फ्लैट नंबर 402 का दरवाजा हमेशा बंद रहता था। भीतर रहते थे सत्तर वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर कृष्णकांत। उनके दोनों बेटे बरसों पहले विदेश जाकर बस चुके थे। वे महीने में एकाध बार फोन करके अपने दायित्व की पूर्ति कर लेते थे।
अकेले रहते-रहते और बच्चों की बेरुखी के कारण प्रोफेसर कृष्णकांत बहुत चिड़चिड़े हो गए थे। वे बस अपने तक ही सिमटे रहते थे। अगर कभी उनका बात करने का मन होता तो खिड़की पर आकर बैठने वाले पक्षियों से या अपने पेड़-पौधों से बातें कर लेते।
चार कमरों वाला उनका फ्लैट पुरानी किताबों, अलमारियों, घड़ियों की टिक-टिक और एक गहरी, ठंडी चुप्पी से भरा था। यह कृष्णकांत जी की अपनी दुनिया थी जिसमें किसी भी बाहरी व्यक्ति की कोई जगह नहीं थी।
लेकिन जब से सामने वाले फ्लैट नंबर 403 में बीस-इक्कीस साल का कृष रहने आया था, कृष्णकांत जी को लगने लगा था कि यह लड़का उनके शांत संसार में बेवजह खलल डाल रहा है।
कृष दिन में कॉलेज की पढ़ाई करता और शाम से देर रात तक ऑनलाइन फूड डिलीवरी का काम करता था। उसकी आदतें जैसे बाइक की चाबी घुमाते हुए तेजी से सीढ़ियाँ उतरना, कभी-कभी तेज आवाज में म्यूजिक बजाना, वीकेंड पर देर रात तक दोस्तों को बुलाना और तो और, कभी भी उनका दरवाजा खटखटाकर चीनी या चायपत्ती माँगना, उन्हें बिल्कुल नागवार गुजरता था।
देर रात तक पार्टी करने, जोर-जोर से म्यूजिक बजाने और बेवजह उन्हें डिस्टर्ब करने के लिए उन्होंने अपार्टमेंट के गार्ड से कई बार इसकी शिकायत भी की थी। लेकिन इसके बावजूद कृष जब भी लिफ्ट या गलियारे में मिलता, अदब से हाथ जोड़कर मुस्कुराता। प्रोफेसर साहब अपनी छड़ी सँभालते हुए त्योरियाँ चढ़ा लेते और बिना कुछ बोले आगे बढ़ जाते।
कृष ने कई बार सोचा कि आखिर अंकल जी उससे इतना नाराज क्यों रहते हैं, लेकिन फिर यह सोचकर चुप हो जाता कि शायद उन्हें शोर-शराबा पसंद नहीं है।
तभी एक तूफानी बरसाती रात में अचानक सब कुछ बदल गया।
उस दिन बाहर तेज बारिश हो रही थी और बिजली भी गुल थी। आधी रात के करीब प्रोफेसर कृष्णकांत की छाती में अचानक असहनीय दर्द उठा। बाईं बाँह में भी तेज खिंचाव होने लगा। साँस लेना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने फोन उठाने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ा।
किसी तरह दीवार का सहारा लेते हुए वे दरवाजे तक पहुँचे। काँपते हाथों से दरवाजा खोला और मदद के लिए आवाज लगाने की कोशिश की, लेकिन आवाज गले में ही अटक गई। अगले ही पल वे गलियारे में गिर पड़े।
उसी वक्त कृष अपनी डिलीवरी खत्म करके घर लौटा था। वह रेनकोट उतारकर अपने फ्लैट का ताला खोल ही रहा था कि उसे कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी।
वह तुरंत पलटा। सामने प्रोफेसर कृष्णकांत फर्श पर पड़े थे।
“अंकल जी! क्या हुआ आपको?”
कृष घबराकर उनके पास पहुँचा। उसने उन्हें आवाज दी, लेकिन वे ठीक से जवाब नहीं दे पा रहे थे। उनकी हालत देखकर कृष ने तुरंत अपार्टमेंट के गार्ड को फोन किया और एम्बुलेंस के लिए अस्पताल से संपर्क किया। लेकिन तेज बारिश के कारण अस्पताल ने समय पर एंबुलेंस पहुंचने की संभावना से इनकार कर दिया।
“हम अभी एंबुलेंस भेज रहे हैं लेकिन सारे रास्तों में पानी भरा हुआ है तो हम यह नहीं बता सकते कि एंबुलेंस आपके पास कब तक पहुंचेगी?”
