कौशल्या जी ने चौंककर अपनी आँखें खोलीं और अनिरुद्ध के कंधे के ऊपर से देखा। सामने उनकी बहू क्लारा खड़ी थी। लेकिन यह वो क्लारा नहीं थी जिसकी कल्पना कौशल्या जी ने की थी। क्लारा ने एक बहुत ही सुंदर सूती सलवार-कमीज़ पहनी हुई थी। उसके सुनहरे बालों पर लाल रंग का दुपट्टा बहुत ही सलीके से ओढ़ा हुआ था। माथे पर एक छोटी सी बिंदी थी और सबसे बड़ी बात, वह झुककर कौशल्या जी के पैर छू रही थी।
कौशल्या जी का हृदय गदगद हो उठा। उनके सारे डर, सारी आशंकाएं एक पल में धुल गईं। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर क्लारा को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। क्लारा की आँखों में भी सम्मान और अपनत्व के भाव थे। उसने टूटी-फूटी लेकिन प्यार भरी हिंदी में कहा, “मैं आपसे मिलने के लिए बहुत इंतज़ार किया माँ जी। अनिरुद्ध मुझे आपके बारे में बहुत बताता था।”
सर्दियों की गुनगुनी धूप आँगन में पसरी हुई थी। कौशल्या जी तुलसी के चौरे के पास बैठी, हाथ में ऊन की सिलाई लिए कुछ बुन रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार मुख्य दरवाज़े की तरफ उठ जाती थीं। उनके हाथों की गति थम सी गई थी और आँखों में एक अजीब सी शून्यता तैर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो शरीर से तो वहाँ मौजूद हैं, लेकिन उनका मन किसी और ही दुनिया में भटक रहा है।
तभी पड़ोस में रहने वाली उनकी सहेली और देवरानी जैसी सरला ने आवाज़ लगाई, “अरे जीजी! यह स्वेटर किसके लिए बुना जा रहा है और हाथ में ऊन लेकर किस गहरी सोच में डूब गई हो? मैं कब से आवाज़ लगा रही हूँ, तुम्हारा तो ध्यान ही नहीं है।”
कौशल्या जी एक झटके से अपनी सोच से बाहर आईं। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और एक फीकी सी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए बोलीं, “कुछ नहीं सरला, बस ऐसे ही पुराने दिन याद आ गए थे। उम्र हो गई है ना, तो ख्यालों में खो जाना आम बात है।”
सरला उनके करीब आकर मुढ़े पर बैठ गई और उनके हाथ से ऊन का गोला लेते हुए बोली, “मुझे मत बहकाओ जीजी। मैं तुम्हें बरसों से जानती हूँ। तुम्हारे चेहरे की यह उदासी कोई पुरानी याद नहीं, बल्कि कोई ताज़ा फिक्र है। सच-सच बताओ, क्या बात है? अनिरुद्ध का फोन आया था क्या?”
बेटे का नाम सुनते ही कौशल्या जी की आँखों में फिर से नमी आ गई। उन्होंने धीमी और भर्राई हुई आवाज़ में कहा, “हाँ, अनिरुद्ध का ही फोन आया था।”
“अरे वाह! फिर तो यह खुशी की बात है। क्या कह रहा था लल्ला? सब ठीक तो है ना वहाँ अमेरिका में?” सरला ने चहकते हुए पूछा।
“हाँ, सब ठीक है। कह रहा था कि अगले शुक्रवार को वो लोग यहाँ आ रहे हैं।” कौशल्या जी ने नज़रें झुका कर कहा।
सरला खुशी से उछल पड़ी, “अगले शुक्रवार! हे भगवान, यह तो बहुत बड़ी खुशखबरी है। पूरे पाँच साल बाद अनिरुद्ध घर आ रहा है। और इस बार तो वो अपनी विदेशी पत्नी और नन्हे बेटे को भी साथ ला रहा है। पर जीजी, तुम इतनी सुस्त और उदास क्यों हो? तुम्हें तो खुशी से झूमना चाहिए। तुम्हारा बेटा, बहू और पोता आ रहे हैं, इस घर में फिर से रौनक लौटेगी। तुम क्या सोच कर अपना दिल छोटा कर रही हो?”
