मीरा थोड़ी आगे बढ़ी और अपने ससुर दीनानाथ जी की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रखा और कहा, “क्या आपको पता है अंकल, जब हम शहर के बाज़ार से गुज़रते थे, तो लोग मेरे ससुर जी को देखकर सम्मान से रास्ता छोड़ देते थे। उनका नाम सुनकर आज भी बड़े-बड़े अधिकारियों के चेहरे पर इज़्ज़त का भाव आ जाता है। उन्होंने भ्रष्टाचार से समझौता नहीं किया, इसलिए आज वो मेरी नज़रों में किसी हीरो से कम नहीं हैं। आपने पूछा कि मैं इस घर में क्या करूँगी? मैं आपको बता दूँ कि मैं इस घर में सिर उठाकर जियूँगी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे इंसान की बहू हूँ जिसके हाथों में किसी ग़रीब का हक़ मारने का पाप नहीं है।”
माधवपुर गाँव की उस संकरी और कच्ची पगडंडी पर आज बरसों बाद कोई गाड़ी रुकी थी। गाड़ी से उतरने वाले कदम भारी थे और आँखों में एक अजीब सा सूनापन था। दीनानाथ जी ने अपनी पुरानी और जर्जर हो चुकी पुश्तैनी हवेली के लोहे के जंग लगे दरवाज़े को धक्का दिया, तो एक भारी चरमराहट के साथ दरवाज़ा खुला। भीतर आंगन में सूखी पत्तियाँ बिखरी थीं और दीवारों की पपड़ियाँ उखड़ कर ज़मीन पर गिर चुकी थीं। शहर के उस शानदार वातानुकूलित घर से इस धूल भरे आंगन तक का सफर महज़ कुछ किलोमीटर का नहीं था, बल्कि यह एक ईमानदार इंसान के उसूलों की कीमत थी, जो उसे चुकानी पड़ी थी।
दीनानाथ जी सरकारी विभाग में एक बड़े ओहदे पर इंजीनियर थे। उनके पास शोहरत थी, रुतबा था और एक आरामदायक जीवन था। लेकिन उनके पास एक ऐसी चीज़ भी थी जो आज के दौर में बहुत महँगी साबित होती है— ‘ईमानदारी’। एक बड़े सरकारी प्रोजेक्ट में घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल का जब उन्होंने विरोध किया और उस फाइल पर हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर दिया, तो भ्रष्ट ठेकेदारों और राजनेताओं के गठजोड़ ने उन्हें ही झूठे आरोपों के जाल में फंसा दिया। सालों तक अदालत के चक्कर चले। अपने बेदाग़ चरित्र को साबित करने और वकीलों की भारी-भरकम फीस चुकाने के लिए दीनानाथ जी को अपना शहर का मकान, गाड़ियाँ और जीवन भर की सारी जमा-पूंजी बेचनी पड़ गई। अंततः वे अदालत से बाइज्जत बरी तो हो गए, लेकिन तब तक वे आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे। अब उनके पास सिर छिपाने के लिए केवल अपने दादा-परदादा का यही खँडहर हो चुका गाँव का घर बचा था।
सामान को बैलगाड़ी से उतारकर घर के भीतर रखा जा रहा था। दीनानाथ जी की पत्नी, कौशल्या देवी, बिना कोई शिकायत किए अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसकर आंगन बुहारने में लग गई थीं। उनका इकलौता बेटा सिद्धार्थ और शहर के एक बड़े घराने से ब्याह कर आई उनकी बहू मीरा, दोनों मिलकर भारी बक्से खिसका रहे थे। दीनानाथ जी एक टूटी हुई खाट पर बैठे यह सब देख रहे थे और अंदर ही अंदर अपराधबोध से घुट रहे थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी एक ज़िद ने उनके पूरे परिवार को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है।
तकरीबन एक हफ्ता बीत गया। परिवार धीरे-धीरे उस कच्ची मिट्टी और खपरैल वाले घर के माहौल में खुद को ढालने की कोशिश कर रहा था। तभी एक दोपहर, गाँव की शांति को चीरती हुई एक चमचमाती एसयूवी गाड़ी उनके घर के दरवाज़े पर आकर रुकी। गाड़ी से त्रिलोक चंद उतरे। त्रिलोक चंद उसी विभाग में दीनानाथ जी के जूनियर हुआ करते थे, लेकिन अपनी चापलूसी और ‘समझौते’ करने की आदत के कारण आज वे करोड़ों के मालिक थे। शहर में उनके कई बंगले थे और वे उसी भ्रष्ट व्यवस्था का एक मज़बूत हिस्सा बन चुके थे, जिससे लड़ते हुए दीनानाथ जी ने अपना सब कुछ गँवा दिया था।
त्रिलोक चंद के आने का मक़सद हालचाल पूछना नहीं, बल्कि अपने उस पुराने अफ़सर की हार का तमाशा देखना था जिसने कभी उनके गलत कामों की फाइल उनके मुँह पर फेंक दी थी। त्रिलोक चंद ने नाक पर रुमाल रखते हुए घर के भीतर कदम रखा और चारों ओर ऐसे देखा जैसे किसी कूड़ेदान में आ गए हों।
