कर्ज़ ममता का: एक देवर की अपनी भाभी के लिए अनूठी भेंट

रोहन ने कविता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी भी आँखों से आँसू बह रहे थे। “भाभी, दुनिया कहती है कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसने माँ बनाई है।

लेकिन मैं कहता हूँ कि जिसके पास आपके जैसी भाभी हो, उसे तो किसी भगवान की भी ज़रूरत नहीं है। आपने अपने हिस्से का निवाला मुझे खिलाया, अपनी नींद मेरे लिए कुर्बान कर दी, मेरे सपनों के लिए अपने सुहाग की निशानी तक उतार दी। आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ और सिर्फ आपकी वजह से हूँ।”

शहर के बाहरी इलाके में बनी एक छोटी सी बस्ती में आज हलचल कुछ ज्यादा ही थी। समीर के दो कमरों के खपरैल वाले मकान में सुबह से ही साफ-सफाई चल रही थी। समीर की पत्नी कविता अपने माथे का पसीना पोंछते हुए बार-बार दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की तरफ देख रही थी।

आज शाम को उनके छोटे देवर रोहन को देखने के लिए लड़की वाले आने वाले थे। रोहन ने दो दिन पहले ही फोन करके बताया था कि उसने अपने लिए एक लड़की पसंद की है, जिसके माता-पिता आज शाम शहर के एक बड़े होटल में समीर और कविता से मिलना चाहते हैं।

रोहन अब कोई मामूली लड़का नहीं था। अपनी दिन-रात की कड़ी मेहनत और लगन से वह पिछले एक साल से राज्य के एक बड़े जिले में डिप्टी कलेक्टर (एसडीएम) के पद पर तैनात था। लेकिन उसकी इस कामयाबी के पीछे समीर और कविता की वो खामोश तपस्या थी, जिसे दुनिया नहीं जानती थी।

कविता के चेहरे पर आज जहाँ एक तरफ देवर की शादी की खुशी थी, वहीं दूसरी तरफ माथे पर चिंता की गहरी लकीरें भी थीं। उसने अपनी पुरानी संदूकची खोलकर अपनी सारी साड़ियाँ बिस्तर पर फैला दी थीं। कोई भी साड़ी ऐसी नहीं थी जिसका रंग न उड़ा हो या जिसके किनारे न घिस गए हों।

उधर समीर भी अपने इकलौते ढंग के पैंट-शर्ट को इस्तरी कर रहा था, जिसकी कॉलर जगह-जगह से घिस चुकी थी। दोनों पति-पत्नी इस बात से परेशान थे कि इतने बड़े ओहदे वाले अफसर के भाई-भाभी बनकर जब वे उन अमीर लड़की वालों के सामने जाएँगे, तो उनके कपड़ों को देखकर लड़की वाले क्या सोचेंगे।

समीर और कविता की शादी को आठ साल बीत चुके थे। जब कविता इस घर में ब्याह कर आई थी, तब समीर एक छोटी सी लोहे की फैक्ट्री में मामूली वर्कर था। परिवार की आर्थिक स्थिति हमेशा से ही डावांडोल रही थी। समीर के पिता ने अपनी जिंदगी भर की पाई-पाई जोड़कर और गाँव की पुश्तैनी ज़मीन बेचकर अपने बड़े बेटे विक्रम को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई थी।

उन्हें उम्मीद थी कि बड़ा बेटा इंजीनियर बनकर परिवार की गरीबी दूर करेगा। लेकिन विक्रम ने इंजीनियर बनते ही एक अमीर घर की लड़की मेघा से शादी कर ली। मेघा को समीर के परिवार का रहन-सहन और गरीबी बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसने विक्रम को अपने परिवार से ऐसा काटा कि विक्रम हमेशा के लिए अपनी पत्नी के साथ अमेरिका जाकर बस गया। उसने पीछे मुड़कर कभी अपने बूढ़े माँ-बाप और छोटे भाइयों की सुध नहीं ली।

इस सदमे को माँ-बाप बर्दाश्त नहीं कर सके और कुछ ही सालों के अंतराल में दोनों दुनिया छोड़कर चले गए। उस समय रोहन बहुत छोटा था। समीर, जो बमुश्किल बारहवीं पास कर पाया था, पिता के निधन के बाद पूरे परिवार का बोझ अपने कंधों पर उठाने को मजबूर हो गया। उसने रोहन का हाथ पकड़ा और गाँव छोड़कर शहर आ गया,

जहाँ उसे इस फैक्ट्री में नौकरी मिल गई। कविता जब ब्याह कर आई, तो उसने देखा कि घर में सुख-सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है, लेकिन उसने कभी उफ्फ तक नहीं की। उसने रोहन को देवर नहीं, बल्कि अपना पहला बच्चा मान लिया।

समीर और कविता की जिंदगी का बस एक ही लक्ष्य बन गया था—रोहन को पढ़ा-लिखा कर एक बड़ा अफसर बनाना। कविता जानती थी कि रोहन पढ़ाई में बहुत तेज़ है और अगर उसे सही माहौल मिले तो वह आसमान छू सकता है। जब कविता और समीर का अपना बेटा आरव पैदा हुआ,