यह सुनते ही कृष ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने गार्ड की मदद से कृष्णकांत जी को सँभाला और उन्हें अपनी डिलीवरी बाइक से अस्पताल ले जाने का फैसला किया। उसने प्रोफेसर साहब को मफलर और गमछे से अपने साथ कसकर बांधा और बारिश से बचाने के लिए अपना रेनकोट उनके ऊपर डाल दिया। फिर सावधानी से बाइक चलाते हुए तीन किलोमीटर दूर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड पहुँचा दिया।
अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने तुरंत कृष्णकांत जी को एडमिट कर लिया। “वेल डन यंग बॉय, तुम इन्हें बिल्कुल सही समय पर अस्पताल ले आए। अगर 10 मिनट की ओर देरी हो जाती तो इनका बचना मुश्किल था।”
डॉक्टर की बात सुनते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर डॉक्टर को धन्यवाद दिया और फिर वहीं बाहर बैठकर उनके होश में आने का इंतजार करने लगा।
सुबह जब प्रोफेसर कृष्णकांत की आँख खुली, तो खुद को अस्पताल के केबिन में देखकर उन्होंने आश्चर्य से नर्स की ओर देखा।
“मैं यहाँ कैसे पहुँचा?”
“आपको एक लड़का यहाँ लेकर आया था। आप ज्यादा बात मत कीजिए, आराम कीजिए।”
तभी उनके होश में आने की खबर सुनकर कृष दौड़ता हुआ अंदर आया।
“अंकल जी! आपको होश आ गया!”
कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई और आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे देखते ही नर्स ने कृष्णकांत जी की ओर देखकर कहा, “यही लड़का आपको यहाँ लेकर आया था। रात भर से बाहर बैठा आपके होश में आने का इंतजार कर रहा है।”
यह सुनते ही कृष्णकांत जी ने हैरत से कृष की ओर देखा।
“बेटा, मैंने हमेशा तुम्हें इतना डाँटा, तुमसे इतना चिढ़ता रहा, लेकिन तुमने मेरे लिए…”
वे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि कृष उन्हें बीच में रोकते हुए बोल पड़ा, “अंकल जी, आप प्लीज ऐसा मत कहिए। आप जल्दी से ठीक हो जाइए। मुझे आपके डाँटने या चिढ़ने से नहीं, आपके बीमार पड़े रहने से फर्क पड़ता है।”
यह सुनते ही प्रोफेसर कृष्णकांत की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने धीरे से अपना हाथ कृष के सिर पर रख दिया।
पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि कोई ऐसा भी है जिसे उनके ठीक होने की सचमुच चिंता है, जबकि उससे उनका कोई खून का रिश्ता भी नहीं है।
पूरे एक हफ्ते तक प्रोफेसर कृष्णकांत अस्पताल में रहे। इस दौरान कृष रोज कॉलेज जाने से पहले या डिलीवरी पर निकलने से पहले उनसे मिलने आता। कभी उनके लिए फल ले आता, कभी डॉक्टर से उनकी तबीयत के बारे में पूछता और कभी उनके पास बैठकर अपने कॉलेज की बातें सुनाता।
एक दिन कृष्णकांत जी ने उससे कहा, “बेटा, तुम रोज मेरे लिए इतना परेशान होते हो। तुम्हारी पढ़ाई और काम भी तो है। अब तुम अपने काम पर ध्यान दो।”
कृष मुस्कुराकर बोला, “अंकल जी, आप ठीक होकर घर आ जाइए। फिर आपकी डाँट भी सुन लेंगे और अपनी पढ़ाई भी कर लेंगे।”
काफी दिनों बाद कृष्णकांत जी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।
एक हफ्ते बाद जब वे अस्पताल से घर लौटे, तो कृष उन्हें सहारा देकर फ्लैट तक लाया। दरवाजे पर पहुँचकर वह उन्हें अंदर छोड़कर जाने लगा, लेकिन कृष्णकांत जी ने उसे आवाज दी।
“कृष!”
