रिश्तों की डोर

“अरे ऐसा भी क्या कबाड़ उठा लाए हैं जमाई राजा, जो तू सुबह-सुबह इतना मुंह फुलाए बैठी है?” शकुंतला देवी ने अपनी बेटी पारुल से फोन पर बात करते हुए चाय की चुस्की ली।

देहरादून की इस हल्की ठंडी सुबह में शकुंतला देवी के हाथ में चाय का प्याला था और कान पर फोन। उधर से पारुल की भरी हुई आवाज आई, “क्या बताऊं मां! कल हमारी शादी की सालगिरह है और इन्होंने मुझे सरप्राइज देने के नाम पर एक कांजीवरम की साड़ी लाकर दी है। मां, तुम्हें तो पता है न कि मुझे ये भारी-भरकम और चौड़े बॉर्डर वाली साड़ियां बिल्कुल पसंद नहीं आतीं। आजकल तो हल्के ऑर्गेंजा और शिफॉन का जमाना है। ऊपर से रंग भी एकदम गहरा मैरून ले आए हैं। कह रहे हैं कि किसी पूजा-पाठ या बड़े फंक्शन में पहन लेना।”

शकुंतला देवी ने तुरंत अपनी भौंहे सिकोड़ीं और बेटी को हवा देते हुए बोलीं, “ना बाबा ना! बिल्कुल मत पहनना। अरे जब मन ही न हो, तो शरीर पर बोझ क्यों लादना? सीधा बोल दे कि बिल दिखाएं और जाकर अभी के अभी बदल कर आएं। हद होती है, सात साल हो गए शादी को, पर आज तक दामाद जी को मेरी फूल सी बच्ची की पसंद-नापसंद ही समझ नहीं आई। रुक जरा, दरवाजे पर दूध वाला आया है, मैं दूध लेकर तुझे वापस फोन लगाती हूं।”

शकुंतला देवी ने फोन काटकर सोफे पर पटका और किचन से बाहर आती अपनी बहू मृदुला को आवाज दी। “मृदुला! अरे ओ मृदुला… जरा अपना फोन तो लाना। पारुल कह रही थी कि उसने तुझे वो साड़ी की फोटो भेजी है जो विकास जी कल शाम उसके लिए लाए हैं। जरा देखूं तो सही कि हमारे दामाद जी ने ऐसी कौन सी नायाब चीज खरीदी है जिस पर मेरी बेटी का पारा सातवें आसमान पर है।”

मृदुला ने अपने हाथ आटे से साफ किए और पल्लू से पोंछते हुए फोन लाकर सास के हाथ में दे दिया। फोटो देखते ही शकुंतला देवी ने मुंह ऐसे बनाया जैसे नीम की पत्ती चबा ली हो।

“हाय राम! यह क्या बुढ़ापे वाला रंग उठा लाए हैं? और इतना चौड़ा सुनहरा बॉर्डर कौन पहनता है आजकल? पारुल तो मेरी अभी भी कॉलेज की लड़की जैसी लगती है, उस पर ये पंडिताइन जैसी साड़ी कहां जचेगी! विकास को तो कपड़े-लत्ते की रत्ती भर भी तमीज नहीं है। बस दुकानदार ने जो पट्टी पढ़ा दी, वही झोले में डालकर चले आए। एक हमारा सिद्धार्थ है… मजाल है जो कभी तुम्हारे लिए ऐसी बेढंगी चीज ले आए! सिद्धार्थ की पसंद तो ऐसी है कि चार लोग पूछते हैं कि कहां से लिया। ना जाने मेरी ही बेटी के नसीब में ऐसा बेरंग इंसान क्यों लिखा था, जिसे न फैशन की समझ है और न पत्नी के शौक की कद्र।”

