मायके की देहरी

 रेणुका ने मुस्कुराते हुए अंजू के कंधे पर सिर टिका दिया और बोली, “दीदी, जिस घर में बेटियों का आना-जाना बना रहता है, उस घर में हमेशा बरकत और रौनक रहती है। आप आती हैं तो आपके भैया के चेहरे पर जो रौनक आती है, वह किसी भी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती। और मैं भी तो किसी की बेटी और बहन हूँ; जब मैं अपने मायके जाती हूँ, तो मुझे जो सुकून मिलता है, वही सुकून मैं आपको इस घर में देना चाहती हूँ।”

“अंजू, कल गोवर्धन के बाद भैयादूज है, तू सुबह वाली बस पकड़ लेगी न? तेरे भैया ने तेरी पसंद की रबड़ी और कचौड़ियाँ मंगवाने के लिए अभी से हलवाई को बोल दिया है,” फ़ोन के उस पार से भाभी रेणुका की चहकती हुई आवाज़ आई।

अंजू ने रसोई के स्लैब पर आटा गूंथते हुए अपने हाथों को रोका और कंधे व कान के बीच दबे फ़ोन को थोड़ा सीधा किया। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने कहा, “हाँ भाभी, सुबह आठ बजे वाली बस से निकलूँगी तो दोपहर के खाने तक देहरादून पहुँच जाऊँगी। भैया से कहना इस बार ज़्यादा इंतज़ाम न करें, बस आप सबके साथ बैठकर दो कप चाय पी लूँगी, वही मेरे लिए सबसे बड़ी दावत है।”

फ़ोन रखने के बाद अंजू कुछ देर तक रसोई की खिड़की से बाहर आँगन में झड़ते हुए हरसिंगार के फूलों को देखती रही। नवंबर की हल्की गुलाबी ठंड हवा में घुलने लगी थी। आज उसकी शादी को पूरे दस साल हो चुके थे। मेरठ के इस भरे-पूरे संयुक्त परिवार में वह जब दुल्हन बनकर आई थी, तब से लेकर आज तक बहुत कुछ बदल गया था। वक़्त की रफ़्तार ने उसे एक अल्हड़ लड़की से एक ज़िम्मेदार बहू, पत्नी और दो बच्चों की माँ बना दिया था।

आज भैयादूज के लिए अपना छोटा सा बैग पैक करते हुए अंजू को दस साल पुरानी वह दोपहर याद आ गई, जब उसकी नई-नई शादी हुई थी।

अंजू का मायका देहरादून में था और ससुराल मेरठ में। दोनों शहरों के बीच क़रीब चार-पाँच घंटे का रास्ता था, लेकिन रीति-रिवाजों और परंपराओं में काफ़ी अंतर था। अंजू के मायके में रक्षाबंधन का त्यौहार तो बहुत धूमधाम से मनाया जाता था, लेकिन भैयादूज मनाने का कोई ख़ास चलन नहीं था। वहाँ दिवाली के बाद बस सामान्य दिनों की तरह कामकाज शुरू हो जाता था। इसके उलट, मेरठ में उसके ससुराल में भैयादूज को रक्षाबंधन से भी बड़ा त्यौहार माना जाता था। इस दिन घर की हर बेटी और बहू का अपने भाई के माथे पर तिलक करने जाना अनिवार्य समझा जाता था।

शादी के बाद जब पहली दिवाली बीती, तो अगले ही दिन सासू माँ निर्मला जी ने अंजू के कमरे में आकर बड़े स्नेह से कहा था, “बहू, अपनी साड़ियाँ और गहने ठीक से रख लेना। परसों भैयादूज है, तुम्हें सुबह ही देहरादून के लिए निकलना होगा। मैंने विशाल से कह दिया है कि वह तुम्हें बस अड्डे तक छोड़ आएगा। और हाँ, समधी जी के घर के लिए मिठाई के डिब्बे और सूखे मेवे मैंने बैठक में रखवा दिए हैं।”

अंजू उस वक़्त बड़ी उलझन में पड़ गई थी। उसने झिझकते हुए अपने सिर का पल्लू ठीक किया और धीमे से बोली, “माँ जी, हमारे यहाँ तो भैयादूज मनाया ही नहीं जाता। भैया तो उस दिन अपने दफ़्तर चले जाते हैं। हमने बचपन से कभी यह त्यौहार नहीं किया, तो अब अचानक कैसे शुरू करूँ?”

