भानुप्रताप जी की आँखों से एक बूँद टपककर मीरा की हथेली पर गिर गई। उन्होंने कांपते हाथों से उसके सिर के बिखरे बालों को सहलाया, “पगली, काश मेरे बस में होता कि मैं समय के चक्र को बाँध लेता और आजीवन तेरी हिफाज़त करता। पर यह काया तो नश्वर है न बेटी। आज नहीं तो कल, इस मिट्टी को मिट्टी में मिल ही जाना है। प्रकृति का नियम कौन टाल सका है? जब मैं आँखें मूँदूँगा, तो ऊपर जाकर राघव को क्या मुँह दिखाऊँगा? क्या कहूँगा उससे कि मैं तेरी अमानत को अकेले, वीरान राहों में भटकने के लिए छोड़ आया? इसलिए कहता हूँ, विवेक बुरा लड़का नहीं है। मान जा मेरी बात…”
उम्र के सत्तरवें पड़ाव पर आकर जब नज़रें कमजोर हो जाती हैं, तब दिल के कान और भी तेज हो जाते हैं। बाहर गेट के लोहे की सांकल खटकी और भानुप्रताप जी के चेहरे पर पसरी गहरी चिंता की लकीरें पल भर में सिमट गईं।
सफेद कोट और हाथ में स्टेथोस्कोप का बैग लटकाए मीरा भीतर दाखिल हुई। चेहरे पर पूरे दिन की थकान और हॉस्पिटल की भागदौड़ साफ झलक रही थी, फिर भी अपनी चिर-परिचित मुस्कान बिखेरते हुए उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
“बाबूजी, आप अब तक जाग रहे हैं? हीटर का तापमान कितना कम कर रखा है आपने! मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि सर्दियों में अपनी छाती को ठंड से बचाइए, ब्रोंकाइटिस फिर उभर आएगा,” मीरा ने बैग मेज पर रखते हुए हीटर का नॉब घुमाया और एक ऊनी कम्बल उनके पैरों पर ठीक से ओढ़ा दिया।
भानुप्रताप जी ने अपनी धुंधली आँखों से उसके पीले पड़े चेहरे को देखा और एक गहरी साँस छोड़ी, “कैसे चैन से सो जाऊँ बिटिया? जब तक तुम्हारी गाड़ी के पहियों की आवाज़ सड़क से मुड़कर बरामदे तक नहीं आ जाती, मेरी साँसें मानों गले में ही अटकी रहती हैं। तुझे इस तरह दिन-रात अपने आप को खपाते देखता हूँ तो कलेजा मुँह को आता है। कितनी बार कहा है मीरा, जिंदगी अभी बहुत लंबी है, अपने लिए कोई नया रास्ता चुन ले। किसी का हाथ थाम ले… आगे बढ़ जा। पर तू तो जैसे इस बूढ़े की बात अनसुनी करने की कसम खा बैठी है। मेरा क्या भरोसा, कब यह बुझता हुआ दीया हमेशा के लिए शांत हो जाए?”
