बेटी-जंवाई तो मेहमान हैं – शुभ्रा बैनर्जी

ख़ुद के घर में रश्मि ने मां-पापा से यही सीखा था कि,घर की जिम्मेदारी भाई-बहनों की साझी होती है। बेटे और बेटी की परवरिश,पढ़ाई और खान-पान में कभी मतभेद करते नहीं हैं मां -बाप,तो उनके प्रति ,उस घर के प्रति जिम्मेदारी से मुंह कैसे मोड़ सकती हैं बेटियां।

तब दादी कहतीं मां से”जमाना कितना भी बदल जाए बहू,पर बेटी-दामाद पर कोई अधिकार नहीं रहता।बेटी जिस घर जाती है,वही उसका अपना घर-बार बन जाता है।तुम अपनी बेटी को उल्टी शिक्षा ना दिया करो।” 

रश्मि तब दादी के गले से लगकर कहती”नहीं दादी,मैं बदलूंगी जमाने की सोच।मेरे लिए मेरे ससुराल और मायके में कभी कोई फर्क नहीं होगा।दोनों घरों की जिम्मेदारी समान रूप से निभाऊंगी मैं,देखना।

” दादी सीने से लगाकर कहतीं”,काश,मैं उस दिन को देखने के लिए जिंदा रह पाऊं।मेरी पोती जिम्मेदारी निभाने में भी अव्वल आएगी,मुझे पता है।पर बिटिया अपनी ससुराल को प्राथमिकता देनी पड़ेगी।उन्हें भी तुझे अपने मायके वालों की तरह अपनाना पड़ेगा।” 

रश्मि हंसकर वहां से चल देती।शायद दादी की ढेर सारी दुआओं का परिणाम था कि उसे सास भी मां जैसी मिली। उन्होंने रश्मि को अपनी बेटी की तरह अपनाया।बाकी लड़कियां देखतीं होंगीं सपने बड़े घर,अकेले रहने,पति को अपने बस में करने के।रश्मि हमेशा एक अच्छी,प्यार करने वाली सास मांगती थी, जो उसे मिली।

पहले पगफेरे में मायके जाते समय,सासू मां ने बहुत सारे थैले पकड़ाए और कहा” पहली बार जा रही हो दुल्हन बनकर।वहां जाकर उनकी बेटी ही बनना।ये तुम्हारी मां और रिश्तेदारों के लिए छोटे-छोटे उपहार हैं।हर कोई वहां तुम्हारी राह देख रहा होगा।बड़ी दीदी हो तो, भाई-बहन ज्यादा ही उत्साहित होंगें।

वहां जाकर कुछ अगर अलग से खरीद कर देने का मन करे ,तो ये पैसे रख दिएं हैं तुम्हारे पर्स में।रवि(बेटे)को बताने की जरूरत नहीं,तुम खुद खरीदकर देना।मन मत मारना, ना अपना और ना ही उनका।” 

रश्मि की आंखों से आंसू झरने लगे।ऐसी भी सास होती हैं इस ज़माने में।सभी के लिए कुछ ना कुछ दिया था उन्होंने।घर में जो मिठाईयां बच गई थीं, नमकीन, बिस्किट, सूखे समोसे ,फल सभी कुछ भर भरकर दिया था

उन्होंने।मां तो चौंक कर बोल भी दीं”अरे बाप रे! इतना सामान लेकर आई है वहां से।ये शोभा देता है क्या? हमें ले जाना चाहिए, जब भी हम जाएं।यहां तो तेरी सास ने सारा घर भेज दिया हो मानो।”

रश्मि ने मां से कहा” बहुत शौक था ना तुम्हारा, जो लोग शादी में नहीं आ सके, उन्हें खिलाने का।कल बुलवा लो सारे मोहल्ले के अंकल- आंटी और बच्चों को।एक पार्टी दे दो तुम।”रश्मि की मां तो खुशी के मारे भाग-भाग कर मोहल्ले के लोगों को न्यौता देकर आई,” सब लोग आना ।जंवाई आया है।आकर आशीर्वाद देना आप सब बेटी -दामाद को।”

देखते-देखते छोटा सा पंडाल भी लगवा लिया भाई।दस बीस कुर्सियां भी आ गईं।टेबल फैन,कूलर सब की व्यवस्था हो गई किराए पर।उस दिन उन लोगों को तृप्त होकर खाना खाते देखकर रश्मि ने अपनी सास को वहीं से एक प्रणाम किया।ये सोच किसी साधारण महिला की तो नहीं हो सकती।खाना खाकर जाते हुए

