सिंदूरी भोर की दस्तक

“मेरी बच्ची… मेरी लाडो,” देवकी जी ने अंजलि की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “आज मेरी आँखें धन्य हो गईं। आज मुझे लगा कि मेरा निशांत जहाँ भी होगा, स्वर्ग से हम पर फूलों की बारिश कर रहा होगा। मेरे घर की बहार लौट आई।” तभी पीछे खड़ा रोहन दोनों हाथों में मिठाइयों और … Read more

जीवन का प्रभात

 नंदिनी ने अपने कांपते हाथों को देखा। उसने सोचा, अगर वह आज खुद को तोड़ लेगी, अगर वह जीवन से मुंह मोड़ लेगी, तो क्या अनुराग की उस पवित्र आत्मा को शांति मिलेगी? क्या अनुराग का प्रेम इतना कमजोर था कि वह उसके जाने के बाद एक इंसान को जीने की हिम्मत भी न दे … Read more

ममता की तराजू

“वकील बाबू, आपने जो मसौदा तैयार किया है, उसे कल दोपहर ठीक बारह बजे लेकर आइएगा। मैं किसी भी तरह का विलंब नहीं चाहती। मेरी तबीयत का कोई ठिकाना नहीं और मैं जीते-जी यह सब कुछ निपटा देना चाहती हूँ।” दूसरी तरफ से वकील श्रीकांत जी की आवाज़ उभरी, जिसमें साफ़ तौर पर हिचकिचाहट और … Read more

कलंक

 अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी सुनैना चाय का कप थामे दूर सड़क पर जलती-बुझती बत्तियों को देख रही थी। तभी ड्रॉइंग रूम में रखे उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी और उसकी रिंगटोन बजने लगी। स्क्रीन पर उसकी बचपन की सहेली वंदना का नाम चमक रहा था। सुनैना और वंदना का साथ महज दो … Read more

तकदीर की लकीरें

दोनों बच्चे बड़े ही संस्कारी और होनहार निकले। रागिनी ने उन्हें कभी यह अहसास तक नहीं होने दिया कि वे उसकी कोख से नहीं जन्मे हैं। उसने उन्हें सिर्फ पाला नहीं, बल्कि अपने संस्कारों से सींचा। बिटिया, जिसका नाम उन्होंने अन्या रखा, उसने कानून की पढ़ाई पूरी की और पिछले साल ही पटियाला के एक … Read more

पहले एक बेटी हूँ

 प्रियांशी ने मुस्कुराते हुए अपनी सास के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और बोली, “मां जी, उन पुरानी बातों को याद करके आज का दिन क्यों खराब करना? परिवार का मतलब क्या होता है? परिवार वही होता है जहां सुख में भले ही लोग अपनी-अपनी दुनिया में मस्त रहें, लेकिन दुख की घड़ी में … Read more

ज़ायका ज़िंदगी का

कई दिनों से मेरी अपनी गृहस्थी की उलझनों के कारण मेरा विश्वनाथ जी के घर जाना नहीं हो पाया था। उस दोपहर जब धूप थोड़ी मद्धम हुई, तो मैंने सोचा कि चलो, अवनि और जानकी जी से हाल-चाल पूछ आऊं। मुख्य दरवाजे की कुंडी खुली हुई थी। जैसे ही मैंने आंगन में कदम रखा, भीतर … Read more

पत्थरदिल

 शारदा की नजरें झुक गईं। नलिनी को ऐसा लगा मानो किसी ने उसके मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया हो। प्रज्ञा और तान्या शर्म के मारे एक-दूसरे का मुंह देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थीं। वे औरतें, जो दोपहर में अस्पताल के गलियारे में बैठकर अपनी-अपनी संपत्तियों को बचाने का ताना-बाना बुन … Read more

कर्मों की छाँव

 विश्वंभर जी और उमा जी ने सोचा कि जीवन का अंतिम पड़ाव अपने इकलौते बेटे, बहू और पोते-पोतियों के संग बिताना ही उचित होगा। लेकिन जाने से पहले उन्हें ‘स्नेह छाया’ की चिंता थी। उस समय तक मयंक एक प्रतिष्ठित कंपनी में इंजीनियर बन चुका था और पूनम एक स्कूल में शिक्षिका। अनाथालय में साथ-साथ … Read more

जीवन की डोर

 मयंक ने प्रज्ञा के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “नहीं मेरी छोटी, शास्त्रों में रक्षा का जो भी अर्थ लिखा हो, लेकिन मेरी असली रक्षक तो तू है। सदियों से दुनिया कहती आई है कि भाई बहन की रक्षा … Read more

error: Content is protected !!