मीरा ने अपने जूते उतारे, हाथ-मुँह धोकर आई और सीधे भानुप्रताप जी के पैरों के पास फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपने नर्म, ठंडे हाथों से उनके झुर्रीदार और काँपते हाथों को थाम लिया। उसकी आँखें भर आईं, पर स्वर में वही पुरानी ज़िद और अगाध अपनत्व था।
“बाबूजी, आप रोज़-रोज़ वही बात क्यों दोहराने लगते हैं? किसने कहा कि मेरी ज़िंदगी अधूरी है? राघव भले ही आज हमारे बीच सशरीर नहीं है, पर उसकी रूह, उसकी यादें और आपका यह वात्सल्य… क्या यह सब कुछ जीने के लिए कम है? राघव की जगह इस दिल में कोई दूसरा कभी नहीं ले सकता बाबूजी। और रही बात आपके जाने की, तो यह बात दोबारा अपनी ज़ुबान पर मत लाइएगा। आप मेरा साया हैं, मेरी ढाल हैं। आपके बिना इस वीरान चौखट पर मेरा अपना कौन है? बस आप हमेशा मेरे साथ रहिए, मुझे और किसी सहारे की दरकार नहीं।”
भानुप्रताप जी की आँखों से एक बूँद टपककर मीरा की हथेली पर गिर गई। उन्होंने कांपते हाथों से उसके सिर के बिखरे बालों को सहलाया, “पगली, काश मेरे बस में होता कि मैं समय के चक्र को बाँध लेता और आजीवन तेरी हिफाज़त करता। पर यह काया तो नश्वर है न बेटी। आज नहीं तो कल, इस मिट्टी को मिट्टी में मिल ही जाना है। प्रकृति का नियम कौन टाल सका है? जब मैं आँखें मूँदूँगा, तो ऊपर जाकर राघव को क्या मुँह दिखाऊँगा? क्या कहूँगा उससे कि मैं तेरी अमानत को अकेले, वीरान राहों में भटकने के लिए छोड़ आया? इसलिए कहता हूँ, विवेक बुरा लड़का नहीं है। मान जा मेरी बात…”
मीरा ने झटके से उनके हाथ छोड़ दिए और उठकर मेज पर रखी दवाइयों की शीशियाँ टटोलने लगी। उसने पानी का ग्लास भरा और दवा की दो गोलियाँ उनकी हथेली पर रखते हुए थोड़ा रूठने के अंदाज़ में बोली, “बाबूजी, मुझे तो कभी-कभी लगता है कि आपको अपने बेटे राघव से सच्चा प्यार था ही नहीं। तभी तो आप इतनी आसानी से उसकी जगह किसी पराए को मेरे जीवन में बिठाने पर आमादा हैं।”
यह सुनते ही भानुप्रताप जी की छाती में एक हूक सी उठी। उन्होंने दवा पानी के साथ गटक ली और मीरा के चेहरे को अपलक देखते हुए बहुत ही गंभीर स्वर में बोले, “तूने यह बात कह तो दी मीरा, पर क्या तू सच में अपने दिल से ऐसा सोचती है? राघव मेरा इकलौता बेटा था। मेरी आँखों की रोशनी था। जब वो तीन साल पहले उस भयानक कार दुर्घटना में हमें छोड़कर गया, तो मेरा आधा वजूद उसी चिता के साथ भस्म हो गया था। जाने वाले तो अपनी डोर तोड़कर चले जाते हैं बिटिया, पर पीछे छूट जाने वालों का इम्तिहान बहुत कड़ा होता है। मैं राघव को वापस तो नहीं ला सकता, पर उसी के नाम पर, उसी के हिस्से के प्यार से मैं अपनी बेटी जैसी बहू का उजड़ा चमन फिर से हरा-भरा देखना चाहता हूँ। क्या यह मेरा स्वार्थ है? क्या एक बाप का अपनी बच्ची के भविष्य के लिए तड़पना गुनाह है?”
