“बाबूजी कोई बच्चे नहीं हैं अनिकेत। उन्होंने दुनिया देखी है। वो जानते थे कि तुम झूठ बोल रहे हो, लेकिन उन्होंने तुम्हारा झूठ इसलिए सच मान लिया क्योंकि वो तुम्हारी खुशी देखना चाहते थे। और तुमने भी झूठ इसलिए बोला क्योंकि तुम उन्हें तकलीफ में नहीं देख सकते थे। ये जो झूठ बोलने की बीमारी है ना, ये दरअसल कोई बीमारी नहीं है… ये तो तुम बाप-बेटों की विरासत है, जो प्यार जताने का तुम लोगों का अपना तरीका है।”
सर्दियों की वो सुबह थी जब दिल्ली की हवा में एक अजीब सी चुभन होती है। मैं बालकनी में खड़ा होकर अपने हाथों से कॉफी के मग की गर्माहट महसूस कर रहा था, लेकिन मेरा दिमाग आज से बीस साल पुरानी स्मृतियों में उलझा हुआ था। कल रात ही हम लोग मेरे होमटाउन, बनारस से वापस लौटे थे। सूटकेस अभी भी आधे खुले पड़े थे और पूरे घर में थकान पसरी हुई थी। मेरी पत्नी, अंजलि, अंदर कमरे में हमारे सात साल के बेटे आरव का स्कूल बैग तैयार कर रही थी। तभी अचानक मुझे अपने पिता, यानी बाबूजी का ख्याल आया। बनारस स्टेशन पर मुझे विदा करते समय उनकी आँखों में जो चमक थी, वो मेरे जेहन में बस गई थी। वो चमक उस कीमती पश्मीना शॉल की वजह से नहीं थी जो मैंने उन्हें दी थी, बल्कि उस झूठ की वजह से थी, जिसने उन्हें वो शॉल ओढ़ने पर मजबूर कर दिया था।
बचपन से ही मैंने बाबूजी को हमेशा एक खास तरह की ‘बीमारी’ से जूझते देखा था। यह बीमारी कोई शारीरिक तकलीफ नहीं थी, बल्कि अपनी इच्छाओं को मारकर हम बच्चों की खुशियों को तरजीह देने की एक अजीब सी आदत थी। हमारे घर की आर्थिक स्थिति उन दिनों बहुत सामान्य हुआ करती थी। बाबूजी एक सरकारी स्कूल में क्लर्क थे। उनकी सीमित तनख्वाह में महीने भर का खर्च चलाना और हम दो भाई-बहनों की पढ़ाई का जिम्मा उठाना किसी जादूगरी से कम नहीं था। लेकिन बाबूजी कभी उफ़ तक नहीं करते थे।
मुझे आज भी याद है, जब मैं आठ या नौ साल का था, तब एक दिन बाबूजी बाज़ार से आम लेकर आए थे। वो दशहरी आमों का मौसम था। आम देखकर मेरी और मेरी छोटी बहन की बांछें खिल गईं। माँ ने आमों को धोकर काटा और हम सब खाने बैठे। मैंने देखा कि बाबूजी हमेशा गुठली वाला हिस्सा ही उठाते थे, जिसमें गूदा कम होता था। जब मैंने उनसे पूछा, “बाबूजी, आप फाँक क्यों नहीं खाते? गुठली में तो कुछ होता ही नहीं है।” तब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, “अरे बेटा, असली स्वाद तो गुठली चूसने में ही है। ये गूदा-वूदा तो तुम बच्चों के लिए है। मुझे तो गुठलियां ही सबसे ज्यादा पसंद हैं।” उस वक्त मेरी नासमझ उम्र इस बात को सच मान बैठी थी। मैं सोचता था कि बाबूजी का स्वाद हम सबसे कितना अलग है।
लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे उनकी इस ‘पसंद’ की हकीकत समझ आने लगी। ये सिर्फ आम की गुठली तक सीमित नहीं था। जब भी घर में कोई नई चीज़ आती, बाबूजी की यही कहानी होती। एक बार दीवाली के मौके पर मैंने ज़िद करके अपने लिए एक महंगा क्रिकेट बैट खरीदवा लिया था। उस साल माँ ने बाबूजी के लिए एक नया कुर्ता-पायजामा सिलवाया था, क्योंकि उनका पुराना कुर्ता कई जगह से घिस चुका था। लेकिन