“पापा,ये माथे पे चोट आपको कैसे लगी?”प्रिशा ने परेशान होकर बोला।
“कुछ नहीं बेटा,बस ऐसे ही वो रोहित की दुकान पर समान लेने गया था तो मुड़ते समय दीवार से टकरा गया था।” रमेश जी ने बात बनाते हुए बोला।
“पापा आप झूठ बोल रहें हैं,दीवार के टकराने से इतना गहरा जख्म नहीं होता।सच बताइए आपको क्या हुआ?आपको मेरी कसम।”बेटी ने अपनी कसम दे दी तो रमेश जी को सच बताना पड़ा।
“बेटा,दुकान में माल खत्म हो गया था इसलिए मैं रोहित की दुकान पर गया था।उससे बोला कि थोड़ा माल दे दे तो उसने मुझे धक्का देकर कहा,कि बाद में आना अभी मेरे पास समय नहीं है।मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं गिर गया।वहां और भी ग्राहक खड़े थे इसलिए मैंने बोलना उचित नहीं समझा और घर आ गया।”
“उस रोहित की आज इतनी हिम्मत बड़ गई कि आपको यानि अपने ताया जी को एक तो सबके सामने बेइज्जत किया और ऊपर से धक्का भी दिया।पापा आज तो मैं चुप नहीं रहूंगी इस रोहित को इसकी औकात दिखाकर रहूंगी। पहले चलिए आपको दवाखाने लेकर चलती हूं।”प्रिशा गुस्से से कांपते हुए बोली।
“जाने दे बेटा बेकार में बात बड़ जाएगी।”
“बात तो बड़ चुकी है।पापा आप मेरा वो गुरुर हैं जिसे कोई भी कभी भी नहीं तोड़ सकता..और जो तोड़ने की कोशिश करेगा उसे तो मैं छोडूंगी नहीं।”कहकर प्रिशा पहले अपने पापा को डॉक्टर के पास ले गई।
किसी समय रमेश जी दवाइयों के होल सेल डीलर हुआ करते थे।उनका व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा था।एक बेटी थी,घर में किसी चीज की कमी नहीं थी ईश्वर का दिया सब कुछ था।
रमेश जी घर के बड़े बेटे थे पिता जल्दी ही साथ छोड़कर चले गए थे इसलिए परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पे आ गई।उनकी इंजीनियर बनने की चाहत अधूरी रह गई।दवाइयों का काम शुरू किया वो अच्छा चलने लगा।अपनी शादी की,छोटे भाई को पढ़ाया लिखाया और उसकी शादी की।छोटे भाई की नौकरी दूसरे शहर में लग गई थी।वो अपने परिवार सहित वहां शिफ्ट हो गया।कुछ समय बाद रमेश जी की माँ भी चल बसी।
रमेश जी का काम अच्छा चलने लगा वो अब दवाइयों के होल सेल डीलर बन गए थे।बेटी प्रिशा भी इंजीनियर बन गई थी।प्रिशा की आई टी कम्पनी में नौकरी लग गई।अच्छा घर परिवार देखकर रमेश जी ने उसकी शादी कर दी।
रमेश जी के छोटे भाई का भी एक ही बेटा था।माता-पिता के लाड प्यार की वजह से वो इतना बिगड़ गया था, कि पढ़ाई लिखाई से उसका कोई लेना देना नहीं था बस दिनभर आवारागर्दी करना यही उसका काम था।रमेश जी के भाई ने जब उनसे बेटे को लेकर अपनी चिंता जाहिर की तो वो बोले कि बेटे को मेरे पास भेज दो मैं उसे अपने काम में लगा लूंगा।
रमेश जी के भाई ने अपने बेटे रोहित को उनके पास भेज दिया।रमेश जी और उनकी पत्नी रोहित को अपने बेटे की ही तरह प्यार करते थे।रोहित रमेश जी के साथ रोज काम पर जाने लगा।धीरे धीरे उसने बिजनेस के सारे गुर सीख लिए और अपना अलग काम शुरू कर दिया..घर भी अलग ले लिया।रमेश जी कुछ नहीं बोले।उनके सारे ग्राहकों पर भी रोहित ने कब्जा कर लिया।वो अब होल सेल डीलर बन गया और रमेश जी की दुकान में थोड़ा बहुत समान रह गया था,जिसे बेचकर वो अपना गुजारा कर रहे थे।रमेश जी ने अपने घर के ऊपर के पोर्शन को किराए पे दे रखा था।उससे भी उन्हें काफी मदद मिल जाती थी।पति पत्नी दोनो का गुजारा ठीक ठाक से हो जाता था।रमेश जी का भाई तो खुश था क्योंकि उसका खोटा सिक्का चल पड़ा था।उसने रोहित की शादी कर दी।रोहित तो सेठ बन गया था।
प्रिशा की माँ तो बहुत सीधी थी वो बेचारी पति से कुछ नहीं कहती पर प्रिशा जब भी मायके आती तब बहुत कलपती,कि पापा क्यों आपने अपने भतीजे पर इतना विश्वास किया?क्यों उसको अपने पास बुलाया?
रमेश जी बेचारे यही कहते -“मैंने तो बस हमेशा से अपनों का भला चाहा।और मेरा तो गुजारा चल रहा है ना और क्या चाहिए?”
