सुधीर जी ने पास बैठी उस बीस साल की लड़की के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “ये मेरी बेटी श्रेया है। पिछले चार सालों से इसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी। दुनिया इसके लिए सिर्फ एक अंधेरा कमरा बन गई थी। लेकिन… आठ महीने पहले, इसे किसी फरिश्ते की आंखें मिलीं। आज ये जिस दुनिया को देख रही है, वो आपकी बेटी निहारिका की आंखों से देख रही है।”
यह सुनते ही दीनानाथ जी, सावित्री देवी और रोहन स्तब्ध रह गए। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
दीनानाथ जी के घर के दालान में आज एक अजीब सा, डरा देने वाला सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ था, पटाखों की गूँज से आसमान रोशन था, लेकिन उनके घर का आंगन घने अंधकार में डूबा था। आज दिवाली का पावन पर्व था, वह त्योहार जो कभी इस घर में महीनों पहले से खुशियां लेकर आता था।
रसोईघर से आज पकवानों की कोई खुशबू नहीं आ रही थी। सावित्री देवी, जो कभी इस दिन पूरे घर को दीयों से सजाने में थकती नहीं थीं, आज एक अंधेरे कोने में बैठी अपनी बेटी निहारिका की तस्वीर को सीने से लगाए मूक आंसू बहा रही थीं। बीच-बीच में उनकी दबी हुई सिसकियां घर के उस भयानक सन्नाटे को चीर देती थीं।
पास ही सोफे पर बैठा उनका छोटा बेटा रोहन शून्य में घूर रहा था। उसकी आँखों के सामने पिछले साल की दिवाली का दृश्य चलचित्र की तरह घूम रहा था। निहारिका दीदी की वो चुलबुली बातें, उनका पूरे घर में रंगोली बनाने के लिए दौड़ना, और भाई-बहन की वो मीठी नोकझोंक। निहारिका को गए हुए अब आठ महीने बीत चुके थे, लेकिन इस घर के लिए जैसे वक्त उसी मनहूस दिन पर ठहर गया था।
निहारिका एक बेहद मेधावी आर्किटेक्ट थी। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उसे बेंगलुरु की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर आर्किटेक्ट की नौकरी मिली, तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी। लेकिन उस खुशी के पीछे एक अनजाना सा डर और विदाई का दुख भी छिपा था।
“अरे मां! तुम क्यों इतना परेशान हो रही हो? बेंगलुरु कोई विदेश थोड़ी है। और अब तो फ्लाइट से बस कुछ ही घंटों का रास्ता है।” निहारिका ने अपनी मां को समझाते हुए कहा था, जब सावित्री देवी उसकी पैकिंग करते हुए बार-बार रो पड़ रही थीं।
“बात दूरी की नहीं है निहू,” सावित्री देवी ने अपना पल्लू आंखों से लगाते हुए कहा था, “तू कभी घर से बाहर नहीं रही। वहां का खाना-पीना अलग, लोग अलग, भाषा अलग। तू कैसे एडजस्ट करेगी? और मुझे तो डर है कि तू काम में इतना उलझ जाएगी कि हमें भूल ही जाएगी।”
तभी रोहन ने बीच में कूदते हुए मज़ाक किया था, “मां को असल में इस बात की चिंता है कि कहीं इनकी लाड़ली बेटी किसी साउथ इंडियन इंजीनियर को अपना दिल न दे बैठे। फिर मां को इडली-डोसा बनाना सीखना पड़ेगा।”
“चुप कर शैतान!” निहारिका ने रोहन के सिर पर हल्का सा मारते हुए कहा था, और फिर सावित्री देवी के गले लगकर बोली थी, “मां, तुम बिल्कुल फिक्र मत करो। मैं तुम्हारी वही निहू रहूंगी। और हां, इस बार दिवाली पर चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, मैं सबसे पहले घर आऊंगी और हम सब मिलकर बहुत बड़ी दिवाली मनाएंगे। मैंने तो अभी से सोच लिया है कि इस बार घर का कोना-कोना कैसे सजाना है।”
