“साहब, बुढ़ापा बहुत अजीब होता है। इंसान का शरीर तो बूढ़ा हो जाता है, लेकिन उसका दिल बिल्कुल एक छोटे बच्चे जैसा हो जाता है। जैसे बच्चों को हर वक़्त प्यार, दुलार और अपनेपन की ज़रूरत होती है, वैसे ही इन बुजुर्गों को भी होती है। पैसे से आप इनके लिए अच्छा बिस्तर तो ला सकते हैं, लेकिन सुकून की नींद तो अपनों से बात करके ही आती है। ना जाने कौन अभागा बेटा है इनका, जिसे इतने बड़े घर में अपनी माँ का अकेलापन दिखाई नहीं देता।”
अनुभव शहर की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था। उसकी जिंदगी एक ऐसी तेज़ रफ्तार ट्रेन की तरह हो गई थी, जिसमें रुकने या बाहर के नज़ारे देखने का कोई समय नहीं था। उसका एक शानदार घर था, एक खूबसूरत पत्नी शिखा, और दो प्यारे बच्चे—रिया और रोहन। इसी बड़े से घर के एक छोटे से कमरे में अनुभव की विधवा माँ, सुमित्रा देवी भी रहती थीं। सुमित्रा देवी ने अपना पूरा जीवन गांव की खुली हवा और सादगी में बिताया था, लेकिन पति के गुजर जाने के बाद, अनुभव उन्हें अपने साथ शहर ले आया था। शुरुआत में सब कुछ ठीक था, लेकिन जैसे-जैसे अनुभव की तरक्की होती गई, घर का माहौल और पारिवारिक प्राथमिकताएं बदलती गईं।
शिखा एक आधुनिक विचारों वाली महिला थी, जिसकी अपनी एक अलग सामाजिक दुनिया थी। उसे किटी पार्टीज, क्लब और सोशल गैदरिंग का बहुत शौक था। इसके विपरीत, सुमित्रा देवी बहुत ही साधारण और पारंपरिक महिला थीं। शिखा को अक्सर सुमित्रा देवी की पुरानी आदतें खटकती थीं। कभी उनके ज़ोर से भजन गाने पर शिखा को ऐतराज़ होता, तो कभी उनके पुराने कपड़ों को देखकर शिखा टोक देती। “माँ जी, आप घर में कोई मेहमान आता है तो ऐसे बाहर मत आ जाया कीजिए, थोड़ा सलीके से रहा कीजिए,” शिखा की ये कड़वी बातें अब घर में आम हो गई थीं।
अनुभव भी ऑफिस के काम में इतना उलझा रहता था कि उसे इन सब बातों पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं मिलती थी। कभी-कभार जब शिखा उससे शिकायत करती, तो वह भी थकावट के मारे अपनी माँ को ही कह देता, “माँ, आप शिखा की बात मान लिया करो ना। क्यों बेवजह बहस करती हो?” सुमित्रा देवी इन बातों का कोई जवाब नहीं देती थीं। वे बस एक फीकी सी मुस्कान के साथ अपना सिर हिला देतीं और अपने कमरे में चली जातीं। बच्चे भी अब बड़े हो रहे थे। शिखा ने उन्हें यह कहकर दादी से दूर कर दिया था कि “दादी पुरानी बातें सिखाएंगी, तुम लोग अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।” इस तरह, उस भरे-पूरे और आलीशान घर में सुमित्रा देवी पूरी तरह से अकेली हो गई थीं।
कुछ महीनों से सुमित्रा देवी ने एक नया रूटीन बना लिया था। हर दोपहर करीब तीन बजे, जब शिखा आराम कर रही होती और बच्चे ट्यूशन गए होते, सुमित्रा देवी घर से निकल जाती थीं। जब अनुभव ने उनसे पूछा कि वह रोज़ कहाँ जाती हैं, तो उन्होंने बहुत ही सहजता से जवाब दिया, “बेटा, पास के मोहल्ले में एक महिला मंडल है, वहाँ रोज़ दोपहर को सत्संग होता है। मेरी उम्र की कई औरतें आती हैं। मैं वहीं चली जाती हूँ। घर में बैठे-बैठे मन घबराता है, वहाँ चार बातें हो जाती हैं तो समय कट जाता है।”
अनुभव को यह सुनकर तसल्ली हुई। उसने सोचा कि चलो, माँ का भी मन लगा रहेगा। शिखा भी इस बात से खुश थी कि दिन के कुछ घंटे उसे घर में पूरी शांति मिलती है और कोई टोका-टाकी करने वाला नहीं होता। अनुभव अपनी माँ को हर महीने कुछ पैसे दे दिया करता था, “माँ, ये पैसे रख लो, ऑटो से चली जाना या रास्ते में कुछ खाने का मन हो तो ले लेना।”