मृदुला चुपचाप खड़ी अपनी सास की बातें सुन रही थी। उसने बहुत ही शांत और सधे हुए स्वर में कहा, “मम्मी जी, फोटो में रंग थोड़ा दबा हुआ लग रहा है, वरना यह असली प्योर सिल्क की कांजीवरम साड़ी है। और आप नीचे कोने में उस शोरूम का टैग देखिए, यह शहर के सबसे बड़े ‘कला निकेतन’ एम्पोरियम से ली गई है। आजकल पारंपरिक साड़ियों का फिर से बहुत चलन है मम्मी जी। जीजा जी ने बहुत मन से और कम से कम आठ-दस हजार रुपये खर्च करके यह साड़ी खरीदी होगी।”

शकुंतला देवी को बहू की यह दलील रास नहीं आई। उन्होंने फोन वापस मृदुला के हाथ में थमाते हुए तंज कसा, “तुम तो रहने ही दो मृदुला! तुम्हें तो हर चीज में बस दाम और टैग दिखता है। अरे चीज वो होती है जो पहनने वाले के मन को भाए, चाहे पांच सौ की ही क्यों न हो। पर विकास को यह बात कौन समझाए!”

अभी सास-बहू की यह बातचीत चल ही रही थी कि शकुंतला देवी का फोन फिर से घनघना उठा। स्क्रीन पर पारुल का नाम चमक रहा था। फोन उठाते ही उधर से पारुल के सिसकने की आवाज आने लगी। पता चला कि मां की शह मिलने के बाद पारुल ने विकास को खूब खरी-खोटी सुनाई। बात इतनी बढ़ गई कि विकास, जो आमतौर पर बहुत शांत स्वभाव के इंसान थे, बिना नाश्ता किए ही अपनी गाड़ी की चाबी उठाकर गुस्से में घर से निकल गए। जाने से पहले उन्होंने इतना तक कह दिया कि “आज के बाद मैं तुम्हारे लिए कभी कुछ नहीं खरीदूंगा।”

बस फिर क्या था, आधे घंटे तक पारुल फोन पर रो-रोकर अपने पति की शिकायतें करती रही और शकुंतला देवी उसे समझाने के बजाय उसके गुस्से में घी डालती रहीं— “तू चिंता मत कर, शाम को आएगा तो खुद ही अक्ल ठिकाने आ जाएगी। मर्दों को सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए, वरना वो औरत को गुलाम समझ लेते हैं।”

जब पारुल का मन हल्का हो गया, तो उसने फोन रख दिया। लेकिन शकुंतला देवी का दरबार अब शुरू हुआ था। उन्होंने ड्राइंग रूम के सोफे पर पालथी मारी और मटर छीलती हुई मृदुला को सुनाकर फिर से अपना पुराना राग अलापना शुरू कर दिया। यह कोई आज की बात नहीं थी। इस घर का यह रोज का दस्तूर बन चुका था। जब भी पारुल और विकास के बीच छोटी सी भी नोकझोंक होती, पारुल तुरंत अपनी मां को फोन लगाती। शकुंतला देवी पहले बेटी को भड़कातीं और फिर घंटों बैठकर अपने दामाद की कमियां गिनातीं। और इस पूरी प्रक्रिया में उनका सबसे पसंदीदा काम होता था— अपने बेटे सिद्धार्थ को दुनिया का सबसे आदर्श पति साबित करना और मृदुला को यह जताना कि वह इस घर में रानी बनकर रह रही है, जबकि उनकी अपनी बेटी नर्क भोग रही है।

“देखा मृदुला? इसे कहते हैं किस्मत का खेल!” शकुंतला देवी ने गहरी सांस लेते हुए कहा। “मेरे जैसा सीधा और समझदार बेटा तो भगवान ने तुझे दे दिया, पर मेरी फूल सी बच्ची के पल्ले कैसा अड़ियल इंसान बांध दिया। भला बता, शादी की सालगिरह के तोहफे पर कोई पति अपनी पत्नी से ऐसे लड़कर घर से बाहर जाता है? अरे पत्नी है, अगर नखरे नहीं दिखाएगी तो कौन दिखाएगा? सिद्धार्थ को देख… कभी आज तक तुझसे ऊंची आवाज में बात की है उसने? तेरे बिना कहे तेरी हर ख्वाहिश पूरी करता है। तू तो बड़ी भाग्यशाली है बहू, जो तुझे सिद्धार्थ जैसा हीरा मिला है, वरना विकास जैसे मर्द के साथ रहना पड़े तो दिन में तारे दिख जाएं!”

