जो बोओगे,वही काटोगे – मृणालिका दुबे

सुनीता की सुबह रोज़ चार बजे शुरू होती थी।

मुर्गे की पहली बाँग से भी पहले उसकी आँख खुल जाती। नींद चाहे पूरी हुई हो या नहीं, उसे उठना ही पड़ता था। सबसे पहले वो रसोई में जाती, गैस पर चाय चढ़ाती, फिर आटा गूँधती, बच्चों के टिफिन तैयार करती और साथ-साथ सास के लिए तुलसी वाली चाय भी बनाती।

उधर पूरा घर गहरी नींद में सो रहा होता… और इधर सुनीता का आधा दिन शुरू हो चुका होता।

उसकी जिंदगी एक घड़ी की तरह चलती थी—हर काम तय समय पर, बिना रुके, बिना शिकायत के।

पति रमेश एक प्राइवेट कंपनी में सुपरवाइज़र था। कमाई ठीक थी, लेकिन स्वभाव बहुत कड़वा। उसे हर बात में कमी निकालने की आदत थी।

“दाल में नमक कम है…”

“कपड़े ठीक से प्रेस क्यों नहीं हुए?”

“तुमसे एक काम ढंग से नहीं होता!”

सुनीता हर रोज़ ये सब सुनती, फिर भी चुप रहती।

क्योंकि उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि घर बचाने के लिए औरत को सहना पड़ता है।

कभी-कभी रात को सबके सो जाने के बाद वो छत पर जाकर आसमान देखती और सोचती—

“क्या मेरी जिंदगी बस यही है?”

लेकिन अगले ही पल बच्चों का ख्याल आते ही वो अपने मन को समझा लेती।

शादी से पहले सुनीता बहुत हुनरमंद थी। उसके हाथों की सिलाई पूरे मोहल्ले में मशहूर थी। लड़कियाँ त्योहारों पर उसके पास डिजाइन लेकर आतीं और वो बड़े प्यार से उनके कपड़े तैयार करती।

उसका सपना था कि एक दिन उसका अपना छोटा-सा बुटीक होगा।

लेकिन शादी के बाद वो सपना धीरे-धीरे रसोई के धुएँ में कहीं खो गया।

एक दिन दोपहर में पड़ोसन मीना उसके घर आई। हाथ में एक सूट था।

“सुनीता, ज़रा इसका गला ठीक कर दोगी? बाज़ार वाले बहुत पैसे माँग रहे हैं।”

सुनीता ने मुस्कुराकर कपड़ा ले लिया।

शाम तक उसने इतना सुंदर काम किया कि मीना देखते ही खुश हो गई।

“अरे वाह! ये तो बिल्कुल बुटीक जैसा लग रहा है!”

मीना ने जाते-जाते पाँच सौ रुपये उसके हाथ में रख दिए।

सुनीता घबरा गई—

“नहीं-नहीं दीदी, रहने दीजिए…”

लेकिन मीना ने उसका हाथ बंद करते हुए कहा—

“मेहनत की कमाई लेने में शर्म कैसी?”

उस रात सुनीता बहुत देर तक उन पैसों को देखती रही।

रकम बड़ी नहीं थी… मगर उसके लिए वो किसी इनाम से कम नहीं थी।

कई सालों बाद उसे लगा था कि उसकी मेहनत की भी कोई कीमत है।

धीरे-धीरे मोहल्ले की दूसरी औरतें भी आने लगीं। किसी को ब्लाउज सिलवाना होता, किसी को बच्चों की फ्रॉक।

सुनीता दिनभर घर का काम करती और रात में सबके सो जाने के बाद अपनी पुरानी सिलाई मशीन निकाल लेती।

उस मशीन की “ठक-ठक-ठक” आवाज़ में जैसे उसके दबे हुए सपने फिर से साँस लेने लगे थे।

लेकिन खुशियाँ ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकीं।

एक रात रमेश की नींद खुल गई। उसने कमरे की लाइट जलती देखी तो गुस्से में बाहर आ गया।

“ये रात के बारह बजे क्या तमाशा लगा रखा है?”

