वैदेही आंटी के जाने के बाद मैंने काँपते हाथों से वह डायरी खोली। उसके हर पन्ने पर मेरे लिए उसका बेपनाह प्यार लिखा था, और आखिरी के कुछ पन्नों में उसने अपने एक सपने का जिक्र किया था। विहान ने लिखा था कि वह शादी के बाद मेरे साथ मिलकर पहाड़ी इलाकों के उन अनाथ और गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल और आश्रम खोलना चाहता था, जो पैसों के अभाव में पढ़ नहीं पाते। उसने लिखा था— “अनन्या की मुस्कान में इतनी रोशनी है कि वह सैकड़ों बेसहारा बच्चों की अंधेरी जिंदगी में उजाला भर सकती है। हम दोनों मिलकर इस संस्था का नाम ‘आशा की किरण’ रखेंगे।”
जिंदगी की किताब के पन्ने भी कितने अजीब होते हैं। कभी हवा का एक झोंका आकर हमें ऐसे पन्ने पर ला खड़ा करता है, जहाँ लिखे शब्दों को न तो हम पढ़ पाते हैं और न ही उनका मतलब समझ पाते हैं। जब हम पीछे मुड़कर अपनी जीवन की डोर को देखते हैं, तो वह किसी उलझे हुए धागे की तरह नजर आती है, जिसकी हर गाँठ पर कोई न कोई दर्द छिपा होता है। लेकिन वक्त के साथ जब वही डोर सुलझने लगती है, तो समझ आता है कि हर उलझन हमें कुछ नया सिखाने और मजबूत बनाने के लिए ही आई थी। मेरी यानी अनन्या की जिंदगी की कहानी भी कुछ ऐसी ही उलझनों और सुलझनों के बीच बुनी गई है।
यह बात उन दिनों की है जब मेरे पापा श्रीकांत जी का तबादला देहरादून वापस हुआ था। पापा वन विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी थे। जब मैं दसवीं कक्षा में थी, तब पापा का ट्रांसफर शिमला हो गया था और हमें अपना यह प्यारा शहर छोड़ना पड़ा था। लेकिन किस्मत का खेल देखिए, ठीक बारहवीं पास करते ही पापा को वापस देहरादून पोस्टिंग मिल गई। मेरे लिए यह खुशी दोगुनी थी, क्योंकि मुझे उसी प्रतिष्ठित कॉलेज में बी.ए. (ऑनर्स) में दाखिला मिल गया था, जहाँ मेरे बचपन के सारे दोस्त—रोहन, नेहा, पूजा और विकास पढ़ रहे थे।
पाँच साल बाद जब मैं वापस देहरादून लौटी, तो शहर की सड़कें, चौराहे और बाजार काफी बदल चुके थे। नई इमारतें खड़ी हो गई थीं और शहर में भीड़भाड़ भी बढ़ गई थी। मगर इस बदलते शहर में अगर कुछ नहीं बदला था, तो वो थी मेरे पुराने दोस्तों की टोली और उनका वही बचपन वाला बेफिक्र अंदाज। कॉलेज के पहले ही दिन जब हम सब कैंटीन की उसी पुरानी मेज पर मिले, तो लगा ही नहीं कि हमारे बीच पाँच साल का फासला रहा है। माँ कमला और पापा भी मुझे खुश देखकर बहुत संतुष्ट थे। मेरी जिंदगी हँसी-ठिठोली, नोट्स के लेन-देन और कॉलेज की मस्तियों के बीच बहुत ही सुकून से गुजर रही थी।
तभी पहले सेमेस्टर के बीच में हमारी इस सुकून भरी दुनिया में एक नए शख्स की दस्तक हुई, जिसका नाम था—विहान। विहान के पिता जी का हाल ही में देहरादून तबादला हुआ था, जिस वजह से उसका एडमिशन सेमेस्टर के बीच में विशेष अनुमति से हुआ था। पहले दिन जब वह हमारी क्लास में आया, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी मासूमियत और चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी। हमारी दोस्तों की पलटन वैसे तो किसी नए इंसान को इतनी जल्दी अपने ग्रुप में शामिल नहीं करती थी, लेकिन विहान के स्वभाव में कुछ ऐसा जादू था कि मात्र एक हफ्ते के भीतर ही वह हमारे ग्रुप की जान बन गया।
विहान आज के दौर के उन लड़कों जैसा बिल्कुल नहीं था, जो दिखावे में यकीन रखते हैं। उसका सीधा-सादापन, सादगी भरी पोशाक और सबसे बढ़कर लड़कियों के प्रति उसका गहरा सम्मान मुझे अंदर ही अंदर बहुत प्रभावित करने लगा था। जब भी ग्रुप में कोई लड़की बात करती, वह पूरी गंभीरता से उसकी बात सुनता। कैंटीन में अगर कभी बैठने की जगह कम पड़ती, तो वह बिना कुछ कहे अपनी कुर्सी किसी लड़की को दे देता और खुद खड़ा रहता। वह हमेशा अपने दिल की सुनता था और बिना किसी बनावट के सबसे बहुत ही विनम्रता से पेश आता था।
