छलावे की बुनियाद

 रघुनाथ जी ने बिना किसी भाव के कहा, “मेरी बेटी कल रात मर गई है। मैं आज उसका श्राद्ध कर रहा हूँ। आज के बाद इस घर में उसका नाम नहीं लिया जाएगा।” एक पिता का दिल टूटकर बिखर चुका था। उन्होंने जीते-जी अपनी बेटी का पिंडदान कर दिया। इधर, ट्रेन में सफर करते हुए … Read more

माटी का कर्ज और स्वाभिमान

“क्या? तुम पागल हो गए हो समीर?” शिखा लगभग चीख पड़ी। “तुम उन लोगों के लिए अपना घर छोड़ोगे?” “हाँ शिखा,” समीर की आवाज में अब एक अजीब सा दर्द था। “क्योंकि बात मेरे वजूद की है, मेरी जड़ों की है। मैं आज जो भी हूँ, जिस घर में तुम ये किटी पार्टियां करती हो, … Read more

दिवाली का वो अनोखा उजियारा

सुधीर जी ने पास बैठी उस बीस साल की लड़की के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “ये मेरी बेटी श्रेया है। पिछले चार सालों से इसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी। दुनिया इसके लिए सिर्फ एक अंधेरा कमरा बन गई थी। लेकिन… आठ महीने पहले, इसे किसी फरिश्ते की आंखें मिलीं। … Read more

सम्मान मेरा भी – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

नगर के सबसे भव्य सभागार में वार्षिक नागरिक सम्मान समारोह आयोजित था। रंग-बिरंगी रोशनियाँ, फूलों की सजी कतारें और मंच पर सजे सम्मान-चिह्न इस बात के साक्षी थे कि आज समाज के विशिष्ट लोगों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जाना था। उद्योगपति, चिकित्सक, शिक्षाविद्, समाजसेवी और अधिकारी—सब अपनी-अपनी उपलब्धियों के साथ मंच पर … Read more

इज्जत

लाल सुर्ख जोड़े में सजी राधिका आईने के सामने बैठी थी। आज उसका रूप निखर कर आ रहा था, लेकिन यह चमक सिर्फ महंगे लहंगे या पुश्तैनी गहनों की नहीं थी। यह चमक उस सुकून और विजय की थी जिसे पाने के लिए उसने एक लंबा, मानसिक और भावनात्मक सफर तय किया था। बाहर आंगन … Read more

मुझे माफ़ कर दे छोटे…

सुरेखा भाभी ने आगे कहा, “वही तो! अगर इतना ही प्यार है अपनी माँ से, तो ले क्यों नहीं जाता अपने साथ? वहां जाकर कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा! लेकिन नहीं, वहां तो साहब को अपनी आज़ादी चाहिए। यहाँ हम दिन-रात खटते रहें और नाम उसका होता रहे कि ‘छोटा बेटा बहुत होनहार है’। सच … Read more

औरत का दिल

थोड़ी सी शर्म कर! तू एक जानवर से भी बदतर है। जिस बाप ने तुझे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, आज जब उसे तेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तो तूने उसे मरने के लिए छोड़ दिया। और जिस औरत पर तू ये हाथ उठा रहा है, आज उसी की वजह से तेरे पिता की सांसें … Read more

 परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता

रघुनाथ जी रो पड़े। उन्होंने शेखर को गले से लगा लिया। उनका बरसों का जमा हुआ दुख, वह धोखा, वह पीड़ा, सब शेखर के कंधों पर आँसुओं के रूप में बह निकली। “तुम सच कह रहे हो बेटा… मैंने जिसे अपना समझा, वह पराया निकला… और जिसे मैंने एक दिन यूँ ही इंसानियत के नाते … Read more

डांट में छिपे अथाह प्रेम – संगीता अग्रवाल

“अब तूने मुझे अपने हाथ से खिलाया है, तो थोड़ा मैं भी तुझे खिला दूँ। सुबह से तूने भी तो कुछ ढंग का नहीं खाया होगा मेरी इस ज़िद के चक्कर में,” शांति देवी ने कहते हुए एक निवाला सुमेधा के मुँह में डाल दिया। अयान, जो दरवाज़े के पीछे खड़ा सब कुछ सुन और … Read more

 काश… मेरा अपना कोई घर होता

विकास भी हमेशा अपने माता-पिता का ही पक्ष लेता। धीरे-धीरे बच्चों के मन में भी यह बात बैठ गई कि घर में असली सत्ता दादा-दादी और पापा की है, माँ तो बस घर का काम करने के लिए है। जैसे-जैसे शशांक और नव्या बड़े हुए, उन्होंने भी अंजलि की बातों को अनदेखा करना शुरू कर … Read more

error: Content is protected !!