आँगन के चार धाम

 केशव जी पास के ही एक सरकारी डाकघर में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे। सीमित वेतन और ईमानदारी की कमाई से घर का चूल्हा तो सम्मान से जल जाता था, लेकिन विलासिता या अतिरिक्त खर्चों की कोई गुंजाइश नहीं थी। शारदा जी बेहद शांत, संतोषी और धर्मपरायण महिला थीं। मोहल्ले के किसी भी … Read more

अधूरी ख्वाहिश का लिबास

  तन्वी जब बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता का साया सिर से उठ गया था। उसके बाद से शारदा जी ने ही माँ और पिता दोनों की भूमिका निभाई। वह एक स्थानीय स्कूल में सिलाई और कढ़ाई की शिक्षिका थीं। उनकी दुनिया बस तन्वी के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। शारदा जी का जीवन किसी शांत … Read more

ममता की छाँव

 समय की कसौटी पर हर पवित्र रिश्ते को एक न एक दिन परखा जरूर जाता है। जब आरव अपनी उच्च शिक्षा पूरी करके एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बहुत बड़े पद पर चयनित हुआ, तो समाज के कुछ तथाकथित शुभचिंतकों और रिश्तेदारों की आंखों में यह सुख खटकने लगा। एक पारिवारिक समारोह के दौरान, सिद्धार्थ की … Read more

अनकहे जज़्बात

 वह तुरंत बाबूजी के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई और उनके काँपते हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर रुँधे गले से बोली, “बाबूजी, आप मुझसे इतना क्यों काँप रहे हैं? मैं कोई पराई या आपकी दुश्मन तो नहीं हूँ। मुझे सच-सच बताइए, यह चश्मा कैसे टूटा और आप कल से यह खाली … Read more

बिना धड़कन वाली बहू

  कैफे का दरवाजा खुला और घंटी की मधुर आवाज के साथ अंदर आई नेहा। नेहा को देखते ही पल्लवी अपनी कुर्सी से उछल पड़ी। आसमानी रंग के लंबे ओवरकोट और खुले बालों में नेहा पहले से कहीं ज्यादा चमक रही थी। पल्लवी ने आगे बढ़कर उसे कसकर गले लगा लिया और शिकायत भरे लहजे में … Read more

ममता की नई छाँव

ज्वेलरी शोरूम के बिलिंग काउंटर पर अपनी सोने की चूड़ियों का पेमेंट करके जैसे ही मैं अपने पर्स में रसीद रखकर पीछे मुड़ी, सामने खड़ी महिला को देखकर मेरे कदम वहीं ठिठक गए। मेरे चेहरे पर अचानक एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई और खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सिल्क की मैरून साड़ी में लिपटी, … Read more

फरिश्ते का स्पर्श

 हरिमोहन जी को देखते ही केशव के मुरझाए हुए चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई। वह बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा। “अरे-अरे, लेटा रह भाई! उठने की जरूरत नहीं है,” हरिमोहन जी ने पास आकर फलों की टोकरी स्टूल पर रखी और बेहद प्यार से केशव के माथे और सिर पर … Read more

रिश्तों की गुनगुनी धूप

 नंदिनी उन्हें गायत्री अम्मा के पास ले गई। साफ-सुथरी हल्के गुलाबी रंग की साड़ी और गर्म कार्डिगन पहने, धुले हुए सफेद बालों में कंघी किए गायत्री अम्मा धूप में बैठी दो छोटी बच्चियों को कहानी सुना रही थीं। उनके चेहरे पर कल रात वाली दहशत और लाचारी की जगह एक गहरा सुकून था। उनके पास … Read more

आंखों की खामोश ज़ुबान

“अबे ओ देवदास! चाय पिएगा या इसमें डुबकी लगाने का इरादा है?” उसके जिगरी दोस्त और चचेरे भाई शौर्य ने टेबल पर जोर से हाथ पटकते हुए कहा। आरुष ने चौंकते हुए शौर्य को देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर मुस्कुराते हुए बोला, “यार शौर्य… क्या आंखें थीं वो! कसम से, ऐसा लगा जैसे … Read more

संस्कारों की कसौटी

“शकुंतला, इंसान अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और संस्कारों से ऊंचा या नीचा होता है। भैरवी के पिता ने भले ही सड़क के किनारे बैठकर लोगों के फटे जूते सिले हों, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को जो शिक्षा और उच्च संस्कार दिए हैं, उनके सामने हमारी यह करोड़ों की दौलत भी बौनी है। … Read more

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