परायेपन का सुरक्षा कवच – लतिका श्रीवास्तव 

सावित्री सुशांत का कोई फोन आया ? सुबोध जी ने सुबह से पांचवीं बार वही प्रश्न किया तो सावित्री झुंझला गई।

अरे अब काहे करेगा ऊ यहां फोन।अब ता नौकरी भी मिल गई बीबी भी मिल गई।काम खत्म मां बाप का । जब तक पढ़ाई कर रहे थे जब नौकरी नहीं मिली थी परेशान थे तब बाप महतारी याद आते रहते थे जरूरत थी

रुपया की ता फोन भी आता रहता था अब सब मस्त हैं अपने संसार में अब का पड़ी है बुड्ढे रिटायर्ड बाप को फोन करने की अब तो डरते होंगे कहीं बाप कुछ मांग ना ले सावित्री की उंगलियां माला जप करती रुक गईं और मुंह पूरी रफ्तार से खुल गया।

चुप रह भागवान तू माला जप ।मुझे डर है सुशांत किसी परेशानी में तो नहीं है सुबोध जी आशंकित स्वर में कह उठे।

अब मेरा मुंह ना खुलवाओ।किसी परेशानी में होता तो घूमने ना जा रहा होता घरवाली के साथ सावित्री ने अबकी बार हाथ में पकड़ी माला को पूजा की चौकी पर रखते हुए तीखे लहजे में कहा तो दरवाजे की तरफ बढ़ते सुबोध जी के कदम थम गए।

घूमने जा रहा है ये किसने कहा तुमसे? पलट कर सावित्री की तरफ देखते हुए प्रति प्रश्न किया उन्होंने।

मुझे सब पता लग जाता है।कोई कित्ता छुपाए वो कमल है ना अरे वही सुशांत का दोस्त जो स्कूल में उसके साथ पढ़ता था और अभी रेलवे की नौकरी करता है।वही बता रहा था

सुबोध ने दिल्ली जाने का रिजर्वेशन करवाया है कहीं मिल नहीं रहा था इसलिए कमल से कहा।दिल्ली घूमने जा रहे हैं कमल से बात कर सकते हैं अपने काम के लिए पर मां बाप से बात करने का टैम नहीं है सपूत के पास सावित्री ने मुंह बनाते हुए हाथ झटके और पालक भाजी तोड़ने लगी।

दिल्ली जा रहा है सुशांत !! मुझसे बताया तक नहीं पूछा तक नहीं अबकी सुबोध जी के भीतर कुछ बेआवाज चटक गया ।एक पल में ही बेटे के पराए हो जाने का दर्द टीस उठा।

पिछले साल से उनके मन में हसरत हिलोर ले रही थी कहीं बाहर घूमने जाने की सावित्री के साथ पूरे परिवार के साथ।एकाध बार सुशांत से बातचीत के दौरान इस हसरत को कहने का सिरा पकड़ने की कोशिश की थी लेकिन उस एकाध बार की भी बेटे ने अवहेलना की। आगे कुछ कहने से पहले ही बात घुमा दी या काट दी ।

फिर भी दो माह पहले हिम्मत करके जब उन्होंने खुलकर अपनी हसरत बताई थी तब से सुशांत ने उनसे बात करना ही लगभग बंद कर दी।उसकी तरफ से तो फोन आना ही बंद हो गया।सुबोध जी के लगाने पर अब सुशांत की जगह अब बहू शुचि फोन उठाती ।अब बहू से क्या और कैसे कहते।

वेदना की एक टीस उठी थी उनके भीतर।

इकलौते पुत्र की परवरिश भविष्य बनाने में अपनी मामूली सी नौकरी में जीवनकाल का सर्वाधिक भाग खटा दिया।शिशु सुशांत के बढ़ते हुए आकार के साथ साथ सुबोध जी के दिल की उम्मीदें भी आकार बढ़ाती रहीं।

उसकी हर उन्नति उन्हें अपनी उन्नति लगती रही।उसका हर दुख उनके कलेजे को चीरता रहा।उसके चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने के लिए अपनी आंखों की नींद और रातों का सुकून स्वाहा कर दिया।

“आइए भोजन लगा दिया है सावित्री की तेज आवाज से उनके मन के विचारों की श्रृंखला भंग हो गई । चुपचाप आकर थाली के सामने बैठ तो गए लेकिन एक कौर गले के अंदर नहीं डाल पाए।भूख मर गई थी आज उनकी और साथ ही दिल के भीतर सिर उठाती हसरत भी।

