“किस मिट्टी की बनी हुई हो तुम शिखा?” अविनाश की आवाज अब शांत थी, लेकिन यह उस तूफान के बाद की शांति थी जो सब कुछ तबाह कर चुकी थी। “इतने सालों से मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूं। तुम्हारी हर महत्वाकांक्षा, तुम्हारी हर आज़ादी का मैंने जश्न मनाया है। मैंने तुम्हारी हर जिद, हर गलती को इस उम्मीद में बर्दाश्त किया कि शायद तुम्हारे अंदर भी कहीं एक परिवार बसाने की चाहत होगी। मैं यही सोचकर चुप रहा कि वक्त के साथ तुम सुधर जाओगी, तुम्हारे अंदर की ममता जागेगी। लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे सीने में दिल है ही नहीं।”
अविनाश बिस्तर के किनारे बैठा था, उसके हाथ में एक सफेद रंग का अस्पताल का लिफाफा था, जिसे पकड़ते हुए उसकी उंगलियां बुरी तरह कांप रही थीं। उसकी आंखों से आंसू बहकर उस कागज पर गिर रहे थे, जिस पर लिखे गए कुछ शब्दों ने उसकी पूरी दुनिया, उसके सारे भविष्य के सपनों को एक पल में राख कर दिया था।
यह अविनाश और शिखा की शादी का छठा साल था। अविनाश एक शांत, सुलझा हुआ और परिवार को अहमियत देने वाला इंसान था। दूसरी तरफ शिखा बेहद महत्वाकांक्षी, अपनी आज़ादी से प्यार करने वाली और आधुनिक ख्यालों की महिला थी। अविनाश ने शिखा की हर जिद, हर फैसले का हमेशा सम्मान किया था। जब शादी के शुरुआती सालों में शिखा ने कहा कि उसे अभी बच्चे नहीं चाहिए क्योंकि उसे अपने करियर पर फोकस करना है, तो अविनाश ने बिना किसी शिकायत के उसका साथ दिया। वह अक्सर अपने दोस्तों के बच्चों को खिलाते हुए एक गहरी आह भरता था, लेकिन उसने कभी शिखा पर कोई दबाव नहीं डाला। उसे लगता था कि समय के साथ शिखा के अंदर भी मातृत्व की भावना जागेगी और वह खुद एक दिन एक छोटे से मेहमान के इस घर में आने की खुशी मनाएगी।
पिछले कुछ हफ्तों से शिखा की तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। उसे थकान महसूस होती थी और सुबह-सुबह चक्कर भी आते थे। अविनाश के मन में एक उम्मीद की किरण जागी थी। उसने सोचा था कि शायद उनका इंतजार खत्म होने वाला है। लेकिन शिखा ने हर बार यह कहकर बात टाल दी कि यह सिर्फ काम का स्ट्रेस है और वह खुद डॉक्टर से मिलकर आ जाएगी। अविनाश ने अपनी पत्नी की प्राइवेसी का सम्मान किया और ज्यादा सवाल नहीं किए।
लेकिन आज, जब शिखा अपनी सहेलियों के साथ वीकेंड पार्टी मनाने गई हुई थी, अविनाश को एक इंश्योरेंस पॉलिसी के कागजात ढूंढते हुए शिखा की अलमारी से यह फाइल मिली। सिटी हॉस्पिटल की यह फाइल एक साधारण मेडिकल चेकअप की नहीं थी। इसमें शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की सहमति का फॉर्म था, एक अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट थी, और सबसे अंत में एक बिल था—जिस पर साफ शब्दों में ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी’ (गर्भपात) लिखा हुआ था। तारीख ठीक चार दिन पहले की थी, जब शिखा ने कहा था कि वह अपनी एक क्लाइंट के साथ शहर से बाहर जा रही है।
