ज़िंदगी के कड़वे घूंट में उम्मीद की मिठास

अनुपमा ने तब सोचा था कि वक्त हर घाव की सबसे बड़ी दवा होता है। कुछ दिन बीतेंगे तो पाखी का मन हल्का हो जाएगा और वह खुद को संभाल लेगी। लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। बीतते दिनों के साथ पाखी का दर्द कम होने के बजाय नासूर बनता जा रहा था। वह खुद को दोषी मानने लगी थी, उसका आत्मविश्वास चकनाचूर हो चुका था और अपने भीतर के इस भयानक तूफान को छुपाने के लिए उसने गुस्से और चिड़चिड़ेपन की एक मोटी चादर ओढ़ ली थी।

  घर के बगीचे में खिले गुलाब और गेंदे के फूल तो मुस्कुरा रहे थे, लेकिन घर की सबसे छोटी और लाडली बेटी पाखी की मुस्कान कहीं खो गई थी। सुबह के नौ बज रहे थे। घड़ी की टिक-टिक के साथ-साथ पाखी की माँ, शारदा जी के दिल की धड़कनें भी तेज़ हो रही थीं। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक करते हुए एक बार फिर पाखी के बंद कमरे के दरवाज़े की ओर देखा और फिर गहरी साँस लेते हुए आवाज़ लगाई।

“पाखी! अरे ओ पाखी… बेटा, आज भी दफ़्तर नहीं जाना है क्या? आज पूरे बीस दिन हो गए हैं तुझे घर पर बैठे हुए। तेरी तबीयत तो ठीक है न?” शारदा जी की आवाज़ में चिंता और थोड़ी सी झल्लाहट दोनों साफ झलक रही थी।

कुछ पल बाद कमरे का दरवाज़ा झटके से खुला। पाखी बाहर निकली। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों के नीचे काले घेरे साफ दिखाई दे रहे थे और चेहरे पर एक अजीब सी बेरुखी थी। जो लड़की कभी सुबह उठते ही पूरे घर को अपनी चहचहाहट से सिर पर उठा लेती थी, आज वो किसी बुझे हुए दीये जैसी लग रही थी।

“क्या बात है मम्मी? मैं आपको इस घर में अच्छी नहीं लग रही हूँ क्या? अगर मेरे यहाँ रहने से आपको इतनी ही दिक्कत हो रही है, तो साफ-साफ कह दीजिए न, मैं कहीं और चली जाती हूँ!” पाखी ने बेहद रूखे और चिड़चिड़े स्वर में जवाब दिया और बिना माँ की तरफ देखे सोफे पर जाकर बैठ गई। उसने गुस्से में टीवी का रिमोट उठाया और बिना किसी मकसद के चैनल बदलने लगी।

अपनी फूल सी कोमल बेटी के मुँह से ऐसे कड़वे बोल सुनकर शारदा जी का दिल बैठ गया। वह तो बस अपनी बेटी की भलाई चाहती थीं, लेकिन पाखी तो जैसे बारूद के ढेर पर बैठी थी—ज़रा सी बात की नहीं कि फट पड़ती थी। शारदा जी अपने पल्लू से आँखों की कोर पोंछते हुए रसोई की तरफ बढ़ गईं, जहाँ उनकी बड़ी बहू अनुपमा सुबह के नाश्ते की तैयारी में जुटी हुई थी।

रसोई में अदरक और इलायची की खुशबू फैल रही थी, लेकिन शारदा जी का मन बेहद कसैला हो रहा था। उन्होंने रसोई के स्लैब के सहारे खड़े होकर धीमी आवाज़ में कहा, “पता नहीं इस लड़की को किसकी नज़र लग गई है, अनुपमा। मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा कि इसे हुआ क्या है। बात-बात पर काटने को दौड़ती है, हर बात का उल्टा जवाब देती है। पहले तो कभी ऐसी न थी मेरी बच्ची। न ठीक से खाती है, न किसी से बात करती है। बस दिन भर अपने कमरे में पड़ी रहती है। बहू, तुम तो इसकी भाभी होने के साथ-साथ इसकी सबसे पक्की सहेली भी हो न… क्या तुम्हें कुछ बताया इसने? आखिर कौन सा दुख इसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है?”