निर्मला जी ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, “बेटा, शादी के बाद दोनों घरों की अच्छी परंपराओं को अपना लेना चाहिए। हमारे यहाँ भैयादूज के दिन बहनें ससुराल में नहीं रुकतीं, भाई के घर जाकर उसकी लंबी उम्र की दुआ करती हैं और गोला-मिश्री देती हैं। अब से तुम भी यह रस्म शुरू कर दो। नया रिवाज शुरू करने में कैसी हिचकिचाहट? शुभ काम तो जब से शुरू हो, तभी अच्छा है।”

सासू माँ तो अपनी बात कहकर चली गईं, लेकिन अंजू कशमकश में पड़ गई। उसे लगा कि जिस त्यौहार को उसके मायके में कोई जानता तक नहीं, उसके लिए वह अचानक पहुँच जाएगी तो सब क्या सोचेंगे? भैया रजत को भी अपनी छुट्टी लेनी पड़ेगी। उसने रात को अपने पति विशाल से इस बारे में बात की। विशाल ने अपनी किताब बंद करते हुए बड़ा ही सीधा सा जवाब दिया, “देखो अंजू, मम्मी घर की बड़ी हैं और रीति-रिवाजों को बहुत मानती हैं। अगर वह कह रही हैं तो चली जाओ, वैसे भी तुम्हें मम्मी-पापा से मिले दो महीने हो गए हैं। बाक़ी जैसा तुम्हें ठीक लगे, तुम्हारी मर्ज़ी है।”

पति के ‘तुम्हारी मर्ज़ी’ कह देने से अंजू की उलझन कम होने के बजाय और बढ़ गई। नई-नई गृहस्थी थी, वह किसी भी हाल में अपनी सासू माँ का दिल नहीं दुखाना चाहती थी, और न ही यह चाहती थी कि ससुराल में पहले ही त्यौहार पर उसके ना जाने से कोई बात बने। आख़िरकार, उसने अपनी माँ शकुंतला देवी को फ़ोन लगाया।

“माँ, यहाँ माँ जी ज़िद कर रही हैं कि भैयादूज पर मुझे मायके जाना ही पड़ेगा। आप तो जानती हैं कि हमारे यहाँ यह त्यौहार नहीं होता। मैं माँ जी को कैसे समझाऊँ? मुझे बड़ा अजीब लग रहा है कि बिना किसी रिवाज के मैं टीका करने आऊँ,” अंजू ने एक ही साँस में अपनी सारी परेशानी माँ के सामने उड़ेल दी।

फ़ोन के दूसरी तरफ़ से माँ की शांत और गहरी आवाज़ आई, “अंजू, तेरी सासू माँ बिल्कुल ठीक कह रही हैं। अगर समधन जी चाहती हैं कि तू यह त्यौहार मनाए, तो ज़रूर मना। तू परसों सुबह की बस पकड़ और घर आ जा, मैं रजत को बोल दूँगी कि वह उस दिन दफ़्तर से छुट्टी ले लेगा।”

अंजू को माँ की बात पर थोड़ा गुस्सा भी आया और हैरानी भी हुई। वह थोड़ा तुनक कर बोली, “माँ, आप भी कैसी बातें कर रही हैं! जिस त्यौहार को हमने पच्चीस सालों में कभी नहीं मनाया, उसे अब अचानक क्यों ढोना? और क्या मुझे अपने ही घर आने के लिए, आप लोगों से मिलने के लिए किसी त्यौहार का बहाना ढूंढना पड़ेगा? मेरा जब मन करेगा, मैं तब आ जाऊँगी। यह तो मेरा अपना घर है!”

