ज़िद की एक चुटकी

  शाम के करीब सात बजे थे और अनघा के चेहरे पर तनी हुई भृकुटियां साफ बता रही थीं कि भीतर कोई तूफान उबल रहा है। काउंटर पर रखी गाजर, बीन्स और शिमला मिर्च पर उसका चाकू कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से चल रहा था। चॉपिंग बोर्ड पर हर वार के साथ वह बुदबुदाती जा रही थी, “इंसान चाहे अपनी जान हथेली पर रखकर दिन-रात सेवा में लगा दे, पर किसी को कोई कद्र नहीं होती! हर बात में टोकना, हर बात में नुक्स निकालना… जैसे मुझसे ज़्यादा तो इन्हें ही सब कुछ पता हो!”

बात कुछ देर पहले की थी। ससुर विश्वनाथ जी बैठक में अखबार पढ़ रहे थे। जब अनघा उन्हें शाम की तुलसी वाली चाय देने गई, तो उन्होंने सामान्य लहजे में कह दिया था, “बहू, आज दाल में नमक कुछ ज़्यादा था और शायद थोड़ा तेल भी। अब मेरी उम्र ऐसी नहीं रही कि भारी खाना पचा सकूं। तुम्हें तो मालूम ही है कि मेरा पेट कितना नाज़ुक है, थोड़ा ख्याल रखा करो।”

वह बात विश्वनाथ जी ने बिना किसी दुर्भावना के कही थी, मगर सुबह से दफ्तर के काम, बच्चों की पढ़ाई और घर की चौखट के बीच उलझी अनघा के अहं पर यह बात तीर की तरह चुभ गई। उसे लगा कि उसकी मेहनत को सिरे से खारिज कर दिया गया। सास के जाने के बाद पिछले चार सालों से उसने कभी इस घर में किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी थी। विश्वनाथ जी की हर दवा, उनका उबला हुआ पानी, उनका सादा नाश्ता—हर चीज़ का ख्याल वही रखती थी। लेकिन आज की यह मामूली-सी नसीहत उसके सब्र का बांध तोड़ गई थी।

“अच्छा! तो आपको हर चीज़ से परहेज़ है? हर चीज़ में बीमारी नज़र आती है? आज देखती हूं कि सच में कुछ होता है या सिर्फ अपनी हुकूमत चलाने के बहाने हैं!” अनघा ने गुस्से में भरकर मन ही मन कहा।

आज बच्चों—आरव और तन्वी—की ज़िद थी कि रात के खाने में मेथी-मटर मलाई और गरमा-गरम पराठे बनें। साथ ही उन्होंने पनीर टिक्का की भी मांग रखी थी। विश्वनाथ जी को बचपन से ही भुनी हुई मूंगफली और मेथी से सख्त एलर्जी थी। खासकर मेथी का असर उन पर इतना गहरा होता था कि सांस की नली में सूजन और त्वचा पर चकत्ते उभर आते थे। यह बात घर के हर सदस्य को पता थी। विश्वनाथ जी के लिए रोज़ रात को बिना छौंक की मूंग की दाल और लौकी या तोरई की सादी तरी बनती थी।

क्रोध में विवेक खो चुकी अनघा ने बच्चों की सब्ज़ी के लिए तैयार किया गया गाढ़ा मसाला देखा, जिसमें कसूरी मेथी और पिसी हुई भुनी मूंगफली का पेस्ट मिलाया गया था। उसने कुकर में विश्वनाथ जी के लिए लौकी और टमाटर का पतला सूप उबलने रखा था। एक पल के लिए उसके हाथ ठिठके, मगर दूसरे ही पल अभिमान और खीझ ने उसके दिमाग को घेर लिया। “ज़रा-सी मेथी और दो दाने मूंगफली से क्या पहाड़ टूट पड़ेगा? बस वहम पाल रखा है इन्होंने। आज थोड़ा-सा डालकर देखती हूं, पता भी नहीं चलेगा और रोज़-रोज़ का यह नखरा भी समझ आ जाएगा।”

उसने मसाले की कड़ाही से एक चम्मच ग्रेवी उठाई और सूप के कुकर में घोल दी। सूप का रंग हल्का-सा बदला, मगर खुशबू मसालों में दब गई।

रात के आठ बजे मेज़ पर खाना लगा। अनघा के पति प्रणय दफ्तर से थके-हारे लौटे थे। बच्चों ने खुशी-खुशी अपनी पसंदीदा सब्ज़ी खाई। अनघा ने एक कटोरे में सूप निकाला और चुपचाप विश्वनाथ जी के कमरे में ले जाकर रख दिया।

