पिता का स्वाभिमान – बिमला रावत जड़धारी

पापा आप क्यों भाभी को परेशान कर रहे हो? पहले तो आप इतनी तारीफ करते थे। हमारी बहू तो बहुत अच्छी है, सर्व

गुण संपन्न है, हमारा बहुत घ्यान रखती है। घर में कोई आता है तो उनकी बहुत आवभगत करती है। किसी को कुछ भी

बोलने का मौका नहीं देती। अब ऐसा क्या हो गया आपको जो भाभी के पीछे पड़ गए वो भी दहेज के लिए। भाई की शादी

से पहले तो आप कहते थे हमें कुछ नहीं चाहिए, हमारे पास सब कुछ है। फिर अब क्यों ?दीनदयाल बहुत ही मेहनती और

स्वाभिमानी थे। वह एक कपड़े की दुकान से कपड़े लाकर साइकिल में गली – गली कपड़े बचेते थे। वह जितना कमाते उसमें

से आधे पैसे अपनी पत्नी ललिता को घर खर्च के लिए दे देते और आधे अपने पास रख लेते। दीनदयाल उन पैसों से आधे बैंक

में जमा कर देते और आधे पैसों से बेचने के लिए और कपड़े ले आते। धीरे – धीरे उसने इतने पैसे जमा कर लिए कि उसने

अपनी ही एक कपड़े की दुकान खोल ली। उनके तीन बच्चे थे- बड़ी बेटी रिया, बेटा दिनेश, और छोटी बेटी रीमा। दीनदयाल

दान पुण्य खुले दिल से करते। जरुरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते। दीनदयाल के अच्छे व्यवहार की वजह से

उसकी दुकान अच्छी चल रही थी।उसने अपना घर भी बना लिया। तीनों बच्चें भी पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी में लग

गये।एक दिन दीनदयाल जी ललिता से बोले, ललिता मेरा दोस्त सुरेश कह रहा था कि मेरी पत्नी का भाई अपने बेटे के लिए

लड़की ढूंढ रहा है, अगर तुम बोलो तो मैं रिया की बात करूं। मैंने बोला सोच कर बताता हूॅं। तुम क्या सोचती हो?हाॅं, मैं

मिली तो हूॅं, लोग भी अच्छे हैं। लड़का क्या करता है?किसी कंपनी में है।अच्छा, बात करो अगर रिश्ता हो जाता है तो

बहुत अच्छा है।ललिता पहले रिया से पूछ लो उसकी क्या मर्जी है।रिया शाम को आफिस से घर आती है।रिया, मुझे तुम से

जरूरी बात करनी है।हाॅं बोलो मम्मी।जो सुरेश अंकल है उनकी पत्नी सुधा आंटी का भतीजा, वह लोग उसके लिए लड़की

ढूंढ रहे हैं। अंकल जी चाहते हैं कि तुम्हारी बात उससे करने के लिए।पर मम्मी मैं तो उन्हें जानती भी….बेटा तुम उस

लड़के से और उसकी मम्मी से मिल चुकी हो।कब मम्मी?हम दोनों दो महीने पहले बाजार गये थे। उस दिन सुधा आंटी

अपनी बहन और उसके बेटे के साथ थी। आया याद तुम्हें?हाॅं मम्मी…बेटा वो बहुत अच्छे लोग है। तुम खुश रहोगी।मम्मी

जैसे आप लोगों की मर्जी। ठीक है बेटा, मैं तुम्हारे पापा को बोल देती हूॅं।दोनों परिवार इस रिश्ते से खुश है। कुछ महीने बाद

शादी की तारीख निकलती है। रिया को जो – जो समान देना था, दीनदयाल उसकी पूरी लिस्ट बना लेते हैं। उनकी मर्जी थी

कि शादी से पन्द्रह दिन पहले ही सारा सामान रिया के सुसराल भिजवा दे। शादी से बीस दिन पहले रिया के दोनों मामा-

