अनकहा इश्क़

शादी के बाद सिद्धार्थ ने अपनी ज़िम्मेदारियाँ तो पूरी कीं, लेकिन वह अपना दिल अनुराधा को कभी नहीं दे पाया। उसने अनुराधा के साथ एक समझौता सा कर लिया था। उसे लगता था कि वह काव्या के सपनों को अनुराधा पर थोप कर अपनी कसक मिटा रहा है। काव्या का सपना था कि उसका पति … Read more

अपनी माटी, अपना आंगन

 कौशल्या जी ने चौंककर अपनी आँखें खोलीं और अनिरुद्ध के कंधे के ऊपर से देखा। सामने उनकी बहू क्लारा खड़ी थी। लेकिन यह वो क्लारा नहीं थी जिसकी कल्पना कौशल्या जी ने की थी। क्लारा ने एक बहुत ही सुंदर सूती सलवार-कमीज़ पहनी हुई थी। उसके सुनहरे बालों पर लाल रंग का दुपट्टा बहुत ही … Read more

खामोश चीख

 “किस मिट्टी की बनी हुई हो तुम शिखा?” अविनाश की आवाज अब शांत थी, लेकिन यह उस तूफान के बाद की शांति थी जो सब कुछ तबाह कर चुकी थी। “इतने सालों से मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूं। तुम्हारी हर महत्वाकांक्षा, तुम्हारी हर आज़ादी का मैंने जश्न मनाया है। मैंने तुम्हारी हर जिद, हर … Read more

अन्नपूर्णा का स्पर्श

“माँ…” साकेत का गला थोड़ा भर्राया हुआ था। “पिछले कुछ सालों में मैंने दुनिया भर के व्यंजन खाए। मुझे लगने लगा था कि मुझे अब हमारे घर का वो सादा खाना कभी पसंद नहीं आएगा। मुझे लगता था कि मैं आगे बढ़ गया हूँ। पर आज तुम्हारी बनाई इस दाल-रोटी ने मुझे एहसास दिलाया है … Read more

मृगतृष्णा

गुलमोहर अपार्टमेंट्स की ग्यारहवीं मंजिल पर रहने वाली सिम्मी , शहर की उन चुनिंदा महिलाओं में से एक थी जिन्हें देखकर किसी को भी ईर्ष्या हो जाए। वह और उसकी तीन अन्य सहेलियाँ—रोशनी, शिखा और तान्या—पूरी सोसाइटी में आकर्षण का केंद्र थीं। उनकी ज़िंदगी किसी हॉलीवुड फिल्म के सीन जैसी लगती थी। वे जब भी … Read more

इंतज़ार के वे खामोश पल

“साहब, बुढ़ापा बहुत अजीब होता है। इंसान का शरीर तो बूढ़ा हो जाता है, लेकिन उसका दिल बिल्कुल एक छोटे बच्चे जैसा हो जाता है। जैसे बच्चों को हर वक़्त प्यार, दुलार और अपनेपन की ज़रूरत होती है, वैसे ही इन बुजुर्गों को भी होती है। पैसे से आप इनके लिए अच्छा बिस्तर तो ला … Read more

अस्तित्व की धूप

छत पर पहुँचते ही शालिनी ने मीरा का हाथ पकड़ लिया और एक गहरी साँस लेते हुए बोली, “मीरा, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तू साबित क्या करना चाहती है? कल ही तो वकीलों से बात हुई थी। तूने खुद कहा था कि अब तू विकास के साथ एक पल भी नहीं … Read more

इंतज़ार के रंग

 मीरा का गला भर आया। उसके पास इस मासूम सवाल का कोई तार्किक जवाब नहीं था। उसने बस आरव को अपने सीने से लगा लिया और उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “पापा के समय को खरीदने की जरूरत नहीं है मेरे बच्चे। तुम उनकी जान हो। वो तुमसे बहुत प्यार करते हैं, बस अपनी … Read more

रिश्तों की बदलती छाँव

 एक दिन शाम को जब स्नेहा ऑफिस में एक जरूरी मीटिंग के कारण लेट हो गई, तो घर पहुँचते ही उसे सावित्री जी के तीखे व्यंग्य सुनने पड़े। “नौकरी करने का यह मतलब थोड़ी है कि घर-परिवार को भूल जाओ। हम भी तो अपने ज़माने में काम करते थे, लेकिन घर के चूल्हे-चौके से कभी … Read more

सुहाग की निशानी: एक अनकहा बलिदान

मेरे बुटीक में पिछले पांच सालों से काम करने वाली रमा सिर्फ मेरी कर्मचारी नहीं, बल्कि मेरे परिवार के एक सदस्य जैसी हो गई थी। रमा के हाथों में जादू था। वह कपड़ों पर कढ़ाई का ऐसा बारीक और खूबसूरत काम करती थी कि बड़े-बड़े डिज़ाइनर भी उसकी कला के आगे फीके पड़ जाएं। वह … Read more

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