अनुपमा ने तवे पर पराठा पलटते हुए एक नज़र अपनी सास के मुरझाए और चिंतित चेहरे पर डाली। उनका माथा चिंता की लकीरों से भरा हुआ था। अनुपमा ने एक पल के लिए सोचा, फिर नज़रे झुकाते हुए बड़ी विनम्रता से कहा, “नहीं मम्मी जी, मुझसे भी खुलकर कुछ खास नहीं कहा उसने। बस यही कह रही थी कि काम का बहुत दबाव था, इसलिए कुछ दिनों की छुट्टी ले ली है। आप ज़्यादा चिंता मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा।”

अनुपमा ने अपनी सास को दिलासा देने के लिए यह झूठ तो बोल दिया, लेकिन वह पाखी की इस हालत, उसकी उदासी और इस अचानक आए चिड़चिड़ेपन की असली वजह बहुत अच्छी तरह जानती थी। उसने अपनी ननद का वह दर्द अपने सीने में छुपा रखा था, क्योंकि पाखी ने रोते हुए उसे अपनी कसम दी थी कि यह बात मम्मी या भैया तक नहीं पहुँचनी चाहिए।

बात दरअसल यह थी कि पाखी चंडीगढ़ की ही एक नामी आईटी कंपनी में काम करती थी। काम में तेज़, स्वभाव से हँसमुख और दिल की बेहद साफ पाखी की मुलाकात करीब ढाई साल पहले उसी के दफ़्तर में काम करने वाले विक्रांत नाम के एक लड़के से हुई थी। विक्रांत दिखने में आकर्षक था और बातों का बड़ा ही माहिर जादूगर। धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती हुई और यह दोस्ती कब गहरे प्यार में बदल गई, पाखी को पता ही नहीं चला। पाखी ने अपने भोले मन से विक्रांत को ही अपना सब कुछ मान लिया था। वह तो मन ही मन विक्रांत के साथ अपने भविष्य के और शादी के सुनहरे सपने भी बुनने लगी थी। दोनों साथ में लंच करते, वीकेंड पर सुखना लेक के किनारे घंटों बैठकर बातें करते और पाखी को लगता कि दुनिया में उससे ज़्यादा खुशनसीब लड़की कोई और हो ही नहीं सकती।

लेकिन पिछले तीन-चार महीनों से हवा का रुख अचानक बदलने लगा था। विक्रांत का व्यवहार पाखी के प्रति बहुत ठंडा और अजनबी सा होने लगा था। वह पाखी के फोन कॉल्स काट देता, उसके मैसेज का जवाब घंटों बाद केवल एक-दो शब्दों में देता और दफ़्तर में भी उससे कतराने लगा था। पाखी जब भी उससे इस बदलाव का कारण पूछती, तो वह यह कहकर टाल देता कि उसके ऊपर एक नए विदेशी प्रोजेक्ट की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गई है, जिसके कारण वह मानसिक तनाव में रहता है।

पाखी ने अपने सच्चे प्यार के भरोसे में आकर विक्रांत की इस बात को सच मान लिया। उसने खुद को समझाया कि इस मुश्किल वक्त में उसे विक्रांत को परेशान नहीं करना चाहिए, बल्कि उसका साथ देना चाहिए। वह अपने काम के साथ-साथ कई बार विक्रांत के हिस्से की फाइलें भी तैयार कर देती ताकि उसका बोझ कम हो सके।

