पराई छत से अपने आँगन तक
चाँदी से चमकते बालों के बीच से झांकती माथे की लकीरें तब और भी गहरी हो जाती थीं, जब गौरी के सूखे होंठों पर अचानक कोई बेवजह की मुस्कान खिल उठती थी। चौंसठ बरस की उम्र में भी उसके भीतर जैसे कोई अल्हड़ बच्ची सांस ले रही थी। वह आँगन में बैठी मटर छीलते-छीलते खुद … Read more