तब शकुंतला देवी ने एक लंबी साँस ली थी और बड़े ही ठहराव के साथ कहा था, “लाडो, अभी तेरी शादी को सिर्फ़ छह महीने हुए हैं, इसलिए तू यह बात नहीं समझेगी। समय के साथ जब गृहस्थी का बोझ कंधों पर आता है न, तब मायके की दहलीज़ बहुत दूर हो जाती है। तब ये तीज-त्यौहार ही वो मज़बूत डोर बनते हैं, जो एक बेटी को उसके पीहर तक खींच लाते हैं। समधन जी का मान रख ले और इस बहाने ही सही, कम से कम घर तो आ जाएगी।”

उस दिन अंजू को अपनी माँ की बातें बहुत पुरानी और किताबी लगी थीं। उसने सोचा था कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि वह अपने ही माता-पिता और भाई से मिलने के लिए तरस जाए। वह तो पढ़ी-लिखी, आज के ज़माने की लड़की है; जब चाहेगी, बस पकड़ेगी और देहरादून पहुँच जाएगी।

लेकिन वक़्त से बड़ा गुरु इस दुनिया में कोई नहीं होता। साल दर साल बीतते गए और अंजू की ज़िंदगी की प्राथमिकताएं कब बदल गईं, उसे ख़ुद पता नहीं चला। शादी के दूसरे साल बड़े बेटे आरव का जन्म हुआ, और उसके तीन साल बाद छोटी बेटी नन्दिनी आ गई। इसी बीच ससुर जी रिटायर हो गए और उन्हें घुटनों के दर्द व शुगर की शिकायत रहने लगी। पति विशाल का व्यापार बढ़ा, तो उनकी व्यस्तताएं भी दोगुनी हो गईं।

अंजू सुबह पाँच बजे उठती, तो रात के ग्यारह कब बज जाते, उसे होश ही नहीं रहता। सुबह उठकर सास-ससुर के लिए दवाई और चाय, फिर बच्चों का टिफ़िन, विशाल का नाश्ता, दोपहर का खाना, बच्चों को स्कूल से लाना, उनका होमवर्क कराना, शाम की रसोई और घर के सौ छोटे-मोटे काम।

वह अपने ही घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों के ऐसे चक्रव्यूह में फँस गई कि मायके जाने का विचार भी मन में आता, तो उसके साथ सौ अड़चनें सामने खड़ी हो जातीं। कभी आरव के स्कूल में परीक्षाएं चल रही होतीं, तो कभी नन्दिनी को मौसम बदलने से बुख़ार आ जाता। कभी ससुर जी की तबीयत नासाज़ हो जाती, तो कभी विशाल के काम के सिलसिले में घर पर मेहमानों का आना-जाना लगा रहता।

गर्मियों की छुट्टियों में भी जब वह मायके जाने की सोचती, तो बच्चों की समर कैंप की क्लासेज या घर के किसी न किसी काम की वजह से प्रोग्राम टल जाता। हालत यह हो गई कि देहरादून, जो महज़ चार घंटे की दूरी पर था, अंजू के लिए सात समंदर पार जैसा हो गया। महीनों बीत जाते और वह मायके की सूरत तक नहीं देख पाती। फ़ोन पर बात हो जाती, वीडियो कॉल पर चेहरे दिख जाते, लेकिन माँ के हाथ के बने परांठे खाने और अपने बचपन के कमरे में बेफ़िक्र होकर सोने का सुख एक सपना बनकर रह गया।

ऐसे में पूरे साल में सिर्फ़ दो ही दिन ऐसे बचे थे, जब दुनिया की कोई भी ताक़त, कोई भी काम अंजू को मायके जाने से नहीं रोक पाता था—एक रक्षाबंधन और दूसरा भैयादूज।