मटर के दाने कटोरे में गिराती मृदुला के हाथ अचानक रुक गए। उसने एक गहरी सांस ली। आज तक वह घर की शांति बनाए रखने के लिए चुप रहती थी, लेकिन आज वह देख रही थी कि उसकी सास की इस अंधी ममता और झूठी तुलना की वजह से पारुल का बसा-बसाया घर टूटने की कगार पर पहुंच रहा था।

मृदुला ने मटर की टोकरी एक तरफ रखी और शकुंतला देवी की आंखों में देखते हुए बेहद शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, “मम्मी जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। सिद्धार्थ कभी मुझसे इस तरह झगड़कर घर से बाहर नहीं जाते। लेकिन मम्मी जी, क्या आप जानती हैं कि वो ऐसा क्यों नहीं करते?”

शकुंतला देवी ने गर्व से सिर उठाते हुए कहा, “क्योंकि मेरे बेटे में संस्कार हैं, वह तुझसे प्यार करता है!”

मृदुला के होंठों पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई। उसने कहा, “नहीं मम्मी जी। सिद्धार्थ मुझसे तोहफों को लेकर इसलिए नहीं झगड़ते, क्योंकि पिछले पांच सालों में सिद्धार्थ ने कभी अपनी मर्जी से, अपने हाथों से चुनकर मेरे लिए एक रुमाल तक नहीं खरीदा है। कल हमारी नहीं, दीदी की सालगिरह है, और जीजा जी ने एक हफ्ता पहले से उनके लिए तोहफा ढूंढना शुरू कर दिया था। वो ऑफिस से थकने के बाद भी बाजार गए, अपनी समझ से सबसे अच्छी साड़ी चुनी। और सिद्धार्थ? सिद्धार्थ तो मेरे जन्मदिन या सालगिरह पर बस मेरे हाथ में दो हजार रुपये थमा देते हैं कि ‘जाओ, जो लेना हो खुद ले आना, मेरे पास बाजार घूमने का फालतू वक्त नहीं है।’ और अगर कभी त्यौहार पर आपकी जिद पर वो कुछ ले भी आते हैं, तो उसमें न मेरा रंग होता है, न मेरी पसंद। फिर भी मम्मी जी, मैं मुस्कुराकर उसे सिर-माथे लगाती हूं। मैं कभी अपनी मां को फोन करके यह नहीं बताती कि मेरे पति को मेरी पसंद का पता ही नहीं है।”

शकुंतला देवी के चेहरे का रंग उड़ गया। उनकी आंखें गुस्से और आश्चर्य से फैल गईं। “तुम… तुम कहना क्या चाहती हो मृदुला? क्या तुम मेरे बेटे में कमियां निकाल रही हो? या ये कह रही हो कि मेरी पारुल ही झगड़ालू है और सारी गलती उसी की है?”

“मैं किसी में कमी नहीं निकाल रही मम्मी जी, मैं बस आपको वो आईना दिखा रही हूं जिस पर आपने ममता की धूल जमने दी है,” मृदुला ने उठकर अपनी सास के पास बैठते हुए उनके हाथों को अपने हाथों में लिया। उसकी आवाज में कोई विद्रोह नहीं था, बल्कि एक गहरा दर्द और समझदारी थी।