मीरा निरुत्तर हो गई। वह नज़रें चुराकर कमरे के एक कोने में देखने लगी।
भानुप्रताप जी ने अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ लीं, उनकी आवाज़ में बेबसी का अथाह समंदर था, “विवेक राघव का सबसे अज़ीज़ दोस्त रहा है। उसने देखा है कि पिछले तीन सालों में तूने इस घर को और मुझे कैसे संभाला है। वो तेरी आत्मा का, तेरे त्याग का सम्मान करता है। वो किसी एहसान की खातिर नहीं, बल्कि पूरे आदर और प्रेम के साथ तेरा हाथ माँगने आया है। उसने साफ़ कहा है कि वो मुझे अपने सगे पिता की तरह यहीं रखेगा। बेटी, इस बूढ़े बाप पर तरस खा। मुझे इस लोक से उस लोक तक जाने का रास्ता हल्का करने दे। मुझे अपने इस सबसे बड़े दायित्व से मुक्ति दे दे।”
मीरा का गला रुँध गया। वह कोई बहस नहीं करना चाहती थी। उसने आगे बढ़कर भानुप्रताप जी के दोनों जुड़े हुए हाथ अपने हाथों में थामे और उन्हें धीरे से कुर्सी से सहारा देकर खड़ा किया, “बाबूजी, रात बहुत ढल चुकी है। अब चलिए, आराम कीजिए। आपकी तबियत बिगड़ जाएगी तो मुझे ही संभालना पड़ेगा।”
भानुप्रताप जी ने भारी कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए मुड़कर देखा। उनके चेहरे पर गहरी मायूसी थी। उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “एक बार सोचना ज़रूर मीरा… अपने इस लाचार बाप के खातिर, अपने भविष्य के खातिर।”
दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया। दालान में अब सिर्फ दीवार घड़ी की ‘टिक-टिक’ और बाहर हवा की सरसराहट बाकी थी। मीरा वहीं हॉल के बीचों-बीच खड़ी रह गई। उसकी निगाहें दीवार पर टँगी चंदन के हार वाली तस्वीर पर जाकर टिक गईं।
तस्वीर में राघव वही चिर-परिचित, बेफिक्र और जानलेवा मुस्कान लिए देख रहा था।
मीरा धीरे-धीरे उस तस्वीर के पास पहुँची। उसने कांपती उँगलियों से तस्वीर के काँच को छुआ। स्पर्श इतना आत्मीय था, जैसे वह सचमुच राघव के गालों को छू रही हो। तीन साल का दबा हुआ बाँध आज एकांत पाते ही टूट पड़ा। मीरा के होंठ कांपने लगे, आँखें आंसुओं से धुंधला गईं।
“क्यों चले गए राघव मुझे इस दोराहे पर अकेला छोड़कर?” उसने सिसकते हुए तस्वीर से पूछा। “तुम तो कहते थे कि मेरा साया बनकर हर मोड़ पर साथ चलोगे। फिर बीच समंदर में नाव छोड़कर क्यों किनारे हो गए? देखो न, बाबूजी क्या कह रहे हैं। वो मुझे किसी और के हवाले करना चाहते हैं। पर मैं कैसे समझाऊँ उन्हें कि इस दिल की हर धड़कन पर तुम्हारा नाम लिखा है? अगर मैंने किसी और की तरफ देखा भी, तो क्या यह तुम्हारे साथ धोखा नहीं होगा? क्या समाज, क्या मेरी अपनी आत्मा मुझे चैन से जीने देगी?”
तस्वीर खामोश रही। उस निर्जीव फ्रेम से कोई जवाब नहीं आया, सिर्फ वही स्थिर मुस्कान मीरा के कलेजे को चीरती रही। मीरा वहीं जमीन पर घुटनों में सिर छिपाकर बैठ गई और देर रात तक रोती रही।
अगले दिन सुबह की धूप कुछ फीकी सी थी। मीरा ने हमेशा की तरह बाबूजी के लिए अदरक की चाय बनाई, नाश्ता तैयार किया और उनके कमरे में ले गई। भानुप्रताप जी बिस्तर पर गुमसुम बैठे रामायण का पाठ कर रहे थे। दोनों के बीच रात वाली बात का कोई ज़िक्र नहीं हुआ, पर हवा में एक अनकहा तनाव तैर रहा था।
मीरा जब क्लिनिक जाने के लिए तैयार होकर अपने कमरे से निकली, तो उसने देखा कि ड्राइंग रूम में विवेक बैठा हुआ था। नेवी ब्लू शर्ट और फॉर्मल पैंट में विवेक का व्यक्तित्व हमेशा की तरह शालीन और गंभीर था। मीरा को सामने देखकर वह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।
“नमस्ते मीरा जी,” विवेक ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़े।
“नमस्ते विवेक… आप इतनी सुबह?” मीरा ने अपने चेहरे पर औपचारिक भाव लाते हुए पूछा।
