छूटा हुआ मायका  

वंदना और रागिनी ने मना करने की बहुत कोशिश की कि भाभी आपको तकलीफ होगी, पर शालिनी ने एक न सुनी। आलोक ने मुस्कुराते हुए टिकट रद्द करा दिया और यात्रा की तारीख चार दिन आगे बढ़ा दी। उन चार दिनों में घर का माहौल और भी अधिक उत्सव जैसा हो गया। भाभी दोनों बहनों को शहर के पुराने बाजारों में ले गईं, उनकी पसंद की चूड़ियाँ, चाट और मिठाइयों का पूरा आनंद दिलवाया। वंदना और रागिनी मन ही मन चकित थीं कि जिस रिश्ते में कभी फासले थे, वह आज इतनी मिठास और अपनत्व से कैसे भर गया।

रसोई में चाय की केतली चढ़ाकर वंदना जैसे ही बर्तन समेटने लगी, डाइनिंग टेबल पर रखे मोबाइल की घंटी अचानक बज उठी। स्क्रीन पर ‘बड़ी भाभी’ का नाम चमकते देख उसके हाथ पल भर के लिए ठिठक गए। पिछले दो वर्षों में बड़ी भाभी यानी शालिनी भाभी का फोन कभी कभार तीज-त्योहार पर केवल एक-दो मिनट की औपचारिक बातचीत के लिए ही आया करता था। मन में थोड़ी हिचकिचाहट और कौतूहल लिए उसने कॉल रिसीव करते हुए कहा, “हेलो, भाभी! नमस्ते, कैसी हैं आप?”

सामने से शालिनी की आवाज आई, “नमस्ते वंदना! मैं बिल्कुल ठीक हूँ, तुम कैसी हो? और बच्चे, भाई साहब सब कैसे हैं?”

“सब ठीक हैं भाभी, आप सुनाइए, अचानक फोन? सब कुशल मंगल तो है न?” वंदना ने थोड़ा संकोच के साथ पूछा।

“हाँ वंदना, सब ठीक है। पर क्या किसी अपने का हालचाल जानने के लिए कोई वजह होनी चाहिए? आज सुबह मैंने रागिनी को भी फोन मिलाया था। सच कहूँ तो तुम दोनों बहनों से मुझे बड़ी शिकायत है। जब से सासू माँ हम सबको छोड़कर गई हैं, तुम दोनों ने तो अपने इस मायके से जैसे नाता ही तोड़ लिया है। क्या तुम्हारा रिश्ता सिर्फ माँ जी से था? क्या उनके चले जाने के बाद बड़े भाई और भाभी की कोई अहमियत नहीं रह जाती? कभी अपने भैया-भाभी की भी खोज-खबर ले लिया करो।”

शालिनी के इन शब्दों ने वंदना के दिल पर जैसे सीधा वार किया। उसने एक ठंडी साँस भरते हुए कहा, “भाभी, ऐसी बात नहीं है। बस… जब से माँ और बाबूजी नहीं रहे, उस घर की तरफ मुड़ने की हिम्मत ही नहीं होती। जहाँ कदम-कदम पर माँ की आहट गूँजती थी, वहाँ उनके बिना कैसे जाऊँ? यहाँ ससुराल की गृहस्थी में उलझकर दिल को बहला लेती हूँ, पर वहाँ की दहलीज पर कदम रखते ही माँ की पुरानी यादें कलेजा चीर देंगी। उस सूनेपन को बर्दाश्त करने का हौसला नहीं होता मुझमें।”

फोन की दूसरी तरफ से शालिनी ने बहुत ही सहज और आत्मीय स्वर में समझाया, “देखो वंदना, तुम्हारी यह बात समझ सकती हूँ। पर सच तो यही है न कि इस संसार में किसी के भी माता-पिता सदा के लिए नहीं रहते। एक न एक दिन सबको इस नश्वर दुनिया को अलविदा कहना ही पड़ता है। तो क्या उनके चले जाने के बाद बेटियाँ अपने मायके की चौखट भूल जाएँगी? भले ही माँ-बाबूजी सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, पर हम भैया-भाभी तो अभी जीवित हैं। जब तक हम हैं, तुम्हारा मायका कैसे छूट सकता है? इस बार जब बच्चों के स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां लगें, तो तुम और रागिनी दोनों अपने-अपने परिवारों के साथ यहाँ आओ। कुछ दिन हमारे पास रहो, हमें भी बहुत अच्छा लगेगा।”