हमारा पूरा ग्रुप हमेशा साथ रहता था—क्लास से लेकर लाइब्रेरी तक और कैंटीन से लेकर कॉलेज के गार्डन तक। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि इतने महीने बीत जाने के बाद भी मेरी और विहान की कभी अकेले में दो मिनट भी बात नहीं हुई थी। जो भी हँसी-मजाक या बातचीत होती, वह सब दोस्तों के बीच ही होती थी। मेरे दिल में उसके लिए एक खास जगह बन चुकी थी, पर मैं इसे सिर्फ एक अच्छा आकर्षण समझकर टाल देती थी।
लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। सर्दियों के दिन थे और मेरी मौसी की बेटी यानी मेरी ममेरी बहन रितु की शादी ऋषिकेश के एक बड़े रिसॉर्ट में तय हुई थी। हमारा पूरा परिवार शादी के तीन दिन पहले ही वहाँ पहुँच गया था। संगीत की रात थी, चारों तरफ रोशनी और शहनाइयों की गूँज थी। मैं हरे रंग का लहंगा पहने अपनी सहेलियों और बहनों के साथ स्टेज के पास खड़ी थी, तभी मेरी नजर सामने से आते एक शख्स पर पड़ी और मेरी धड़कनें एक पल के लिए थम गईं। क्रीम कलर की शेरवानी में विहान ठीक मेरे सामने खड़ा था।
मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। जब हमारी नजरें मिलीं, तो उसके चेहरे पर भी वही हैरानी और फिर एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई। पास आने पर पता चला कि मेरे जीजाजी के बड़े भाई और विहान के भैया बहुत करीबी दोस्त और बिजनेस पार्टनर थे, इसलिए विहान अपने पूरे परिवार के साथ लड़के वालों की तरफ से शादी में आया था। यह इत्तेफाक किसी फिल्मी कहानी जैसा था। वहाँ हमारे दोनों के परिवार मौजूद थे, सैकड़ों मेहमान थे, लेकिन हमारे कॉलेज के ग्रुप का कोई भी दूसरा सदस्य वहाँ नहीं था। पहली बार हम दोनों अपने दोस्तों की भीड़ से अलग, एक-दूसरे के आमने-सामने थे।
उस शाम विहान की माँ वैदेही जी और मेरी माँ की भी आपस में बहुत अच्छी दोस्ती हो गई। संगीत के कार्यक्रम में जब सबने कपल्स और दोस्तों को डांस फ्लोर पर बुलाया, तो विहान ने बहुत ही शालीनता से अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया। उस रात हमने साथ में खूब डांस किया, गोलगप्पे खाने की शर्त लगाई और आधी रात तक रिसॉर्ट के लॉन में बैठकर ढेर सारी बातें कीं। उस एक रात ने हमारे बीच की सारी झिझक मिटा दी। अब हमारी दोस्ती में एक अजीब सी कशिश घुल चुकी थी, जो दोनों तरफ दबे पाँव मोहब्बत की चिंगारी सुलगा रही थी।
शादी के बाद जब कॉलेज दोबारा शुरू हुआ, तो हमारे रिश्ते का रंग बदल चुका था। अब वह ग्रुप में बैठकर भी सिर्फ मुझे ही देखा करता था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब घर में अचानक मेहमान आ जाने की वजह से मुझे कॉलेज पहुँचने में दो घंटे की देरी हो गई थी। उस जमाने में फोन पर हर वक्त बात करने का चलन इतना आम नहीं था और मेरा फोन भी बैग में साइलेंट पर पड़ा था। मैं जैसे ही भागती हुई कॉलेज के गेट के अंदर दाखिल हुई, मैंने देखा कि विहान सीढ़ियों के पास खड़ा बेसब्री से इधर-उधर टहल रहा था। उसकी पहली दो क्लासेज छूट चुकी थीं।
मुझे देखते ही उसके चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ, पर वह तुरंत मेरे पास आया और थोड़ी नाराजगी और घबराहट के मिले-जुले स्वर में बोला, “कहाँ थीं तुम इतनी देर से अनन्या? पता है कितनी देर से गेट पर खड़ा हूँ? पंद्रह बार कॉल कर चुका हूँ तुम्हारे फोन पर! जब घर से देर से निकलो तो कम से कम एक मैसेज या कॉल तो कर दिया करो, जान निकल जाती है मेरी… इतनी फिक्र रहती है तुम्हारी।”
उसकी आँखों में अपने लिए इतनी गहरी तड़प देखकर मेरा दिल भर आया, पर मैंने भी मुस्कुराते हुए उससे पूछ ही लिया, “क्यों करते हो तुम मेरी इतनी चिंता विहान? यहाँ इतने सारे दोस्त हैं, किसी को तो इतनी घबराहट नहीं हुई। आखिर माजरा क्या है, आज साफ-साफ बता ही दो?”
