साँवले रंग की चमक

 प्रतीक की बातें सुनकर मालती जी की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने गर्व से अपनी बेटी की तरफ देखा। वहीं आलोक जी का सिर शर्म और पश्चाताप से झुक गया था। उन्हें आज समझ आ गया था कि जिस साँवले रंग को वे अपनी बेटी की कमजोरी समझ रहे थे और जिसे … Read more

दहलीज़ के उस पार

 सिद्धार्थ का पारा सातवें आसमान पर था। माँ के भड़काए हुए शब्दों ने उसकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था। उसने अपने बुजुर्ग ससुर की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “आप तो रहने ही दीजिए पापा जी! गलती वैदेही की नहीं, आपकी और आपकी परवरिश की है। आपने इसे इतना सिर चढ़ा रखा है कि … Read more

ज़िंदगी के कड़वे घूंट में उम्मीद की मिठास

अनुपमा ने तब सोचा था कि वक्त हर घाव की सबसे बड़ी दवा होता है। कुछ दिन बीतेंगे तो पाखी का मन हल्का हो जाएगा और वह खुद को संभाल लेगी। लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। बीतते दिनों के साथ पाखी का दर्द कम होने के बजाय नासूर बनता जा रहा था। वह खुद को … Read more

मायके की देहरी

 रेणुका ने मुस्कुराते हुए अंजू के कंधे पर सिर टिका दिया और बोली, “दीदी, जिस घर में बेटियों का आना-जाना बना रहता है, उस घर में हमेशा बरकत और रौनक रहती है। आप आती हैं तो आपके भैया के चेहरे पर जो रौनक आती है, वह किसी भी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती। और … Read more

समर्पण का मौन कर्ज

 आलोक का स्पर्श पाते ही वंदना का सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। उसने आलोक के हाथों को अपनी आंखों से लगा लिया और फूट-फूट कर रोते हुए, टूटते शब्दों में बोली, “आप… आप इतने अच्छे क्यों हैं? क्यों करते हैं आप मेरे लिए इतना सब कुछ? मैंने कल रात आपकी और भैया की … Read more

अधूरे ख्वाबों की नई सुबह

 वैदेही आंटी के जाने के बाद मैंने काँपते हाथों से वह डायरी खोली। उसके हर पन्ने पर मेरे लिए उसका बेपनाह प्यार लिखा था, और आखिरी के कुछ पन्नों में उसने अपने एक सपने का जिक्र किया था। विहान ने लिखा था कि वह शादी के बाद मेरे साथ मिलकर पहाड़ी इलाकों के उन अनाथ … Read more

रिश्तों की डोर

“अरे ऐसा भी क्या कबाड़ उठा लाए हैं जमाई राजा, जो तू सुबह-सुबह इतना मुंह फुलाए बैठी है?” शकुंतला देवी ने अपनी बेटी पारुल से फोन पर बात करते हुए चाय की चुस्की ली। देहरादून की इस हल्की ठंडी सुबह में शकुंतला देवी के हाथ में चाय का प्याला था और कान पर फोन। उधर … Read more

बंद मुट्ठी की विरासत और आँगन की तुलसी

“अजी सुनते हो! सुबह-सुबह चश्मा नाक पर टिकाए ऐसे क्या घूर रहे हो? कोई अजूबा देख लिया क्या? जैसे-जैसे बाल सफेद हो रहे हैं, वैसे-वैसे आपकी शरारतें बढ़ती जा रही हैं!” अपनी सूती साड़ी के पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए गौरी देवी ने मीठी झिड़की दी। उनके हाथों में तुलसी के गमले में … Read more

भीतर का कोहरा

अनिकेत सन्न रह गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमेशा सहमी रहने वाली मल्लिका कभी इस तरह पलटवार करेगी। अनिकेत ने धमकियाँ देने की कोशिश की कि वह उसे समाज में बदनाम कर देगा, लेकिन मेधा और उनकी टीम के कड़े रुख और पुलिस की कानूनी चेतावनी ने अनिकेत की सारी … Read more

फ्लैट नंबर 403 – श्वेता अग्रवाल

फ्लैट नंबर 402 का दरवाजा हमेशा बंद रहता था। भीतर रहते थे सत्तर वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर कृष्णकांत। उनके दोनों बेटे बरसों पहले विदेश जाकर बस चुके थे। वे महीने में एकाध बार फोन करके अपने दायित्व की पूर्ति कर लेते थे। अकेले रहते-रहते और बच्चों की बेरुखी के कारण प्रोफेसर कृष्णकांत बहुत चिड़चिड़े हो गए … Read more

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