लोग बेटी और दामाद को लिफाफे में पैसे ,तो शायद कम,पर दुआएं मंहगी देते जा रहें दें।इस  घटना ने रश्मि को यह समझा दिया , कि उसकी सास का क्या विशिष्ट व्यक्तित्व है।

दो चार दिन रहकर जब वापस आई,मां ने भी अपनी सामर्थ्य से जो भी भेजा।उन्हें बहुत अच्छा लगा।खुलकर तारीफ की। एक लड़की को और इससे ज्यादा क्या चाहिए।जब घर की कमांडर मां की सोच इतनी बड़ी है, तो ऐसी मां की बेटियां तो इनका बेस्ट वर्जन ही होंगीं।

कुछ दिनों में ही दशहरे का त्योहार आने वाला था।बड़ी बेटी -जंवाई और बेटे के साथ आने वाली थी।यहां से वो अपनी ससुराल चली जाएंगी।

सासू मां तो पूजा में बेटी -जंवाई को क्या उपहार दे सोच ही नहीं पा रही थी।छोटी बेटी ने याद दिलाया”मां तुमने जो दीदी के पुराने सोने तुड़वाकर मंगलसूत्र बनवाई हो वही दे देना।दादा की शादी का स्पैशल गिफ्ट हो जाएगा।क्यों भाभी ठीक है ना?” 

रश्मि ने उछलकर कहा”हां मां,मुझे यहां रिसेप्शन में बहुत सुंदर-सुंदर साड़ियां मिली हैं,उनमें दीदी, उनकी ननद और सास के लिए से सुंदर उपहार हो जाएंगे। तुम्हें कुछ और देना का मन है तो बेटे से बोलकर मंगवा लो।भाई की शादी के बाद जा रही है ना, सभी उम्मीद लगाकर बैठते हैं।ये उपहार सम्मान है इस घर काउस घर के प्रति।हैं ना मां?” 

“बहू की सोच तो बिल्कुल मेरी जैसी ही निकली।मैंने तो पहली बार में ही इसकी आंखों में ममता और सच्चाई देख ली थी, तभी तो पसंद कर लें आई अपने घर।” पापा (ससुर)छोटी ननद, और उनके बेटे(पति)हंसने लगे।पति ने तो कह भी दिया, कि वो भी मुझे पसंद कर इस घर में नहीं आई, बल्कि तुम्हें पसंद करते हुए शादी की।

आज बड़ी ननद को आना था।खाना बनाने की जिम्मेदारी पहली बार मां से बहू ने ली थी।बड़े मन से खाना बनाया रश्मि ने, छोटी ननद से पूछकर।आते ही सभी एक जगह पापा के कमरे में इकट्ठे हुए।बड़ी दीदी की बातों का विषय केवल अपनी सास,पति के काम,बेटे की पढ़ाई का ही था। चुलबुली तो थी ही रश्मि बचपन से,बड़े से बैग को देखकर पूछा ननदोई जी से” क्या -क्या उपहार ले जा रहें हैं

घर वालों के लिए,हमें दिखाएंगे नहीं?”,ननद का तो पारा चढ़ गया।झल्लाते हुए कहा” अरे भाभी, तुम्हारी ससुराल‌ वाले तो अच्छे मिले तुम्हें।मेरी ससुराल में सब एक से बड़े एक दुश्मन हैं।कितना भी अच्छा गिफ्ट दो, नाक मुंह सिकोड़ने लगते‌ हैं।ये देखो कितना कुछ खरीदना पड़ा, इनकी तो पूरी तनख्वाह में चूना लग गया।”

बड़ी बेटी की बातें सुनकर मां धीरज बंधाते लगी। रश्मि तो बस वो पैकेट्स देखने के लिए उत्साहित हुई जा रही थी।एक-एक करके पैकेट्स खुल रहें थे।चार कांजीवरम सिल्क की साड़ियां‌ देखकर तो मन बाग-बाग हो गया।

हिसाब लगाया रश्मि ने “एक ननद की सास की,एक ननद की ननद की,और दो‌ में से एक सासू मां और एक उसी की होगी।वाकई, शॉपिंग बढ़िया करती हैं‌ दीदी।पर छोटी बहन,पापा,और अपने भाई को‌ गिफ्ट्स कब देगी।कल ही जाना है,खरीद‌भी नहीं पाएगी।”

तभी दीदी की आवाज बड़ी मुश्किल से सुन पाई वह,और‌ जी कहा!