मेरी बात सुनकर वह एकदम से सकपका गया। अपनी नजरें चुराते हुए अपने बालों में हाथ फेरने लगा और बात को टालते हुए बोला, “कुछ नहीं यार… बस वो तो तुम हमारी सबसे अच्छी दोस्त हो न, और आज केमिस्ट्री का प्रैक्टिकल था, इसलिए चिंता हो रही थी और कुछ नहीं।”
मैं मन ही मन मुस्कुराकर रह गई। इस पागल लड़के का मैं क्या करती! मुझसे बेइंतहा प्यार भी करता था और अपने होंठों से बयां करने से डरता भी था। फिर जब मैंने गहराई से सोचा तो समझ आया कि वह इजहार करने से नहीं, बल्कि मुझे खो देने से डरता था। उसे लगता था कि कहीं उसके दिल की बात सुनकर मैं उससे अपनी दोस्ती भी न तोड़ लूँ।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा और देखते ही देखते हमारे कॉलेज के तीन साल पूरे हो गए। आज कॉलेज में हमारा आखिरी दिन था—फेयरवेल पार्टी। हर कोई एक-दूसरे से गले मिल रहा था, ऑटोग्राफ दे रहा था और भविष्य के वादे कर रहा था। मेरा दिल बहुत भारी था कि क्या आज के बाद विहान और मेरी राहें अलग हो जाएँगी? तभी विहान मेरे पास आया और मुझे कैंपस के पीछे वाले पुराने गुलमोहर के पेड़ के नीचे ले गया।
गिरते हुए लाल फूलों के बीच उसने एक गहरी साँस ली और मेरी आँखों में सीधे देखते हुए आखिर हिम्मत कर ही ली, “अनन्या, पिछले तीन सालों से हर रोज तुमसे एक बात कहना चाहता था, पर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया। आज अगर नहीं कहा, तो शायद जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगा। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ अनन्या… क्या इस जिंदगी के लंबे सफर में तुम मेरी हमसफर बनोगी?”
