अपने कब बन गए पराये – गीता वाधवानी  

 दरवाजे पर घंटी बजी। मां शारदा देवी ने दरवाजा खोला और अपने बेटे आयुष्मान को देखकर बोली-” अरे बेटा आज तो जल्दी आ गया पैसे तो तुझे आते आते रात के 8:00 जाते हैं। ” 

 आयुष्मान -” हां मां आज हम बाहर खाना खाने चलेंगे, आप तैयार हो जाओ।मैं अभी रति से भी तैयार होने को कहता हूं। ” 

 मां-” बेटा,तुम दोनों चले जाओ मैं नहीं जाऊंगी, क्या भला मैं तुम्हारे साथ जाती हुई अच्छी लगूंगी? वैसे क्या आज कोई खास बात है? ” 

 आयुष्मान -” मां आप भूल गई आज तो बहुत खास दिन है आज पूरा 1 साल हो गया मुझे मेरी मां से मिले हुए चलिए चलिए जल्दी तैयार हो जाइए बाकी बातें बाद में करेंगे। ” गीता वाधवानी 

 शारदा देवी की आंखों में आंसू थे और वह तैयार होने के लिए अंदर चली गई।आयुष्मान,रति और मां तीनों ने एक अच्छे रेस्टोरेंट में खाना खाया और फिर ठंडी मलाईदार कुल्फी खाकर घर वापस आ ग ए।तीनों बहुत खुश थे। 

 कपड़े बदलकर सोते समय शारदा देवी की आंखों में नींद नहीं थी। सोचते सोचते वह अपने पुराने समय में पहुंच गई थी। 

 पिछले साल की ही तो बात है।वहखुशी-खुशी अपने बेटे नीरज के साथ गांव से आई थी।वह खुश थी कि मैं भी अब अपने बहू और बच्चों के साथ रहूंगी। पति शंकर के गुजर जाने के बाद वह गांव में अकेली रह गई थी,इतना बड़ा घर मानो उन्हें खाने को दौड़ता था। वह अकेली रह नहीं पा रही थी। शुरू शुरू में तो नीरज और उसकी पत्नी शीतल उनका बहुत ध्यान रखते थे लेकिन कुछ समय बाद उनका व्यवहार बदल गया था। 

 कुछ दिन पहले, नीरज ने एक दिन अपनी मां से कहा था-” इन कागजों पर हस्ताक्षर कर दो माँ। ” 

 शारदा देवी ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं थी लेकिन अपने हस्ताक्षर कर लेती थी और थोड़ी बहुत हिंदी पढ़ लेती थी। 

 उन्होंने पूछा-” बेटा यह कौन से कागज है? ” 

 नीरज ने कहा-” मां यह बैंक के कागज है, मुझे लोन लेना है इस पर तुम्हारे हस्ताक्षर जरुरी है। ” 

 शारदा देवी को बैंक के कामों के बारे में कुछ पता नहीं था। उन्होंने ज्यादा सवाल ना करते हुए चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए। उसके बाद नीरज और उसकी पत्नी शीतल का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगा। शीतल बात-बात पर उनका अपमान करती थी और नीरज को उनके खिलाफ भडकाती थी। नीरज भी बिना कुछ सोचे समझे मां का अपमान कर देता था। 

 तभी उन दिनों में, शारदा देवी के दूर के रिश्ते में एक देवर लगता था उनका बेटा आयुष्मान, नीरज के घर के पास वाले फ्लैट में रहने आया। 

 एक दिन ठेले वाले से सब्जी लेते समय आयुष्मान ने उन्हें पहचान लिया क्योंकि गांव में उनके घर आसपास ही थे। आयुष्मान और शारदा देवी एक दूसरे से मिलकर बहुत ही खुश हुए। शारदा ने उसे अपने बेटे नीरज के घर आने का निमंत्रण दिया। आयुष्मान नीरज और शीतल  से मिलने आया। 

 आयुष्मान ने कहा -” कभी माँ  को हमारे घर भी रहने के लिए भेजो। ” 