“अरे दीनानाथ बाबू! यह क्या हाल बना लिया है आपने?” त्रिलोक चंद ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा। उनकी आवाज़ में झूठी हमदर्दी और असली घमंड साफ झलक रहा था। “सुना था कि आप गाँव आ गए हैं, तो सोचा मिल आऊँ। पर यकीन नहीं होता कि कभी पूरे ज़िले में जिस अफ़सर के नाम का डंका बजता था, वो आज इन सीलन भरी दीवारों के बीच अपनी ज़िंदगी के आखिरी दिन काटने को मजबूर है।”
दीनानाथ जी ने फीकी सी मुस्कान के साथ उन्हें बैठने का इशारा किया। सिद्धार्थ एक कुर्सी साफ़ करके ले आया। त्रिलोक चंद कुर्सी पर बैठते हुए फिर शुरू हो गए, “मैंने तो आपको पहले ही समझाया था दीनानाथ जी, कि ज़माना आदर्शों पर नहीं, पैसों पर चलता है। अगर उस दिन आपने उस फाइल पर एक छोटा सा हस्ताक्षर कर दिया होता, तो आज आपके पास भी मेरे जैसी गाड़ी होती, शहर के वीआईपी इलाके में कोठी होती। पर आपको तो हरिश्चंद्र बनने का शौक था। क्या मिला आपको अपनी इस ईमानदारी से? समाज में बदनामी, कोर्ट-कचहरी के धक्के और अंत में यह फटेहाली! खुद तो आप गर्त में गए ही, साथ में अपने इस जवान बेटे और इस बेचारी बहू की ज़िंदगी भी बर्बाद कर दी। अब बताइए, इस झोपड़े में यह पढ़ी-लिखी बहू क्या करेगी? गोबर पाथेगी?”
त्रिलोक चंद के ये शब्द किसी ज़हरीले तीर की तरह दीनानाथ जी के सीने में चुभ रहे थे। उनका सिर शर्म और ग्लानि से झुक गया। उनकी आँखें नम हो गईं। सिद्धार्थ से अपने पिता का यह अपमान बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसकी मुट्ठियाँ कस गई थीं और वह कुछ तीखा जवाब देने ही वाला था कि तभी रसोई के दरवाज़े से मीरा बाहर आई। उसके हाथों में पीतल की एक पुरानी ट्रे थी, जिसमें चाय के कप और पानी के गिलास रखे थे।
मीरा के चेहरे पर एक गज़ब की शांति और आत्मविश्वास था। उसने बहुत ही सलीके से ट्रे त्रिलोक चंद के सामने रखी और सीधे खड़े होकर, बिना किसी झिझक के, बहुत ही विनम्र लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोली, “अंकल जी, चाय पीजिए। हमारे इस ‘झोपड़े’ की चाय में आपको वो स्वाद मिलेगा जो शायद शहर की बड़ी-बड़ी कोठियों में भी नसीब नहीं होता। और हाँ, आप शायद कुछ गलतफहमी का शिकार हो गए हैं। आपने अभी कहा कि मेरे ससुर जी को अपनी ईमानदारी से क्या मिला? और उन्होंने हमारे लिए क्या छोड़ा है?”
त्रिलोक चंद ने चाय का कप उठाते हुए अजीब सी नज़र से मीरा को देखा। दीनानाथ जी, कौशल्या देवी और सिद्धार्थ भी हैरान होकर मीरा की तरफ देखने लगे।
मीरा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “अंकल जी, आपने अपनी ज़िंदगी में दौलत बहुत कमाई होगी, लेकिन शायद आप ‘कमाई’ का असली मतलब नहीं समझते। मेरे पापा जी ने हमें जो विरासत दी है, उसकी कीमत आप अपनी पूरी तिजोरी खाली करके भी नहीं चुका सकते। उन्होंने हमें ‘बेदाग चरित्र’ और ‘सच्चाई’ की वो दौलत दी है, जिसके आगे दुनिया के सारे हीरे-जवाहरात फीके हैं। आप कह रहे हैं कि उन्होंने सब कुछ गँवा दिया? नहीं अंकल, उन्होंने तो बहुत कुछ कमाया है।”
मीरा थोड़ी आगे बढ़ी और अपने ससुर दीनानाथ जी की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रखा और कहा, “क्या आपको पता है अंकल, जब हम शहर के बाज़ार से गुज़रते थे, तो लोग मेरे ससुर जी को देखकर सम्मान से रास्ता छोड़ देते थे। उनका नाम सुनकर आज भी बड़े-बड़े अधिकारियों के चेहरे पर इज़्ज़त का भाव आ जाता है। उन्होंने भ्रष्टाचार से समझौता नहीं किया, इसलिए आज वो मेरी नज़रों में किसी हीरो से कम नहीं हैं। आपने पूछा कि मैं इस घर में क्या करूँगी? मैं आपको बता दूँ कि मैं इस घर में सिर उठाकर जियूँगी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे इंसान की बहू हूँ जिसके हाथों में किसी ग़रीब का हक़ मारने का पाप नहीं है।”