मामी जी आऐ और बोल, जीजा जी शादी में अगर कुछ सामान तुम देना चाहते हो और नहीं दे पा रहे हो तो हम दोनों भाई

मिल कर दे देंगे।अरे हमने तो सारा सामान लेकर इक्कठा कर लिया है, कुछ दिनों में रिया के सुसराल भिजवा देंगे। हमने

उन्हें बोल दिया है।शादी से पहले कौन भिजवाता है? वैसे क्या – क्या सामान दे रहे हो?तभी ललिता आती है, भाई

सामान बाद में देखना पहले चाय पी लिजिए और जब तक खाना बनता है तब तक बातचीत किजिए। ललिता अगर पता

चल जाता तो हम भी अपनी बजट के हिसाब से उस सामान का पैसे दे देते।ललिता तुम खाना बनाओ, मैं सामान की लिस्ट

दिखा देता हूॅं। सामान खाना खाने के बाद दिखा देंगे।दीनदयाल बोले।लिस्ट देखने के बाद दोनों भाई बोलते हैं ललिता तुम

लोग तो बहुत सारा सामान दे रहे हो। क्यों नया रिवाज शुरू कर रहे हो। हम दोनों भाई अपनी बेटियों की शादी में इतना

सब कैसे करेंगे।तभी दीनदयाल बोले, तंग तो हमारे हाथ भी थे। लेकिन हमने सोच रखा था कि दोनोंं लड़कियों की शादी

अच्छे से करनी है। और उसी हिसाब से हम पैसे जमा कर रहे थे।आज इतने पैसे जमा हो गए कि हम इतना सब कर सकें।

तुम लोग जब अपने बच्चों की शादी करोगे तो अपने बजट के हिसाब से करना।इस तरह रिया की शादी खुब धूम धाम से हो

गयी।दो साल बाद बेटे की शादी बेटे की पसंद की लड़की से कर दी। उन्होंने पहले ही कहे दिया कि हमें कुछ भी समान नहीं

चाहिए। घर में समान रखने की जगह नहीं है। तभी लड़की के पापा बोले, हम सभी सामान देना चाहते है अगर सामान

नहीं लेना चाहते तो हम पैसे देने के लिए भी तैयार हैं।दीनदयाल जी हाथ जोड़कर कर कहते हैं, मुझे माफ करना, हमें कुछ

भी नहीं चाहिए। अगर आप की बेटी लेना चाहती है तो उस से पूछ लेना। पर शादी के बाद वह हमारी जिम्मेदारी है। उसे

किसी चीज की जरूरत होगी तो उसे हम पूरी करेंगे। वैसे हम उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे।;निधि दिनेश की

दुल्हन बन के घर आ जाती है। ललिता बोली अब बस रीमा की भी गृहस्थी बस जाए तो हमारी जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी।

इसी बीच रिया का एक बेटा और एक बेटी हो गये। दिनेश भी एक बेटी का पिता बन जाता है। रीमा की कई जगह शादी की

बात चली पर कहीं बात नहीं बन पा रही थी। रिया अपने बच्चों के साथ अपने मायके आयी हुई थी।सभी साथ बैठ आपस में

बातें कर रहे थे। तभी दीनदयाल जी बोले, मैंने रीमा के रिश्ते की बहुत कोशिश कर ली, कहीं ढ़ंग का रिश्ता ही नहीं मिल

रहा है। बेटा रीमा, अगर तुमने कोई लड़का पसंद कर रखा है तो बोलो।नहीं पापा मैंने कोई लड़का पसंद नहीं किया

है।रिया बेटा तुम्हारी नजर में अगर कोई है तो …पापा आप इतनी चिंता मत करो, जब सही समय होगा तब शादी हो

जाएगी। इतनी चिंता से आप की तबियत न खराब हो जाए।तभी दिनेश बोला, पापा मेरे आफिस में एक लड़का है। लड़का