निहारिका बेंगलुरु चली गई। शुरुआत में उसे थोड़ी परेशानी हुई, लेकिन उसने जल्दी ही सब कुछ संभाल लिया। वह हर रोज़ शाम को नियम से घर पर वीडियो कॉल करती थी। कभी वो मां को अपना नया ऑफिस दिखाती, तो कभी पापा को वहां के मौसम का हाल बताती। दूरी के बावजूद उसने घर से अपना नाता और गहरा कर लिया था। दीनानाथ जी का चश्मा टूट जाता तो अगले ही दिन बेंगलुरु से नया चश्मा कूरियर से आ जाता। रोहन को कोई नई किताब चाहिए होती, तो वो बिना मांगे उसके कमरे में पहुंच जाती। निहारिका मीलों दूर रहकर भी इस घर की धुरी बनी हुई थी।
वक्त अपनी रफ्तार से उड़ रहा था। दिवाली में बस एक महीना बचा था और निहारिका ने अपने आने का टिकट भी परिवार को व्हाट्सएप कर दिया था। दीनानाथ जी और सावित्री देवी अपनी बेटी के स्वागत की तैयारियों में जुट गए थे। घर में रंग-रोगन शुरू हो गया था।
लेकिन फिर वो मनहूस शाम आई जिसने इस परिवार की दुनिया ही उजाड़ दी। निहारिका के ऑफिस के एक सहकर्मी, कबीर का फोन आया। फोन रोहन ने उठाया था। कबीर की कांपती हुई आवाज़ ने बताया कि निहारिका अपनी एक कंस्ट्रक्शन साइट के मुआयने के लिए गई थी, जहां एक भारी लोहे का ढांचा गिरने से वह गंभीर रूप से घायल हो गई है। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया है, लेकिन हालत बहुत नाज़ुक है।
यह खबर सुनते ही घर में जैसे वज्रपात हो गया। दीनानाथ जी, सावित्री देवी और रोहन रात की ही फ्लाइट पकड़कर बदहवास हालत में बेंगलुरु पहुंचे। अस्पताल के आईसीयू के बाहर का वो मंज़र दीनानाथ जी आज भी नहीं भूल पाते। मशीनों की बीप-बीप की आवाज़ों के बीच सफेद चादरों में लिपटी उनकी फूल सी बच्ची पड़ी थी।
डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, लेकिन निहारिका के सिर पर लगी चोट इतनी गहरी थी कि उसे बचाया नहीं जा सका। तीसरे दिन सुबह डॉक्टरों ने भारी मन से घोषित कर दिया कि निहारिका ‘ब्रेन डेड’ हो चुकी है। उसका मस्तिष्क हमेशा के लिए काम करना बंद कर चुका है और अब उसके वापस लौटने की कोई उम्मीद नहीं है।
सावित्री देवी यह सुनते ही बेहोश होकर गिर पड़ीं। दीनानाथ जी पत्थर की मूरत बन गए, उनकी आंखों से आंसू तक सूख गए थे। नियति ने उनके साथ इतना क्रूर मज़ाक किया था कि उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें।
अस्पताल के उस निराशाजनक माहौल में कबीर, जो निहारिका का अच्छा दोस्त भी था, भारी कदमों से दीनानाथ जी के पास आया। उसके साथ अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर भी थे।
“अंकल…” कबीर ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “मैं जानता हूं कि यह समय इन बातों का नहीं है। निहारिका हमारे बीच नहीं रही, यह हम सबके लिए एक ऐसा सदमा है जिससे हम कभी उबर नहीं पाएंगे। लेकिन… एक बहुत ज़रूरी बात आपको बतानी थी।”
“क्या बचा है अब बताने को बेटा? हमारी तो दुनिया ही उजड़ गई।” दीनानाथ जी ने शून्य में देखते हुए कहा।
“अंकल, निहारिका ने पिछले साल ऑफिस में हुए एक मेडिकल कैंप के दौरान अपने अंगों के दान का संकल्प लिया था। उसने एक फॉर्म भरा था कि यदि कभी उसे कुछ हो जाए, तो उसके शरीर के उपयोगी अंग ज़रूरतमंदों को दान कर दिए जाएं। डॉक्टर साहब का कहना है कि निहारिका का शरीर अभी स्वस्थ है, केवल मस्तिष्क मृत हुआ है। अगर आप लोग अनुमति दें, तो…”
“बस!” दीनानाथ जी अचानक गुस्से और पीड़ा से चीख पड़े। “मेरी बच्ची कोई निर्जीव वस्तु नहीं है जिसके टुकड़े कर दिए जाएं। हम हिंदू धर्म को मानने वाले लोग हैं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि शरीर का दाह संस्कार पूर्ण रूप से होना चाहिए, वरना आत्मा को शांति नहीं मिलती। मैं अपनी फूल जैसी बच्ची के शरीर को इस तरह कटने-फटने नहीं दूंगा। यह पाप है!”