बाबूजी ने उसे पहनने से साफ इंकार कर दिया। उनका तर्क था, “अरे भागवान, ये रंग तो देखो! इतना चटक नीला रंग पहनूंगा तो स्कूल के बच्चे क्या कहेंगे? ये सब तुम नौजवानों पर अच्छा लगता है, मेरी तो उम्र हो गई है।” माँ ने लाख समझाया, लेकिन वो नहीं माने। बाद में मुझे पता चला कि उस महीने मेरा बैट खरीदने की वजह से बजट बिगड़ गया था, और दर्जी को देने के लिए पूरे पैसे नहीं थे। इसलिए बाबूजी ने रंग का बहाना बनाकर वो कपड़ा मेरे एक चचेरे भाई को दे दिया था और खुद दीवाली के दिन वही पुराना धुला हुआ कुर्ता पहनकर पूजा में बैठे थे।
मुझे उनकी इन बातों पर बहुत गुस्सा आता था। मुझे लगता था कि वो बेवजह का नाटक करते हैं। जब मैं कॉलेज में गया, तो मैंने कई बार उनसे बहस भी की। “बाबूजी, आप सीधे-सीधे क्यों नहीं कह देते कि आप हमारे लिए त्याग कर रहे हैं? ये अजीब-अजीब से बहाने बनाने की क्या ज़रूरत है?” मेरी इस बात पर वो बस एक फीकी सी मुस्कान दे देते और कहते, “बेटा, जब तुम बाप बनोगे तब समझोगे। कोई बाप त्याग नहीं करता, वो बस अपनी खुशी चुनता है।” उस वक्त मुझे उनकी बातें बहुत किताबी लगती थीं। मुझे लगता था कि एक इंसान अपनी ज़रूरतों को मारकर खुश कैसे रह सकता है?
समय का पहिया घूमा। मैं पढ़-लिखकर दिल्ली आ गया, एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी लग गई। अंजलि से शादी हो गई और फिर आरव हमारी जिंदगी में आ गया। जीवन की आपाधापी में मैं बाबूजी के उन पुराने किस्सों को लगभग भूल सा गया था। लेकिन इस बार जब हम दीवाली की छुट्टियों में बनारस गए, तो हालात कुछ और ही थे।
बनारस का हमारा वो पुराना घर अब भी वैसा ही था, बस बाबूजी बहुत बूढ़े हो गए थे। उनके घुटनों में अब दर्द रहने लगा था और सर्दियों की शुरुआत होते ही उनकी खाँसी बढ़ जाती थी। माँ ने बताया कि डॉक्टर ने उन्हें ठंड से पूरी तरह बचने की हिदायत दी है, लेकिन वो अब भी अपनी पुरानी सूती शॉल ही ओढ़ते हैं। “मैंने कितनी बार कहा कि वो पुरानी शॉल अब गर्माहट नहीं देती, लेकिन तुम्हारे बाबूजी तो बस अपनी ज़िद पर अड़े रहते हैं। कहते हैं कि नई शॉल बहुत भारी होती है, उनसे सम्भलती नहीं,” माँ ने रसोई में पूड़ियां तलते हुए मुझसे शिकायत की।
मैंने जब बाबूजी को देखा, तो वो वाकई उस पुरानी, जगह-जगह से घिसी हुई शॉल में खुद को लपेटे हुए थे। उनका शरीर ठंड से हल्का-हल्का कांप रहा था, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी तसल्ली वाली मुस्कान थी। मेरा मन अंदर तक कचोट गया। मैं उसी शाम अंजलि को लेकर शहर के सबसे बड़े शोरूम में गया। मैंने वहां से एक बहुत ही मुलायम, हल्की और बेहद गर्म पश्मीना शॉल खरीदी। वो शॉल इतनी हल्की थी कि मुट्ठी में आ जाए, लेकिन उसकी गर्माहट किसी भारी रजाई से कम नहीं थी। इसके साथ ही मैंने उनके लिए ऑर्थोपेडिक जूतों की एक जोड़ी भी ली, ताकि सुबह की सैर में उनके घुटनों पर जोर ना पड़े।
जब मैं वो सामान लेकर घर पहुँचा और मैंने वो शॉल बाबूजी के सामने रखी, तो उनकी आँखों में एक पल के लिए जो चमक आई, वो मुझसे छुप नहीं सकी। उन्होंने अपने कांपते हाथों से उस शॉल को छुआ। उसका मखमली एहसास उन्हें बहुत अच्छा लगा, यह उनके चेहरे से साफ झलक रहा था। लेकिन अगले ही पल, उनकी वही पुरानी ‘बीमारी’ जाग उठी।
