एक दिन शाम को जब स्नेहा ऑफिस में एक जरूरी मीटिंग के कारण लेट हो गई, तो घर पहुँचते ही उसे सावित्री जी के तीखे व्यंग्य सुनने पड़े। “नौकरी करने का यह मतलब थोड़ी है कि घर-परिवार को भूल जाओ। हम भी तो अपने ज़माने में काम करते थे, लेकिन घर के चूल्हे-चौके से कभी जी नहीं चुराया।
आज की लड़कियों को तो बस बाहर घूमने की आज़ादी चाहिए, घर की जिम्मेदारी से कोई मतलब नहीं।” स्नेहा ने सफाई देने की कोशिश की कि मीटिंग अचानक आ गई थी, लेकिन उसकी बात बीच में ही काट दी गई।
खिड़की से छनकर आती सुबह की हल्की धूप कल्याणी के चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन उनके मन के भीतर एक अजीब सा अंधेरा और घबराहट छाई हुई थी। आज उनकी इकलौती बेटी स्नेहा की विदाई थी।
कल्याणी अपने हाथों से स्नेहा के सूटकेस में उसकी पसंद की छोटी-छोटी चीजें रख रही थीं—उसकी पसंदीदा किताबें, कुछ पुरानी तस्वीरें, और उसकी वो नीली डायरी जिसे वो हमेशा अपने सिरहाने रखती थी। हर एक कपड़ा रखते हुए कल्याणी के हाथ कांप रहे थे और आँखें डबडबा रही थीं।
स्नेहा दरवाजे के पास खड़ी अपनी माँ को इस तरह चुपचाप सब समेटते हुए देख रही थी। उससे रहा नहीं गया और वह दौड़कर अपनी माँ के गले लग गई। कल्याणी ने अपने आँसू छिपाते हुए स्नेहा के सिर पर हाथ फेरा और भारी आवाज़ में कहा, “पगली, रोती क्यों है? पुणे जा रही है, कोई दूसरे देश थोड़ी ही जा रही है।
और फिर तेरी सासू माँ, सावित्री जी, कितनी समझदार और सुलझी हुई महिला हैं। सगाई वाले दिन ही तो उन्होंने सबके सामने कहा था कि उन्हें बहू नहीं, बेटी चाहिए। देखना, वो तुझे पलकों पर बिठाकर रखेंगी। बस तू वहाँ सबके स्वभाव को समझने की कोशिश करना। नया घर है, नए लोग हैं, थोड़ा वक्त तो लगेगा ही।”
स्नेहा ने बस हामी में सिर हिला दिया। वह जानती थी कि उसकी माँ अपने डर को छिपाने के लिए ये सब कह रही हैं। विदाई का वह भारी पल भी आ गया। शहनाई की धुन के बीच, आँसुओं से भीगी आँखों और भारी कदमों के साथ स्नेहा ने अपने मायके की दहलीज पार की और अपने पति कुणाल के साथ एक नई दुनिया की ओर निकल पड़ी।
गाड़ी धूल उड़ाते हुए दूर चली गई, लेकिन कल्याणी बहुत देर तक उसी खाली रास्ते को एकटक निहारती रहीं। उनके मन में बार-बार यही सवाल गूंज रहा था कि जिस बेटी को नाज़ों से पाला, वह अचानक किसी और की कैसे हो जाती है।
शुरुआती कुछ दिन बिल्कुल वैसे ही बीते जैसे किसी भी नई नवेली दुल्हन के बीतते हैं। मेहमानों का आना-जाना, रस्में, और ढेर सारे उपहार। लेकिन जैसे ही घर से मेहमानों की भीड़ छँटी और रोजमर्रा की जिंदगी शुरू हुई, घर का माहौल बदलने लगा। स्नेहा एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी।
शादी से पहले ही यह बात तय हो गई थी कि वह शादी के बाद भी अपनी नौकरी जारी रखेगी। कुणाल के परिवार वालों ने भी इस पर बहुत खुशी जताई थी और कहा था कि आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ ही घर और बाहर दोनों बखूबी संभाल सकती हैं।
लेकिन हकीकत उन मीठी बातों से कोसों दूर थी। स्नेहा का ऑफिस सुबह नौ बजे शुरू होता था। उसने सोचा था कि वह सुबह उठकर नाश्ता बनाने में मदद करेगी और फिर काम पर निकल जाएगी।
लेकिन सावित्री जी की उम्मीदें कुछ और ही थीं। वे चाहती थीं कि स्नेहा सुबह छह बजे उठकर पूरे घर की सफाई करे, सबके लिए अलग-अलग तरह का नाश्ता बनाए, दोपहर के लंच की तैयारी करके जाए, और शाम को थकी-हारी लौटने के बाद फिर से रात के खाने का पूरा जिम्मा उठाए।