“मम्मी जी, कोई भी इंसान पूरा परफेक्ट नहीं होता। सिद्धार्थ बहुत अच्छे हैं, वो घर की जिम्मेदारियां बखूबी निभाते हैं, पर वो भावनाओं को जताना नहीं जानते। दूसरी तरफ विकास जीजा जी हैं, जो दीदी से इतना प्यार करते हैं कि उनकी छोटी-छोटी खुशियों के लिए खुद बाजारों की खाक छानते हैं। हर महीने दीदी को घुमाने ले जाते हैं, उनके सिर में दर्द भी हो तो ऑफिस से छुट्टी ले लेते हैं। क्या सिद्धार्थ ने कभी मेरे बुखार में ऑफिस से छुट्टी ली है? नहीं न! पर मैंने कभी इस बात का बतंगड़ नहीं बनाया, क्योंकि मैंने सिद्धार्थ को उनकी अच्छाइयों और कमियों, दोनों के साथ स्वीकार किया है। मेरे मायके में मेरी मां ने मुझे हमेशा यही सिखाया कि पति अगर प्यार से पत्थर भी लाकर दे, तो उसके पीछे के भाव को देखना, उस पत्थर की कीमत को नहीं।”

शकुंतला देवी स्तब्ध बैठी थीं। मृदुला की बातें कड़वी जरूर थीं, लेकिन उनमें एक भी शब्द झूठ नहीं था।

मृदुला ने आगे कहा, “मम्मी जी, माफ कीजिएगा, लेकिन दीदी के घर में जो ये रोज-रोज का क्लेश होता है न, उसकी जड़ कहीं न कहीं आपकी यह अंधी तरफदारी है। जब एक शादीशुदा बेटी गुस्से में अपनी मां को फोन करती है, तो वह उस वक्त नासमझ होती है। उस वक्त मां का फर्ज होता है कि वह बेटी को ठंडा करे, उसे उसके पति का प्यार और समर्पण याद दिलाए। लेकिन आप क्या करती हैं? आप दीदी की हर गलत बात में भी हां में हां मिलाती हैं और जीजा जी को कटघरे में खड़ा कर देती हैं। आप बार-बार सिद्धार्थ का झूठा उदाहरण देकर दीदी के मन में यह जहर भर देती हैं कि उनका पति नालायक है और भाई दुनिया का सबसे अच्छा पति है। इसी तुलना ने दीदी के मन से जीजा जी के लिए सम्मान खत्म कर दिया है। जिस दिन जीजा जी का सब्र टूट गया न मम्मी जी, उस दिन दीदी के पास पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।”

कमरे में एकदम सन्नाटा पसर गया। दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही थी। शकुंतला देवी ने आज तक अपनी बहू को केवल आज्ञाकारी रूप में देखा था, लेकिन आज मृदुला की बातों ने उनकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। उन्हें याद आया कि कैसे हर बार पारुल के फोन करने पर उन्होंने आग में घी डालने का काम किया था। कैसे उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि विकास उनकी बेटी का कितना ख्याल रखता है, बल्कि हमेशा उसकी छोटी-छोटी भूलों को पहाड़ बना दिया। और यह भी सच था कि सिद्धार्थ ने तो पिछले साल मृदुला के जन्मदिन पर उसे विश करना तक याद नहीं रखा था, फिर भी मृदुला ने हंसकर दिन बिता दिया था।

शकुंतला देवी की आंखों से दो बूंद आंसू लुढ़क कर उनके गालों पर आ गिरे। उन्होंने कांपते हाथों से मृदुला के सिर पर हाथ फेरा और भारी गले से बोलीं, “तू आज मेरी बहू नहीं, मेरी मां बनकर बोली है मृदुला। मैं अपनी बेटी के मोह में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे दिख ही नहीं रहा था कि मैं खुद अपने हाथों से उसके सुहाग की खुशियों में ग्रहण लगा रही हूं। मैंने तुझे भी हमेशा ताने ही दिए, तेरे सब्र की कभी कद्र नहीं की।”

“ऐसा मत कहिए मम्मी जी, आप बड़ों का आशीर्वाद ही तो इस घर की नींव है। बस अब इस नींव को दीदी के घर में भी मजबूत करना है,” मृदुला ने सास के आंसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा।

तभी मृदुला के दिमाग में एक विचार कौंधा। उसने कहा, “मम्मी जी, कल दीदी और जीजा जी की सालगिरह है। अभी वक्त बिगड़ा नहीं है, हम चाहें तो आज की इस कड़वाहट को कल की सबसे खूबसूरत याद में बदल सकते हैं।”

शकुंतला देवी ने उम्मीद भरी नजरों से मृदुला की तरफ देखा, “वो कैसे बहू?”