लेकिन सच तो उस आग की तरह होता है, जिसे चाहे लाख पर्दों में छुपाया जाए, उसका धुआँ बाहर आ ही जाता है। करीब बीस दिन पहले दफ़्तर के कैफेटेरिया में पाखी ने कुछ सहकर्मियों को आपस में फुसफुसाते हुए सुना। वे लोग विक्रांत और पाँच महीने पहले ही कंपनी के एचआर डिपार्टमेंट में आई एक नई लड़की, नताशा के बारे में बातें कर रहे थे। नताशा कंपनी के एक बड़े डायरेक्टर की भतीजी थी। लोगों की बातों से पाखी को पता चला कि विक्रांत और नताशा को अक्सर देर रात तक साथ देखा जाता है और दोनों के बीच नज़दीकियाँ काफी बढ़ गई हैं।

यह सुनकर पाखी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। पहले तो उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन जब उसने खुद उसी शाम विक्रांत की केबिन की तरफ कदम बढ़ाए, तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। विक्रांत नताशा का हाथ अपने हाथों में लिए बैठा था और दोनों किसी बात पर ठहाके लगाकर हँस रहे थे। नताशा के जाने के बाद पाखी जब केबिन के अंदर गई और उसने काँपते हुए स्वर में विक्रांत से इस बारे में सवाल किया, तो विक्रांत के चेहरे पर शर्मिंदगी की एक शिकन तक नहीं आई।

बल्कि उसने बड़ी ही बेरहमी और बेशर्मी से अपने कंधे उचकाते हुए कह दिया, “देखो पाखी, तुम्हें शायद कोई बहुत बड़ी गलतफहमी हो गई है। हमारे बीच जो कुछ भी था, वह प्यार नहीं बल्कि सिर्फ एक वक्ती आकर्षण और अच्छी दोस्ती थी। हम दोनों को एक-दूसरे का साथ अच्छा लगता था, बस बात खत्म। और जहाँ तक मुझे याद है, मैंने तुमसे कभी शादी करने या सात जन्मों तक साथ निभाने का कोई वादा नहीं किया था। नताशा मेरे करियर के लिए और मेरे भविष्य के लिए बिल्कुल सही जीवनसाथी है। बेहतर होगा कि तुम भी इस सच को स्वीकार करो और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ो।”

विक्रांत के वे शब्द किसी पिघले हुए सीसे की तरह पाखी के कानों में उतरे और सीधे उसके दिल को छलनी कर गए। जिस इंसान के लिए उसने अपने ढाई साल, अपनी भावनाएँ और अपने सारे सपने समर्पित कर दिए थे, उसने एक झटके में उनके रिश्ते को ‘महज एक आकर्षण’ का नाम देकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया था। पाखी उस दिन विक्रांत के सामने बहुत रोई, उसने अपने प्यार की दुहाई दी, यहाँ तक कि वह उसके सामने गिड़गिड़ाई भी, लेकिन पत्थर दिल हो चुके विक्रांत पर उसके आँसुओं का रत्ती भर भी असर नहीं हुआ। वह अपना बैग उठाकर उसके सामने से ऐसे निकल गया जैसे वह पाखी को जानता ही न हो।

उस दिन पाखी किसी तरह टूटे हुए कदमों और बिखरी हुई आत्मा के साथ घर लौटी थी। रात को जब घर के सब लोग सो गए, तब वह अनुपमा की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोई थी और उसे सारी बात बताई थी। उस दिन के बाद से पाखी की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह दोबारा उस दफ़्तर की दहलीज़ पर कदम रखे, जहाँ हर कोने में उसकी बेइज्ज़ती और उसके टूटे हुए विश्वास की गूँज मौजूद थी।

अनुपमा ने तब सोचा था कि वक्त हर घाव की सबसे बड़ी दवा होता है। कुछ दिन बीतेंगे तो पाखी का मन हल्का हो जाएगा और वह खुद को संभाल लेगी। लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। बीतते दिनों के साथ पाखी का दर्द कम होने के बजाय नासूर बनता जा रहा था। वह खुद को दोषी मानने लगी थी, उसका आत्मविश्वास चकनाचूर हो चुका था और अपने भीतर के इस भयानक तूफान को छुपाने के लिए उसने गुस्से और चिड़चिड़ेपन की एक मोटी चादर ओढ़ ली थी।