एक दिन शाम को जब स्नेहा ऑफिस में एक जरूरी मीटिंग के कारण लेट हो गई, तो घर पहुँचते ही उसे सावित्री जी के तीखे व्यंग्य सुनने पड़े। “नौकरी करने का यह मतलब थोड़ी है कि घर-परिवार को भूल जाओ। हम भी तो अपने ज़माने में काम करते थे,
लेकिन घर के चूल्हे-चौके से कभी जी नहीं चुराया। आज की लड़कियों को तो बस बाहर घूमने की आज़ादी चाहिए, घर की जिम्मेदारी से कोई मतलब नहीं।” स्नेहा ने सफाई देने की कोशिश की कि मीटिंग अचानक आ गई थी, लेकिन उसकी बात बीच में ही काट दी गई।
कुणाल भी इन बातों में अपनी माँ का ही पक्ष लेता नज़र आता। वह कहता, “स्नेहा, माँ पुरानी सोच की हैं, तुम ही थोड़ा एडजस्ट कर लो। आखिर तुम इस घर की बहू हो।” यह ‘बहू’ शब्द स्नेहा के कानों में किसी सीसे की तरह चुभता था। शादी से पहले जो लोग उसे ‘बेटी’ कहकर बुलाते नहीं थकते थे, आज वे उसे कदम-कदम पर ‘आदर्श बहू’ होने के नियम कायदे सिखा रहे थे।
कल्याणी को बेटी की बहुत फिक्र रहती थी। वह रोज़ शाम को स्नेहा को फोन करती, लेकिन स्नेहा हमेशा जल्दी में होती। “माँ, अभी खाना बनाना है,” या “माँ, अभी सासू माँ बुला रही हैं,” कहकर वह फोन काट देती। कल्याणी समझ रही थीं कि कुछ तो है जो स्नेहा उनसे छिपा रही है।
महीनों बीत गए। एक रविवार की दोपहर, कल्याणी ने स्नेहा को वीडियो कॉल किया। स्नेहा उस समय कपड़े धो रही थी। कैमरे में अपनी बेटी का उतरा हुआ चेहरा और आँखों के नीचे पड़े काले घेरे देखकर कल्याणी का दिल धक से रह गया।
“स्नेहा, तेरी ये क्या हालत हो गई है? तू ठीक तो है ना? कुणाल कैसा है? और सावित्री जी… वो तो तुझे बेटी मानती थीं ना?” कल्याणी ने एक ही सांस में कई सवाल पूछ डाले।
स्नेहा अब अपने आँसू नहीं रोक पाई। वह फफक-फफक कर रो पड़ी। “कहाँ की बेटी माँ? यहाँ तो मुझे एक मशीन समझ लिया गया है जो ऑफिस से पैसे भी कमाकर लाए और घर का सारा काम भी बिना उफ किए करे।
सासू माँ तो बस इस बात का इंतज़ार करती हैं कि मुझसे कोई छोटी सी गलती हो और वो मुझे ताने मार सकें। कल तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि तुम्हारे मायके वालों ने तुम्हें घर का काम करना नहीं सिखाया, सिर्फ किताबें रटा दीं।”
स्नेहा की सिसकियाँ कल्याणी के कलेजे को चीर रही थीं। “वो जो कहते थे ना माँ कि उन्हें बहू नहीं बेटी चाहिए… वो सब एक दिखावा था। उन्हें एक पढ़ी-लिखी, कमाने वाली बहू चाहिए थी जो उनके बेटे का रुतबा बढ़ाए, लेकिन घर के अंदर वो चाहते हैं कि मैं एक बिना ज़ुबान की नौकरानी बनकर रहूँ। एक बेटी के हिस्से की आज़ादी और प्यार यहाँ मेरे लिए नहीं है।”
कल्याणी अवाक रह गईं। उनके पास अपनी बेटी को सांत्वना देने के लिए कोई शब्द नहीं थे। उन्हें याद आया कि कैसे विदाई के समय सावित्री जी ने स्नेहा का माथा चूमकर उसे अपनी बेटी कहा था। फोन कटने के बाद, कल्याणी बहुत देर तक शून्य में देखती रहीं। उनकी आँखों से भी आँसू बह निकले।
उनके मन में एक ही विचार बार-बार आ रहा था, “आखिर हम औरतें ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन क्यों बन जाती हैं? एक सास जब अपनी बेटी को ससुराल विदा करती है तो रोती है, लेकिन जब वही सास किसी और की बेटी को अपने घर लाती है,
तो उसके भीतर की वह ममता, वह माँ का दिल अचानक पत्थर का क्यों हो जाता है? क्यों हम पीढ़ियों से चले आ रहे इस दर्दनाक दोहरे मापदंड को खत्म नहीं कर पाते?” कल्याणी को समझ आ गया था कि समाज चाहे जितना भी आधुनिक हो जाए, रिश्तों की यह कड़वी सच्चाई इतनी आसानी से नहीं बदलने वाली।
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– मिन्नी मिश्रा