कौशल्या जी ने एक लंबी साँस ली। उनके सीने में दबा हुआ दर्द शब्दों के रूप में बाहर आने लगा, “खुशी तो है सरला, लेकिन इस खुशी के पीछे का डर मुझे खाए जा रहा है। वो आएँगे, दस-पंद्रह दिन मेहमानों की तरह इस घर में रहेंगे। हमें एक झूठा मोह दिखाएंगे, हमारे साथ हँसेंगे-बोलेंगे और फिर वापस उसी पराए देश में उड़ जाएंगे। मैं इस उम्र में उस जुड़ाव और फिर से बिछड़ने के दर्द को कैसे सह पाऊँगी? उनका जीवन तो वहीं बस चुका है, यह घर तो उनके लिए बस एक हॉलिडे डेस्टिनेशन रह गया है।”
सरला ने कौशल्या जी का हाथ अपने हाथों में ले लिया और समझाते हुए बोली, “अरे जीजी, तुम भी ना, भविष्य की चिंताओं में आज की खुशी क्यों बर्बाद कर रही हो? वो जब जाएंगे तब की तब देखी जाएगी। फिलहाल तो तुम उनके स्वागत की तैयारी करो। सोचो, तुम्हारी बहू क्लारा और पोता पहली बार इस घर में, इस देश में आ रहे हैं। उनके लिए तुम्हें कितने सारे पकवान बनाने हैं। अनिरुद्ध को तुम्हारे हाथ के बेसन के लड्डू और गाजर का हलवा कितना पसंद है। क्या तुम अपने पोते को अपने हाथ का बना खाना नहीं खिलाओगी?”
कौशल्या जी के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई, “सरला, वो गिट-पिट अंग्रेजी बोलने वाली विदेशी मेम और उसका बेटा क्या जानेंगे हमारे भारतीय पकवानों का स्वाद? वो तो वहाँ पिज्जा और बर्गर खाने वाले लोग हैं। उन्हें क्या पता हमारे हिंदुस्तानी संस्कार, हमारे रीति-रिवाज और हमारे रिश्तों की गर्माहट क्या होती है? मुझे तो डर है कि कहीं उन्हें हमारे इस पुराने ढर्रे के घर में घुटन ना होने लगे। कहीं मेरी बहू मेरे पहनावे और मेरे रहन-सहन को देखकर मुँह ना बनाए। मैंने तो सुना है विदेशी लड़कियाँ बड़ों का सम्मान करना नहीं जानतीं।”
सरला ने उन्हें झकझोरते हुए कहा, “अरे जीजी, उठो और यह सब सोचना बंद करो। किसी को बिना मिले, बिना जाने उसके बारे में ऐसी राय नहीं बनाते। अनिरुद्ध हमारा बेटा है, उसकी पसंद पर इतना तो भरोसा रखो। चलो, उठो और घर की साफ-सफाई में लग जाओ। मुझे भी बताना, मैं भी मदद करवा दूँगी।”
कौशल्या जी ने एक ठंडी आह भरी और बुदबुदाईं, “हाँ, उठती हूँ।”
अगले कुछ दिन घर में दीवाली जैसी साफ-सफाई और तैयारियाँ चलती रहीं। कौशल्या जी ने अनिरुद्ध के कमरे को बिल्कुल वैसा ही सजाया जैसा वो छोड़कर गया था। रसोई में घी और मेवों की खुशबू महकने लगी। बेसन के लड्डू, मठरी, और तरह-तरह के व्यंजन बनाए गए। लेकिन इन सबके बीच कौशल्या जी का दिल धक-धक कर रहा था। उनके मन में क्लारा को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं।
शुक्रवार की सुबह से ही कौशल्या जी की आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं। दोपहर के करीब एक गाड़ी उनके घर के सामने आकर रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुलते ही सबसे पहले अनिरुद्ध बाहर निकला। पाँच सालों में वो थोड़ा बदल गया था, लेकिन उसकी आँखों में अपनी माँ के लिए जो प्यार था, वो आज भी वैसा ही था।
“माँ!” कहते हुए अनिरुद्ध दौड़कर आया और कौशल्या जी के गले से लग गया।
कौशल्या जी की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। सालों की तड़प, इंतज़ार और बेटे से दूर रहने का दर्द उन आँसुओं में बह निकला। बेटे को सीने से लगाकर उनके तपते हुए हृदय को जैसे एक पल में ही सावन की ठंडक मिल गई। अनिरुद्ध भी अपनी माँ के आँचल में सिर छिपाकर भावुक हो गया था।
तभी उनके कानों में एक बहुत ही मीठी और स्पष्ट आवाज़ सुनाई दी, “प्रणाम माँ जी।”
कौशल्या जी ने चौंककर अपनी आँखें खोलीं और अनिरुद्ध के कंधे के ऊपर से देखा। सामने उनकी बहू क्लारा खड़ी थी। लेकिन यह वो क्लारा नहीं थी जिसकी कल्पना कौशल्या जी ने की थी। क्लारा ने एक बहुत ही सुंदर सूती सलवार-कमीज़ पहनी हुई थी। उसके सुनहरे बालों पर लाल रंग का दुपट्टा बहुत ही सलीके से ओढ़ा हुआ था। माथे पर एक छोटी सी बिंदी थी और सबसे बड़ी बात, वह झुककर कौशल्या जी के पैर छू रही थी।
कौशल्या जी का हृदय गदगद हो उठा। उनके सारे डर, सारी आशंकाएं एक पल में धुल गईं। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर क्लारा को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। क्लारा की आँखों में भी सम्मान और अपनत्व के भाव थे। उसने टूटी-फूटी लेकिन प्यार भरी हिंदी में कहा, “मैं आपसे मिलने के लिए बहुत इंतज़ार किया माँ जी। अनिरुद्ध मुझे आपके बारे में बहुत बताता था।”
कौशल्या जी खुशी से रो पड़ीं। तभी उन्हें एक पतली सी, सुरीली आवाज़ सुनाई दी, “दादी माँ…!”