“कहाँ खो गई बहू? क्या सोच रही है?” शारदा जी की आवाज़ से अनुपमा की तंद्रा टूटी।

“कुछ नहीं मम्मी जी, बस ऐसे ही…” अनुपमा ने खुद को संभालते हुए कहा।

“अच्छा यह बता, इस पतीले में क्या उबाल रही है?” शारदा जी ने चूल्हे पर रखे बर्तन की ओर इशारा करते हुए पूछा।

“जी, वो पाखी ने सुबह से कुछ खाया-पिया नहीं है न, तो मैंने सोचा उसके लिए गरमा-गरम सूप बना दूँ। उसे टमाटर और सब्जियों का सूप बहुत पसंद है। पिएगी तो शायद उसका मन थोड़ा अच्छा हो जाए और शरीर में थोड़ी ताकत भी आए।” अनुपमा ने कड़छी चलाते हुए कहा।

शारदा जी ने एक गहरी ठंडी साँस भरी और अनुपमा के कंधे पर हाथ रखते हुए बोलीं, “बहू, अब इस घर में तू ही है जो उसके मन की थाह ले सकती है। मैं कुछ बोलूँगी या पूछूँगी तो वह फिर से भड़क जाएगी और मुझे ही चार बातें सुना देगी। मेरे से अब अपनी हँसती-खेलती बेटी का यह हाल देखा नहीं जाता। रात-रात भर मुझे नींद नहीं आती यह सोचकर कि आखिर मेरी बच्ची किस गम में घुलती जा रही है। तू ही कुछ उपाय कर बेटा, उसे इस अँधेरे से बाहर निकाल।” शारदा जी की आँखों में एक माँ की बेबसी और अपनी संतान के लिए अथाह पीड़ा साफ तैर रही थी।

सास के रसोई से बाहर जाने के बाद अनुपमा वहीं खड़ी होकर उबलते हुए सूप को एकटक देखने लगी। उसका दिमाग बहुत तेज़ी से दौड़ रहा था। वह जानती थी कि सीधे-सीधे समझाने या उपदेश देने का पाखी पर कोई असर नहीं होने वाला, क्योंकि वह यह पहले भी करके देख चुकी थी। पाखी को इस वक्त शब्दों से ज़्यादा एक ऐसे एहसास की ज़रूरत थी, जो उसकी बंद हो चुकी सोच के दरवाज़ों को भीतर से झकझोर कर खोल सके।

सूप में मसाले डालते समय अचानक अनुपमा की नज़र सामने रखे नमक के डिब्बे पर पड़ी। उसके चेहरे पर एक हल्की सी चमक आई। उसे पाखी की समस्या का हल निकालने की एक तरकीब सूझ गई थी। उसने जानबूझकर सूप के कटोरे में सामान्य से कहीं ज़्यादा नमक डाल दिया और उसे अच्छी तरह मिलाकर ट्रे में रखा।

अनुपमा सूप का प्याला लेकर बैठक में पहुँची, जहाँ पाखी अब भी शून्य में ताकते हुए सोफे पर बैठी थी। टीवी चल रहा था, लेकिन पाखी का ध्यान वहाँ बिल्कुल नहीं था।

“पाखी… ये लो, तुम्हारे लिए तुम्हारा पसंदीदा गरमा-गरम वेजिटेबल सूप लाई हूँ। सुबह से तुमने चाय तक नहीं पी है, इसे पी लो, अच्छा लगेगा।” अनुपमा ने बेहद प्यार से सूप का कटोरा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।

पाखी का मन तो बिल्कुल नहीं था, लेकिन अपनी भाभी का वह बहुत आदर करती थी और उनके प्यार को ठुकरा नहीं सकी। उसने अनमने ढंग से कटोरा हाथ में लिया और चम्मच से सूप का एक घूंट भरा।