क्योंकि भैयादूज का रिवाज उसकी सासू माँ निर्मला जी ने ख़ुद शुरू करवाया था, इसलिए इस दिन घर का सारा कामकाज निर्मला जी और विशाल ख़ुद अपने ज़िम्मे ले लेते थे। निर्मला जी दो दिन पहले से ही अंजू को टोकना शुरू कर देतीं, “बहू, बच्चों के कपड़े पैक कर लिए या नहीं? कल भैयादूज है, तुम्हें हर हाल में भाई के घर जाना है। घर की चिंता मत करना, मैं और विशाल सब संभाल लेंगे।”

यहाँ तक कि अगर ससुराल में कोई छोटा-मोटा काम होता भी, तब भी सासू माँ उसे टाल देतीं क्योंकि उनके हिसाब से भैयादूज पर बेटी का भाई के घर जाना धर्म और परंपरा का हिस्सा था, जिसे किसी भी हाल में तोड़ा नहीं जा सकता था।

तीन साल पहले जब अंजू की माँ शकुंतला देवी का देहांत हुआ, तब तो अंजू को लगा था कि अब शायद मायके जाने की वह डोर हमेशा के लिए कमज़ोर पड़ जाएगी। माँ के जाने के बाद लड़कियाँ अक्सर मायके जाने में संकोच करने लगती हैं। लेकिन भैया रजत और भाभी रेणुका ने उस परंपरा को टूटने नहीं दिया, जिसकी नींव दस साल पहले रखी गई थी।

माँ के जाने के बाद जब पहली भैयादूज आई, तो अंजू का मन बहुत भारी था। उसने विशाल से कहा था कि इस बार वह नहीं जाएगी, माँ के बिना घर सूना लगेगा। तब भाभी रेणुका ने ख़ुद फ़ोन करके कहा था, “दीदी, मम्मी ने मुझसे कहा था कि भैयादूज का यह रिवाज कभी रुकना नहीं चाहिए। अगर आप नहीं आएंगी, तो आपके भैया सूने माथे के साथ पूरा दिन दरवाज़े की तरफ़ देखते रहेंगे। यह घर जितना मम्मी के रहते आपका था, आज भी उतना ही आपका है।”

और ठीक उसी पल, सासू माँ निर्मला जी ने भी उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “बहू, मायका माँ से होता है, यह सच है; लेकिन माँ के जाने के बाद भाई-भाभी के रिश्ते को सहेज कर रखना बहन का भी फ़र्ज़ होता है। अगर तुम त्यौहार पर जाना छोड़ दोगी, तो धीरे-धीरे दूरियाँ बढ़ जाएंगी। रीति-रिवाज इसीलिए बनाए गए हैं ताकि सुख-दुख में परिवार के लोग एक-दूसरे की देहरी लांघते रहें। जाओ, तैयारी करो।”

उस दिन अंजू फूट-फूटकर रोई थी। उसे अपनी माँ के दस साल पहले कहे गए वे शब्द अक्षरशः सच होते दिखाई दिए—“तू अभी नहीं समझेगी लाडो, समय के साथ जब गृहस्थी का बोझ बढ़ता है, तो ये तीज-त्यौहार ही वो बहाना बनते हैं जो बेटी को मायके खींच लाते हैं।”

अगले दिन सुबह अंजू दोनों बच्चों को लेकर देहरादून पहुँची। जब उसने घर में क़दम रखा, तो भैया रजत ने आगे बढ़कर उसके पैर छुए और बच्चों को गोद में उठा लिया। भाभी रेणुका ने आरती की थाली सजा रखी थी और रसोई से ठीक वैसी ही खुशबू आ रही थी, जैसी माँ के रहते आया करती थी।

जब अंजू ने भैया के माथे पर रोली और चावल का तिलक लगाया और उनके हाथ में सूखा नारियल दिया, तो रजत की आँखें नम हो गईं। उन्होंने अंजू के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “अंजू, सच कहूँ तो दस साल पहले जब तेरी सासू माँ ने यह भैयादूज का रिवाज शुरू करवाया था, तब मुझे भी लगा था कि यह सिर्फ़ एक औपचारिकता है। लेकिन आज समझ आता है कि अगर यह त्यौहार न होता, तो शायद हम भाई-बहन साल में एक ही बार मिल पाते। अपनी-अपनी ज़िंदगियों की भागदौड़ में हम इतने मशगूल हो चुके हैं कि बिना किसी ख़ास मौके के वक़्त निकालना ही भूल जाते हैं।”