“अरे कुछ खा क्यों नहीं रहे । पालक उड़द दाल तो आपको पसंद है इसीलिए तो बनाई है।क्या अच्छी नहीं बनी सावित्री से पति का अनमना पन छुपा ना रह सका।पछता उठी काहे जुबान की छुरी चला दी सुबह सबेरे से।

बेटे के प्रति पिता का अटूट स्नेह लगाव और उम्मीदें आज काली बदली में घिर गए थे।बदली घोर कालिमा में तब्दील हो चली थी।

उनके दिल्ली जाने से आपको खुशी नहीं हो रही!! अरे हम नहीं गए तो क्या हुआ बेटा बहू ही सही।शादी तो आपने ही बहुत झूम कर करवाई थी बहू लाने की बड़ी जल्दी मची थी आपको।अब लो मजा बहू का।जो बेटा अभी तक हमारा था अब बहू का हो गया।बहुरिया के पीछे पीछे चलेगा उसका दिल रखेगा उसकी हसरतों को पूरा करने में रुपया उड़ाएगा।

इसीलिए जोर दिया था मैंने अभी बहू को सुशांत के साथ मत भेजो।कुछ दिन यहां हमारे साथ रह लेने दो।जान समझ लेने दो।सुशांत भी तो नहीं ले जाना चाह रहा था…. सावित्री के दिल का गुबार आज विस्फोटक स्थिति में था।

अरी बावली, बहू क्या हम अपने लिए लाए थे।बेटा बहू आपस में एक दूसरे को जान समझ ले यही सबसे जरूरी है।अगर वे दोनों एक दूसरे को समझ लेंगे तो हमें समझने या नहीं समझने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता जीवन तो उन दोनों को साथ चलाना है।शुरुआती वैवाहिक गृहस्थी ही आगामी जीवन का आधार बनती है।

अभी हम लोगों का हस्तक्षेप या रोक टोक या सलाहें उनके आपसी रिश्तों की परिपक्वता में बाधक होंगे सावित्री की बात बीच में ही बेसब्री से काटते हुए सुबोध जी ने थाली खिसका कर प्रणाम किया और पानी ही पीकर उठ गए।

दूसरे घर से आई लड़की हमारे घर की चिंता ख्याल और फिक्र क्यों करेगी मुंह बनाते हुए सावित्री ने पारंपरिक सास वाली मानसिकता से पूर्ण सहमति जताते हुए कहा

और सुबोध जी की छूटी थाली को माथे से लगाए हुए समेटा और किचेन में चली गई।आज उसकी भी भूख मर गई थी।अपने दुखी और आक्रोशित दिल का गुबार निकाल कर थोड़ी तसल्ली हुई ही थी कि पति का हाल देख ज्यादा दुखी हो गई चिंतित हो गई।

कमल ने कहा था चाची सुशांत ने मना किया था आप लोगों से बताने को।आप चाचाजी से बिल्कुल ना बताइएगा।लेकिन सावित्री के लिए इतनी बड़ी बात पति से छिपाना और पचा पाना दुष्कर कार्य था।

आज तक हर छोटी से बड़ी बात वह पति को बताती रहीं हैं।हर बात हर काम पति से पूछ कर सलाह लेकर ही करती रहीं हैं।तो फिर ये बात कैसे ना बतातीं। तिस पर पति का बेटे से इतना लगाव और आकाश तक उठी उम्मीदें उन्हें चिंता में डाल रहीं थीं।

किसी और से सुशांत के बारे में कोई ऐसी बात सुबोध जी को पता लगे और उनकी उम्मीदें चकनाचूर हो जाएं इससे बेहतर है मैं अभी शुरुआत में बेटे का घर के प्रति उचटता बदलाव बता दूं ताकि बाद में कोई जोर का झटका ऐसा ना लगे जिसे पति का भावुक दिल सहन ना कर सके।

मन की स्थिति तो घिरे हुए बादलों की भांति होती है।जैसी परिस्थिति वैसे बादल वैसा मन।

सुबोध जी की मानसिक स्थिति भी आज ऐसे काले बादलों में गिरती जा रही थी।कोशिश करने पर भी बादल छंटने के बजाय और गहराते जाते थे।शुचि को बहू के रूप में भी बहुत समझ कर ही बेटे के लिए चुना था उन्होंने।शुचि उन्हें बेहद समझदार और सुलझे विचारों की लगी थी।लेकिन सावित्री की लगाई चिंगारी ने उनके मन में संदेह की अग्नि सुलगा दी थी।