लेकिन सूप के जीभ से छूते ही पाखी का चेहरा एकदम से बिगड़ गया। उसने बड़ी मुश्किल से वह घूंट गले के नीचे उतारा और खाँसते हुए कटोरा वापस मेज पर रख दिया।

अनुपमा ने अनजान बनते हुए बड़े भोलेपन से पूछा, “अरे, क्या हुआ पाखी? सूप अच्छा नहीं बना क्या?”

“भाभी, आज आपका ध्यान कहाँ था सूप बनाते वक्त? इसमें नमक इतना ज़्यादा हो गया है कि यह बिल्कुल ज़हर जैसा कड़वा और खारा लग रहा है। पिया ही नहीं जा रहा!” पाखी ने मुँह बनाते हुए कहा।

अनुपमा ने तुरंत आगे बढ़कर सूप का कटोरा उठा लिया और चेहरे पर अफसोस के भाव लाते हुए बोली, “अरे राम! मुझसे इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई। लाओ, यह कटोरा मुझे दे दो, मैं इसे अभी सिंक में फेंक आती हूँ। यह तो अब किसी काम का नहीं रहा।”

जैसे ही अनुपमा कटोरा लेकर मुड़ने लगी, पाखी ने तुरंत उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोक लिया और बोली, “अरे भाभी, इसमें पूरा सूप फेंकने की क्या ज़रूरत है? इतनी मेहनत से आपने सब्जियाँ काटकर इसे बनाया है। इसमें बस नमक ही तो तेज़ हुआ है न! आप इसमें थोड़ा सा उबला हुआ पानी, थोड़ी सी ताज़ी क्रीम और हल्का सा टमाटर का पल्प और मिला देंगी, तो इसका खारापन अपने आप कम हो जाएगा और यह बिल्कुल ठीक हो जाएगा। एक गलती की वजह से पूरी चीज़ को थोड़ी न फेंका जाता है!”

पाखी की यह बात सुनते ही अनुपमा के कदम वहीं थम गए। वह धीरे से मुड़ी, सूप का कटोरा वापस मेज पर रखा और पाखी के बिल्कुल पास बैठकर उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। अनुपमा की आँखों में इस वक्त एक अजीब सी गहराई और चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी।

“बिल्कुल सही कहा तुमने, मेरी गुड़िया…” अनुपमा ने बेहद कोमल लेकिन गंभीर आवाज़ में कहना शुरू किया, “एक चीज़ के बिगड़ जाने या एक गलती हो जाने से पूरी चीज़ को बर्बाद नहीं किया जाता, उसे फेंका नहीं जाता। पाखी, ज़रा ध्यान से सोचो, यह सूप का प्याला ठीक तुम्हारी इस अनमोल ज़िंदगी की तरह है। और इसमें जो ज़रूरत से ज़्यादा नमक घुल गया है न, वह तुम्हारे अतीत का वही कड़वा अनुभव है, वह धोखा है जो तुम्हें विक्रांत से मिला है।”

पाखी एकदम से चौंक गई। उसने नज़रें उठाकर अपनी भाभी की ओर देखा।

अनुपमा ने अपनी बात जारी रखी, “जिस तरह इस सूप में एक बार घुल चुके नमक के कणों को हम चुन-चुनकर बाहर नहीं निकाल सकते, ठीक उसी तरह ज़िंदगी में जो बुरा वक्त बीत गया, जो धोखा तुम्हें मिल गया, उसे भी हम अतीत में जाकर मिटा नहीं सकते और न ही ज़िंदगी से बाहर निकालकर फेंक सकते हैं। वह कड़वा अनुभव भी अब तुम्हारे जीवन के सफर का एक हिस्सा बन चुका है। लेकिन पाखी, अभी तुमने खुद ही तो मुझे रास्ता दिखाया न! तुमने कहा कि इसमें थोड़ा पानी और ताज़ी क्रीम मिला देंगे तो इसका खारापन दब जाएगा और स्वाद फिर से अच्छा हो जाएगा। तो फिर तुम अपनी ज़िंदगी के साथ ऐसा क्यों नहीं कर रही हो? एक इंसान के दिए हुए खारेपन की वजह से तुम अपनी पूरी ज़िंदगी के प्याले को ही क्यों फेंक देना चाहती हो?”