“अरे बेटा, ये क्या ले आए? ये तो बहुत महंगी लग रही है,” उन्होंने शॉल को वापस पॉलिथीन में डालते हुए कहा।
“बाबूजी, आप कीमत की चिंता मत कीजिए। आप इसे ओढ़कर देखिए, एकदम हल्की है और बहुत गर्म भी। डॉक्टर ने कहा है ना ठंड से बचने के लिए,” मैंने उन्हें समझाते हुए कहा।
“ना बाबा ना!” उन्होंने तुरंत इंकार कर दिया। “इतनी मुलायम और कीमती चीज़ मुझसे नहीं सम्भलेगी। मैं तो ठहरा पुराना आदमी, कहीं चाय-वाय गिरा दी तो दाग लग जाएगा। और ये रंग… ये तो बिल्कुल औरतों वाला रंग है। मोहल्ले वाले देखेंगे तो क्या कहेंगे? तुम इसे वापस कर दो।”
उन्होंने जूते देखकर भी यही कहा, “इन जूतों का डिज़ाइन तो देखो, बिल्कुल अंतरिक्ष यात्रियों जैसा लग रहा है। मेरे वो चमड़े वाले जूते अभी बिल्कुल ठीक हैं, बस एक बार पॉलिश करवा लूंगा तो नए जैसे हो जाएंगे।”
मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। इतने साल बीत गए थे, लेकिन बाबूजी की आदत रत्ती भर भी नहीं बदली थी। अंजलि मेरे पास आई और धीरे से बोली, “रहने दो, वो नहीं मानेंगे। उन्हें लगता है कि इतने पैसे उनके ऊपर खर्च करना बर्बादी है। वो हमेशा से ऐसे ही हैं।”
अगले दो दिनों तक वो शॉल और जूते मेरे कमरे में ही पड़े रहे। मैंने बाबूजी को कई बार मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कह दिया कि अगर मैंने वो वापस नहीं किए, तो वो मुझसे बात नहीं करेंगे। मेरी छुट्टियां खत्म हो रही थीं। परसों हमें दिल्ली वापस लौटना था। मैं बहुत बेचैन था। मैं किसी भी कीमत पर बाबूजी को उस पुरानी, घिसी हुई शॉल में ठंड से ठिठुरता हुआ छोड़कर नहीं जाना चाहता था।
अचानक, पैकिंग करते समय मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा। वो एक ऐसा विचार था जो शायद मेरे खून में ही बसा हुआ था। मैंने अंजलि को अपना प्लान बताया। पहले तो वो हंसी, फिर बोली, “देखते हैं तुम्हारी ये तरकीब काम आती है या नहीं।”
अगली सुबह, जब सब लोग नाश्ते की मेज पर बैठे थे, मैं जानबूझकर एक बहुत उदास और परेशान सा चेहरा बनाकर बाहर आया। मेरे हाथ में वो पश्मीना शॉल और जूतों का डिब्बा था। मैंने डिब्बे को ज़मीन पर पटकते हुए सोफे पर खुद को गिरा लिया।
“क्या हुआ बेटा? तू इतना परेशान क्यों है?” माँ ने चिंता से पूछा। बाबूजी ने भी अपना अखबार नीचे रख दिया।
“कुछ नहीं माँ, सब गड़बड़ हो गया,” मैंने मुँह बनाते हुए कहा। “ये जो शॉल और जूते मैं लाया था ना, ये मैंने दरअसल अपने बॉस के लिए खरीदे थे। उन्हें इस तरह की चीज़ें बहुत पसंद हैं। मैंने सोचा था कि गिफ्ट करूंगा तो शायद मेरा प्रमोशन पक्का हो जाए।”
बाबूजी ने आँखें सिकुड़ते हुए मेरी तरफ देखा। “तो इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? दे देना उन्हें।”