वह पलटकर खड़ा हो गया।
“बेटा, शाम को फुर्सत मिले तो इधर आना। चाय साथ पिएँगे।”
कृष के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसे उसे कोई बहुत बड़ी खुशी मिल गई हो।
“जी अंकल जी! जरूर आऊँगा।”
उस शाम पहली बार उनके फ्लैट की बालकनी में दो कुर्सियाँ लगीं। कृष चाय लेकर आया तो कृष्णकांत जी ने उसे अपने पास बैठने का इशारा किया।
उस दिन दोनों ने साथ-साथ चाय पीते हुए देर तक बातें कीं।
महीने बीतते गए और शाम पाँच बजे की चाय के साथ दोनों का रिश्ता भी गहरा होता गया। प्रोफेसर कृष्णकांत कृष को उसकी पढ़ाई और अंग्रेजी के कठिन विषयों में मदद करते, तो कृष उन्हें अपने कॉलेज और डिलीवरी के किस्से सुनाता।
कभी कृष देर से आता तो कृष्णकांत जी गलियारे की तरफ देखते रहते। और जब वह दरवाजे पर आकर कहता, “अंकल जी, आज चाय मैं बनाऊँ या आप बनाएँगे?” तो उनके चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ जाती।
अब कृष के तेज कदमों की आवाज उन्हें परेशान नहीं करती थी। कभी-कभी तो वे घड़ी देखकर सोचने लगते कि आज लड़का इतनी देर कहाँ रह गया।
एक शाम प्रोफेसर कृष्णकांत के बड़े बेटे का विदेश से फोन आया।
“पापा, आपकी उम्र हो गई है और आप अकेले रहते हैं, इसलिए हमें आपकी बहुत चिंता होती है। यहाँ से हम आपकी देखभाल भी नहीं कर पाते। हम सोच रहे हैं कि आपको शहर के किसी अच्छे सीनियर सिटिजन विला में शिफ्ट करवा दें। वहाँ चौबीसों घंटे नर्स रहेगी, तो आपकी देखभाल अच्छे से हो जाएगी।”
कृष्णकांत जी कुछ देर चुप रहे।
उन्होंने बालकनी की तरफ देखा, जहाँ कृष फर्श पर बैठकर उनके चश्मे का ढीला पेंच कस रहा था। चश्मा ठीक करने के बाद वह उसे साफ करने लगा और धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रहा था।
कृष्णकांत जी ने गहरी साँस ली।
“बेटा, तुम लोगों को मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ।”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
“लेकिन पापा, हम चाहते हैं कि आपकी देखभाल अच्छी तरह हो।”
“जानता हूँ बेटा। तुम्हें मेरी चिंता है। लेकिन देखभाल सिर्फ दवा और नर्स से नहीं होती। कभी-कभी किसी का पास बैठ जाना, दो बातें कर लेना और साथ में चाय पी लेना भी बहुत जरूरी होता है।”
उन्होंने कुछ पल रुककर कहा, “तुम लोग अपनी जिंदगी में खुश रहो। मैं भी यहाँ ठीक हूँ।”
यह कहकर उन्होंने फोन रख दिया।
फोन रखते ही उनकी आँखें नम हो आईं। वे अपने बेटों से नाराज नहीं थे, लेकिन कहीं न कहीं मन में एक खालीपन जरूर था। आखिरी बार उनके बेटों ने उनके साथ बैठकर चाय कब पी थी, यह भी उन्हें ठीक से याद नहीं था।
उन्हें उदास देखकर कृष तुरंत उनके पास आया।
“क्या हुआ अंकल जी? आप ठीक तो हैं न? किसका फोन था? कोई परेशानी तो नहीं?”
कृष की आँखों में चिंता देखकर कृष्णकांत जी कुछ पल उसे देखते रहे। फिर उन्होंने आगे बढ़कर उसे सीने से लगा लिया।
“कुछ नहीं बेटा… मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “जा, चाय बनाकर ले आ। और सुन, आज चाय में थोड़ी तुलसी की पत्ती ज्यादा डालना।”
कृष मुस्कुराते हुए रसोई की ओर चल पड़ा।
“अभी लाया, अंकल जी!”
कुछ ही देर में रसोई से केतली की खनक सुनाई देने लगी। चाय की खुशबू पूरे फ्लैट में फैल गई।
कृष दो कप चाय लेकर बालकनी में आया। उसने एक कप कृष्णकांत जी को दिया और दूसरा लेकर उनके पास बैठ गया।
कृष्णकांत जी ने चाय का कप हाथ में लिया और सामने खुले आसमान की ओर देखने लगे। उनके फ्लैट का दरवाजा आज भी वही था, वही पुरानी किताबें थीं, वही घड़ी की टिक-टिक थी। लेकिन अब उस घर की चुप्पी पहले जैसी नहीं रही थी।
उन्होंने एक नजर अपने पास बैठे कृष पर डाली, जो चाय की चुस्की लेते हुए अपने कॉलेज का कोई किस्सा सुना रहा था।
कृष्णकांत जी के चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान आ गई।
कभी उन्हें लगता था कि इस लड़के की दस्तक उनके शांत जीवन में बेवजह का खलल है। आज उसी की आहट का उन्हें इंतजार रहता था।
उन्होंने चाय का कप थोड़ा और कसकर थाम लिया।
उन्हें समझ आ गया था कि अपनेपन के लिए हमेशा खून का रिश्ता जरूरी नहीं होता। कभी-कभी कोई पराया भी इतना अपना सा लगने लगता है कि उसके बिना घर खाली लगने लगता है।
धन्यवाद
साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता- #पराया, जो अपना सा लगे
लेखिका- श्वेता अग्रवाल, धनबाद, झारखंड
शीर्षक -फ्लैट नंबर 403