यजमान को बुलाइए कन्यादान की रस्म करनी है पंडित त्रिभुवन प्रसाद की आवाज गूंज उठी और सबकी निगाहें वधू शिवांगी के पिता दिनकर जी को ढूंढने लगीं।
विशाल शानदार शामियाना लंबी लंबी कनातें दूधिया रोशनी में सतरंगी आभा बिखेर रहीं थीं। पीले गुलाबी लाल सुर्ख गुलाब से लेकर बसंती गेंदे शुभ्र सेवंती की लटकने गुच्छों में आबद्ध हो मनमोहक वातावरण की छटा सजा रहीं थीं।शहनाई की मीठी मधुर धुन फिजाओं में घुल कर हर दिल को वैवाहिक कार्यक्रम में तल्लीन कर रहीं थीं।चुस्त दुरुस्त लड़के लड़कियां विविध सुस्वादु व्यंजनों की ट्रे सजाए हर आगंतुक की सेवा में मगन थे।दिनकर जी सफेद चूड़ीदार ,काली अचकन और सुर्ख पग्गड़ में सजे संवरे अतिथि सत्कार में जुटे थे।अति व्यस्तता में भी उनका पूरा ध्यान बेटी शिवांगी पर ही था।नाज था उन्हें अपनी बेटी पर।शिक्षा संस्कार और तमीज सब था उनकी बेटी में।आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया था उन्होंने अपनी बेटी को।पंडितजी की आवाज पर वह बेटी के पास आ गए।
“पंडित जी …..मैं अपनी कन्या का दान नहीं करना चाहता” दिनकर जी की धीमी किंतु दृढ़ आवाज ने पंडाल में कोलाहल और कौतूहल को गर्मा दिया।
कैसी बातें कर रहे हैं जी आप। बेटी है तो कन्यादान तो हमें करना ही पड़ेगा ये तो पुण्य का काम है।सबके सामने तमाशा मत बनाइए पत्नी रेवती जी लपक कर उनके पास पहुंच गईं।
नहीं रेवती मैंने अपनी बेटी शिवांगी को उच्च शिक्षिता बनाया है अपने पैरों पर खड़ी करवाया है वह स्वयं समर्थ है वह कोई वस्तु नहीं है वह कोई मूक गाय नहीं है कि उसकी गर्दन झुका दान कर दूं दिनकर जी शिवांगी की चिंतातुर दृष्टि से दृष्टि मिला दृढ़ स्वर में कह उठे।
यजमान सदियों की परम्परा है आपके कहने से तो बदल नहीं जाएगी।कन्या का दान होता आ रहा है होता रहेगा आप कन्या के जिम्मेदार पिता होने का फर्ज करिए हमारे पूर्वजों ने जो परंपराएं रस्मे बनाई हैं उन पर प्रश्न उठाना उनका निरादर करना है आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी पंडित जी का आक्रोशित स्वर थोड़ा उग्र हो चला था।
सुनिए जी तमाशा काहे कर रहे हैं आखिर हम लड़की वाले हैं ।सब लोग क्या कहेंगे।दामाद जी आपको ही देख रहे हैं।चुपचाप जैसा पंडितजी कह रहे है करने के लिए करिए रेवती जी कन्यादान की पूरी तैयारी करती समझाती बोल उठीं।
पूरे पंडाल में फुसफुसाहटों के स्वर तेज हो गए।आपत्ति करने वालों की बाढ़ आ गई।
कन्यादान नहीं करना है तो क्या वर का दान करेंगे।शादी ही क्यों कर रहे हैं।लड़की वाले हैं भूल गए क्या।लड़की दे रहे हो ….जितने मुंह उतने स्वर।
आपको कन्यादान रस्म से इतना एतराज क्यों है दिनकर भाई साब क्या आपको पूर्वजों और उनकी बनाई परंपराओं पर आदर नहीं है एक रिश्तेदार ने बीच बचाव करते हुए माहौल अनुकूल बनाने का यत्न किया।
पूर्वजों के आदर निरादर की बात ही नहीं है भाई।मुझे तो बस कन्यादान के उस मूल तत्व पर एतराज है जो मेरी ही नहीं सभी बेटियों को दान की वस्तु बना देती हैं जो शादी के बाद खूंटे में बंधी गाय की तरह अपनी इच्छाओं का गला घोंट देती है।जैसा कहा जाता है वैसा ही करने को बाध्य हो जाती हैं।मुझे एतराज है इस कन्यादान से जो कन्या के जन्मदाता माता पिता को अपनी ही बेटी से शादी के बाद सारे संबंध छोड़ने को बाध्य कर देते हैं।