मृदुला ने तुरंत अपना फोन उठाया और पारुल को वीडियो कॉल लगाया। पारुल अभी भी बिस्तर पर लेटी सुबक रही थी। फोन उठाते ही शकुंतला देवी ने इस बार कोई सहानुभूति नहीं दिखाई, बल्कि थोड़ी सख्त आवाज में बोलीं, “पारुल! आंखें पोंछ और मेरी बात कान खोलकर सुन। अभी तुरंत उठ, मुंह धो और वो कांजीवरम साड़ी निकाल जो विकास लाया है।”

पारुल ने चौंककर कहा, “पर मां, अभी तो तुम कह रही थीं कि…”

“मैं जो कह रही थी वो मेरी नादानी थी!” शकुंतला देवी ने बीच में ही बात काटते हुए कहा। “मुझे मृदुला ने अभी उस साड़ी की बारीकियां दिखाई हैं। अरे पगली, वो शुद्ध रेशम की साड़ी है जो विकास ने अपनी पसीने की कमाई से, न जाने कितनी दुकानों में भटकने के बाद तेरे लिए चुनी है। मर्दों को औरतों के फैशन की बारीक समझ नहीं होती पारुल, उन्हें बस यह समझ आता है कि मेरी पत्नी किस चीज में रानी लगेगी। उसकी आंखों से देख, उस साड़ी में उसका प्यार बुना हुआ है। आज तक मैंने तुझे गलत राह दिखाई, पर अब नहीं। तेरा पति हीरा है पारुल, उसकी कद्र कर, वरना मेरी तरह बाद में पछताएगी। सिद्धार्थ तो कभी मृदुला के लिए इतना समय भी नहीं निकाल पाता जितना विकास तेरे लिए करता है।”

मां के मुंह से अचानक ऐसी बातें सुनकर पारुल सन्न रह गई। तभी मृदुला ने स्क्रीन पर आकर कहा, “दीदी, एक काम कीजिए। आज शाम जब जीजा जी ऑफिस से लौटें, तो आप ठीक वैसी ही तैयार होकर उन्हें दरवाजे पर मिलिए जैसा वो आपको देखना चाहते हैं। मैं अभी आपको एक वीडियो भेज रही हूं, उस साड़ी को हम थोड़ा नए और मॉडर्न स्टाइल में ड्रेप करेंगे और साथ में आपका वो कुंदन वाला चोकर पहनिएगा। यकीन मानिए, आप किसी राजकुमारी से कम नहीं लगेंगी।”

मां और भाभी की बातों ने पारुल के मन पर जमी अहंकार की परत को पिघला दिया। उसे याद आया कि कल रात जब विकास वो साड़ी का डिब्बा लेकर आए थे, तो उनकी आंखों में बच्चों जैसी चमक और उत्साह था, जिसे उसने एक ही पल में अपने कड़वे शब्दों से बुझा दिया था। पारुल की आंखों में पछतावे के आंसू आ गए। उसने धीरे से सिर हिलाया, “ठीक है मां… मैं आज वैसा ही करूंगी।”

उस शाम, जब विकास भारी कदमों और उदास मन से अपने घर की घंटी बजा रहा था, तो उसे उम्मीद थी कि अंदर से फिर वही तानों और शिकायतों का दौर शुरू होगा। लेकिन जैसे ही दरवाजा खुला, विकास की आंखें खुली की खुली रह गईं।

सामने पारुल खड़ी थी— उसी गहरे मैरून रंग की कांजीवरम साड़ी में, जिसे उसने बेहद खूबसूरती और सलीके से पहना था। बालों में ताजे मोगरे का गजरा, गले में कुंदन का हार और माथे पर छोटी सी बिंदी। पारुल के हाथ में आरती की थाली तो नहीं थी, लेकिन विकास की पसंद की गर्मागर्म अदरक वाली चाय के दो कप थे।