अच्छा और समझदार है। पिताजी रिटायर है पर उनकी पेंशन नहीं है। एक छोटी बहन है, अभी उसकी शादी नहीं हुई है,

उसकी मां नहीं है। घर की सारी जिम्मेदारी उसी के ऊपर है। उसका अपना घर है, लोन में लिया है, घर में सारी सुविधा तो

नहीं है। कह रहा था धीरे धीरे आवश्यकता अनुसार सामान जोड़ रहा हूॅं। अगर आप कहें तो मैं बात करूं?पर दिनेश बेटा

रीमा कैसे रह पाएगी? तुम उसके पापा से मिले हो क्या? हाॅं पापा, आफिस से जब कभी हम साथ निकलते हैं तो वो मुझे

कभी कभी अपने घर ले जाता है चाय नाश्ता कराने। पापा, उसके पापा और बहन बहुत ही व्यवहारिक है। पापा अगर बात

बन जाती है तो सब ठीक हो जाएगा। फिर रीमा भी नौकरी करती है। दोनों मिलकर काम करेंगे तो घर के हालात सुधार

जाएंगे।रीमा बेटा तुम बताओ।पापा मुझे कोई परेशानी नहीं है।ठीक है दिनेश, तुम उस लड़के से बात कर लो, फिर हम

उसके पापा से मिल लेंगे।दिनेश उस लड़के, संदीप, से रिश्ते की बात करता है। फिर दोनों परिवार मिलते हैं  और रिश्ता

पक्का हो जाता है। दो महीने बाद की शादी की तारीख निकलती है। रीमा आफिस के बाद ही अपनी बहन और भाभी के साथ

शादी की खरीदारी के लिए निकल जाती। दिनेश और उसके पापा शादी के कार्ड की और बाकी की खरीदारी में व्यस्त हो

गए।दो महीने कब निकल गये, पता ही नहीं चला। शादी का दिन भी आ गया। बारात के स्वागत के लिए सब खड़े थे। सभी

रिश्तेदार कह रहें थे कि दीनदयाल जी ने कम समय में कितनी अच्छी तैयारी कर ली। दोनों लड़कियों की शादी बहुत अच्छे

से कर दी। बेटियों को सब कुछ दिया पर बेटे की शादी में एक पैसा भी नहीं लिया। तभी वहॉं निधि के पापा बोले, ऐसा कैसे

नहीं लिया। मैंने पूरे पाॅंंच लाख दहेज में दिऐ हैं।यह सुन कर किसी को भी विश्वास नहीं हुआ। तभी किसी ने कहा, हम नहीं

मानते। दीनदयाल बहुत स्वाभिमानी हैं, आज तक उन्होंने किसी से एक पैसा भी नहीं लिया। वो जो भी कुछ काम करते हैं

अपनी हैसियत के हिसाब से करते हैं। हम ये सब नहीं मानते।आप लोगों के मानने न मानने से क्या होता है? जो चीज मैंने

दी है, मैं तो बोलूंगा ही।सब लोग चुप हो गये, कोई कुछ नहीं बोला। शादी अच्छे से सम्पन हो गयी। पर दहेज वाली बात

किसी तरह दीनदयाल जी के कानों तक पहुँच गयी। उन्हें बहुत ही गुस्सा आया। जब ये बात उन्होंने ललिता जी को बताई तो

वह बोली, लोगों को बोलने दो ये बात, हम लोग जानते हैं और निधि भी जानती है। किसी और के बोलने से हमें कोई फर्क

नहीं पड़ता।मुझे फर्क पड़ता है। जो चीज मैंने किया ही नहीं तो उस की बदनामी क्यों लूं।तो तुम क्या बहु को परेशान

करोगे?देखते रहो मैं क्या करता हूॅं।रिया बेटा, तुम ही पापा को समझाओ इसमें निधि बहु कि क्या गलती है।मम्मी,