विश्वनाथ जी ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और मुस्कुराते हुए कहा, “थक गई होगी न बहू? बैठ, दो मिनट सांस ले ले। शाम को शायद मैंने कुछ ज़्यादा ही कह दिया था, बुरा मत मानना। तू अकेली कितना करेगी, मैं समझता हूं बेटा।”

ससुर के ये शब्द सुनकर अनघा के सीने में एक अजीब-सी सिहरन दौड़ी। एक सेकंड के लिए लगा कि वह कटोरा छीन ले और कह दे कि यह मत पीजिए। मगर उसका अहंकार और संकोच आड़े आ गया। उसने सिर्फ इतना कहा, “कोई बात नहीं पापा जी, आप सूप पी लीजिए, ठंडा हो जाएगा।”

विश्वनाथ जी ने दो-तीन घूंट पिए। उन्हें स्वाद थोड़ा अलग लगा, मगर उन्होंने सोचा कि शायद बहू ने कोई नया हर्ब डाला होगा। बहू का दिल रखने के लिए उन्होंने पूरा सूप खत्म कर दिया।

रात के दस बजे तक घर के सब लोग अपने-अपने कमरों में सोने चले गए। अनघा भी बिस्तर पर लेट गई, लेकिन उसकी आंखों से नींद गायब थी। रह-रहकर रसोई की वह घटना उसके ज़ेहन में कौंध रही थी। घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर आगे बढ़ रही थीं।

करीब साढ़े ग्यारह बजे सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी कराह सुनाई दी।

अनघा की आंखें तुरंत खुल गईं। वह झटके से उठ बैठी। आवाज़ विश्वनाथ जी के कमरे से आ रही थी। प्रणय भी हड़बड़ा कर उठ गया, “यह पापा के कमरे से आवाज़ कैसी आ रही है?”

दोनों भागते हुए विश्वनाथ जी के कमरे में पहुंचे। वहां का नज़ारा देखकर प्रणय के पैरों तले ज़मीन खिसक गई और अनघा का कलेजा हलक में आ गया।

विश्वनाथ जी बिस्तर पर तड़प रहे थे। उनका पूरा चेहरा लाल पड़ चुका था और गर्दन पर गहरे लाल रंग के उभरे हुए चकत्ते साफ दिख रहे थे। वे दोनों हाथों से अपने गले को पकड़कर सांस खींचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सांस की नली से केवल घुरघुराहट की भयानक आवाज़ निकल रही थी। उनकी आंखें फटी हुई थीं और होंठ नीले पड़ने लगे थे।

“पापा! क्या हुआ पापा?” प्रणय पागलों की तरह चिल्लाया और उन्हें सहारा देकर बिठाने की कोशिश करने लगा। लेकिन विश्वनाथ जी कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थे। उनका शरीर कांप रहा था।

“अनघा! जल्दी पानी लाओ! देखो क्या हो गया इन्हें!” प्रणय ने बदहवास होकर आवाज़ लगाई।

अनघा बुत बनी खड़ी थी। उसके हाथ-पैर बर्फ जैसे ठंडे पड़ चुके थे। उसका दिमाग सुन्न हो गया था। यह कोई वहम नहीं था, यह एनाफिलेक्टिक शॉक था—वही जानलेवा एलर्जी जिसकी चेतावनी डॉक्टर हमेशा देते थे।

“पानी नहीं… प्रणय… हमें… हमें तुरंत अस्पताल जाना होगा!” अनघा की आवाज़ कांप रही थी, उसके गले से आवाज़ मुश्किल से निकली।

पड़ोस के एक परिचित की मदद से विश्वनाथ जी को गाड़ी में डाला गया। रात के बारह बजे गाड़ी शहर के एक बड़े निजी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के सामने रुकी। विश्वनाथ जी तब तक अर्धमूर्छित हो चुके थे।

डॉक्टरों की टीम तुरंत हरकत में आई। उन्हें सीधे आईसीयू में ले जाया गया। बाहर लाल बत्ती जल उठी।

प्रणय गलियारे में बेचैनी से चक्कर काट रहा था, उसकी आंखों में आंसू थे। “अचानक यह कैसे हो गया? शाम तक तो पापा बिल्कुल भले-चंगे थे। उन्होंने कुछ उल्टा-सीधा तो नहीं खाया? अनघा, तुमने क्या दिया था उन्हें?”