“अरे कैसे दे दूँ बाबूजी! कल रात उनका फोन आया था। वो कह रहे थे कि उनका इस हफ्ते का टूर कैंसिल हो गया है और वो किसी काम से लंदन जा रहे हैं। अब वो दो महीने बाद आएंगे। और सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इस शोरूम की पॉलिसी है कि बिका हुआ सामान सिर्फ तीन दिन के अंदर वापस हो सकता है। आज चौथा दिन है। मैंने अभी फोन किया था, वो वापस लेने से साफ मना कर रहे हैं,” मैंने बहुत ही नाटकीय अंदाज़ में कहा।
“तो क्या हुआ? रख ले, तू खुद पहन लेना,” माँ ने भोलेपन से कहा।
“माँ, मैं दिल्ली में ये शॉल ओढ़कर ऑफिस जाऊंगा क्या? लोग हसेंगे मुझ पर। और ये जूते… ये तो बिल्कुल बुजुर्गों वाले डिज़ाइन के हैं। मैं इन्हें पहन ही नहीं सकता। पूरे पंद्रह हज़ार रुपये पानी में डूब गए। अब तो इसे कबाड़ी को ही देना पड़ेगा या किसी भिखारी को दान करना पड़ेगा। बहुत भारी नुकसान हो गया बाबूजी,” मैंने अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपाते हुए कहा, ताकि मेरी हंसी किसी को नज़र ना आए।
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। मैंने उँगलियों के बीच से देखा, बाबूजी की आँखों में उथल-पुथल मची हुई थी। एक तरफ उनका वो उसूल था कि बच्चों का पैसा उन पर खर्च ना हो, और दूसरी तरफ पंद्रह हज़ार रुपये का भारी नुकसान और सामान के कबाड़ में जाने का डर। एक मिडिल क्लास पिता के लिए किसी भी चीज़ का बर्बाद होना दुनिया का सबसे बड़ा अपराध होता है।
कुछ पल की खामोशी के बाद बाबूजी धीरे से उठे। उन्होंने सोफे के पास आकर उस शॉल को उठाया और अपने गले में लपेट लिया। फिर उन्होंने जूतों का डिब्बा खोला और उन्हें अपने पैरों में पहनकर देखा।
“अरे… ये तो बिल्कुल मेरे नाप के हैं,” उन्होंने थोड़ा आश्चर्यचकित होने का नाटक करते हुए कहा।
“नाप के तो होंगे ही, मेरे बॉस का कद-काठी बिल्कुल आप ही के जैसा है,” मैंने भी अपनी स्क्रिप्ट को आगे बढ़ाया।
बाबूजी ने एक बार खुद को शीशे में देखा, फिर खांसते हुए बोले, “देख बेटा, पंद्रह हज़ार रुपये बहुत बड़ी रकम होती है। इसे ऐसे ही कबाड़ी को देना तो बेवकूफी होगी। माना कि ये रंग थोड़ा अजीब है और जूते भी थोड़े विचित्र हैं, लेकिन नुकसान से बचने के लिए… मैं इसे रख लेता हूँ। मैं घर के अंदर ही शॉल ओढ़ लूंगा और सुबह अंधेरे में ये जूते पहनकर टहलने चला जाऊंगा। किसी को पता नहीं चलेगा। पैसे भी बर्बाद नहीं होंगे और काम भी आ जाएगा।”
मैंने अपना सिर झुका लिया ताकि बाबूजी मेरी भीगी हुई आँखें ना देख सकें। “ठीक है बाबूजी, अगर आपको लगता है कि आप इसे पहन सकते हैं, तो आप ही रख लीजिए। कम से कम मेरी आँखों के सामने मेरा पैसा बर्बाद तो नहीं होगा।”
“हाँ-हाँ, तू चिंता मत कर। मैं संभाल लूंगा,” बाबूजी ने शॉल को और अच्छी तरह से अपने कंधों पर लपेटते हुए कहा।
उस रात जब मैं सोने के लिए कमरे में गया, तो मैंने देखा अंजलि दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुरा रही थी।
“क्या बात है, आज तो तुम बिल्कुल बाबूजी बन गए थे,” उसने मुझे छेड़ते हुए कहा।
“मतलब?” मैंने नासमझी का नाटक किया।
“मतलब ये कि, तुमने भी वही किया जो बाबूजी तुम्हारे बचपन में करते थे। तुमने भी अपने प्यार को एक बहुत ही खूबसूरती से बुने हुए झूठ के पीछे छुपा लिया। तुम्हें क्या लगता है, बाबूजी को पता नहीं चला होगा कि तुम झूठ बोल रहे हो?”