तब भी कविता के प्यार और दुलार में रोहन के लिए कोई कमी नहीं आई। घर में सिर्फ दो ही कमरे थे। कविता ने बड़ा और हवादार कमरा रोहन की पढ़ाई के लिए दे दिया था। वह खुद समीर और छोटे आरव के साथ उस कमरे में सोती, जो रसोई से सटा हुआ था और जहाँ गर्मियों में भट्टी जैसी तपिश होती थी।

कविता का दिन सुबह चार बजे शुरू होता था। वह उठकर सबसे पहले रोहन के लिए नाश्ता बनाती, ताकि उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए।

घर का सारा काम वह बिना किसी आवाज़ के करती। जब रोहन पढ़ रहा होता, तो वह छोटे आरव को लेकर पड़ोस के मंदिर के चबूतरे पर जाकर बैठ जाती, ताकि बच्चे के रोने या खेलने की आवाज़ से रोहन की एकाग्रता भंग न हो। समीर भी फैक्ट्री में ओवरटाइम करता था। कई बार तो वह लगातार दो-दो शिफ्ट में काम करता, ताकि रोहन की कोचिंग की फीस और किताबों का खर्चा निकल सके।

इस सफर में कविता ने अपनी हर इच्छा का गला घोंट दिया था। मायके से जो एकाध अच्छे कपड़े मिले थे, वे भी समय के साथ पुराने पड़ गए थे। तीज-त्यौहार पर जब पड़ोस की औरतें नए कपड़े और गहने पहनकर निकलतीं, तो कविता बहाना बना देती कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है।

समीर और कविता खुद सूखी रोटी और पतली दाल खाकर गुज़ारा कर लेते, लेकिन रोहन की थाली में हमेशा दूध, घी और फल नज़र आते। कविता आरव के दूध में भी पानी मिला देती, लेकिन रोहन को हमेशा पूरा ग्लास दूध देती, यह सोचकर कि उसे दिन-रात दिमागी मेहनत करनी पड़ती है। रोहन यह सब देखता था और उसकी आँखों में भाभी के लिए सम्मान रोज़-ब-रोज़ गहरा होता जाता था।

समय बीतता गया और रोहन की मेहनत रंग लाई। उसने सिविल सर्विसेज़ की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा पास कर ली। अब उसे अंतिम इंटरव्यू और आगे की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली जाना था, जिसके लिए तुरंत साठ हज़ार रुपयों की आवश्यकता थी। समीर के लिए इतनी बड़ी रकम रातों-रात जुटाना असंभव था। फैक्ट्री के मालिक ने भी एडवांस देने से मना कर दिया था। हार मानकर समीर ने सालों बाद अपने बड़े भाई विक्रम को अमेरिका फोन लगाया। विक्रम ने फोन तो उठाया, लेकिन जब समीर ने रोहन के भविष्य के लिए पैसों की मदद मांगी, तो विक्रम की पत्नी मेघा ने बीच में ही फोन छीन लिया। उसने ताने मारते हुए कहा कि उनके पास कोई पैसों का पेड़ नहीं लगा है और अगर औकात नहीं थी तो इतने बड़े सपने क्यों देखे।

समीर उस दिन बुरी तरह टूट गया था। वह घर के बाहर चबूतरे पर बैठकर रोने लगा। कविता से अपने पति के ये आँसू और देवर का टूटता हुआ भविष्य देखा नहीं गया। वह चुपचाप उठी, कमरे में गई और अपनी शादी का लाल जोड़ा खोला। उसमें उसका मंगलसूत्र, दो सोने की चूड़ियाँ और एक चेन रखी थी। यह उसके सुहाग की निशानी और जीवन की एकमात्र जमा-पूँजी थी। कविता ने बिना एक पल की देरी किए वे सारे गहने समीर के हाथों में लाकर रख दिए।

“ये क्या कर रही हो तुम?” समीर ने कांपते हाथों से गहने देखते हुए कहा था।

“एक माँ अपने बेटे के भविष्य के लिए इतना भी नहीं कर सकती क्या? जाइए, इन्हें सुनार के पास गिरवी रख आइए। मेरा सुहाग इन गहनों में नहीं, आपके और रोहन के माथे के सुकून में बसता है,” कविता ने दृढ़ता से कहा था।

गहने गिरवी रखे गए और रोहन दिल्ली चला गया। रोहन ने जब सुना कि उसकी भाभी ने उसके लिए अपना मंगलसूत्र तक उतार दिया है, तो उसने उस दिन कसम खाई थी कि वह जब तक अफसर नहीं बन जाता, घर वापस नहीं लौटेगा। और उसने अपनी कसम पूरी की। वह एसडीएम बना और एक साल तक वहीं ट्रेनिंग और ड्यूटी में व्यस्त रहा।