उन्होंने नीचे देखा तो एक चार साल का बेहद प्यारा सा बच्चा, जिसकी आँखें अनिरुद्ध जैसी और बाल क्लारा जैसे थे, उनकी तरफ देखकर खिलखिला रहा था। कौशल्या जी का रोम-रोम वात्सल्य से भर गया। उन्होंने झट से नीचे झुककर अपने पोते आरव को गोद में उठा लिया और उसे चूमने लगीं।
आरव कुछ देर तो उनकी गोद में रहा, फिर अचानक वो नीचे उतरा और भागकर आँगन में चला गया। कौशल्या जी घबरा गईं कि कहीं उसे धूल-मिट्टी से एलर्जी ना हो जाए। उन्होंने देखा कि आरव तुलसी के पौधे के पास पड़ी गीली मिट्टी के पास बैठ गया और अपने छोटे-छोटे हाथों से मिट्टी के घरौंदे बनाने लगा। उसके साफ-सुथरे कपड़े और हाथ पूरी तरह मिट्टी में सन गए थे।
कौशल्या जी को लगा कि अब क्लारा गुस्सा होगी। उन्हें लगा कि क्लारा अभी दौड़कर जाएगी, बच्चे को डांटेगी, उसे मिट्टी से खींचेगी और यहाँ की गंदगी को कोसने लगेगी।
लेकिन इसके विपरीत, क्लारा वहीँ खड़ी मुस्कुरा रही थी। अनिरुद्ध अपनी माँ के पास आया, उनके कंधे पर हाथ रखा और बहुत ही शांत स्वर में बोला, “देखा माँ! आपका पोता भी अपनी जन्मभूमि की मिट्टी को छूकर अपनापन महसूस कर रहा है। क्लारा ने इसे बचपन से ही भारत की कहानियाँ सुनाई हैं। माँ, क्लारा भले ही विदेश में पैदा हुई है, लेकिन इसने हमारे संस्कारों को मुझसे भी ज्यादा गहराई से अपनाया है।”
कौशल्या जी हैरान होकर अनिरुद्ध को देख रही थीं। अनिरुद्ध ने आगे कहा, “और माँ, एक बात और… आप जो सोच रही थीं कि हम कुछ दिनों के लिए आए हैं और फिर वापस चले जाएंगे, तो आप गलत थीं। हम अब वापस नहीं जाने वाले। मैंने अपना ट्रांसफर यहीं इंडिया के ऑफिस में करवा लिया है। आखिर अब हमें अपने देश में, अपने घर में, अपनी माँ के पास ही तो रहना है।”
यह सुनते ही कौशल्या जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्होंने क्लारा की तरफ देखा, तो क्लारा ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ माँ जी, हम हमेशा के लिए आ गए हैं। हमारा असली घर तो यहीं है।”
कौशल्या जी ने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा और भगवान का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने आरव को मिट्टी से सने हाथों के साथ ही अपने गले से लगा लिया और इस बार उनके आँसू बिछड़ने के डर के नहीं, बल्कि हमेशा के लिए मिल जाने की असीम खुशी के थे। आँगन में पसरी वह धूप आज कौशल्या जी को अपनी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत धूप लग रही थी।
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