सुबह की हल्की धूप आँगन में उतर रही थी। रसोई से चाय की खुशबू और मंदिर की घंटियों की आवाज़ पूरे घर में घुल रही थी। सुमन रोज़ की तरह सबसे पहले उठ गई थी। सास-ससुर की चाय, पति राजेश का नाश्ता, बच्चों के टिफिन—सब कुछ उसकी दिनचर्या का हिस्सा था।
पिछले पंद्रह वर्षों से यही घर उसकी दुनिया था। उसने इस घर को सिर्फ संभाला नहीं था, बल्कि अपने स्नेह से सींचा था। बच्चों की पहली मुस्कान से लेकर उनकी हर छोटी-बड़ी परेशानी तक, सुमन उनके साथ खड़ी रही थी। सास की दवाइयों का समय उसे बिना घड़ी देखे याद रहता और ससुर की पसंद की सब्जी वह बाज़ार से खुद चुनकर लाती।
घर में सब उससे प्यार करते थे, लेकिन धीरे-धीरे एक बात उसे भीतर से चुभने लगी थी।
उसकी हर मेहनत को जैसे “यह तो उसका काम है” कहकर सहज मान लिया जाता था।
एक दिन राजेश के छोटे भाई की पत्नी ने घर में कुछ दिनों के लिए रहने आने की इच्छा जताई। वह आई तो घर में खूब रौनक हो गई। सुमन ने खुशी-खुशी उसके लिए कमरे की सफाई की, उसकी पसंद का खाना बनाया और बच्चों की तरह उसका स्वागत किया।
शाम को सब बैठे बातें कर रहे थे। तभी छोटी बहू ने हँसते हुए कहा,
“भाभी, आप तो घर पर ही रहती हैं, इसलिए ये सब काम आपके लिए मुश्किल नहीं होते होंगे।”
सुमन मुस्कुरा दी।
शब्द छोटे थे, मगर कहीं भीतर गहरे उतर गए।
उसने सोचा—“घर पर रहती हूँ… इसलिए?”
क्या घर संभालना कोई काम नहीं?
अगले दिन राजेश के दोस्तों का परिवार अचानक घर आ गया। सुमन ने बिना किसी शिकायत के खाना बनाया। सबने खाना खाया और उसकी तारीफ की।
राजेश के एक मित्र ने मुस्कुराकर कहा,
“भाभी जी, आपकी वजह से राजेश बहुत आराम से रहता है।”
राजेश हँसकर बोला,
“अरे, ये तो घर का काम है। इसमें कौन-सी बड़ी बात है!”
सुमन के हाथ में पकड़ा गिलास कुछ पल के लिए ठहर गया।
उस रात बच्चे सो चुके थे। राजेश भी मोबाइल में व्यस्त था। सुमन चुपचाप बालकनी में बैठी आसमान देख रही थी।
राजेश ने पूछा,
“क्या हुआ? आज कुछ परेशान लग रही हो।”
सुमन ने पहली बार बिना मुस्कुराए कहा,
“राजेश, क्या तुम्हें लगता है कि मैं इस घर में सिर्फ काम करने के लिए हूँ?”
राजेश ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
“तुम ऐसा क्यों कह रही हो?”
“क्योंकि कभी-कभी लगता है कि मेरी मेहनत दिखाई नहीं देती। मैं तुम्हारे माता-पिता को अपने माता-पिता समझकर उनकी सेवा करती हूँ। बच्चों के लिए अपनी कितनी इच्छाएँ छोड़ दीं, उसका हिसाब कभी नहीं रखा। तुम्हारे लिए हर कदम पर साथ दिया। लेकिन जब मेरी बात आती है तो सब कहते हैं—‘तुम तो घर पर रहती हो।’”
राजेश कुछ नहीं बोला।
सुमन की आँखों में आँसू थे, मगर आवाज़ में दृढ़ता थी।
“मुझे किसी से हिसाब नहीं चाहिए। मुझे अपनी मेहनत की कीमत भी नहीं चाहिए। बस इतना चाहती हूँ कि मुझे भी सम्मान मिले। स्वाभिमान मेरा भी है, राजेश।”
यह सुनकर राजेश का सिर झुक गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस सुमन को वह हमेशा मजबूत समझता था, वह भी कभी-कभी थकती होगी। उसे भी मन होता होगा कि कोई उससे पूछे—“तुम कैसी हो?”
अगली सुबह सुमन हमेशा की तरह उठी, लेकिन इस बार रसोई में जाने से पहले ससुर जी ने उसे आवाज़ दी।
“बहू, आज चाय मैं बनाऊँगा।”
सुमन मुस्कुराई,
“आप रहने दीजिए, मैं बना देती हूँ।”
ससुर जी बोले,
“नहीं बहू, इतने साल तुमने सबके लिए बनाया है। आज हमें भी तुम्हारे लिए कुछ करने दो।”
सास ने पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटी, हमें कभी समझ ही नहीं आया कि तुम बहू से कब बेटी बन गईं। तुम्हारी चुप्पी को हमने तुम्हारी आदत समझ लिया। हमें माफ कर दो।”
सुमन की आँखें भर आईं।
तभी राजेश ने बच्चों के टिफिन उठाते हुए कहा,
“आज टिफिन मैं तैयार करूँगा।”
बेटी हँसते हुए बोली,
“पापा, आपको तो पता ही नहीं मेरे टिफिन में क्या जाता है!”
सब हँस पड़े।
उस दिन पहली बार सुमन ने महसूस किया कि उसके घर में कुछ बदला है।
बड़ा बदलाव नहीं था—न कोई भाषण, न कोई वादा।
बस रिश्तों में थोड़ी-सी समझ बढ़ गई थी।
कुछ दिनों बाद सुमन ने पास के विद्यालय में बच्चों को संगीत सिखाने का काम शुरू कर दिया। यह उसका वर्षों पुराना सपना था।
राजेश ने उसका हाथ थामकर कहा,
“तुमने इतने साल हमारा सपना पूरा किया। अब अपनी बारी है। अपने सपने को भी जी लो।”
सुमन की आँखों में चमक आ गई।
उसने मुस्कुराकर कहा,
“घर मेरा है, परिवार मेरा है और रिश्ते भी मेरे हैं। इन्हें निभाना मुझे आता है। लेकिन अब मेरी पहचान सिर्फ किसी की पत्नी, बहू या माँ नहीं होगी। मैं सुमन भी हूँ।”
राजेश ने कहा,
“और हमें तुम पर गर्व है।”
सुमन ने आँगन की ओर देखा। वही घर था, वही लोग थे, वही रिश्ते थे।
बस फर्क इतना था कि अब उन रिश्तों में कर्तव्य के साथ सम्मान भी था।
उसे समझ आ गया था—
रिश्ते वहाँ खूबसूरत होते हैं, जहाँ त्याग एकतरफा नहीं होता,
जहाँ स्नेह के साथ सम्मान भी मिलता है,
और जहाँ किसी को अपने अस्तित्व के लिए आवाज़ ऊँची नहीं करनी पड़ती।
क्योंकि प्यार माँगा नहीं जाता,
लेकिन सम्मान हर इंसान का अधिकार है।
और उस दिन सुमन ने मन ही मन कहा—
“मैंने रिश्तों के लिए बहुत कुछ छोड़ा है,
पर अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ूँगी।
क्योंकि स्वाभिमान मेरा भी है।”
सुदर्शन सचदेवा