अविनाश को लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर घोंप दिया हो। वह बच्चा, जिसके आने की कल्पना मात्र से उसकी आंखें चमक उठती थीं, वह अब इस दुनिया में नहीं था। और सबसे भयानक बात यह थी कि उस बच्चे को किसी हादसे ने नहीं, बल्कि खुद उसकी मां ने खत्म किया था, वह भी अविनाश को बिना बताए।
रात के ग्यारह बज चुके थे। दरवाजे की घंटी बजी। अविनाश ने भारी कदमों से जाकर दरवाजा खोला। शिखा सामने खड़ी थी, मुस्कुराती हुई, अपने हाथ में एक शॉपिंग बैग लिए।
“तुम्हें पता है अविनाश, आज हमने कितना एन्जॉय किया? और मैंने अपने लिए एक बहुत सुंदर सी ड्रेस भी ली है,” शिखा ने अंदर आते हुए अपनी खुशी जाहिर की, लेकिन अविनाश की खामोशी और उसकी लाल आंखों को देखकर वह ठिठक गई।
“क्या हुआ? तुम ऐसे क्यों देख रहे हो मुझे? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?” शिखा ने अपना बैग सोफे पर रखते हुए पूछा।
अविनाश के होंठ कांपे, लेकिन कोई आवाज नहीं निकली। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया, जिसमें वह सफेद फाइल थी। फाइल को देखते ही शिखा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी मुस्कान अचानक कहीं गायब हो गई और कमरे में एक दमघोंटू सन्नाटा छा गया।
“ये… ये क्या किया तुमने शिखा?” अविनाश की आवाज में गुस्सा कम और दर्द ज्यादा था। उसकी आवाज इतनी भर्राई हुई थी कि शब्द मुश्किल से फूट रहे थे।
शिखा ने एक पल के लिए अपनी नजरें चुराईं, लेकिन फिर खुद को संभालते हुए एक रक्षात्मक रवैया अपना लिया। “तुम मेरी अलमारी में क्या कर रहे थे अविनाश? तुम्हें मेरी चीजों की जासूसी करने का क्या हक है?”
“जासूसी?” अविनाश ने एक कड़वी हंसी हंसी। “मैं अपनी पत्नी की अलमारी में एक जरूरी कागज ढूंढ रहा था और मुझे मेरे मरे हुए बच्चे की रिपोर्ट मिल गई! और तुम मुझसे मेरी जासूसी के बारे में पूछ रही हो? इतनी बड़ी बात हो गई, तुमने एक जिंदगी खत्म कर दी, और मुझसे पूछती हो क्या हो गया?”
शिखा ने गहरी सांस ली और चिढ़ते हुए कहा, “प्लीज अविनाश, इसे इतना ड्रामेटिक मत बनाओ। तुम कहना क्या चाहते हो?”
अविनाश अब खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। “तुमने मुझे बिना बताए, मेरी कोई राय जाने बगैर अपना गर्भपात करा लिया! हमारे बच्चे का खून कर दिया शिखा! उस नन्ही सी जान का, जिसके लिए मैं सालों से तरस रहा था। जिस खुशी के लिए मैं हर मंदिर, हर दरगाह में मन्नतें मांगता था… तुमने मुझे उस खुशी से हमेशा के लिए वंचित कर दिया। आखिर क्या वजह थी? तुमने ऐसा क्यों किया?”