प्रिशा बेचारी पापा की बात सुनकर चुप हो जाती और इसे विधि का विधान का समझकर तसल्ली कर लेती।
रमेश जी को दुकान का समान के लिए रोहित के पास ही जाना पड़ता था।
इस बार प्रिशा की माँ की तबियत ठीक नहीं थी इसलिए वो मायके आई हुई थी।
“पापा को पट्टी करवाकर और इंजेक्शन लगवाकर प्रिशा घर आई और बोली-“पापा,आप आराम करो मैं रोहित से बात करके आती हूं।”
“प्रिशा बेटा,अभी मत जा तू गुस्से में है कल आराम से बात कर लेना।”प्रिशा के माँ और पापा दोनों एक साथ बोले।
“लोहा जब गरम हो तभी चोट मारनी चाहिए।”कहकर प्रिशा घर से निकल पड़ी।
रोहित की दुकान पर पहुंचकर प्रिशा गुस्से से चिल्लाते हुए बोली -“रोहित तू अपने आप को क्या समझता है?कभी भी किसी का अपमान कर देगा?तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा?”
“दीदी,मैं आपका मतलब समझा नहीं।आओ बैठो आराम से बात करते हैं।”रोहित ग्राहकों से नजर बचाते हुए बोला।
“मैं यहां बैठने नहीं आई हूं तुझे तेरी औकात बताने आईं हूं।पिता जैसे ताया जी का अपमान करते हुए तुझे जरा शर्म नहीं आई।तेरे पिता ने तो निकम्मा कहकर तुझे घर से निकाल दिया था।मेरे पापा ने ना सिर्फ तुझे सहारा और पिता जैसा प्यार दिया बल्कि अपनी मेहनत से स्थापित किया व्यापार भी तुझे सौंप दिया।एक तो तूने उनका सब कुछ हथिया लिया और अब वो तुझसे समान मांगने आते हैं तो तू ये कहकर उन्हें धक्का दे देता है,कि बाद में आना अभी मेरे पास समय नहीं है।मेरे पापा ने जिंदगी भर सबको अपने हाथों से दिया..कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।वो मेरा ही नहीं पूरे परिवार का गुरुर हैं..तूने आज उस गुरुर को तोड़ने की कोशिश की है..पर याद रख जब तक मैं जिंदा हूं मेरे पिता के स्वाभिमान को कोई भी ठेस नहीं पहुंचा सकता।और जो ऐसा करने की हिमाकत करेगा मैं उसे छोडूंगी नहीं समझा।” प्रिशा को यूं चिल्लाते हुए देख सारे ग्राहक एक एक करके वहां से जाने लगे।
“दीदी,आप ये बातें घर पर आकर भी तो कर सकतीं थीं।मेरे कस्टमर क्या सोचेंगे मेरे बारे में?”
“जब मेरे पापा को धक्का दिया था तब नहीं सोचा था,कि कस्टमर क्या सोचेंगे?पता भी है उनको माथे पे कितनी गहरी चोट आई है।वैसे अच्छा ही हुआ जो आज सबको तेरी सच्चाई पता चल गई।”
“क्या?ताया जी को माथे पे चोट लगी है।”
“जी हां।” प्रिशा गुस्से से तमतमाती हुए अपने घर आ गई।पीछे पीछे रोहित भी आ गया और रमेश जी के पैर पकड़ते हुए बोला-“ताया जी मुझे माफ कर दीजिए मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।अब से आपको ना तो मेरी दुकान पर समान मांगने की आना पड़ेगा ना ही अपनी दुकान पर बैठना पड़ेगा।अब आप घर पे आराम से रहिए और अपना व ताई जी का ख्याल रखिए।महीने का सारा खर्च मैं उठाऊंगा।आपने पिता का फर्ज निभाया अब मेरी बारी है बेटे का फर्ज निभाने की।प्लीज मना नहीं करना।”
रमेश जी और उनकी पत्नी दोनों ही बेचारे सीधे व सरल थे।सारे बातों को भुलाकर उन्होंने रोहित को गले से लगा लिया।पर प्रिशा को अभी भी रोहित पर विश्वास नहीं हो रहा था।वो उसे आंखें दिखाते हुए बोली-
“देख रोहित,जो तूने कहा है ना उसपर अमल करना,मेरे जाते ही बदल मत जाना.. वरना..।”
“दीदी,मैं पहले ही बहुत शर्मिंदा आप मुझे और शर्मिंदा न करो।”रोहित प्रिशा के पैर पड़ते हुए बोला।
“और पापा,आप चिंता मत करना….मैं हूं ना।”प्रिशा ने पिता को सांत्वना दी।
सबने मिलकर साथ खाना खाया और रिश्तों की एक नई शुरुआत की।
दोस्तों बेटा हो या बेटी उनके लिए पिता का स्वाभिमान सबसे ऊपर होना चाहिए और उसकी रक्षा करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।।क्योंकि जब स्वाभिमान को ठेस लगती है तो इंसान अंदर से टूट जाता है।
कमलेश आहूजा
साप्ताहिक कहानी प्रतियोगिता “पिता का स्वाभिमान ”