जब भी अनुभव अपनी माँ के हाथ में पैसे रखता, सुमित्रा देवी का मन भर आता था। अनुभव को शायद याद नहीं था, लेकिन सुमित्रा देवी को वे दिन अच्छी तरह याद थे जब अनुभव छोटा था। अनुभव के पिता एक साधारण क्लर्क थे और अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था। उस समय सुमित्रा देवी ने दूसरों के कपड़े सिलकर, रात-रात भर जागकर अनुभव की पढ़ाई का खर्च उठाया था। अनुभव कभी अपनी स्कूल ट्रिप या खिलौनों के लिए पैसे मांगता, तो सुमित्रा देवी अपनी दवाइयों के पैसे बचाकर उसकी खुशी पूरी करती थीं। आज वही बेटा जब उन्हें पैसे दे रहा था, तो उन्हें अपनी दी हुई परवरिश पर गर्व भी हो रहा था, लेकिन साथ ही एक अनजाना सा दर्द भी उनके सीने में उठता था।
दिन बीतते गए। सुमित्रा देवी का रोज़ दोपहर को जाना और शाम ढले वापस आना एक नियम बन गया था। एक दिन अनुभव के ऑफिस में कोई सर्वर डाउन होने की वजह से उसे दोपहर में ही छुट्टी मिल गई। वह अपनी कार से घर लौट रहा था। रास्ते में उसे खयाल आया कि क्यों न आज माँ को सत्संग से ही पिक कर लिया जाए। उसने शिखा को फोन किया और पूछा कि माँ का सत्संग किस गली में होता है। शिखा ने बताया कि माँ ने एक बार गीता भवन के पास वाले कम्युनिटी हॉल का ज़िक्र किया था।
अनुभव ने अपनी कार गीता भवन की तरफ मोड़ ली। जब वह वहाँ पहुँचा, तो देखा कि वहाँ तो सन्नाटा पसरा हुआ था। हॉल के बाहर बैठे चौकीदार से पूछने पर पता चला कि वहाँ पिछले कई महीनों से कोई महिला मंडल या सत्संग नहीं हो रहा है। अनुभव हैरान रह गया। “अगर माँ यहाँ नहीं आतीं, तो फिर रोज़ तीन घंटे कहाँ जाती हैं?” उसके दिमाग में कई सवाल घूमने लगे। उसे घबराहट होने लगी। उसने आस-पास के पार्कों और मंदिरों में देखा, लेकिन सुमित्रा देवी कहीं नहीं मिलीं।
थक हारकर अनुभव घर की तरफ लौटने लगा। रास्ते में शहर का पुराना बस अड्डा पड़ता था। ट्रैफिक सिग्नल लाल होने के कारण अनुभव ने कार रोकी। उसकी नज़र अनायास ही बस अड्डे के बाहर बनी एक पुरानी और धूल भरी सीमेंट की बेंच पर पड़ी। वहाँ जो नज़ारा उसने देखा, उससे उसकी सांसें जैसे वहीं रुक गईं।
सुमित्रा देवी उसी धूल भरी बेंच पर बैठी थीं। उनके हाथ में कोई माला या किताब नहीं थी। वे बस चुपचाप वहाँ बैठी थीं और अपनी धुंधली आँखों से आते-जाते लोगों को देख रही थीं। वे उन परिवारों को देख रही थीं जो बस से उतरकर खुशी से एक-दूसरे के गले मिल रहे थे। वे उन छोटे बच्चों को देख रही थीं जो अपने माता-पिता की उंगली थामे चहकते हुए जा रहे थे। किसी को हंसता देख उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती, और फिर वे एक गहरी आह भर कर आसमान की तरफ देखने लगतीं।
अनुभव ने कार साइड में लगाई और चुपचाप अपनी माँ से कुछ दूरी पर जाकर खड़ा हो गया। वह यह समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर उसकी माँ, जो इतनी धार्मिक है, सत्संग का झूठ बोलकर इस शोर-शराबे और धुएं से भरे बस अड्डे पर रोज़ क्यों आती है?
तभी पास ही चाय की टपरी लगाने वाला एक अधेड़ उम्र का आदमी एक कुल्हड़ में चाय लेकर सुमित्रा देवी के पास गया। “लो अम्मा, तुम्हारी चाय! आज फिर से तुम्हारे बेटे का इंतज़ार कर रही हो?”
सुमित्रा देवी ने मुस्कुराते हुए चाय ली और बोलीं, “नहीं रे भैया, मेरा बेटा तो बहुत बड़ा अफसर है। वह तो बड़े से दफ्तर में काम करता है। मैं तो बस यूँ ही रौनक देखने आ जाती हूँ।”
अनुभव से रहा नहीं गया। वह उस चाय वाले के पास गया और धीमी आवाज़ में पूछा, “भैया, क्या ये अम्मा रोज़ यहाँ आती हैं?”
चाय वाले ने अनुभव को ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, “हाँ बाबूजी, पिछले छह महीने से इनका यही नियम है। रोज़ दोपहर को आती हैं और शाम ढलने तक इसी बेंच पर बैठी रहती हैं। बहुत ही भली औरत हैं। मैंने एक दिन पूछ लिया था कि अम्मा, तुम इस धूल-मिट्टी में रोज़ क्यों आकर बैठती हो? तुम्हारे घर में कोई नहीं है क्या?”
अनुभव ने कांपती आवाज़ में पूछा, “तो… तो उन्होंने क्या कहा?”