जो रोक देते हैं उस पिता को अपनी ही बेटी पर शादी के बाद होने वाले अत्याचार का विरोध करने से जिनके लिए उनकी बेटी मात्र लड़की ना होकर उनका स्वाभिमान होती है।ऐसी रस्म से एतराज है मुझे जो बेटी को अपने ही माता पिता के घर आने जाने पर रुकावट लगा देती है जो शादी के बाद उसे एक बेटी के अधिकार से अपने ही मां पिता के लिए कुछ भी करने से रोक देती है।यह रस्म ही अपनी बेटी को अपने घर में पराया कर देती है दिनकर जी के दोनों हाथ जुड़े थे और उनके अकाट्य तर्क हवाओं में गूंज उठे थे जो शिवांगी के कानों से होकर दिल में उतर गए थे।अपने पिता के लिए उसके मन में अपार श्रद्धा उमड़ आई थी।
पिता जी कितनी गहरी सोच रखते हैं।मेरे पिता जी की सोच कितनी उदार है सोच कर वह गर्व से भर गई और उसने पार्श्व में बैठे अपने भावी पति शिवेश की तरफ देखा।उन नजरों में शिवेश की अपने पिता की बातों के प्रति सहमति की उम्मीद थी समर्थन की आकांक्षा थी जिसे शिवेश ने नजरें मिलते ही भांप लिया।
पंडितजी पिता जी एकदम सही कहते हैं।ऐसी रस्में जो किसी को हीनता का बोध कराए उसे जंजीरों में जकड़ दें उन पर मुझे भी एतराज है।बेटी किसी वस्तु की तरह नहीं किसी इंसान की तरह ही होती है शादी के बाद भी उसका अपना स्वतंत्र वजूद होना चाहिए किसी रस्म को इतनी इजाजत नहीं कि उसके अस्तित्व पर प्रतिबंध लगा दे ।उसके स्वाभिमान को कुचल सकें कि वह अपने अधिकारों के हनन पर खामोश रह जाए।पंडितजी मैं भी चाहूंगा कि आप इस रस्म को बदल दें शिवेश ने हाथ जोड़कर खड़े दिनकर जी के दोनों हाथों को अपने हाथों में पकड़ते हुए दृढ़ता से जब अपनी बात कही तो अचानक सारी फुसफुसाहट पर विराम लग गया।शिवांगी की नजरों में शिवेश के लिए विशेष अनुराग के साथ सम्मान जाग उठा था।
शिवेश के दृढ़ प्रभावशाली शब्दों ने सबकी आपत्तियों पर ताला जड़ दिया था।
लड़के वालो का पक्ष विवाह में सबसे मजबूत होता है।वे जैसा कह दें जो चाह लें सब स्वीकार्य होता है।लड़के वालो के पास मानो वह शक्ति वह सामर्थ्य आ जाती है जो रस्म बदल सकती है।जो वजन लड़की वालो अर्थात दिनकर जी के बार बार कहने पर भी बेअसर हो रहा था आलोचनाओं का केंद्रबिंदु बना हुआ था अचानक शिवेश के कहने पर वजनदार हो गया प्रशंसा का हकदार हो गया।आज शक्ति लड़केवालों के हाथ में थी।लड़की वाले अपनी बात कहने के अधिकारी भले ही थे लेकिन उस पर मुहर लगाई थी लड़केवालों ने।चारों तरफ से साधुवाद साधुवाद की आवाजें आने लगीं।
अब किसी को कोई आपत्ति नहीं थी।
तो ठीक है यजमान जैसा आप कहें हमे क्या।वैसे भी समय के अनुसार रस्मों और रीतियों में सकारात्मक परिवर्तन आवश्यक होता है।जब आप दोनों परिवार रजामंद हैं तो फिर आइए वर वधू दोनों के हाथों के साथ आप माता पिता भी अपने हाथों को लाइए साथ में रखिए।परस्पर समान बनाए रखने की दोनों पक्षों द्वारा दोनों पक्षों के प्रति बराबरी का,सम्मान का अपनी बाते कहने का वादा करने की रस्म होगी अब… पंडितजी ने अत्यंत उत्साह से आसन के पास सभी को बुलाने का आव्हान करते हुए कहा तो हर्ष की लहर पूरे पंडाल में तैर गई।
सही बात का भी समर्थन करने के लिए हिम्मत होनी चाहिए।भीतर का डर अकेले व्यक्ति को दबोच लेता है।सार्वजनिक सम्मति ने सभी की हिम्मत बढ़ा दी थी।
जुड़े हुए हाथ अब मिल गए थे और साथ बढ़ते हुए हाथ मानो एक नए रिवाज एक नए परिवर्तन की ओर बढ़ रहे थे।
पिता का स्वाभिमान#कहानी प्रतियोगिता