अनघा दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी। उसके पैर उसका बोझ उठाने से इनकार कर रहे थे। वह चाहती तो झूठ बोल सकती थी, वह कह सकती थी कि उसे कुछ नहीं पता। मगर अंदर जो आग जल रही थी, वह किसी भी सज़ा से बदतर थी। सामने आईसीयू के कांच के पार उसके ससुर ज़िंदगी और मौत से लड़ रहे थे—सिर्फ उसकी एक छोटी-सी ज़िद, उसके झूठे गुस्से के कारण।

“प्रणय…” अनघा के मुंह से सिसकी निकल पड़ी। वह ज़मीन पर बैठ गई और सिर पकड़कर रोने लगी।

“क्या हुआ अनघा? तुम इस तरह क्यों रो रही हो? डॉक्टर देख रहे हैं न, सब ठीक हो जाएगा।” प्रणय ने उसे संभालना चाहा।

“सब ठीक नहीं होगा प्रणय… यह सब मेरी वजह से हुआ है। मैंने… मैंने पापा के सूप में मेथी और मूंगफली की ग्रेवी मिला दी थी…” अनघा ने रोते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया।

प्रणय जैसे किसी गहरे सदमे में चला गया। उसका हाथ अनघा के कंधे से हट गया। उसकी आंखों में अविश्वास और गहरा दर्द था। “क्या? तुमने… तुमने जानबूझकर ऐसा किया? तुम जानती थी कि पापा को इससे कितनी खतरनाक एलर्जी है! अनघा, तुम इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती हो? सिर्फ इसलिए कि उन्होंने शाम को खाने पर टोक दिया था?”

“मुझे माफ कर दो प्रणय! मुझे लगा वो सिर्फ वहम करते हैं… मुझे नहीं पता था कि यह इतना जानलेवा हो जाएगा! भगवान के लिए मुझे माफ कर दो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था…” अनघा दोनों हाथ जोड़कर फूट-फूट कर रो रही थी।

प्रणय ने बिना कुछ कहे मुंह फेर लिया और आईसीयू के दरवाज़े की तरफ भागा। उसने तुरंत ड्यूटी डॉक्टर को अंदर जाकर बताया कि मरीज़ ने अनजाने में मेथी और मूंगफली का सेवन कर लिया है।

यह जानकारी मिलते ही डॉक्टरों ने इलाज की दिशा तुरंत बदली। उन्हें तुरंत एपिनेफ्रीन और एंटीहिस्टामाइन के इंजेक्शन दिए गए।

अगले दो घंटे अनघा के लिए दो सदियों जैसे बीते। अस्पताल के ठंडे फर्श पर बैठकर उसने ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग लड़ी थी—अपने खुद के पश्चाताप से। उसने मन ही मन ईश्वर से केवल एक भीख मांगी, “हे भगवान, मेरे ससुर जी को बचा लो। चाहे मुझे जो सज़ा मिले, मैं भुगतने को तैयार हूं, लेकिन मेरे हाथों किसी की जान मत जाने दो।”

रात के करीब ढाई बजे आईसीयू का दरवाज़ा खुला। डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने मास्क हटाया।

“मरीज़ अब खतरे से बाहर हैं,” डॉक्टर ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा। “अच्छा हुआ कि आपने समय पर बता दिया कि एलर्जेन क्या था। सांस की नली पूरी तरह ब्लॉक होने ही वाली थी। अगर पंद्रह मिनट की भी देर होती, तो हम उन्हें बचा नहीं पाते। अब उनकी हालत स्थिर है, सुबह तक होश आ जाएगा।”

यह सुनते ही प्रणय की आंखें भर आईं और उसने राहत की सांस ली। अनघा वहीं फर्श पर माथा टेककर रो पड़ी। उसके आंसुओं में अब डर नहीं, बल्कि ज़िंदगी भर का पश्चाताप और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता थी।

सुबह की पहली किरण के साथ विश्वनाथ जी को होश आ गया। उन्हें जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था। चेहरे की सूजन काफी कम हो चुकी थी, हालांकि कमज़ोरी साफ झलक रही थी।

प्रणय कमरे में गया, उसके पीछे सहमी हुई अनघा भी दाखिल हुई। उसकी नज़रें ज़मीन पर गड़ी हुई थीं। वह विश्वनाथ जी से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

विश्वनाथ जी ने कमज़ोर आवाज़ में कहा, “प्रणय… अनघा बेटा…”

अनघा से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। वह दौड़कर विश्वनाथ जी के बिस्तरों के पास घुटनों के बल बैठ गई और उनके हाथ पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। “पापा जी, मुझे माफ कर दीजिए! मैं बहुत बुरी हूं। कल रात सूप में जो कुछ हुआ, वह गलती से नहीं हुआ था… मैंने अपने गुस्से में, अपने अहंकार में आकर वो मसाला डाल दिया था। मुझे लगा आप सिर्फ नाटक करते हैं… मेरी एक नादानी आपकी जान ले सकती थी पापा जी! मुझे पुलिस के हवाले कर दीजिए, मुझे घर से निकाल दीजिए, लेकिन मुझे माफ मत कीजिए!”