चाय वाले ने एक गहरी सांस ली और कहा, “अम्मा की बात सुनकर मेरी तो आँखें भर आईं बाबूजी। अम्मा ने कहा था- ‘बेटा, मेरा भरा-पूरा घर है। मेरा बेटा मुझे बहुत पैसे भी देता है। लेकिन उस बड़े से घर में मेरे लिए कोई समय नहीं है। मेरी बहू मुझसे चिढ़ती है, पोते-पोती मेरे पास बैठने से कतराते हैं, और बेटे के पास काम के अलावा कोई फुर्सत नहीं है। घर की दीवारें मुझे खाने को दौड़ती हैं। जब कोई मुझसे बात नहीं करता, तो मुझे लगता है कि मैं ज़िंदा ही क्यों हूँ। इसलिए मैं यहाँ आ जाती हूँ। यहाँ इतने सारे लोगों को हंसते-बोलते देखती हूँ, परिवारों को एक साथ सफर करते देखती हूँ, तो मेरे मन को तसल्ली मिलती है कि दुनिया में अभी भी प्यार बाकी है। इन अजनबियों को खुश देखकर मैं खुद को बहला लेती हूँ कि शायद मेरा परिवार भी कभी ऐसे ही मेरे साथ बैठेगा।’ “
चाय वाले ने आगे कहा, “साहब, बुढ़ापा बहुत अजीब होता है। इंसान का शरीर तो बूढ़ा हो जाता है, लेकिन उसका दिल बिल्कुल एक छोटे बच्चे जैसा हो जाता है। जैसे बच्चों को हर वक़्त प्यार, दुलार और अपनेपन की ज़रूरत होती है, वैसे ही इन बुजुर्गों को भी होती है। पैसे से आप इनके लिए अच्छा बिस्तर तो ला सकते हैं, लेकिन सुकून की नींद तो अपनों से बात करके ही आती है। ना जाने कौन अभागा बेटा है इनका, जिसे इतने बड़े घर में अपनी माँ का अकेलापन दिखाई नहीं देता।”
चाय वाले के हर शब्द ने अनुभव के सीने में खंजर की तरह वार किया। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसे अपना वो बचपन याद आ गया, जब वह स्कूल से लौटकर सिर्फ इसलिए रोने लगता था क्योंकि उसकी माँ उसे दरवाजे पर खड़ी नहीं मिलती थी। और आज… आज उसने अपनी उसी माँ को इस कदर अकेला छोड़ दिया था कि उन्हें सड़क पर अजनबियों के बीच अपनापन तलाशना पड़ रहा था।
अनुभव भरे बाज़ार में, लोगों की परवाह किए बिना अपनी माँ की तरफ भागा। सुमित्रा देवी चाय पीकर उठने ही वाली थीं कि अनुभव ने जाकर उनके दोनों पैर पकड़ लिए। वह फूट-फूट कर रोने लगा।
“मुझे माफ़ कर दो माँ… मुझे माफ़ कर दो!” अनुभव फफकते हुए बोला।
सुमित्रा देवी अपने बेटे को इस तरह अचानक देखकर घबरा गईं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से अनुभव को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। “क्या हुआ मेरे लाल? तू यहाँ कैसे? तू रो क्यों रहा है?”
अनुभव ने अपनी माँ का माथा चूमा और रोते हुए कहा, “माँ, आप रोज़ इस धूल में आकर मेरे प्यार को तलाशती हो और मैं कितना अंधा था जो घर में आपके दर्द को नहीं देख पाया। आपने मेरे लिए अपना पूरा जीवन निकाल दिया, और मैं आपको दिन के दो पल भी नहीं दे सका। मुझे वो घर नहीं चाहिए माँ, जहाँ आपके लिए जगह न हो। चलिए मेरे साथ।”
सुमित्रा देवी की आँखों से भी खुशी और संतोष के आंसू बह निकले। आज बरसों बाद उनके बेटे ने उन्हें इतने प्यार से गले लगाया था।
उस दिन जब अनुभव अपनी माँ को लेकर घर पहुँचा, तो वह एक बदला हुआ इंसान था। उसने शिखा को पूरी बात बताई और पहली बार बहुत सख्त लहज़े में कहा कि अगर इस घर में माँ का सम्मान नहीं हो सकता, तो यह घर उनके भी किसी काम का नहीं है। शिखा को भी जब सुमित्रा देवी के बस अड्डे पर बैठने वाली बात पता चली, तो उसे अपने किए पर बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने सुमित्रा देवी के पैर छूकर माफी मांगी।
उस दिन के बाद से सुमित्रा देवी को कभी भी किसी ‘सत्संग’ का बहाना बनाकर घर से नहीं निकलना पड़ा। अब अनुभव हर शाम ऑफिस से लौटकर आधा घंटा सिर्फ अपनी माँ के पास बैठता था। शिखा अब उनके साथ मिलकर रसोई में काम करती और बच्चे रोज़ रात को अपनी दादी से पुरानी कहानियाँ सुनकर ही सोते थे। सुमित्रा देवी की सूनी आँखों में अब बस अड्डे की धूल नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्यार की चमक थी।
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