“अंकल जी ने कल मुझे फोन किया था। उन्होंने कहा था कि एक बार आकर बैठूँ। पर मीरा जी, मैं यहाँ अंकल जी के दबाव में या किसी औपचारिकता के तहत नहीं आया हूँ। अगर आपके पास पाँच मिनट हों, तो क्या मैं आपसे कुछ बात कर सकता हूँ?” विवेक ने बहुत ही संजीदगी से कहा।
मीरा ने घड़ी देखी और फिर सोफे की तरफ इशारा करते हुए बैठ गई, “कहिए।”
विवेक ने एक क्षण का मौन साधा, फिर सीधे मीरा की आँखों में देखा। उसकी नज़रों में न कोई याचना थी, न ही कोई दिखावा; वहाँ सिर्फ एक शांत सच्चाई थी।
“मीरा जी, मैं जानता हूँ कि आप इस वक्त किस मानसिक द्वंद्व से गुजर रही हैं। आपको लगता होगा कि मैं आपके जीवन में राघव की जगह छीनने की कोशिश कर रहा हूँ। पर यक़ीन मानिए, राघव मेरा सिर्फ दोस्त नहीं था, मेरे भाई जैसा था। कॉलेज के दिनों से लेकर हमारी पहली नौकरी तक, हमने हर सुख-दुख साझा किया है। मैं कभी भी, किसी भी सूरत में राघव की जगह नहीं ले सकता और न ही मैं ऐसा कोई दुस्साहस करना चाहता हूँ।”
मीरा ने अपनी पलकें झुका लीं, उसकी उँगलियाँ अपने पर्स के पट्टे को भींच रही थीं।
विवेक ने आगे कहा, “राघव आपके अतीत का वह खूबसूरत सच है, जिसे कोई नहीं मिटा सकता। मैं उस अतीत को मिटाने नहीं, बल्कि आपके वर्तमान का हमसफ़र और आपके भविष्य का संबल बनने की इजाज़त माँगने आया हूँ। अंकल जी जिस चिंता में घुल रहे हैं, वह बेबुनियाद नहीं है। वो आपको खुश देखना चाहते हैं, आपको फिर से खुल कर मुस्कुराते देखना चाहते हैं। मीरा जी, जिंदगी सिर्फ यादों के सहारे एक बंद कमरे में गुज़ार देने का नाम नहीं है। राघव अगर आज जहाँ कहीं भी होगा, क्या वह आपको हर रोज़ इस तरह घुटते और तन्हाई में आँसू बहाते देखना चाहेगा? प्रेम किसी को बाँधकर पिंजरे में कैद करने का नाम नहीं है मीरा जी, प्रेम तो दूसरे के जीवन में उजाला भरने की दुआ है।”
विवेक की बातें मीरा के अंतर्मन को मथ रही थीं। पर उसका पारंपरिक मन, जो सदियों से त्याग और आत्म-बलिदान को ही स्त्री का एकमात्र धर्म मानता आया था, इतनी आसानी से झुकने को तैयार नहीं था।
“विवेक, आप एक बहुत अच्छे इंसान हैं,” मीरा ने भरभराई आवाज़ में कहा। “आप किसी भी योग्य और सुंदर लड़की के साथ एक नई और मुकम्मल ज़िंदगी शुरू कर सकते हैं। फिर आप अपने जीवन में एक ऐसा रिश्ता क्यों जोड़ना चाहते हैं, जिसका एक सिरा हमेशा अतीत के आंसुओं से भीगा रहेगा? मुझमें अब किसी को देने के लिए वो उत्साह, वो रंग नहीं बचा है।”
विवेक मुस्कुराया, एक बहुत ही गहरी और समझदार मुस्कान।
“मीरा जी, मुझे किसी कोरे कागज़ की तलाश नहीं है जिस पर मैं अपनी मर्जी की इबारत लिखूँ। मुझे एक ऐसी साथी चाहिए जिसके पास एक संवेदनशील दिल हो, जो रिश्तों की कद्र करना जानती हो। और जो त्याग, जो निष्ठा आपने अंकल जी के प्रति दिखाई है, उसने मेरे दिल में आपके लिए प्रेम से पहले अगाध सम्मान पैदा किया है। जहाँ सम्मान होता है, वहाँ प्रेम अपने आप पनप जाता है। बाकी फैसला पूरी तरह आपका है। आप अगर ज़िंदगी भर मुझे सिर्फ एक दोस्त मानकर भी नकार देंगी, तब भी अंकल जी और आपके प्रति मेरा दायित्व कभी कम नहीं होगा। मैं कोई ज़बरदस्ती नहीं करूँगा।”
विवेक उठ खड़ा हुआ, उसने झुककर भानुप्रताप जी के कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा, मीरा को अलविदा कहा और बाहर निकल गया।
उस दिन अस्पताल में मीरा का मन किसी भी काम में नहीं लगा। स्टेथोस्कोप लगाते हुए, मरीजों की नब्ज़ टटोलते हुए, दवाइयों के पर्चे लिखते हुए—हर जगह उसके कानों में बस दो ही बातें गूँज रही थीं। एक तरफ बाबूजी की वह लाचार गुहार कि “मुझे अपने इस सबसे बड़े दायित्व से मुक्ति दे दे,” और दूसरी तरफ विवेक के वो शब्द कि “राघव अगर आज जहाँ कहीं भी होगा, क्या वह आपको हर रोज़ इस तरह घुटते देखना चाहेगा?”
