इंतज़ार के रंग

 मीरा का गला भर आया। उसके पास इस मासूम सवाल का कोई तार्किक जवाब नहीं था। उसने बस आरव को अपने सीने से लगा लिया और उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “पापा के समय को खरीदने की जरूरत नहीं है मेरे बच्चे। तुम उनकी जान हो। वो तुमसे बहुत प्यार करते हैं, बस अपनी जिम्मेदारियों में थोड़ा फंस गए हैं। देखना, वो जल्दी ही तुम्हारे लिए बहुत सारा समय निकालेंगे।”

दिन बीतते गए, लेकिन सिद्धार्थ की व्यस्तता कम नहीं हुई। हर सुबह वह आरव के उठने से पहले ही घर से निकल जाता और रात को तब लौटता जब आरव सो चुका होता। कभी-कभी रविवार को जब वह घर पर होता भी था, तो उसका लैपटॉप और फोन उसे आरव से दूर रखते थे।

  सिद्धार्थ एक बहुत बड़ा आर्किटेक्ट था, जो शहर के लिए खूबसूरत घर और दफ्तर डिजाइन करता था। लेकिन विडंबना यह थी कि दूसरों के सपनों का घर बनाने वाले इस इंसान के पास अपने ही घर के लिए समय नहीं था। उसकी पत्नी, मीरा, एक बेहद समझदार और शांत स्वभाव की महिला थी, जिसने घर और आठ साल के बेटे आरव की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी थी। आरव एक बेहद संवेदनशील और कलात्मक बच्चा था। उसकी दुनिया रंगों, कैनवस और तूलिका (ब्रश) के इर्द-गिर्द घूमती थी। वह अपनी हर भावना को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करता था।

एक शाम, आरव अपने कमरे में बैठा एक पेंटिंग बना रहा था। उसने अपने पिता, माता और खुद को एक साथ पार्क में पिकनिक मनाते हुए उकेरा था। तभी सिद्धार्थ फोन पर किसी क्लाइंट से बात करते हुए घर में दाखिल हुआ। आरव दौड़कर अपने पिता के पास गया और अपनी पेंटिंग दिखाते हुए बोला, “पापा, देखिए! मैंने हम तीनों की पेंटिंग बनाई है। क्या हम इस रविवार ऐसे ही पिकनिक पर जा सकते हैं?” सिद्धार्थ ने बिना पेंटिंग की तरफ देखे ही एक हाथ से आरव को किनारे किया और फोन पर बात करते हुए अपने स्टडी रूम में चला गया। आरव का मुस्कुराता हुआ चेहरा एकदम से मुरझा गया।

मीरा सब कुछ देख रही थी। वह आरव के पास आई, उसके हाथ से पेंटिंग ली और उसे चूमते हुए कहा, “वाह आरव! यह तो बहुत सुंदर है। तुम्हारे पापा अभी ऑफिस के काम में बहुत उलझे हुए हैं, बेटा। वो बहुत मेहनत करते हैं ताकि तुम्हें अच्छे खिलौने और रंग मिल सकें।”

आरव ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से अपनी मां की तरफ देखा और एक ऐसा सवाल किया जिसने मीरा को निशब्द कर दिया। उसने पूछा, “मां, अगर मैं अपने सारे खिलौने वापस कर दूं, नए रंगों की डिब्बी भी न मांगूं और कभी किसी चीज की जिद न करूं… तो क्या उन पैसों से पापा का थोड़ा सा टाइम खरीदा जा सकता है? मुझे उनके पैसे या खिलौने नहीं चाहिए, मुझे बस मेरे पापा चाहिए।”

मीरा का गला भर आया। उसके पास इस मासूम सवाल का कोई तार्किक जवाब नहीं था। उसने बस आरव को अपने सीने से लगा लिया और उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “पापा के समय को खरीदने की जरूरत नहीं है मेरे बच्चे। तुम उनकी जान हो। वो तुमसे बहुत प्यार करते हैं, बस अपनी जिम्मेदारियों में थोड़ा फंस गए हैं। देखना, वो जल्दी ही तुम्हारे लिए बहुत सारा समय निकालेंगे।”

दिन बीतते गए, लेकिन सिद्धार्थ की व्यस्तता कम नहीं हुई। हर सुबह वह आरव के उठने से पहले ही घर से निकल जाता और रात को तब लौटता जब आरव सो चुका होता। कभी-कभी रविवार को जब वह घर पर होता भी था, तो उसका लैपटॉप और फोन उसे आरव से दूर रखते थे।