वंदना ने थोड़ा हैरान होते हुए कहा, “अच्छा ठीक है भाभी, देखती हूँ।” और उसने बात समाप्त कर फोन रख दिया।

फोन कटने के बाद वंदना की नजरें खिड़की के बाहर शून्य में टिक गईं। मन में सवालों का बवंडर उठने लगा कि आज अचानक भाभी के सुर इतने बदले हुए क्यों थे? वही शालिनी भाभी, जिन्होंने कभी मुड़कर यह नहीं पूछा था कि ननदें कब आ रही हैं, आज इतनी मनुहार क्यों कर रही थीं? वंदना ने बिना देर किए तुरंत अपनी छोटी बहन रागिनी को फोन लगाया।

“हेलो रागिनी, क्या आज भाभी का फोन तुम्हारे पास भी आया था?” वंदना ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।

रागिनी ने आश्चर्य जताते हुए उत्तर दिया, “हाँ दीदी! अभी थोड़ी देर पहले ही भाभी ने मुझे फोन किया था। बहुत जोर देकर कह रही थीं कि इस छुट्टियों में घर आओ, बहुत दिन हो गए मिले हुए। मुझे तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ। जब माँ थीं, तब तो भाभी ने कभी एक कप चाय के लिए भी हमें अपने कमरे में नहीं बुलाया, हमेशा दूरी बनाकर रखी, और आज अचानक इतना प्यार कैसे उमड़ पड़ा? दीदी, आपका क्या विचार है?”

वंदना ने विचारमग्न होकर कहा, “रागिनी, सच कहूँ तो मेरा मन भी भारी है। पर भाभी ने जिस हक और अपनत्व से बात की, उसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं लग रहा। एक बार चल कर देखते हैं। दो-चार दिन रहकर लौट आएँगे, कम से कम यह तो समझ आएगा कि उनके दिल में क्या है।”

“ठीक है दीदी, अगर आप कह रही हैं तो दो-तीन दिन के लिए चलते हैं,” रागिनी ने सहमति जता दी।

असल में, वंदना और रागिनी का मायका भोपाल के एक पुराने और प्रतिष्ठित इलाके में था। परिवार में दो भाई—आलोक और मयंक—तथा दो बहनें थीं। पिता देवेश जी और माँ मनोरमा जी अत्यंत सरल और स्नेहशील स्वभाव के थे। बड़ा बेटा आलोक और उसकी पत्नी शालिनी शादी के कुछ साल बाद ही माता-पिता से अलग होकर पास ही एक नए स्वतंत्र मकान में रहने लगे थे। शालिनी स्वभाव से अत्यंत तेज-तर्रार, स्वतंत्र विचारों वाली और थोड़े तीखे मिजाज की महिला थीं। उनका मानना था कि वे जीवन भर संयुक्त परिवार के दायित्वों और सास-ससुर की सेवा में अपनी निजी जिंदगी और आजादी को कुर्बान नहीं कर सकतीं। उन्होंने साफ कह दिया था कि वे अपने ढंग से जिंदगी जीना चाहती हैं और माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी छोटे बेटे और बहू को भी उठानी चाहिए।

उस समय जब भी वंदना और रागिनी अपने बच्चों के साथ छुट्टियों में भोपाल आती थीं, तो वे सीधे अपने माँ-बाबूजी और छोटे भाई मयंक के पास ही ठहरती थीं। उस दौर में शालिनी कभी-कभार उनसे मिलने आ जाया करती थीं, पर उन्होंने कभी दोनों ननदों को अपने घर कुछ दिन रहने का न्योता नहीं दिया। धीरे-धीरे समय बीता; पिता देवेश जी का देहांत हो गया। इसके कुछ समय बाद छोटे भाई मयंक की नौकरी इंदौर में लग गई, तो माँ मनोरमा जी भी उसके साथ इंदौर जाकर रहने लगीं।

भोपाल का वह पैतृक मकान सूना हो गया था। जब कभी माँ छुट्टियों में कुछ दिन के लिए भोपाल आतीं, तभी बहनें वहाँ पहुँच पाती थीं। पर दो साल पहले जब मनोरमा जी का भी अचानक देहावसान हो गया, तो दोनों बहनों की दुनिया जैसे बिखर गई। छोटा भाई मयंक परिवार सहित इंदौर में पूरी तरह बस चुका था और भोपाल में केवल आलोक भैया और शालिनी भाभी का घर रह गया था। माँ के जाने के बाद वंदना और रागिनी के लिए भोपाल की जमीन जैसे पराई हो गई थी। वे दोनों अपने उस बचपन के शहर, उस मिट्टी, उन गलियों को देखने के लिए तरस जाती थीं, जहाँ उनका बचपन हँसते-खेलते बीता था। उन्होंने मान लिया था कि अब शायद जीवन में कभी भोपाल अपने मायके के तौर पर नहीं जाया जा सकेगा।