पाखी की आँखों में नमी तैरने लगी। वह बिना पलक झपकाए अपनी भाभी की बातें सुन रही थी, जो सीधे उसके दिल की गहराइयों में उतर रही थीं।

अनुपमा ने पाखी के गालों को सहलाते हुए कहा, “पाखी, उस कड़वे अनुभव के असर को कम करने के लिए तुम्हें अपनी ज़िंदगी में नए सपनों, नई खुशियों, अपने परिवार के प्यार और नई मीठी यादों की क्रीम मिलानी ही पड़ेगी। हम इंसान अक्सर यही सबसे बड़ी भूल करते हैं—हम अतीत की किसी एक बुरी घटना या किसी एक गलत इंसान की यादों को पकड़कर बैठ जाते हैं। उसी के बारे में दिन-रात सोच-सोचकर अपने आज को, अपने वर्तमान को नर्क बना लेते हैं और इस चक्कर में अपना आने वाला कल, अपना सुनहरा भविष्य भी अपने ही हाथों से तबाह कर लेते हैं। जो बीत गया, उसे हम बदल नहीं सकते पाखी, लेकिन आज हमारे हाथ में जो पल है, उसे संवारकर हम उस बीते हुए कल के दर्द को छोटा ज़रूर कर सकते हैं। हर चीज़ को देखने के दो नज़रिए होते हैं—या तो तुम इस बात पर रोती रहो कि तुम्हें धोखा मिला, या फिर इस बात के लिए ईश्वर का शुक्र अदा करो कि उस इंसान की असलियत शादी से पहले ही तुम्हारे सामने आ गई और तुम्हारी पूरी ज़िंदगी बर्बाद होने से बच गई। अब यह पूरी तरह से तुम पर निर्भर करता है कि तुम अपनी ज़िंदगी को किस नज़रिए से देखना चाहती हो।”

भाभी की बातों ने पाखी के मन पर जमी उदासी और भ्रम की बर्फ को पिघला दिया था। उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, लेकिन ये आँसू कमज़ोरी के नहीं थे, बल्कि भीतर जमा हुए उस ज़हर के थे जो अब बाहर निकल रहा था।

पाखी ने सिसकते हुए अनुपमा के कंधे पर सिर रख दिया और धीमी आवाज़ में बोली, “आप बिल्कुल सच कह रही हैं भाभी… मैंने खुद को बहुत सज़ा दे ली। लेकिन भाभी, मेरी एक ही उलझन है… मैं उसी दफ़्तर में वापस कैसे जाऊँ? वहाँ हर रोज़ विक्रांत और नताशा का सामना कैसे करूँगी? मुझे बहुत डर लगता है, बहुत शर्म आती है।”

अनुपमा ने पाखी का चेहरा अपने हाथों में भरकर ऊपर उठाया और उसकी आँखों में आँखें डालकर दृढ़ता से कहा, “शर्म किस बात की पाखी? और नज़रें तुम क्यों चुराओगी? क्या तुमने किसी को धोखा दिया है? क्या तुमने किसी के जज़्बातों के साथ खिलवाड़ किया है? नहीं न! तुमने तो सच्चे दिल से अपना रिश्ता निभाया था। गद्दारी और बेईमानी तो उस इंसान ने की है, तो फिर सिर झुकाकर चलने की बारी उसकी है, तुम्हारी नहीं! तुम क्यों किसी अपराधी की तरह घर में छुपकर बैठी हो? उठो, अपने आँसू पोंछो और पूरे आत्मविश्वास के साथ उस दफ़्तर में कदम रखो। देखने दो उस विक्रांत को भी कि पाखी कोई छुई-मुई का पौधा नहीं है जो उसके एक झटके से मुरझा जाएगी, बल्कि वह तो वह चट्टान है जो हर तूफान का सामना करके और भी मज़बूत बनती है। अपनी कामयाबी और अपनी मुस्कान को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाओ।”