फिर एक दिन ऐसा आया जब आरव के स्कूल में ‘आर्ट एग्जीबिशन’ (कला प्रदर्शनी) होने वाली थी। आरव की कई पेंटिंग्स वहां प्रदर्शित की जानी थीं। उसने एक हफ्ते पहले ही सिद्धार्थ से वादा लिया था कि वह इस एग्जीबिशन में जरूर आएगा।

“पापा, आपको मेरी कसम है, आप जरूर आएंगे ना? मेरे सारे दोस्तों के पापा आ रहे हैं। मुझे उन्हें दिखाना है कि मेरे पापा भी मेरे साथ हैं,” आरव ने सिद्धार्थ का हाथ पकड़कर कहा था।

सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखा था, “बिल्कुल आऊंगा मेरे चैंपियन। यह तो बहुत बड़ी बात है। मैं अपना सारा काम कैंसिल करके तुम्हारे स्कूल आऊंगा, यह मेरा पक्का वादा है।”

शनिवार की रात आरव खुशी के मारे सो नहीं पाया। उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े निकाल कर रखे। रविवार की सुबह वह बहुत जल्दी उठ गया और तैयार होने लगा। सिद्धार्थ भी उठा हुआ था और डाइनिंग टेबल पर कॉफी पी रहा था। तभी सिद्धार्थ का फोन बजा। वह किसी विदेशी क्लाइंट का फोन था। बातचीत के दौरान सिद्धार्थ के चेहरे पर तनाव साफ दिखने लगा। कॉल खत्म होने के बाद उसने मीरा की तरफ देखा और कहा, “मीरा, एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट हाथ से निकल सकता है। मुझे अभी ऑफिस जाना होगा और शायद पूरी दोपहर वहीं लग जाए। आरव को तुम एग्जीबिशन में ले जाना।”

मीरा ने गुस्से और निराशा से कहा, “सिद्धार्थ, आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आपने उससे वादा किया था। वह बच्चा पिछले एक हफ्ते से इसी दिन का इंतजार कर रहा है। आपका एक दिन का काम आपके बेटे की खुशियों से ज्यादा जरूरी कैसे हो सकता है?”

“तुम समझती क्यों नहीं हो मीरा? यह मेरी जिंदगी का सबसे अहम प्रोजेक्ट है,” सिद्धार्थ ने झुंझलाते हुए कहा।

उसी वक्त आरव अपने कमरे से बाहर आया। वह पूरी तरह तैयार था और उसके चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी थी। उसने दोनों की बातें सुन ली थीं। सिद्धार्थ ने थोड़ा झेंपते हुए कहा, “सॉरी बेटा, पापा को एक बहुत जरूरी काम आ गया है। हम अगले हफ्ते पक्का चलेंगे।”

लेकिन इस बार आरव ने न तो जिद की, न रोया और न ही कोई शिकायत की। उसने बस एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, “कोई बात नहीं पापा, मुझे पता था आप नहीं आओगे। आप अपना काम कर लो।”

यह कहते हुए उसने अपना स्कूल बैग वापस कुर्सी पर रख दिया और अपने कमरे में चला गया।

सिद्धार्थ वहीं खड़ा रह गया। आरव की उस खामोशी, उस फीकी मुस्कान और बिना लड़े हार मान लेने वाले अंदाज ने सिद्धार्थ के सीने में एक अजीब सी चुभन पैदा कर दी। उसे लगा जैसे आरव ने शिकायत करना इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि वह समझदार हो गया है, बल्कि इसलिए छोड़ दिया है क्योंकि उसने अपने पिता से उम्मीद करना ही बंद कर दिया है। एक बच्चे का अपने पिता से उम्मीद छोड़ देना दुनिया की सबसे डरावनी बात होती है।

भारी मन से सिद्धार्थ ऑफिस चला गया, लेकिन उसका दिमाग काम में नहीं लग रहा था। बार-बार उसे आरव की वह सूनी आंखें याद आ रही थीं। दोपहर को वह आधे काम से ही उठकर घर वापस आ गया। घर में शांति थी। मीरा रसोई में कुछ काम कर रही थी और आरव शायद सो रहा था।