शाम को घर लौटते हुए मीरा ने गाड़ी रास्ते में एक पार्क के किनारे रोक दी। सर्द शाम का धुंधलका धीरे-धीरे शहर को अपनी आगोश में ले रहा था। सूखे पत्ते हवा के झोंके से गिर रहे थे, पर उसी पेड़ की दूसरी डालियों पर छोटी-छोटी हरी कोंपलें भी फूट रही थीं।
मीरा ने सोचा, क्या पतझड़ के बाद बहार का आना कोई पाप है? क्या किसी अपने के चले जाने के बाद खुद को जीते जी मार देना ही वफ़ा की इकलौती परिभाषा है? राघव तो हमेशा उसे खिलखिलाते देखना चाहता था। जब भी मीरा ज़रा सी उदास होती थी, राघव पूरे घर को सिर पर उठा लेता था। फिर आज उसी राघव के नाम पर उसने अपनी पूरी ज़िंदगी को एक बेनूर, बेरंग कोठरी क्यों बना लिया है?
रात को जब मीरा घर पहुँची, तो उसने देखा कि भानुप्रताप जी की तबीयत कुछ नासाज़ थी। वे खाँस रहे थे और उनका बदन बुखार से तप रहा था। मीरा ने तुरंत उनका चेकअप किया, दवा दी और उनके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखने लगी।
रात के दो बजे जब बुखार थोड़ा उतरा, तो भानुप्रताप जी ने अपनी कमजोर आँखें खोलीं। सामने मीरा को अपनी सेवा में रत देखकर उनकी आँखों के कोरों से पानी बह निकला।
“तू क्यों जाग रही है बच्ची? जा सो जा, कल सुबह फिर तुझे अस्पताल जाना है…” उन्होंने बुझे स्वर में कहा।
मीरा ने उनके माथे से पट्टी हटाई और उनके दोनों हाथ अपने गालों से लगा लिए। उसकी आँखों में अब कोई संशय, कोई असमंजस नहीं था। वहाँ एक शांत, निर्मल निश्चय था।
“बाबूजी… क्या सचमुच मेरी खुशी में ही आपकी शांति छुपी है?” मीरा ने धीमी आवाज़ में पूछा।
भानुप्रताप जी ने पलकें झपकाकर सहमति दी, उनके होंठ हिले, “मेरी आखिरी साँस का सुकून सिर्फ तेरे मुस्कुराते चेहरे में है बेटी।”
मीरा ने एक लंबी साँस ली, उठकर खिड़की की तरफ गई और खुले आसमान में चमकते एक अकेले तारे को देखा—मानों वह तारा राघव ही हो, जो दूर से उसे देखकर हौले से मुस्कुरा रहा हो और कह रहा हो, ‘आगे बढ़ो मीरा, मैं तुम्हारे हर सही फैसले के साथ हूँ।’
मीरा वापस पलटी। उसने भानुप्रताप जी के चरण स्पर्श किए और बेहद विनम्र, दृढ़ स्वर में बोली, “बाबूजी… अगर विवेक सचमुच मुझे मेरे अतीत और आपके साथ स्वीकार करने को तैयार हैं, तो मुझे उनका प्रस्ताव मंज़ूर है। मैं शादी के लिए तैयार हूँ।”
यह सुनते ही भानुप्रताप जी की आँखों में जैसे जीवन की एक नई ज्योति कौंध गई। उन्होंने कांपते हाथों से मीरा का सिर अपने सीने से लगा लिया। उस रात उस बूढ़े बाप के सीने से सालों का भारी बोझ हमेशा के लिए उतर गया था। कमरे का सन्नाटा अब डरावना नहीं था, बल्कि उसमें एक नई सुबह की आहट घुली हुई थी।