उसकी आवाज में इतनी सच्चाई और पवित्रता थी कि मेरी आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। भला मैं उसे ‘ना’ कैसे कह सकती थी, मेरा दिल तो कब का उसका हो चुका था। लेकिन मैंने अपने आँसू पोंछे और चेहरे पर थोड़ी गंभीरता लाते हुए उसके सामने एक शर्त रख दी। मैंने कहा, “विहान, मेरा जवाब ‘हाँ’ है, लेकिन यह ‘हाँ’ तभी मुकम्मल होगी जब तुम मेरे पापा से सीधे बात करोगे। जिस दिन मेरे पापा हमारे रिश्ते के लिए मान जाएँगे, मैं तुम्हारी हमसफर बन जाऊँगी।”
कहते हैं न, सच्ची मोहब्बत में वो ताकत होती है जो पत्थर को भी पिघला दे और खुदा को भी झुका दे। विहान ने मेरी शर्त को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया। उसने अपने एम.बी.ए. की पढ़ाई पूरी की और एक बहुत अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी हासिल कर ली। जिस दिन उसके हाथ में पहला अपॉइंटमेंट लेटर आया, वह अपने माता-पिता को लेकर सीधे हमारे घर मेरे पापा से मिलने पहुँच गया। मेरे पापा स्वभाव से थोड़े सख्त और उसूलों के पक्के इंसान थे, लेकिन विहान की ईमानदारी, उसके संस्कारों और मेरे प्रति उसके समर्पण ने पापा का दिल जीत लिया। पापा ने मुस्कुराते हुए विहान को गले लगा लिया और हमारे रिश्ते को अपना आशीर्वाद दे दिया।
हमारी जिंदगी में खुशियों की बहार आ गई थी। दोनों परिवारों की रजामंदी से बड़ी धूमधाम से हमारी सगाई हुई। जब विहान ने मेरी उंगली में सगाई की अंगूठी पहनाई, तो मुझे लगा कि मैं दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की हूँ। हमारी शादी छह महीने बाद नवंबर में तय हुई थी। इस बीच हम दोनों अक्सर शाम को देहरादून की वादियों में घूमने जाते, मसूरी की पहाड़ियों पर बैठकर अपने आने वाले कल के सपने बुनते। हमारे दोनों परिवार भी अब एक परिवार बन चुके थे। कभी हम सब उनके घर डिनर पर होते, तो कभी वे हमारे घर। हमने अपने कमरे के पर्दों के रंग से लेकर हनीमून की जगह तक सब कुछ तय कर लिया था।
लेकिन शायद मेरी खुशियों को किसी की बुरी नजर लग गई थी, या फिर मेरी किस्मत के पन्नों में यह सुख इतना ही लिखा था। शादी में सिर्फ एक महीना बाकी था। घर में कार्ड छप चुके थे और खरीदारी जोरों पर थी। उस शाम मूसलाधार बारिश हो रही थी। विहान किसी काम से हरिद्वार गया हुआ था। शाम को करीब सात बजे उसका फोन आया, “अनन्या, मैंने तुम्हारे लिए एक बहुत ही खूबसूरत कांचीवरम साड़ी खरीदी है। मैं और मेरा बचपन का जिगरी दोस्त कबीर कार से देहरादून के लिए निकल चुके हैं। बस एक घंटे में तुम्हारे घर पहुँच रहा हूँ, तैयार रहना, आज डिनर साथ करेंगे।”
मैंने खुशी-खुशी अपनी माँ की मदद से उसके पसंद की मिठाई बनाई और बालकनी में खड़ी होकर उसकी कार की हेडलाइट्स का इंतजार करने लगी। एक घंटा बीता, दो घंटे बीते, घड़ी की सुइयाँ रात के दस बजा रही थीं, पर विहान नहीं आया। उसका और कबीर का फोन भी लगातार स्विच ऑफ आ रहा था। मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट होने लगी। तभी रात के साढ़े दस बजे पापा के फोन की घंटी बजी।
फोन उठाते ही पापा के चेहरे का रंग सफेद पड़ गया और उनके हाथ से फोन छूटकर जमीन पर गिर गया। पापा की आँखों से बहते आँसू देखकर मेरी रूह काँप उठी। हाईवे पर तेज बारिश और फिसलन की वजह से सामने से आ रहे एक बेकाबू ट्रक ने विहान की कार को रौंद दिया था। अस्पताल पहुँचने से पहले ही मेरा विहान मुझे इस भरी दुनिया में अकेला छोड़कर हमेशा के लिए जा चुका था। कबीर को भी गंभीर चोटें आई थीं, पर उसकी जान बच गई थी।
जब सफेद कफन में लिपटा विहान का शांत चेहरा मेरे सामने आया, तो मेरे अंदर का सब कुछ टूटकर बिखर गया। जिस इंसान के साथ मैंने कल तक अपने बुढ़ापे तक के सपने देखे थे, वह आज मेरी आवाज सुनकर भी आँखें नहीं खोल रहा था। विहान के जाने के बाद मैं पूरी तरह से सुन्न हो गई थी। न मेरे आँसू बहते थे, न मेरे मुँह से कोई शब्द निकलता था। मैं बस अपने कमरे के एक कोने में बैठी अपनी सगाई की अंगूठी को निहारती रहती थी। मैं साँस तो ले रही थी, पर हकीकत में एक जिंदा लाश बन चुकी थी।