इसी उधेड़बुन में दो-तीन हफ्ते और गुजर गए। एक दिन शालिनी का दोबारा फोन आ गया, “वंदना, बच्चों की छुट्टियां तो शुरू हो चुकी होंगी। तुमने और रागिनी ने आने का क्या कार्यक्रम बनाया? टिकट कब का करवा रही हो? अब बहाने मत बनाना, मैं आलोक से कहकर तुम लोगों के लिए कमरे तैयार करवा रही हूँ।”

भाभी के इस लगातार आग्रह और अपनत्व भरे दबाव के आगे दोनों बहनों का संकोच पिघल गया। उन्होंने आपस में बात करके तीन दिन का संक्षिप्त कार्यक्रम बनाया और भोपाल के लिए ट्रेन की टिकटें बुक करा लीं। हालाँकि मन के किसी कोने में अब भी यह अनजाना डर समाया हुआ था कि कहीं वहाँ पहुँचकर कोई असहज स्थिति न बन जाए या भाभी का व्यवहार फिर से पहले जैसा रूखा न हो जाए।

नियत दिन पर जब वंदना और रागिनी अपने बच्चों के साथ भोपाल स्टेशन पर उतरीं, तो सामने आलोक भैया को मुस्कुराते हुए खड़ा देखकर उनका दिल भर आया। भैया ने बड़े लाड़ से बच्चों का सामान उठाया और गाड़ी में बैठाया।

जैसे ही वे आलोक के घर पहुँचीं, दरवाजे पर शालिनी भाभी आरती की थाली सजाए उनका इंतजार कर रही थीं। दोनों बहनों के चेहरे पर विस्मय के भाव थे। शालिनी ने दोनों को आत्मीयता से गले लगाया, उनका माथा चूमा और बच्चों को दुलारते हुए भीतर ले गईं। पूरा घर महक रहा था। जिस कमरे में उन्हें ठहराया गया, वहाँ साफ-सुथरी चादरें, ताजे फूल और बच्चों की पसंद की कॉमिक्स तक सजी रखी थीं।

“तुम लोग हाथ-मुँह धोकर जल्दी से डाइनिंग टेबल पर आओ, मैंने तुम दोनों की पसंद की कचौड़ियाँ और मूँग दाल का हलवा बनाया है,” शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा।

नाश्ते की मेज पर बैठकर वंदना और रागिनी एक-दूसरे का मुँह ताक रही थीं। वे कचौड़ियाँ बिल्कुल वैसी ही बनी थीं जैसी कभी माँ मनोरमा जी बनाया करती थीं। नाश्ते के बाद बातों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि दोपहर कब ढल गई, पता ही नहीं चला। शालिनी ने ननदों को तनिक भी यह अहसास नहीं होने दिया कि वे किसी पराए घर में आई हैं। वे लगातार उनकी पसंद-नापसंद का ख्याल रख रही थीं। कभी चाय के साथ बचपन के किस्से छेड़ना, कभी पुराने पारिवारिक एल्बम खोलकर हँसना, तो कभी बच्चों के साथ कैरम खेलना—शालिनी का रूप पूरी तरह बदला हुआ था।

दिन में बड़े भैया आलोक उन्हें पुरानी यादें ताजा कराने बड़े तालाब और वीआईपी रोड घुमाने ले गए। शाम को शालिनी ने खुद खड़े होकर दोनों ननदों के लिए उनकी प्रिय पारंपरिक थाली तैयार की। हँसी-मजाक, सुख-दुख के साझा पलों और अपनों के संग में देखते ही देखते तीन दिन पंख लगाकर उड़ गए।

तीसरे दिन की शाम को जब वंदना ने कहा, “भाभी, कल सुबह की हमारी वापसी की ट्रेन है, इसलिए हम पैकिंग कर लेते हैं,” तो शालिनी का चेहरा एकदम उतर गया।

शालिनी ने तुरंत आलोक की तरफ देखा और बोलीं, “अरे, यह क्या बात हुई? अभी तो तुम लोग आई थीं और अभी जाने की बात कर रही हो? बच्चों की तो पूरे महीने की छुट्टी है। आलोक, आप अभी जाकर इनका टिकट निरस्त करवाइए और चार दिन बाद का करवाइए। जब तक कम से कम एक हफ्ता पूरा नहीं होगा, मैं किसी को यहाँ से हिलने नहीं दूँगी।”