सुनीता डर गई।

“वो… थोड़ा सिलाई का काम था…”

रमेश ने मशीन की तरफ देखा और ताना मारते हुए बोला—

“अब कमाई करके मुझे एहसान दिखाओगी? घर की औरतों को ये सब शोभा नहीं देता।”

उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि सास भी जाग गईं।

उन्होंने भी तुरंत कहना शुरू कर दिया—

“बहुएँ अगर पैसे कमाने लगें ना, तो घर टूटते देर नहीं लगती।”

सुनीता चुपचाप मशीन बंद करके बैठ गई।

उस रात उसने तकिए में मुँह छिपाकर बहुत रोया।

उसे लगा शायद सच में वो गलत कर रही है।

अगले दिन उसने सिलाई का सामान अलमारी में रख दिया।

पूरा दिन उसका मन बुझा-बुझा रहा।

शाम को उसकी दस साल की बेटी पायल स्कूल से लौटी। उसने देखा कि माँ उदास बैठी है।

“मम्मी, आज सिलाई नहीं करोगी?”

सुनीता ने फीकी मुस्कान दी—

“नहीं बेटा… अब नहीं।”

पायल कुछ देर चुप रही, फिर धीरे से बोली—

“लेकिन मुझे तो अच्छा लगता है जब लोग आपकी तारीफ करते हैं।

मैं बड़ी होकर आपकी तरह बनना चाहती हूँ।”

ये सुनते ही सुनीता जैसे अंदर तक हिल गई।

उसे एहसास हुआ कि वो सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं जी रही… उसकी बेटी भी उसे देखकर सीख रही है।

अगर आज वो डरकर अपने सपने छोड़ देगी, तो कल उसकी बेटी भी हर बात पर समझौता करना सीख जाएगी।

उस रात सुनीता ने बहुत सोचा।

और अगले दिन उसने पहली बार रमेश से बिना डरे कहा—

“मैं घर का हर काम करूँगी… लेकिन सिलाई भी करूँगी। क्योंकि इससे मुझे खुशी मिलती है। और इसमें कोई गलत बात नहीं है।”

रमेश उसकी आँखों में पहली बार इतना आत्मविश्वास देखकर चुप रह गया।

शुरुआत आसान नहीं थी।

कई रिश्तेदार बातें बनाने लगे।

“अब बहू बिजनेस करेगी?”

“घर से बाहर निकलना शुरू कर दिया है…”

लेकिन सुनीता अब बदल चुकी थी।

वो किसी से लड़ती नहीं थी… बस चुपचाप अपना काम करती रहती।

धीरे-धीरे उसका काम बढ़ने लगा। उसने थोड़े पैसे जोड़कर नई सिलाई मशीन खरीदी। फिर घर के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगवाया—

“सुनीता सिलाई सेंटर”

जिस औरत ने सालों तक अपनी पहचान दबाकर रखी थी, आज वही दूसरी औरतों को हुनर सिखाने लगी थी।

मोहल्ले की कई लड़कियाँ उसके पास सिलाई सीखने आने लगीं।

किसी की आर्थिक मजबूरी थी, तो कोई अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी।

सुनीता हर लड़की से एक बात जरूर कहती—

“औरत अगर खुद पर भरोसा करना सीख जाए… तो उसकी जिंदगी बदल सकती है।”

समय के साथ रमेश का व्यवहार भी बदलने लगा।

उसे एहसास हुआ कि सुनीता की कमाई से घर की जरूरतें आसान हो रही हैं। बच्चों की पढ़ाई बेहतर हो गई थी।

एक दिन उसने चुपचाप सुनीता के लिए नई सिलाई मशीन लाकर रख दी।

सुनीता हैरानी से उसे देखने लगी।

रमेश धीमे स्वर में बोला—

“शायद… मैं ही गलत था।”

सुनीता की आँखें भर आईं।

लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं थे।

कुछ महीनों बाद स्कूल में महिला दिवस का कार्यक्रम था।

पायल मंच पर गई और बोली—

“मेरी प्रेरणा मेरी मम्मी हैं। उन्होंने मुझे सिखाया कि सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती।”

पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

भीड़ में बैठी सुनीता की आँखें नम थीं।

उसे याद आया वो समय, जब उसने अपने सपनों को खुद ही दफना दिया था।

लेकिन आज… वही सपने उसकी पहचान बन चुके थे।

उसने समझ लिया था—

जिंदगी में इंसान जो बोता है, वही पाता है।

अगर औरत अपने भीतर डर, चुप्पी और समझौते बोती रहेगी… तो उसे सिर्फ घुटन मिलेगी।

लेकिन अगर वो हिम्मत, आत्मसम्मान और मेहनत बोएगी…

तो एक दिन उसे सम्मान, पहचान और सुकून जरूर मिलेगा।

और सच यही है—

जो बोया… वही पाया।

लेखिका:-मृणालिका दुबे

पुणे

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