अनुपमा ने एक पल रुककर रसोई की तरफ इशारा किया और बोली, “और पाखी, अगर अपने लिए नहीं, तो कम से कम अपनी उस बूढ़ी माँ के लिए ही खुद को इस अँधेरे से बाहर निकालो। तुम्हारी इस हालत ने मम्मी जी की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है। वह तुमसे डर के मारे कुछ पूछ नहीं पातीं, लेकिन रसोई में खड़े होकर छुप-छुपकर रोती हैं। क्या एक धोखेबाज़ इंसान तुम्हारे लिए तुम्हारी माँ के प्यार और उनके आँसुओं से भी बढ़कर हो गया?”

माँ का ज़िक्र आते ही पाखी का दिल काँप उठा। उसे सुबह का वह दृश्य याद आ गया जब उसने अपनी माँ को कितनी बेरुखी से जवाब दिया था। ग्लानि और पश्चाताप से उसका मन भर आया। उसी पल उसने अपने भीतर एक नई ऊर्जा और एक नए संकल्प का अनुभव किया। उसने अपनी हथेली से अपने आँसू पोंछे और एक गहरी साँस ली।

शाम होते-होते घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। पाखी ने खुद रसोई में जाकर अपनी माँ को पीछे से गले लगा लिया और सुबह के अपने व्यवहार के लिए उनसे माफी माँगी। बेटी के इस बदले हुए रूप और उसके चेहरे पर लौटी कोमलता को देखकर शारदा जी की आँखें खुशी से छलक पड़ीं। उन्होंने पाखी का माथा चूमकर उसे अपने सीने से लगा लिया।

अगली सुबह जब चंडीगढ़ के आसमान में सूरज की पहली किरण फूटी, तो शर्मा निवास में भी एक नया सवेरा हुआ था। ठीक आठ बजे पाखी नहा-धोकर, अपने सबसे बेहतरीन फॉर्मल कपड़ों में तैयार होकर अपने कमरे से बाहर निकली। उसके बालों में सलीका था, आँखों में काजल की जगह गज़ब का आत्मविश्वास चमक रहा था और चेहरे पर एक शांत, गरिमामयी मुस्कान थी।

उसने डाइनिंग टेबल पर आकर अपनी माँ के पैर छुए और रसोई की ओर देखते हुए अपनी पुरानी खनकती हुई आवाज़ में पुकारा, “भाभी! जल्दी से मेरा टिफिन पैक कर दीजिए, मुझे दफ़्तर के लिए देर हो रही है!”

रसोई से टिफिन बॉक्स लेकर बाहर आती अनुपमा और पास खड़ी शारदा जी ने एक-दूसरे की ओर देखा और दोनों के चेहरों पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई। पाखी ने अपनी ज़िंदगी के कड़वे घूंट में उम्मीद और हौसले की मिठास घोल ली थी और अब वह ज़िंदगी की हर चुनौती से जीतने के लिए पूरी तरह तैयार थी।

दोस्तों, ज़िंदगी में कई बार हमें भी ऐसे लोगों से धोखा मिलता है जिन पर हम खुद से ज़्यादा भरोसा करते हैं। आपके हिसाब से पाखी की भाभी अनुपमा ने उसे समझाने का जो तरीका अपनाया, वह कैसा था? अगर आप पाखी की जगह होते, तो ऐसे हालात से खुद को कैसे बाहर निकालते? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ!

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