 नीरज और शीतल मानो तैयार ही बैठे थे। एकदम से बोले -” हां हां क्यों नहीं? किसी दिन आकर ले जाना मां को। ” 

 बाद में शारदा देवी ने नीरज से कहा -” मैं किसी के घर रहने नहीं जाऊंगी। ” 

 नीरज-” तो क्या हुआ, आयुष्मान भी तो आपके बेटे जैसा है। इतने प्यार से आपको बुला रहा है। ” 

 2 दिन बाद, आयुष्मान जब दोपहर के समय शारदा देवी को लेने के लिए सचमुच आया। तब उसने सुना की शीतल नीरज से कह रही थी-” तुमने मां से गांव के घर के कागजों पर साइन तो करवा लिए पर उसे बेचोगे कब, जल्द से जल्द उसे भेज दो और पैसे अपने हाथ में कर लो, ऐसा ना हो किसी दिन मां को पता चल जाए और उसके बाद मन को किसी वृद्ध आश्रम में छोड़ आना। ” गीता वाधवानी 

 उस समय शारदा देवी दूसरे कमरे में आराम कर रही थी। 

 नीरज ने कहा -” यह तुम कैसी बातें कर रही हो, माँ  है वह मेरी, उन्हें वृद्ध आश्रम में कैसे छोड़ सकता हूं। ” 

 शीतल ने कहा-” तो ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी, मैं घर छोड़कर चली जाऊंगी रहो फिर तुम अपनी मां के साथ। ” 

 आयुष्मान दरवाजे के बाहर खड़ा सब कुछ सुन रहा था। उसे यह सब सुनकर बहुत दुख हुआ और वह उल्टे पैर लौट गया। 

 घर जाकर उसने अपनी पत्नी रति को सारी बात बताई। गीता वाधवानी  

 तब आयुष्मान और उसकी पत्नी मिलकर नीरज के पास आए और बोले -“नीरज तुम अपनी मां के साथ ऐसा कैसे कर सकते हो,तुमने धोखे से उनके घर को हड़प लिया और अब तुम्हें उन्हें वृद्ध आश्रम छोड़ने की बात कर रहे हो यह सही नहीं है।” 

 नीरज-” तुम हमारे बीच में बोलने वाले कौन होते हो, हम जो मर्जी करें। ” 

 आयुष्मान -” तो तुम इतना तो कर ही सकते हो की मां को वृद्ध आश्रम भेजने की बजाय मेरे साथ भेज दो। मैं उनका पूरा ख्याल रखूंगा।मैं ने अपनी मां को बचपन में ही खो दिया था, मैं मां के प्यार और मां के साथ के  लिए  हमेशा तरसता रहा हूं।मुझे  माँ मिल जाएगी।” 

 नीरज और शीतल तो उनसे छुटकारा पाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने हां कर दी। शारदा देवी का दिल यह सुनकर टूट चुका था। वह नीरज की बेशर्मी से हताश थी और आयुष्मान का स्नेह देखकर भावुक हो रही थी। उन्होंने बैग में अपने कपड़े डाले और आयुष्मान के साथ चल पड़ी। 

 आयुष्मान और रति उनका बहुत सम्मान करते थे। हर बात में उनकी सलाह लेते थे।साथ में घूमाने ले जाते थे उनके खाने-पीने का और दवाइयों का पूरा ध्यान रखते थे। 

 आज आयुष्मान के साथ रहते रहते 1 वर्ष बीत गया था। अपने कब पराए बन गए और पराये अपनों से भी बढ़कर हो गए, कैसे समय बीत गया पता भी ना चला। आज आयुष्मान उसी दिन को सेलिब्रेट कर रहा था और मां को खाना खिलाने के लिए बाहर ले गया था। 

 दोस्तों आपको कहानी कैसी लगी कमेंट करके अवश्य बताएं। 

स्वरचित, अप्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली 

साप्ताहिक प्रतियोगिता- विषय # अपने हुए पराए 

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