उम्मीद का धागा
आरुषि के लिए जैसे वक्त ठहर सा गया था। कमरे में मद्धिम उजाला था और वह चुपचाप अपनी हथेलियों की लकीरों को घूरती हुई बैठी थी। तभी दरवाजे की कुंडी झटके से बजी और उसकी बचपन की सहेली नैना बिना किसी औपचारिक इजाजत के भीतर दाखिल हो गई। उसके चेहरे पर रोज की तरह वही … Read more