” तो बताओ कैसे लगे गिफ्ट्स,सभी तुम्हारे जंवाई ने नामी दुकान‌ से खरीदा है।कस्टम में‌ है वह।दिल‌ खोलकर पैसे खर्च करते‌‌ हैं।”सबने तारीफ की,पर आदत के अनुसार रश्मि ने पूछा ” दीदी,मां की साड़ी कौन सी है?

वो तो भड़क गईं ज्यादा और गुस्से में बड़बड़ाने लगी’,अरे ,ये सब ससुराल वालों के लिए हैं।अच्छा थोड़ी लगता है कि ससुराल से दूर रहो और जब जाओ,तो बिना कुछ लिए पहुंच जाओ।तुम तो अभी नई हो ना इस घर में,तुम्हें कायदा कानून पता नहीं होगा।बेटियां अपने मायके जातीं हैं,तो ही पुण्य लाभ मिलता है उनको।तुम इस घर से छिपाकर चीजें मत ले जाने लगा।

ऐसे में क्लेस बढ़ते हैं।मां के पास पहले से ही कोरी कितनी साड़ियां पड़ी हुईं हैं।फिर बेटे की शादी में खरीदीं नई साड़ियां भी पड़ी हुई हैं।अरे सास है तभी ले जा रहीं हूं।ये फारमेल्टि मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती।जब जरूरत हो,तभी खरीदें ।”

रश्मि ने तिरछी नजर से मां को देखा,तो उन्हें बेटी की लाई क्रीम और रेड साड़ी पर नजर गड़ाए देखा।जैसे ही रश्मि से नजरें मिलीं ,वो हट गई वहां से। रश्मि यह बात हजम नहीं कर सकती थी।तुरंत बड़ी दीदी से बोली-दीदी,बुरा मत मानना।मेरी शादी में मिली साड़ियों में देखो ना,कोई क्रीम और लाल कांबिनेशन में‌ साड़ी देखो ना।

मिले तो अपने हाथों से मां को दे दो प्लीज़। जरूरत ना भी हो, बेटा-बहू,पति कितना भी दें,पर जब बेटी कुछ देती है ना मां को,मां प्रसाद समझकर ग्रहण करती हैं।”

दीदी ने समझी बात और रश्मि के सूटकेस से वैसी ही एक साड़ी निकालकर मां के हांथ में दी यह कहकर कि भूल गए थे,कहां रख दिए।

और इधर मां को,अपनी बेटी से पहली 

बार कोई उपहार मिला है।सीने से लगाकर साड़ी बहुत देर तक रोती रही।खूब आशीर्वाद दिया बेटे-बहू और नवासे को ।

बेटी के जाने के दो हफ्ते बाद ही ससुर बहुत बीमार पड़ गए।लोकल डॉक्टर ने हांथ खड़े कर लिए।बाहर ले जाने के लिए बोला गया।तब बाहर की उतनी जानकारी किसी को नहीं थी। रश्मि ने सुझाव दिया क्यों ना सतना दीदी के पास जाएं।वहां बीमारी तो कम से कम पता चलेगी।” 

ससुर जी ,जो हमेशा शांत रहते थे,अचानक से मां की ओर देखकर बोले”क्यों जी,बेटियां तो पराई होतीं हैं ना,जंवाई हमारे मेहमान हैं,उन्हें क्यों दिक्कत दें?यहां से कहीं और चलना हो तो ठीक है।मैं बेटी -दामाद के पास नहीं जाऊंगा।तुमने अपनी बेटी को मायके की जिम्मेदारी से सदा दूर ही रखा, इसलिए जबरदस्ती किसी को जिम्मेदारी की खातिर बेमन से कुछ करने की जरूरत नहीं।” 

पति की बात सुनकर सन्न रह गई सासू मां।सच में जिम्मेदारी के सारे सैशन उन्होंने छोटी बेटी और बड़े बेटे को ही सिखाए थे।अपने सिक्के का खोटा निकलना, मां की बेइज्जती भी तो है।तुरंत रश्मि का हांथ पकड़ कर बोली” तुम साथ में रहोगी, तो हम सब निश्चिंत रहेंगें।अरे बहू, अपने तो बेटा -बहू ही होतें हैं, बेटी-दामाद नहीं।मैंने उसे कभी नहीं सिखाया कि मायके की जोड़ भी नाड़ी से बंधी होती है।

कल हम पापा को जबलपुर ले जाएंगे,सतना नहीं।

शुभ्रा बैनर्जी 

मुहावरा आधारित कहानी -बेटा-बहू तो अपने ही होते हैं 

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