उन्हें बेटे बहू का कही बाहर घूमने जाना नहीं कचोट रहा था।उन्हें जो बात चुभ रही थी वह था बेटे का उनसे बात ना करना टालमटोल करना ।सावित्री को कैसे समझाएं कि उन्हें अपने ही बच्चों से जलन नहीं हो रही थी बे तो चाहते ही हैं अभी उनकी उम्र है घूमे फिरें एक दूसरे के प्रति समझ बढ़ाएं।

लेकिन सुशांत ने उनसे ये बात छुपाई क्यों ! क्या पिता इतने पराए लगने लगे अब कि अपनी छोटी छोटी बातें भी पिता से शेयर करने वाला बेटा इस बात को छिपाए!! और क्यों?? इस क्यों का उत्तर ढूंढ रहे थे वे चुपचाप अपने कमरे के बिस्तर पर लेटे हुए।जितना उस उत्तर की खोज में जाते उतना ही काले बादलों में घिर जाते रास्ता ही नहीं दिखता।

बगल में रखी गीता उठकर पढ़ने लगे कि मन  शांत हो सके।

उस दिन के बाद उन्होंने सुशांत का या उसके फोन का जिक्र ही नहीं किया।पूजा पाठ प्रार्थना बाजार बगीचे आस पड़ोस में अपने मन को भटका लिया।लेकिन मन के भीतर बहुत भीतर कहीं सुशांत अब भी उन्हें व्यथित कर रहा था और एक अनजाना डर और चिंता उन्हें घेर रही थी।

करीब तीन महीने के बाद एक दिन शाम को जब वे घर में घुसे।

“सुनिए जी सुशांत का फोन आया था सावित्री की बेहद उत्साही आवाज ने उन्हें एक क्षण को चौंकाया लेकिन फिर वही टूटन उन्हें आकुल कर गई।खामोश ही रहे वह जैसे कोई शब्द नहीं बचे थे अब उनके पास।

पूछेंगे नहीं क्या कह रहा था बेटा सावित्री ने उन्हें गुमसुम और प्रतिक्रियाहीन देख आश्चर्य व्यक्त किया।

निर्विकार ही रहे तब भी वह।

कल आ रहे हैं बेटा बहू सावित्री ने जैसे धमाका किया।

एक पल को उनके भीतर भी खुशी का उजास फूटने को बेताब हो गया।सुशांत उनका बेटा आ रहा है कल इस बात ने उनके भीतर खलबली मचा दी।लेकिन दूसरे ही पल वह फिर उन्ही काले गहरे बादलों में छिप गए थे।

अच्छा…संक्षिप्त तटस्थ जवाब देकर वह हाथ मुंह धोने पीछे आंगन में लगे नल के पास चले गए थे।

सावित्री जो कल तक सुशांत और बहू के नाम से काट खाने दौड़ रही थी।आज सब कुछ भूल बेहद उत्साह से बावली हुई जा रही थी।नाना प्रकार की तैयारी में व्यस्त हो गई थी।कमरे की सफाई बाजार से सामान की लिस्ट पकवान बनाना सबमें मगन हो गईथी।

लेकिन सुबोध जी का मन टूट सा गया था।अपनापन महसूस ही नहीं हो रहा था।बेटा के आने में परायेपन की महज औपचारिकता की गंध महसूस हो रही थी उन्हें।

सुबह से बहुत रौनक थी घर में।ठीक दस बजे सुशांत शुचि के साथ घर आ गया।सावित्री ने हुलास कर दोनों की आरती उतारी फूल छिड़के मीठा खिलाया।दोनों ने झुक कर सावित्री के फिर सुबोध जी के चरण स्पर्श किए।सुबोध जी ने हाथ उठाकर आशीष तो दे दिया लेकिन मन बुझा ही रहा।सुबोध कुछ कमजोर दिखाई दे रहा था उन्हें लेकिन उन्होंने उसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया उठकर अपने कमरे में आ गए फिर से गीता का पाठ करने लगे मन में अजीब सी व्याकुलता और अधीरता घिर आई थी।

क्या कह रही है बहू सुशांत को एडमिट करना पड़ा दिल्ली में तीन महीने ।तुम लोगों ने हम लोगों को बताया तक नहीं अचानक सावित्री का आकुल तेज वाक्य उनके कानों से होता हुआ कलेजे को चीर गया।