आज वही रोहन उन्हें उसी शहर के एक बड़े फाइव स्टार होटल में लड़की वालों से मिलाने बुला रहा था। शाम के चार बज चुके थे। कविता एक पुरानी सूती साड़ी को बार-बार ठीक कर रही थी, ताकि उसकी सिलवटें और रफू किए गए हिस्से छिप जाएँ। समीर भी उदास मन से अपने जूते पॉलिश कर रहा था। तभी घर के बाहर एक नीली बत्ती वाली बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी।

गाड़ी का दरवाज़ा खुला और उसमें से सूट-बूट पहने रोहन बाहर निकला। उसके साथ उसका एक अर्दली भी था। बस्ती के लोग बाहर निकल-निकल कर इस नज़ारे को देख रहे थे। रोहन सीधे घर के अंदर आया। उसे देखते ही समीर और कविता की आँखें छलक पड़ीं। रोहन ने सबसे पहले आगे बढ़कर समीर के पैर छुए और फिर कविता के चरणों में झुक गया।

“अरे पागल, तू यहाँ इस वक़्त? तुझे तो सीधा होटल पहुँचना था न?” समीर ने रोहन को गले लगाते हुए कहा।

रोहन मुस्कुराया और उसने अपने अर्दली से दो बड़े पैकेट लिए। उसने पहला पैकेट समीर के हाथों में थमाया।

“भैया, ये आपके लिए है। एकदम नया रेमंड का सूट है। मैंने आपके नाप का ही सिलवाया है। आज शाम को लड़की वालों के सामने मेरे पिता बनकर आप इसे ही पहनकर जाएँगे,” रोहन ने कहा।

फिर उसने एक छोटा पैकेट छह साल के आरव को दिया, जिसमें उसके लिए एक सुंदर सी शेरवानी थी। “मेरा बच्चा आज सबसे स्मार्ट लगेगा,” रोहन ने आरव का गाल चूमते हुए कहा।

आखिर में रोहन कविता के पास आया। कविता की आँखें आंसुओं से धुंधली हो चुकी थीं। रोहन ने एक बड़ा सा लाल मखमली डिब्बा और एक सुंदर सा बैग कविता के हाथों में रखा। कविता ने कांपते हाथों से जब वह डिब्बा खोला, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसमें उसका वही पुराना मंगलसूत्र, सोने की चूड़ियाँ और चेन रखी थी, जिन्हें उसने सालों पहले गिरवी रख दिया था। साथ ही उसमें एक भारी सोने का हार और चमकते हुए नए झुमके भी थे। बैग के अंदर बनारस की सबसे कीमती और खूबसूरत रेशमी साड़ी थी।

“ये सब… ये सब क्या है रोहन?” कविता की आवाज़ गले में ही अटक गई।

रोहन ने कविता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी भी आँखों से आँसू बह रहे थे। “भाभी, दुनिया कहती है कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसने माँ बनाई है। लेकिन मैं कहता हूँ कि जिसके पास आपके जैसी भाभी हो, उसे तो किसी भगवान की भी ज़रूरत नहीं है। आपने अपने हिस्से का निवाला मुझे खिलाया, अपनी नींद मेरे लिए कुर्बान कर दी, मेरे सपनों के लिए अपने सुहाग की निशानी तक उतार दी। आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ और सिर्फ आपकी वजह से हूँ।”

रोहन ने आगे कहा, “लड़की वालों ने मुझसे पूछा था कि आपकी माँ नहीं हैं, तो शादी के फैसले कौन लेगा? मैंने उनसे कहा था कि मेरी जन्म देने वाली माँ तो नहीं हैं, लेकिन मेरी तकदीर बनाने वाली मेरी माँ मेरे साथ है। आज शाम को आप इस साड़ी और इन गहनों को पहनकर आएँगी भाभी। दुनिया को पता चलना चाहिए कि रोहन की माँ कोई साधारण औरत नहीं, बल्कि त्याग की एक साक्षात् देवी है। सब लोग मंदिरों में देवी देखने जाते हैं, लेकिन देवी को अपने घर में, अपने सामने देखने का सौभाग्य सिर्फ मुझे मिला है।”

कमरे में खामोशी छा गई, जिसे सिर्फ खुशी की सिसकियों की आवाज़ तोड़ रही थी। समीर ने अपनी पत्नी को गर्व से देखा। कविता ने आगे बढ़कर रोहन का माथा चूम लिया। आज उस छोटे से खपरैल वाले घर में जो रोशनी थी, वह किसी महल के झूमरों से भी ज्यादा चमकदार थी। उस शाम जब समीर सूट पहनकर और कविता बनारसी साड़ी के साथ अपना मंगलसूत्र पहनकर होटल के उस आलीशान हॉल में पहुँची, तो लड़की वाले भी उनके सादगी भरे लेकिन गरिमामयी व्यक्तित्व को देखकर नतमस्तक हो गए।

खून के रिश्ते तो अक्सर स्वार्थ की आंधी में टूट जाते हैं, लेकिन जो रिश्ते त्याग और निस्वार्थ प्रेम की बुनियाद पर खड़े होते हैं, वे इतिहास रच देते हैं।

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#कर्ज़ ममता का: एक देवर की अपनी भाभी के लिए अनूठी भेंट

लेखिका : मीरा महेश

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