त्रिलोक चंद के हाथ में पकड़ा चाय का कप हल्का सा कांपने लगा। उनके चेहरे की वो घमंडी मुस्कान अब गायब होने लगी थी।
मीरा रुकी नहीं। उसने त्रिलोक चंद की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “अंकल जी, मैंने सुना है कि जिन लोगों के पास बेईमानी का पैसा होता है, उन्हें रात को नींद की गोलियां खानी पड़ती हैं। उन्हें हमेशा इनकम टैक्स और विजिलेंस के छापों का डर सताता रहता है। उनके अपने ही बच्चे पैसों के लिए आपस में लड़ते हैं और बुढ़ापे में उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं। आपकी वो बड़ी कोठी, जिसमें शायद चैन की नींद का एक भी कोना नहीं है, इस कच्ची मिट्टी के घर के सामने बहुत छोटी है। मेरे पापा जी ने हमें वो संस्कार दिए हैं कि आज जब उन पर मुसीबत आई, तो हम में से कोई भी उन्हें छोड़कर नहीं भागा। हम सब एक दीवार की तरह उनके साथ खड़े हैं। मेरी सास ने बिना एक आँसू बहाए अपने सारे गहने बेच दिए, ताकि उनके पति का सम्मान बच सके। मेरे पति ने अपने करियर की शुरुआत में ही अपने पिता का साथ देने के लिए दिन-रात एक कर दिया। यह जो हमारा परिवार एक साथ मुस्कुराते हुए रात को चटाई पर सोता है ना… इसे कहते हैं असली अमीरी।”
मीरा ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, “इसलिए अंकल जी, आप हमारी चिंता छोड़ दीजिए। मकान कच्चा है, लेकिन इस घर की नींव उस ईमानदारी और संस्कारों की पक्की ईंटों से बनी है जिसे कोई तूफान नहीं हिला सकता। दौलत तो आज है, कल नहीं रहेगी, लेकिन इंसान का ज़मीर अगर एक बार बिक जाए, तो वो फिर कभी वापस नहीं आता। हम बहुत खुश हैं अपनी इस अमीरी में। आपको आपकी वो कोठी और वो डर भरी ज़िंदगी मुबारक हो।”
कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था। त्रिलोक चंद का चेहरा लाल हो चुका था। उनके पास मीरा की किसी भी बात का कोई जवाब नहीं था। जो इंसान एक ईमानदार और टूटे हुए व्यक्ति का मज़ाक उड़ाने और अपने पैसों का रौब झाड़ने आया था, उसे आज एक नई उम्र की लड़की ने आइना दिखा दिया था। उस आइने में त्रिलोक चंद को अपनी दौलत बहुत बौनी और अपना चरित्र बहुत कुरूप नज़र आ रहा था।
वे बिना चाय का एक भी घूंट पिए, चुपचाप अपनी जगह से उठे और बिना किसी से नज़रे मिलाए, तेज़ कदमों से बाहर निकल गए। उनकी चमकती हुई एसयूवी जब धूल उड़ाती हुई वापस लौटी, तो उस धूल में उनका सारा गुरूर भी कहीं खो गया था।
उनके जाने के बाद, दीनानाथ जी फूट-फूट कर रो पड़े। यह दुख के आँसू नहीं थे। यह उस सुकून के आँसू थे जो एक पिता को तब मिलते हैं जब उसे अहसास होता है कि उसके बच्चों ने उसकी दी हुई शिक्षा और उसके उसूलों को सच में आत्मसात कर लिया है। उन्होंने खड़े होकर अपनी बहू के सिर पर हाथ रखा और रुंधे हुए गले से कहा, “बेटी, मुझे लगता था कि मैं कंगाल हो गया हूँ, लेकिन आज तुमने मुझे दुनिया का सबसे अमीर इंसान बना दिया। तुमने आज मेरे खोए हुए आत्मसम्मान को वापस लौटा दिया है।”
कौशल्या देवी ने आगे बढ़कर मीरा को गले लगा लिया और सिद्धार्थ की आँखों में अपनी पत्नी के लिए अथाह प्रेम और गर्व छलक रहा था।
उस रात माधवपुर के उस कच्चे घर में चूल्हे पर बनी सादी सी रोटी और दाल में जो मिठास थी, वो शायद दुनिया के किसी फाइव-स्टार होटल के पकवानों में नहीं होती। उस रात उस परिवार ने महसूस किया कि जब अपनों का अटूट विश्वास और प्रेम साथ हो, तो दुनिया का कोई भी संघर्ष बड़ा नहीं लगता।
दीवारें भले ही मिट्टी की थीं, लेकिन उस घर में गूंजने वाली हँसी सोने सी खरी थी। परिवार का हर सदस्य जानता था कि यह बुरा वक़्त भी गुज़र जाएगा, लेकिन उन्होंने जो सबक और जो एकजुटता इस वक़्त में हासिल की है, वो उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी वसीयत होगी।
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#कच्ची मिट्टी का पक्का घर
लेखिका : नमिता पंडित