मैं अंजलि की बात सुनकर हैरान रह गया।
“बाबूजी कोई बच्चे नहीं हैं अनिकेत। उन्होंने दुनिया देखी है। वो जानते थे कि तुम झूठ बोल रहे हो, लेकिन उन्होंने तुम्हारा झूठ इसलिए सच मान लिया क्योंकि वो तुम्हारी खुशी देखना चाहते थे। और तुमने भी झूठ इसलिए बोला क्योंकि तुम उन्हें तकलीफ में नहीं देख सकते थे। ये जो झूठ बोलने की बीमारी है ना, ये दरअसल कोई बीमारी नहीं है… ये तो तुम बाप-बेटों की विरासत है, जो प्यार जताने का तुम लोगों का अपना तरीका है।”
अंजलि की बात मेरे दिल में उतर गई। मुझे याद आ गया बाबूजी का वो कहा हुआ वाक्य—”कोई बाप त्याग नहीं करता, वो बस अपनी खुशी चुनता है।” आज मैंने भी अपनी खुशी चुन ली थी, और बाबूजी ने मेरी खुशी के लिए अपनी उस ज़िद को छोड़ दिया था।
अगले दिन जब हम दिल्ली वापस आने के लिए स्टेशन जाने को तैयार हुए, तो बाबूजी बाहर पोर्च में खड़े थे। उन्होंने वही पश्मीना शॉल ओढ़ी हुई थी और पैरों में वो ऑर्थोपेडिक जूते थे। ठंड बहुत थी, लेकिन उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।
जब मैंने उनके पैर छुए, तो उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर धीरे से कहा, “बेटा, अगली बार अपने बॉस के लिए कुछ खरीदे, तो पहले उसकी पसंद पूछ लेना। हर बार तेरा पुराना बाप तेरा नुकसान बचाने के लिए तैयार नहीं खड़ा होगा।”
उनकी आँखों में एक शरारती चमक थी। मैं समझ गया कि मेरी चोरी पकड़ी गई थी। लेकिन इस बार कोई शर्मिंदगी नहीं थी। मैंने मुस्कुराते हुए उन्हें गले लगा लिया।
आज अपनी बालकनी में खड़े होकर, मैं सोच रहा हूँ कि प्यार कभी-कभी कितनी अजीब भाषा बोलता है। कभी ये आम की गुठलियों में छुप जाता है, तो कभी एक नापसंद शॉल के रंगों में। हम पीढ़ियाँ भले ही बदल जाएं, हम गाँव से निकलकर बड़े शहरों में बस जाएं, लेकिन हमारे अंदर वो पुराने संस्कार, वो माता-पिता की दी हुई छोटी-छोटी आदतें कहीं न कहीं ज़िंदा रहती हैं। जब भी हम अपनों की खुशी के लिए अपनी किसी चाहत को मारते हैं या कोई ऐसा मीठा सा झूठ बोलते हैं जिससे किसी अपने का दर्द कम हो जाए, तो दरअसल हम उसी पुरानी विरासत को आगे बढ़ा रहे होते हैं। और सच कहूँ तो, दुनिया की हर सच्चाई से खूबसूरत वो एक झूठ होता है, जो किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आए।
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#वो मीठा सा झूठ
लेखिका : हर्षिता सिंह