वंदना और रागिनी ने मना करने की बहुत कोशिश की कि भाभी आपको तकलीफ होगी, पर शालिनी ने एक न सुनी। आलोक ने मुस्कुराते हुए टिकट रद्द करा दिया और यात्रा की तारीख चार दिन आगे बढ़ा दी। उन चार दिनों में घर का माहौल और भी अधिक उत्सव जैसा हो गया। भाभी दोनों बहनों को शहर के पुराने बाजारों में ले गईं, उनकी पसंद की चूड़ियाँ, चाट और मिठाइयों का पूरा आनंद दिलवाया। वंदना और रागिनी मन ही मन चकित थीं कि जिस रिश्ते में कभी फासले थे, वह आज इतनी मिठास और अपनत्व से कैसे भर गया।

आखिरकार सातवें दिन विदाई की घड़ी आ ही गई। इस बार जब दोनों बहनें तैयार होकर ड्राइंग रूम में आईं, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने सोफे पर दो बेहद खूबसूरत जरी की साड़ियाँ, नए कपड़े, बच्चों के लिए सुंदर उपहार और मिठाइयों के बड़े-बड़े डिब्बे करीने से सजे हुए रखे थे। बिल्कुल उसी तरह, जैसे कभी माँ मनोरमा जी अपनी बेटियों की विदाई के समय सहेजा करती थीं।

शालिनी ने आगे बढ़कर दोनों बहनों के माथे पर रोली और अक्षत का टीका लगाया, उनके हाथों में नारियल और शगुन के लिफाफे थमाए। यह देखकर वंदना और रागिनी अपने आँसुओं का बाँध नहीं रोक पाईं। दोनों फफक-फफक कर शालिनी के गले से लिपट गईं।

वंदना रुंधे गले से बोली, “भाभी… आज आपने जो मान-सम्मान और ममता हमें दी है, उसके बाद हमें लगा ही नहीं कि हमारी माँ इस दुनिया में नहीं हैं। सात दिनों में आपने हमें एक पल के लिए भी अनाथ या बे-मायके का महसूस नहीं होने दिया। आपने हमारी माँ की कमी को अपने आँचल से ढक लिया भाभी।”

शालिनी की आँखें भी छलक आईं। उन्होंने दोनों ननदों के आँसू पोंछते हुए बेहद भावुक होकर कहा, “वंदना, रागिनी… मुझे माफ कर देना। युवावस्था की नादानी और अपने अहम् में मैंने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की थी कि परिवार क्या होता है। जब तक माँ जी जीवित थीं, मुझे लगता था कि जिम्मेदारियाँ केवल एक बंधन हैं। पर जब माँ जी चली गईं और घर खाली हुआ, तब मुझे अहसास हुआ कि रिश्तों की असली पूँजी क्या होती है। जब तुम दोनों ने यहाँ आना बंद कर दिया, तब मुझे लगा कि अगर मैं आगे बढ़कर इस रिश्ते को नहीं सँभालूँगी, तो आलोक का यह घर सचमुच वीरान हो जाएगा। माँ तो चली गईं, पर उनके जाने के बाद यह मेरा कर्तव्य था कि मैं उनके दिए संस्कारों और इस मायके की लाज को बचा कर रखूँ। जब तक तुम्हारी यह भाभी जीवित है, तुम्हारा मायका कभी नहीं छूटेगा। जब भी तुम्हारा मन भारी हो, बिना किसी संकोच के अपने इस घर चली आना।”

आलोक भैया भी अपनी आँखों की नमी छुपाते हुए मुस्कुरा रहे थे। एक बिखरा हुआ परिवार फिर से प्रेम, समझदारी और क्षमा की मजबूत डोर से बँध चुका था। दोनों बहनों ने भाभी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और भीगी आँखों लेकिन तृप्त हृदय के साथ विदा ली, यह विश्वास लेकर कि उनका मायका आज भी उतना ही आबाद और अपना है।

अगर आपको भी लगता है कि माँ के न रहने पर एक समझदार और संवेदनशील भाभी ही मायके की लाज और अस्तित्व को बचाए रख सकती है, तो इस बारे में आपकी क्या राय है? क्या रिश्तों में पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर एक नई शुरुआत करना ही परिवार की असली ताकत है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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