झपट कर कमरे के बाहर आए।

सुशांत निढाल सा सोफे पर बैठा था।शुचि एक बड़ा सा मेडिकल बॉक्स खोलकर दवाइयां दे रही थी।

क्या हुआ था सुशांत को शुचि।क्या कह रही थी तुम सावित्री अधीरता से सुबोध जी बावले हो गए थे।

पापा एक दिन अचानक सुशांत ऑफिस में चक्कर खा कर गिर पड़े थे बेहोश हो गए थे।तुरंत icu में एडमिट कर दिया था ऑफिस वालों ने फिर मुझे सूचित किया था।मै बदहवास हो गई थी।डॉक्टर्स ने बताया स्ट्रोक आया था।दिल्ली ले जाना पड़ेगा।इसीलिए आनन फानन में कमल भैया को सारी बातें बता कर रिजर्वेशन करवाया ।

आप लोग घबरा जाएंगे परेशान हो जाएंगे यही सोच कर सुशांत ने आप लोगों को कुछ भी बताने से मुझे मना कर दिया था।आपका फोन नहीं उठाते थे बात नहीं करते थे इस डर से कि कहीं आपकी आवाज सुनकर भावुकता में अपनी बीमारी ना बता दें ।

हमें माफ कर दीजिए पापा आपका दिल दुखाया कहीं बाहर घुमाने की बात पर भी इसीलिए कोई जवाब नहीं देते बनता था शुचि भरे गले से कह रही थी और सुबोध जी दौड़कर अपने प्राणों से प्यारे बेटे को गले से चिपटाए जा रहे थे।

बेटा तू इतना बीमार हुआ।दिल्ली में एडमिट रहा लंबा इलाज चला तुम दोनों ने अकेले इतना पहाड़ जैसा दुख झेला हम लोगों को क्यों नहीं बताया बेटा।हम पराए थोड़ी ही थे।

अरे तुम लोगों का कष्ट सुनकर इतने परेशान नहीं होते जितने तुम लोगों से बात ना करके हुए सुबोध नाराज़ भी हो रहे थे और आंखों में आंसू भी आ रहे थे ।आज मन पर घिरे काले गहरे बादल छंट रहे थे और बारिश बन कर आंखो से बरस उठे थे।

इतने दिनों से बेटे के जिस मौन को वह उसका पराया पन समझ आकुल हो रहे थे वह वस्तुत: पराया पन था ही नहीं बल्कि वह तो बेटे का उनके प्रति अटूट अपनापन था ।पराया होने को सुरक्षा कवच बनाया था उसने समझ कर भीतर तक भीग गया पिता का दिल।

नहीं पापा मै आप लोगों को दुखी और परेशान नहीं देख सकता।लेकिन विश्वास मानिए आपकी याद मुझे हर पल प्रेरणा देती रही बीमारी से लड़ने में सुशांत पिता के गले लग सुबक उठा।मै ही जानता हूं कितना कठिन होता है आपसे बात छुपा पाना सुशांत बोलता जा रहा था और पापा को मनाता जा रहा था।

नहीं बेटा कसम खा कि आज के बाद कभी इस तरह की कोई बीमारी कोई कष्ट हमसे नहीं छुपाएगा।और बातचीत करना तो कभी बंद नहीं करेगा।तुझसे बात नहीं करना मेरे लिए असहनीय हो जाता है मेरे बेटे तेरे कष्ट मेरे भी हैं मिलकर कष्ट कम हो जाते हैं बांट देने से दुख बंट जाता है हम केवल सुख के साथी थोड़ी है दुख के भी हैं।अपनों से ही तो दुख बांटा जाता है परायों से नहीं।और हम तो तेरे अपने हैं पराए नहीं ।अब से कभी हमे पराया मत करना सुबोध जी ने भावुक होकर कहा तो सुशांत और शुचि उनके पैरों पर झुक गए।

नहीं पिता जी अबसे ऐसा कभी नहीं होगा कान पकड़ते हैं कह दोनों ने कान पकड़ लिए तो सावित्री के साथ सुबोध जी को भी हंसी आ गई।

अद्भुत दृश्य था।पिता का बेटे के प्रति और बेटे का पिता के अत्यधिक प्रेम ख्याल सुरक्षा की भावना ही दोनों को इस मोड तक ले आई थी।

बहुत दिनों बाद आज घर हंस रहा था। 

लतिका श्रीवास्तव 

अपने हुए पराए#कहानी प्रतियोगिता 

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