कमरे में सन्नाटा छा गया। प्रणय चुपचाप खड़ा अपनी पत्नी के पश्चाताप को देख रहा था।

विश्वनाथ जी ने धीरे से अपना कांपता हुआ हाथ उठाया और अनघा के सिर पर रख दिया। उनके चेहरे पर क्रोध या नफरत का कोई भाव नहीं था, बल्कि एक पिता की असीम करुणा झलक रही थी।

“पगली…” विश्वनाथ जी ने धीमी आवाज़ में कहा, “तू अगर सच में बुरी होती, तो रात को मुझे अस्पताल लेकर नहीं भागती। तू अगर पत्थर दिल होती, तो सच बताने की हिम्मत नहीं करती। इंसान से कभी-कभी गुस्से में गलतियां हो जाती हैं बेटा। जब मन पर अहंकार और थकान का पर्दा पड़ता है, तो सही और गलत की पहचान खो जाती है।”

अनघा ने भीगी आंखों से ऊपर देखा।

विश्वनाथ जी ने आगे कहा, “चार साल से तूने इस घर को अपनी हथेलियों पर संभाल रखा है। मेरी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का तूने हमेशा ध्यान रखा। कल शाम मेरी ही बात कहने का ढंग शायद गलत था। जब अपना कोई बहुत मेहनत करे और उसे बदले में सिर्फ कमी सुनाई दे, तो ठेस लगती है। मैं तुम्हारी उस थकान को नहीं समझ पाया। लेकिन देख, भगवान ने हमें संभलने का एक मौका दिया है।”

“पापा जी, आप मुझे डांटिए मत, सज़ा दीजिए… आपका यह बड़प्पन मुझे और शर्मिंदा कर रहा है,” अनघा की रुलाई थम नहीं रही थी।

“सज़ा तो तुझे रात भर मिल गई बहू, जब तू उस गलियारे में तिल-तिल मरी होगी,” विश्वनाथ जी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा। “पश्चाताप के आंसुओं से बड़ा कोई प्रायश्चित नहीं होता। आज के बाद कभी अपने दिल में कड़वाहट मत पालना। जब भी कोई बात बुरी लगे, तो मुंह पर बोल देना, लेकिन अपने भीतर के उस प्यार और सेवा भाव को गुस्से की भेंट मत चढ़ने देना।”

प्रणय आगे बढ़ा और उसने अनघा के कंधे पर हाथ रखा। उसके चेहरे से भी अब कड़वाहट मिट चुकी थी। उसने देखा कि उसकी पत्नी का अहंकार पूरी तरह गल चुका था और वहां अब सिर्फ सच्ची आत्मीयता बची थी।

उस दिन अनघा ने अस्पताल के उस कमरे में एक नया जन्म लिया था। उसने समझ लिया था कि परिवार केवल कर्तव्यों के बोझ से नहीं चलता, बल्कि आपसी संवाद, समझदारी और क्षमा से चलता है। गुस्से में उठाया गया एक छोटा-सा कदम भी अपनों को हमेशा के लिए छीन सकता है।

दो दिन बाद जब विश्वनाथ जी घर लौटे, तो घर का माहौल बदला हुआ था। अनघा ने सबसे पहले घर के मंदिर में दिया जलाया और फिर पूरे आदर के साथ अपने ससुर के पैर छुए। अब उसके काम में कोई बोझ या झल्लाहट नहीं थी, बल्कि एक नया ठहराव और गहरा प्रेम था। उस कड़वी रात ने परिवार की नींव को हिला ज़रूर दिया था, मगर सच और क्षमा के धागों ने उसे पहले से भी ज़्यादा अटूट बना दिया।

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क्रोध में इंसान अक्सर वह कर बैठता है जिसका पछतावा उसे ताउम्र रहता है। क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में अपनी बात को दबाकर गुस्सा पालने के बजाय सीधे बातचीत कर लेना ज़्यादा बेहतर है? विश्वनाथ जी के इस क्षमा भाव पर आपकी क्या राय है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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