गलती तो पापा की भी नहीं है। पापा के स्वाभिमान को ठेस पहुंचा है। मैं पापा से बात करती हूॅं, और फिर दिनेश और निधि

से भी बात करूंगी।रिया पापा के पास जाती है और पापा को समझती है। बेटा तुम बताओ मैंने कब लिया निधि के पापा से

दहेज। उसके पापा सबसे कहते फिर रहे हैं कि मैंने उनसे दहेज में पाॅंंच लाख रुपए लिए है।पापा ये सब आप से किसने

कहा?बेटा आज मेरी सारी रिश्तेदारी में थू – थू हो रही है। जिस दिन रीमा की शादी थी उस दिन निधि के पापा ने सब

रिश्तेदारों को कहा।पापा ऐसा नहीं हो सकता। मैं अभी दिनेश और निधि को बुलाती हूॅं।निधि, क्या मेरे पापा ने तुम्हारे

पापा से दहेज में पैसे मांगे थे?दीदी आप ये क्या कह रही हो?दिनेश गुस्से में पूछता है।दिनेश तुम चुप रहो, मैं निधि से

बात कर रही हूॅं। बताओ निधि।नहीं दीदी। पापा जी ने तो दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था।फिर क्यों तुम्हारे पापा

सब रिश्तेदारों में कहते फिर रहे हैं कि पापा ने दहेज मांगा था?दीदी मुझे कुछ नहीं पता। मैं अभी पापा से बात करती

हूॅं।दिनेश ने निधि को रोकते हुए बोला, निधि रुको, मैं फोन कर के ससुर जी को यहाॅं बुलाता हूॅं। यह मेरे पिता के

स्वाभिमान की बात है। रीमा के और तुम्हारे सुसराल वाला को भी बुलाता हूॅं, ताकि सब के सामने ये बात साफ हो जाए

कि मेरे पापा ने कोई दहेज के पैसे नहीं लिए हैं।दिनेश सब को फोन कर के घर बुलाता है। सब लोग दीनदयाल जी के घर

आते हैं। तब दिनेश कहता है, मैं आप सब से माफी मांगता हूॅं कि मैंने आप सब को परेशान किया। आज मेरे पिता के

स्वाभिमान की बात है। निधि तुम अपने पापा से पूछोगी या मैं पूछूं?दिनेश मैं बात करती हूॅं। पापा, क्या मेरे सुसराल वालों

ने आप से दहेज मांगा था नहीं बेटा, तुम ऐसा क्यों बोल रही हो। समधी जी ने तो साफ मना कर दिया था कि हमें कुछ भी

नहीं चाहिए। फिर मैंने वो पैसे तुम्हें दे दिये थे।तो फिर आप क्यों सब को बोलते फिर रहे हैं कि इन्होंने आप से दहेज मांगा।

आप ने तो अपनी ही बेटी का जीवन नरक बना दिया।निधि मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी। आज मैंने अपनी ही गलती से

अपनी ही बेटी का घर उजाड़ दिया था। आप सब मुझे माफ कर दो। मैंने समधी जी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई।जी,

पिता का स्वाभिमान ही हमारा आत्म सम्मान है। मैं आप सब से हाथ जोड़ कर विनिती करता हूॅं कृपया मेरे पिता की

गरिमा बनाए रखें।दिनेश बेटा, आगे मुझसे ऐसी गलती नहीं होगी। मैं अपने किए पर बहुत शर्मिन्दा हूं।तभी रिया आकर

बोली, खाना बन गया है, आज हम सब साथ मिलकर खाना खाएंगे। ऐसे साथ बैठ कर खाने का मौका बहुत कम मिलता

है।दीनदयाल जी भी बोले, बेटा तुमने ठीक बोला, चलो सब मिलकर खाना खाते हैं।

बिमला रावत जड़धारी

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