पराई छत से अपने आँगन तक

चाँदी से चमकते बालों के बीच से झांकती माथे की लकीरें तब और भी गहरी हो जाती थीं, जब गौरी के सूखे होंठों पर अचानक कोई बेवजह की मुस्कान खिल उठती थी। चौंसठ बरस की उम्र में भी उसके भीतर जैसे कोई अल्हड़ बच्ची सांस ले रही थी। वह आँगन में बैठी मटर छीलते-छीलते खुद … Read more

सपनों की सरगम

शारदा जी अचरज और गर्व से अपनी बहू को देख रही थीं। वह बोलीं, “कमला जी, सच कहूँ तो मुझे भी आज ही पता चला कि मेरी बहू के भीतर इतना बड़ा हुनर छिपा है। इसने तो कभी जिक्र ही नहीं किया।” उस रात जब सब मेहमान चले गए और घर के लोग आँगन में … Read more

सात समंदर पार का सन्नाटा

बाबूजी के ये शब्द याद आते ही सिद्धार्थ के सब्र का बाँध पूरी तरह टूट गया। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया और किसी छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। उस बंद कमरे में उसकी सिसकियाँ गूँज रही थीं, लेकिन आज उसने अपने आँसुओं को रोका नहीं। वह रोता रहा, तब … Read more

ठोकरों के बाद मिली परछाईं

 सम्मान के साथ सिया को अपनी जीवनसंगिनी बनाने के लिए तैयार हूँ। मेरे माता-पिता भी सिया को बहुत पसंद करते हैं और वे मेरे फैसले के साथ हैं।” अक्षत की बात सुनकर श्रीकांत जी अवाक रह गए। उन्होंने अक्षत की आँखों में देखा, जहाँ सिया के लिए सिर्फ सच्चा सम्मान और अपार प्रेम झलक रहा … Read more

एक कंगन की कीमत

मोबाइल की स्क्रीन पर छोटे भाई कार्तिक का नाम चमकते देख मालिनी की उंगलियां कुछ पल के लिए ठिठक गईं। पूरे आठ महीने बाद आज उस नंबर से कॉल आया था। मालिनी ने रसोई की गैस धीमी की, आंचल से हाथ पोंछे और धड़कते दिल से फोन उठाया। इससे पहले कि वह ‘हैलो’ कहती, उधर … Read more

मां के आंचल की छांव

ग्यारह साल की बच्ची की इस सीधी और सच्ची बात से बैठक में कुछ पलों के लिए सन्नाटा पसर गया। गजेंद्र जी का चेहरा थोड़ा फीका पड़ गया, उन्होंने बात संभालते हुए कहा, “अरे नहीं बेटा, मैं गिना थोड़े ही रहा हूं! मैं तो तुम्हारे पापा को बता रहा था कि हमारी बिटिया हमारे पास … Read more

मायके की अमानत और पराये होते अपने

“अरे अवनि, क्या बात है? जब से छोटी दीदी मानसी के घर से लौटकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर बारह क्यों बजे हुए हैं? रास्ते में भी तुमने एक शब्द नहीं बोला और घर आकर भी गुमसुम बैठी हो। आखिर हुआ क्या है वहां?” प्रणव ने अपने ऑफिस के जूते उतारते हुए और टाई ढीली … Read more

दो माओं का आंगन

 शारदा जी का मन बहुत भारी और बेचैन था। सामने मेज पर उनका खुला हुआ सूटकेस रखा था, जिसमें वह आधे-अधूरे मन से अपनी साड़ियां तह करके रख रही थीं। तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘नेहा’ नाम चमक रहा था। शारदा जी ने एक गहरी सांस ली और फोन उठाया। “मां, आपने अपनी … Read more

सिंदूर से परे भी एक रिश्ता

“बाबूजी, जरा शांत होकर सोचिए! मैं आपसे बहस नहीं कर रही, बस इतना कह रही हूं कि आप जो फैसला सुना रहे हैं, वह अन्याय है। उस मासूम की आखिर खता क्या है? अभी तो उसकी उम्र ही क्या है… महज बाईस साल! और शादी के बाद उसने सुख के दिन ही कितने देखे हैं?” … Read more

गुमनाम दहलीज़ का स्वाभिमान

 शारदा जी की आँखों में नमी तैर गई। उन्होंने नव्या के हाथों को थामकर कहा, “बेटा, बाहर मेरी छोटी बहन विमला और मेरे मायके की भाभी बैठी हैं। शाम की गाड़ी से वे वापस अपने घर चली जाएँगी। तेरे ससुर जी ने सभी रिश्तेदारों की विदाई के लिफाफे बनाए हैं, पर मेरे मायके वालों के … Read more

error: Content is protected !!