सिद्धार्थ सीधे आरव के कमरे में गया। आरव सच में सो रहा था। उसकी टेबल पर रंगों और कागजों का ढेर लगा था। सिद्धार्थ ने चीजों को समेटना शुरू किया। तभी उसकी नजर आरव की एक पुरानी ‘स्केचबुक’ पर पड़ी, जो हमेशा आरव के सिरहाने रखी रहती थी। सिद्धार्थ ने यूं ही उस बुक को खोल लिया।

पहले पन्ने पर एक खूबसूरत ड्राइंग थी—एक बड़ा आदमी और एक छोटा बच्चा हाथ पकड़े हुए। नीचे टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था, ‘मेरे पापा और मैं।’ सिद्धार्थ के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

उसने पन्ने पलटने शुरू किए। जैसे-जैसे पन्ने पलटते गए, तस्वीरें बदलती गईं। अगली कुछ तस्वीरों में पापा का चेहरा फोन से ढका हुआ था। उसके आगे की तस्वीरों में पापा एक कोने में लैपटॉप पर काम कर रहे थे और बच्चा दूर खड़ा उन्हें देख रहा था।

लेकिन जब सिद्धार्थ ने किताब के आखिरी कुछ पन्ने देखे, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन पन्नों पर बनी तस्वीरों में पिता था ही नहीं। सिर्फ एक बच्चा था जो कभी अकेले टीवी देख रहा था, कभी अकेले खेल रहा था और कभी खिड़की से बाहर झांक रहा था। सबसे आखिरी पन्ने पर एक बड़ा सा खाली घर बना था, जिसके अंदर सिर्फ आरव और उसकी मां थे। घर के बाहर एक गाड़ी बनी थी और उसके नीचे लिखा था, ‘पापा अब यहां नहीं रहते, पापा काम के घर में रहते हैं।’

एक-एक पन्ना पलटते हुए सिद्धार्थ के हाथ कांपने लगे। वह एक ऐसा आर्किटेक्ट था जो दुनिया की सबसे मजबूत दीवारें बनाता था, लेकिन उसे पता ही नहीं चला कि कब उसके और उसके बेटे के बीच एक ऐसी अदृश्य दीवार बन गई जिसे पार करना अब लगभग नामुमकिन सा लग रहा था। उन पन्नों में सिर्फ चित्र नहीं थे, बल्कि एक आठ साल के बच्चे की तड़प, उसका अकेलापन और अपने पिता को खो देने का दर्द था।

सिद्धार्थ वहीं आरव के बिस्तर के पास फर्श पर बैठ गया और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह अपनी महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में इतना अंधा हो गया था कि उसने अपने ही अंश को खुद से दूर कर दिया था।

तभी दरवाजे पर आहट हुई। मीरा वहां खड़ी थी। उसने सिद्धार्थ के हाथों में वह स्केचबुक और उसकी आंखों में बहते आंसू देख लिए थे। उसे कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। सिद्धार्थ उठकर मीरा के पास गया और रुंधे हुए गले से बोला, “मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी मीरा। मैं दुनिया के लिए घर बनाता रहा और अपना ही घर उजाड़ बैठा। लेकिन अब और नहीं… मैं अपने बेटे को ऐसे नहीं खो सकता।”

उस दिन सिद्धार्थ ने अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया। जब शाम को आरव की आंख खुली, तो उसने देखा कि उसके पापा फर्श पर बैठकर एक बड़े से कैनवस पर कुछ पेंट कर रहे हैं। आरव हैरान रह गया। वह धीरे से पास गया।

सिद्धार्थ ने मुड़कर देखा, अपनी बाहें फैलाईं और कहा, “क्या दुनिया का सबसे महान पेंटर इस नौसिखिए की थोड़ी मदद करेगा? हमें एक बहुत सुंदर सा घर बनाना है… जिसमें हम तीनों हमेशा साथ रहें, बिना किसी फोन और लैपटॉप के।”

आरव की आंखों में चमक लौट आई। उसने दौड़कर अपने पापा को गले लगा लिया। उस दिन के बाद से, सिद्धार्थ ने कभी भी अपने काम को अपने परिवार से बड़ा नहीं होने दिया। उसे समझ आ गया था कि पैसा और शोहरत वापस मिल सकते हैं, लेकिन एक बार बचपन का जो समय बीत गया और रिश्ते टूट गए, तो उन्हें दुनिया की कोई भी दौलत वापस नहीं ला सकती।

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