पिता का स्वाभिमान – तोषिका

अपने *पिता का स्वाभिमान* हमेशा रखना बेटा। तुम्हारे पिताजी बोलेंगे कुछ नहीं, पर तुम उनका ध्यान रखना। अपने बेटे केशव के सर पर हाथ फेरती हुई हीना बोली।

अगले दिन जब वो सुबह सुबह उठा और हॉस्पिटल जाने की तैयारी कर ही रहा था कि उसके पिताजी माधव का उसको कॉल आया। उस कॉल को देख कर उसके मन में अलग सी बेचैनी आई और वो उस को उठाने से हिचकिचा रहा था पर हिम्मत करते हुए अपने कांपते हाथों से उसने फोन को उठाया और बोला “हेलो! प्रणाम पिताजी” उधर से एक भारी और सख्त आवाज आई और उन्होंने वो बोल दिया जो कही न कही केशव को पता था पर सुनना नहीं चाहता था। उसके पिताजी बोले “बेटा, तुम्हारी मां हम सब को छोड़ कर कल रात को ही चल बसी”।

उस वक्त उस शण केशव रोना चाहता था, चीखना चाहता था, अपनी मां से एक बार बात करना चाहता था, पूछना चाहता था कि मां तुम इतनी हिम्मत वाली हो कर भी एक कैंसर जैसी बीमारी से कैसे हार गई। उसके मन में काफी भूचाल चल रहा था पर वो कुछ कह नहीं पाया क्योंकि उसको अपनी मां के पिछली रात के बोले हुए शब्द याद थे, और उनकी आखिरी इच्छा भी थी वो। साथ ही में उसको पता था कि उसके पिता भी मन ही मन रो रहे होंगे पर दिखाएंगे नहीं। इसीलिए केशव ने बस एक वाक्य पूछा और वो था “पिताजी, अब मां को कोई दर्द नहीं हो रहा होगा ना?”

इस पर माधव थोड़ा चौंका पर उसने बोला “बेटा, तुम्हारी मां का सफर शायद यही तक था और अब शायद उसको सारे दर्दों से आराम भी मिल गया होगा।”

वो समय बहुत कठिन था दोनों के लिए पर दोनों एक दूसरे के लिए ढाल बनकर खड़े थे। अकेले में दोनों रोते थे पर सामने एक दूसरे को कुछ भी नहीं जताते थे। दिन से महीने और महीनों से साल बीते, माधव ने दूसरी शादी नहीं की और केशव के ऊपर सारी जिंदगी न्योछावर कर दी उधर केशव ने भी कभी अपने पिताजी को शिकायत का मौका नहीं दिया। पढ़ाई में वो हमेशा अव्वल आता था और दूसरी चीजों में भी वो सबसे आगे था। केशव अब शादी की उमर का हो चुका था। उसने अपने पिताजी की पसंद की लड़की से शादी भी की, अब उसके खुद के बच्चे भी थे और माधव बूढ़ा हो गया था। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब केशव को परीक्षा देनी पड़ी।

केशव की बीवी केशव से कहती है कि “सुनो जी! आज हमारे बेटे का 2 जन्मदिन है, हम पूरा परिवार बाहर खाने चले?” केशव ने बोला “हां चलते है, एक बार मैं पिताजी को भी बता देता हू, वो त्यार रहेंगे।”

केशव की बीवी बोली “तुम्हे पता तो है, पिताजी से अब खुद से चला भी नहीं जाता है। सारा दिन उनका ध्यान रखना पड़ेगा, हमें अपने बच्चे का भी ध्यान रखना है, वो छोटा है अभी।”

केशव ये सब सुन कर झल्ला उठा और बोला “तुम जानती भी हो, पिताजी ने बचपन से मेरे लिए इतना कुछ किया है और मां के जाने के बाद भी उन्होंने हमेशा मेरा और मेरी चीजों का ध्यान रखा। अब जब उनको मेरी जरूरत है, और मेरा फ़र्ज़ है उनका ध्यान रखने का तो तुम कह रही हो कि मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी ना करूं?”

शाम को पूरा परिवार बड़े से रेस्टोरेंट में खाना खाने गए, शुरू शुरू में सब अच्छा चल रहा था लेकिन उधर केशव की बीवी को दोपहर की बात याद थी और उसको लगा कि माधव की वजह से केशव उस पर चिल्लाया था, तो उसने जान कर माधव के हाथ को धक्का मारा और उनके हाथ से पानी का गिलास गिर गया, जिसके चलते माधव के सारे कपड़े भीग गए।  ये सब कर कर वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी और सब की नज़रे उनकी तरफ थी, लेकिन अपने पिताजी पर चिल्लाने की जगह वो बड़े आराम से अपनी कुर्सी से उठा और तौलिए से उनके कपड़े साफ किए, साथ ही में उसने एक वेटर को बुला कर उसको पैसे दिए और नया कुर्ता लाने को कहा। सब उसको देख रहे थे और ये सब देख कर माधव बोला “बेटा मुझे माफ कर दो मेरी वजह से तुम्हे इतनी शर्मिंदगी सहनी पड़ रही है”। केशव की आँखें भर आई और उसने बोला “पिताजी आप क्यों माफी मांग रहे है, आपकी कोई गलती नहीं है। बचपन में अपने कितनी बार मुझे गिर कर दुबारा उठना सिखाया, यह तक की मां के जाने के बाद भी अपने पूरी कोशिश की मुझे मां की कमी कभी महसूस ना हो, तो इस बार मेरा फ़र्ज़ है और आप मुझसे माफी मांग कर, ये फ़र्ज़ नहीं चीन सकते।”

उसको दूर से अपनी मां हीना की झलक दिखी, जो उसको मुस्कुरा कर शाबाशी दे रही थी कि उसने अपनी मां से किया हुआ वादा कभी नहीं भूला।

ना जाने कैसे पर, केशव की बीवी को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने खुद आकर अपनी गलतियों की माफी माधव से मांगी और माधव के आशीर्वाद लिया।

लेखिका – तोषिका

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