पारुल ने झुककर विकास के पैर छुए और कान पकड़ते हुए भर्राई आवाज में कहा, “मुझे माफ कर दीजिए विकास। मुझे साड़ी का वजन तो दिखा, पर उसके पीछे छिपा आपका इतना गहरा प्यार नहीं दिखा। सच कहूं तो इस साड़ी में मैं खुद को बहुत खूबसूरत महसूस कर रही हूं।”

विकास के चेहरे की सारी थकान और गुस्सा एक ही पल में काफूर हो गया। उसकी आंखें भर आईं। उसने चाय के कप साइड की टेबल पर रखे और पारुल को कसकर अपने गले से लगा लिया। “सॉरी तो मुझे बोलना चाहिए पारुल, मुझे भी सुबह इस तरह घर से नहीं निकलना चाहिए था। पर सच कहूं, तुम इस साड़ी में बिल्कुल वही पारुल लग रही हो जिसे मैंने सात साल पहले वरमाला पहनाई थी।”

रात को करीब नौ बजे शकुंतला देवी के फोन पर एक फोटो आई। फोटो में विकास और पारुल एक साथ केक काट रहे थे, दोनों के चेहरों पर दुनिया भर की खुशियां झलक रही थीं, और पारुल उसी मैरून साड़ी में दमक रही थी। फोटो के नीचे विकास का मैसेज लिखा था— “थैंक यू मम्मी जी, पारुल ने बताया कि आज आपने और मृदुला भाभी ने मिलकर उसे तैयार करवाया है। यह मेरी जिंदगी की सबसे अच्छी सालगिरह है।”

शकुंतला देवी ने वह फोटो सिद्धार्थ और मृदुला को दिखाई। तभी सिद्धार्थ, जो चुपचाप सोफे पर बैठा सुबह से घर का बदला हुआ माहौल महसूस कर रहा था, अपनी जगह से उठा। उसने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला और मृदुला के सामने रख दिया।

मृदुला ने चौंककर डिब्बा खोला तो उसमें सोने की दो बेहद खूबसूरत चूड़ियां थीं। सिद्धार्थ ने झेंपते हुए कहा, “मैं सुबह ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, तब कमरे के बाहर खड़ा होकर मैंने तुम्हारी और मां की सारी बातें सुन ली थीं मृदुला। मुझे वाकई एहसास नहीं था कि पैसे हाथ में थमा देने से जिम्मेदारी तो पूरी हो जाती है, पर पत्नी का मान नहीं बढ़ता। आज ऑफिस से लौटते वक्त मैं खुद सुनार की दुकान पर गया और अपनी पसंद से तुम्हारे लिए ये चुनकर लाया हूं। पता नहीं तुम्हें ये डिजाइन पसंद आएगा या नहीं…”

मृदुला की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उसने बिना एक पल गंवाए वे चूड़ियां अपनी कलाइयों में पहन लीं और सिद्धार्थ के हाथों को थामते हुए कहा, “यह मेरी जिंदगी का सबसे अनमोल तोहफा है सिद्धार्थ, क्योंकि इसमें आपका वक्त और आपका प्यार शामिल है।”

शकुंतला देवी ने दोनों के सिर पर हाथ रखते हुए मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया। आज उन्हें समझ आ गया था कि जब एक मां तुलना का तराजू फेंककर न्याय और समझदारी की डोर थाम लेती है, तो न केवल बेटी का ससुराल महकता है, बल्कि खुद का आंगन भी स्वर्ग बन जाता है।

आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

क्या आपके परिवार या आस-पड़ोस में भी कभी ऐसा हुआ है कि मायके वालों की दखलअंदाजी या तुलना करने की आदत से किसी के रिश्ते में दरार आई हो? इस कहानी में आपको मृदुला की समझदारी सबसे अच्छी लगी या शकुंतला देवी का अपनी गलती सुधारना? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके विचारों का हमें इंतजार रहेगा!

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .

error: Content is protected !!