तीन महीने बाद, वसंत की एक सुनहरी दोपहर में, उसी घर के आँगन में एक सादे पर बेहद गरिमामय समारोह का आयोजन हुआ। कोई भारी-भरकम तड़क-भड़क नहीं थी, बस गिने-चुने आत्मीय लोग और वैदिक मंत्रों की गूँज थी।
मीरा ने हल्के गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी पहन रखी थी। उसके चेहरे पर बनावटी चमक नहीं, बल्कि एक ठहराव भरा, गरिमामय तेज था। विवेक ने जब उसके गले में मंगलसूत्र पहनाया, तो उसकी आँखों में मीरा के लिए बेशुमार अकीदत और मोहब्बत तैर रही थी।
फेरे पूरे होने के बाद, दोनों सबसे पहले दालान में रखी राघव की तस्वीर के सामने पहुँचे। तस्वीर पर ताज़े चमेली के फूलों की माला लटकी थी। विवेक ने आगे बढ़कर अपने हाथों से तस्वीर के सामने एक नया दीया जलाया और सिर झुकाकर हाथ जोड़ लिए। मीरा ने भी हाथ जोड़े। इस बार उसकी आँखों में विलाप के आँसू नहीं थे, बल्कि एक कृतज्ञता भरी चमक थी। उसे लगा जैसे तस्वीर में मुस्कुराता राघव उन दोनों पर अपना मूक आशीष बरसा रहा हो।
इसके बाद दोनों झुककर भानुप्रताप जी के चरणों में गिरे।
भानुप्रताप जी ने दोनों के सिर पर अपने दोनों हाथ रख दिए। उनकी आँखों से बहते आँसू आज दर्द के नहीं, बल्कि परम संतोष और आनंद के थे। उन्होंने विवेक का हाथ मीरा के हाथ पर रखा और गदगद कंठ से बोले, “आज मैं सचमुच अपने तमाम सांसारिक कर्जों से मुक्त हो गया। आज इस घर में सिर्फ एक बहू ने दूसरा जीवन नहीं पाया, बल्कि एक बाप को उसकी खोई हुई औलाद और उसका खोया हुआ संसार वापस मिल गया।”
बाहर आँगन में लगे पारिजात के पेड़ से सफेद-नारंगी फूल हौले-हौले झड़कर ज़मीन को महका रहे थे, मानों प्रकृति भी इस नए, पावन संकल्प पर अपने अक्षत बरसा रही हो। जीवन ने एक बार फिर साबित कर दिया था कि पतझड़ कितना भी क्रूर क्यों न हो, अगर हौसले की ज़मीन और अपनों के प्यार की धूप मिले, तो नई कोंपलों को खिलने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती।
अक्सर हमारा समाज विधवा या परित्यक्ता स्त्री से यह उम्मीद करता है कि वह अपनी बची हुई ज़िंदगी सिर्फ यादों के खंडहर में आँसू बहाकर काट दे। क्या एक ससुर का अपनी बहू को बेटी मानकर उसका पुनर्विवाह कराना और एक पुरुष का उस स्त्री को उसके अतीत समेत पूरे सम्मान के साथ अपनाना—हमारे समाज के लिए एक अनुकरणीय मिसाल नहीं है? इस विषय पर आपकी क्या सोच है? अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : कृति सिंह चौहान