दोपहर के खाने के बाद जब बच्चे आँगन में खेलने लगे और भैया किसी काम से बाहर गए, तो अंजू और रेणुका भाभी छत पर धूप सेंकने बैठ गईं। अंजू ने भाभी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “भाभी, आज मैं एक बात सोच रही थी। हमारे समाज में अक्सर सास और ननद-भाभी के रिश्तों को लेकर न जाने कितनी बातें बनाई जाती हैं। लेकिन मेरी सासू माँ की एक छोटी सी ज़िद ने मुझे मेरे मायके से जोड़े रखा, और आपने माँ के जाने के बाद भी इस घर के दरवाज़े मेरे लिए उतनी ही गर्मजोशी से खोले रखे। आज मुझे समझ आया कि हमारे बुज़ुर्गों ने ये तीज-त्यौहार सिर्फ़ पूजा-पाठ के लिए नहीं बनाए थे, बल्कि इसलिए बनाए थे ताकि घर की बेटियाँ जब पराई गृहस्थी की नींव बन जाएं, तब भी साल में कुछ दिन वे वापस अपनी जड़ों की तरफ़ लौट सकें, खुलकर साँस ले सकें और अपने बचपन को फिर से जी सकें।”

रेणुका ने मुस्कुराते हुए अंजू के कंधे पर सिर टिका दिया और बोली, “दीदी, जिस घर में बेटियों का आना-जाना बना रहता है, उस घर में हमेशा बरकत और रौनक रहती है। आप आती हैं तो आपके भैया के चेहरे पर जो रौनक आती है, वह किसी भी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती। और मैं भी तो किसी की बेटी और बहन हूँ; जब मैं अपने मायके जाती हूँ, तो मुझे जो सुकून मिलता है, वही सुकून मैं आपको इस घर में देना चाहती हूँ।”

शाम को जब अंजू वापस मेरठ लौटने के लिए बस में बैठी, तो उसके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक गहरी तृप्ति और नई ऊर्जा थी। उसने अपने बैग में रखे डिब्बों को देखा, जिनमें भाभी ने सासू माँ और विशाल के लिए भी ख़ास मिठाइयाँ और पकवान रखे थे।

इस यात्रा ने अंजू के मन में एक सकारात्मक संकल्प जगाया। उसने मन ही मन तय किया कि जैसे उसकी सासू माँ और माँ ने मिलकर उसके लिए मायके का रास्ता हमेशा खुला रखा, वैसे ही वह भी अपनी बेटी नन्दिनी और आने वाली पीढ़ियों को अपने रिश्तों और परंपराओं का यह खूबसूरत महत्व ज़रूर सिखाएगी। रिवाज चाहे मायके के हों या ससुराल के, अगर वे दिलों को जोड़ने का काम करते हैं, तो उन्हें पूरे मन से अपनाना चाहिए।

हमारी भारतीय संस्कृति में तीज-त्यौहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं, बल्कि वे उन रिश्तों में संजीवनी फूंकने का माध्यम हैं, जो रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों की धूल के नीचे दब जाते हैं। एक शादीशुदा औरत के लिए उसका मायका किसी चार्जिंग स्टेशन की तरह होता है, जहाँ वह साल में एक-दो बार जाकर अपने मायके के स्नेह से ख़ुद को फिर से भर लेती है और दोगुनी ऊर्जा के साथ अपनी गृहस्थी को संवारने लौट आती है।

आपसे एक छोटा सा सवाल: क्या आपके साथ या आपके परिवार में भी ऐसा होता है कि गृहस्थी की व्यस्तताओं के बीच केवल तीज-त्यौहारों के बहाने ही मायके या अपनों से मिलना हो पाता है? शादी के बाद आपने कौन सा नया रिवाज अपनाया? अपने दिल की बात और अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें, हमें आपके कमेंट्स का इंतज़ार रहेगा!

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