शिखा ने सोफे पर बैठते हुए बहुत ही रूखी और ठंडी आवाज में जवाब दिया, “ओह! तो फाइल देख ली तुमने। ठीक है, जो हुआ सो हुआ। इसमें कौन सी बड़ी बात है? तुम क्यों इतना हाइपर हो रहे हो? मुझे इतनी जल्दी बच्चों के चक्कर में नहीं फंसना था। मेरी अभी एक नई नौकरी लगी है, मुझे दुनिया घूमनी है। मैं रातों की नींद खराब करके डायपर बदलने के लिए तैयार नहीं हूं। मुझसे नहीं होगा यह सब! और यह मेरी बॉडी है, तो फैसला भी मेरा ही होना था।”
अविनाश सन्न रह गया। वह अपनी पत्नी के चेहरे को ऐसे देख रहा था जैसे किसी अजनबी को देख रहा हो। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस औरत के साथ उसने अपनी जिंदगी के छह साल गुजारे हैं, वह इतनी पत्थरदिल हो सकती है।
“किस मिट्टी की बनी हुई हो तुम शिखा?” अविनाश की आवाज अब शांत थी, लेकिन यह उस तूफान के बाद की शांति थी जो सब कुछ तबाह कर चुकी थी। “इतने सालों से मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूं। तुम्हारी हर महत्वाकांक्षा, तुम्हारी हर आज़ादी का मैंने जश्न मनाया है। मैंने तुम्हारी हर जिद, हर गलती को इस उम्मीद में बर्दाश्त किया कि शायद तुम्हारे अंदर भी कहीं एक परिवार बसाने की चाहत होगी। मैं यही सोचकर चुप रहा कि वक्त के साथ तुम सुधर जाओगी, तुम्हारे अंदर की ममता जागेगी। लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे सीने में दिल है ही नहीं।”
“अविनाश, तुम बात का बतंगड़ बना रहे हो। हम बाद में भी बच्चा प्लान कर सकते हैं जब मैं रेडी होऊंगी,” शिखा ने अपनी बात सही ठहराने की कोशिश की।
“बस! अब बहुत हुआ शिखा,” अविनाश ने अपना हाथ उठाते हुए उसे चुप कराया। “बाद में? तुम एक इंसान की जान को एक प्रोजेक्ट समझती हो जिसे जब चाहे शुरू किया और जब चाहे बंद कर दिया? तुमने सिर्फ उस बच्चे का कत्ल नहीं किया है शिखा, तुमने आज मेरे विश्वास का, मेरे सपनों का और मेरी भावनाओं का भी खून कर दिया है। पति-पत्नी का रिश्ता साझेदारी का होता है। अगर तुम तैयार नहीं थी, तो तुम मुझसे बात कर सकती थी। हम कोई रास्ता निकालते। लेकिन तुमने मुझे इस लायक भी नहीं समझा कि मेरे बच्चे की मौत का फैसला लेने से पहले तुम मुझे बता सको।”
अविनाश अपने बेडरूम की तरफ मुड़ा और उसने अपना सूटकेस निकाल लिया। शिखा अब थोड़ी घबराई। “ये क्या कर रहे हो तुम? तुम बैग क्यों पैक कर रहे हो?”
अविनाश ने अपने कपड़े सूटकेस में डालते हुए कहा, “मैं अब तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं जी सकूंगा। जो रिश्ता धोखे और इतनी गहरी स्वार्थपरता पर खड़ा हो, उसका कोई भविष्य नहीं है। मैं जा रहा हूं… तुम्हारी जिंदगी से बहुत दूर। अब तुम आज़ाद हो अपनी मनमानी के लिए, अपनी पार्टियों के लिए, अपनी झूठी दुनिया के लिए। क्योंकि मैं एक ऐसी स्त्री के साथ एक मिनट भी रहना बर्दाश्त नहीं करूंगा, जिसके अंदर न तो एक पत्नी की ईमानदारी है और न ही इंसानियत… मातृत्व तो बहुत दूर की बात है।”
अविनाश ने अपना सूटकेस बंद किया और दरवाजे की तरफ बढ़ा। शिखा वहीं सोफे पर बुत बनकर बैठी रही। शायद उसे अपने अहंकार में यह यकीन ही नहीं था कि अविनाश कभी उसे छोड़कर भी जा सकता है। दरवाजे की चौखट पर पहुंचकर अविनाश एक पल के लिए रुका। उसने पीछे मुड़कर उस घर को देखा जिसे उसने बड़े प्यार से सजाया था, लेकिन अब वह घर उसे एक कब्रगाह की तरह लग रहा था।
“काश… काश तुमने एक बार, सिर्फ एक बार उस नन्ही जान के बारे में सोचा होता। अलविदा शिखा,” यह कहकर अविनाश ने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया। दरवाजे के बंद होने की तेज आवाज ने कमरे के सन्नाटे को एक बार फिर चीर दिया, लेकिन इस बार यह सन्नाटा हमेशा के लिए शिखा की जिंदगी का हिस्सा बनने वाला था। बारिश अब भी हो रही थी, शायद आसमान भी आज अविनाश के उस अधूरे सपने के लिए रो रहा था जो कभी पूरा नहीं हो सका।
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