महीनों बीत गए। मेरा वजन गिरता गया, आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए। माँ-पापा मुझे देखकर तिल-तिल मर रहे थे। एक दिन शाम को दरवाजे की घंटी बजी। माँ ने दरवाजा खोला तो सामने विहान की माँ वैदेही आंटी खड़ी थीं। बेटे के गम ने उन्हें भी आधी उम्र से ज्यादा बूढ़ा कर दिया था। वह धीरे-धीरे चलकर मेरे कमरे में आईं और मेरे पास जमीन पर बैठ गईं। उन्होंने मेरे बेजान हाथों को अपने काँपते हाथों में लिया और मेरे गालों को सहलाते हुए रो पड़ीं।
उन्होंने अपने बैग से एक लाल रंग की मखमली डायरी निकाली और मेरी गोद में रख दी। रुँधे हुए गले से उन्होंने कहा, “अनन्या बेटा, कल विहान की अलमारी साफ करते हुए मुझे उसकी यह डायरी मिली। इसमें उसने अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सपने के बारे में लिखा है। बेटा, मेरा विहान तो शरीर से चला गया, पर अगर तू भी ऐसे ही खुद को खत्म कर लेगी, तो उसकी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी। तुझे उसके लिए जीना होगा बेटा, उसके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए उठना होगा।”
वैदेही आंटी के जाने के बाद मैंने काँपते हाथों से वह डायरी खोली। उसके हर पन्ने पर मेरे लिए उसका बेपनाह प्यार लिखा था, और आखिरी के कुछ पन्नों में उसने अपने एक सपने का जिक्र किया था। विहान ने लिखा था कि वह शादी के बाद मेरे साथ मिलकर पहाड़ी इलाकों के उन अनाथ और गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल और आश्रम खोलना चाहता था, जो पैसों के अभाव में पढ़ नहीं पाते। उसने लिखा था— “अनन्या की मुस्कान में इतनी रोशनी है कि वह सैकड़ों बेसहारा बच्चों की अंधेरी जिंदगी में उजाला भर सकती है। हम दोनों मिलकर इस संस्था का नाम ‘आशा की किरण’ रखेंगे।”
डायरी के उन शब्दों को पढ़ते हुए महीनों बाद मेरी आँखों से आँसुओं का बांध फूट पड़ा। मैं उस रात फूट-फूटकर रोई, लेकिन जब सुबह सूरज की पहली किरण मेरी खिड़की से अंदर आई, तो मेरे अंदर की जिंदा लाश मर चुकी थी और एक नई अनन्या का जन्म हो चुका था। मुझे समझ आ गया था कि सच्चा प्यार किसी के चले जाने पर खुद को मिटा देना नहीं, बल्कि अपने प्रेमी के आदर्शों और सपनों को अपने भीतर जिंदा रखना है।
मैंने उसी दिन अपने आँसू पोंछे, अपने माता-पिता और विहान के माता-पिता के पैर छुए और अपनी आगे की पढ़ाई फिर से शुरू की। मैंने बी.एड. किया और अपनी जमा-पूँजी तथा दोनों परिवारों के सहयोग से देहरादून के पास एक छोटे से गाँव में ‘विहान—आशा की किरण’ नाम से एक स्कूल और अनाथालय की नींव रखी। विहान का दोस्त कबीर भी ठीक होने के बाद मेरे इस मिशन में एक भाई की तरह मेरे कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो गया।
आज उस हादसे को पाँच साल बीत चुके हैं। आज जब मेरे आश्रम के डेढ़ सौ बच्चे मुझे ‘माँ’ और ‘दीदी’ कहकर मेरे गले लगते हैं, तो मुझे उन बच्चों की मासूम आँखों में अपने विहान की वही पुरानी मुस्कान दिखाई देती है। मैंने विहान के माता-पिता को भी अपने ही घर में अपने माता-पिता के साथ रख लिया है। आज मेरी जिंदगी की वह उलझी हुई डोर पूरी तरह सुलझ चुकी है। विहान शारीरिक रूप से मेरे साथ न होकर भी हर पल मेरी साँसों में, मेरे काम में और इन बच्चों की खिलखिलाहट में मेरे साथ जिंदा है।
जिंदगी में जब कोई अपना हमें बीच राह में छोड़कर चला जाता है, तो क्या हमें अपनी जिंदगी रोक देनी चाहिए या अनन्या की तरह उनकी यादों को अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ना चाहिए? अनन्या और विहान के इस अमर प्रेम के बारे में आपके क्या विचार हैं, हमें कमेंट करके जरूर बताएँ।
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