सावित्री देवी भी रोते हुए बोलीं, “नहीं-नहीं, मेरी बच्ची को और दर्द मत दो। उसे मेरे पास ले चलो।”
वहां खड़े सभी लोग निशब्द रह गए। दीनानाथ जी का क्रोध और उनकी पीड़ा दोनों ही अपनी जगह जायज़ थे। कोई भी पिता अपनी जवान बेटी के शरीर को इस तरह सौंपने की कल्पना भी नहीं कर सकता था।
तभी रोहन, जो अब तक एक कोने में चुपचाप रो रहा था, उठकर अपने पिता के पास आया। उसने अपने पिता के दोनों हाथ कसकर पकड़ लिए। “पापा… दीदी हमेशा दूसरों के लिए जीती थी। याद है, बचपन में जब मेरे पास खिलौने नहीं होते थे, तो वो अपनी गुड़िया मुझे दे देती थी। जब किसी गरीब को देखती थी, तो अपना टिफिन उसे दे आती थी। दान करना तो उसके स्वभाव में था।”
“रोहन, तू क्या कह रहा है? तू चाहता है कि मैं अपनी ही बेटी के शरीर को…” दीनानाथ जी फफक पड़े।
“पापा, गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि आत्मा अमर है, वह केवल शरीर बदलती है। दीदी का यह शरीर कल चिता की आग में जलकर राख हो जाएगा। लेकिन अगर उसकी आंखों से कोई फिर से इस खूबसूरत दुनिया को देख पाए, अगर उसका दिल किसी और के सीने में धड़कता रहे, तो क्या दीदी सचमुच मरेगी? पापा, दीदी की आखिरी इच्छा को मत मारिए। उसे वो करने दीजिए जो वो हमेशा से करना चाहती थी—दूसरों को जीवन देना। मुझे अपनी दीदी पर गर्व है, और मैं चाहता हूं कि आपको भी हो।”
रोहन की बातों में इतनी गहराई और सत्य था कि दीनानाथ जी का विरोध आंसुओं में बह गया। उन्होंने कांपते हाथों से अंगदान के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। निहारिका के अंगों ने कई लोगों को नया जीवन दिया, लेकिन दीनानाथ जी का परिवार अपनी बेटी की राख कलश में लेकर एक खालीपन के साथ वापस अपने शहर लौट आया।
उसके बाद से इस घर में कोई त्योहार नहीं मना। वो खुशियों से भरा घर एक खंडहर सा महसूस होने लगा। और आज, उसी सूनेपन के बीच, बाहर जलते पटाखों की आवाज़ उनके अंदर के घावों को और गहरा कर रही थी।
अचानक, इस डरावनी शांति को चीरते हुए घर की डोरबेल बजी।
रोहन ने चौंककर दरवाज़े की तरफ देखा। “इस वक्त कौन हो सकता है?” उसने सोचा। दीनानाथ जी भी अपनी जगह से उठ खड़े हुए। रोहन ने जाकर दरवाज़ा खोला।
दरवाज़े पर पांच अजनबी लोग खड़े थे। उनमें एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, एक बीस-बाईस साल की लड़की, एक बारह साल का छोटा लड़का और एक बुजुर्ग दंपत्ति शामिल थे। अधेड़ उम्र वाले व्यक्ति के हाथ में दीयों से सजा एक बड़ा सा थाल था और मिठाई का डिब्बा था।
“जी… आप लोग कौन हैं? किससे मिलना है?” रोहन ने उलझन में पूछा।
“क्या हम अंदर आ सकते हैं?” उस व्यक्ति ने बहुत ही नम्र और कांपती हुई आवाज़ में पूछा।
आवाज़ सुनकर दीनानाथ जी और सावित्री देवी भी दरवाज़े तक आ गए। उन अजनबियों के चेहरों पर एक अजीब सी श्रद्धा और आंखों में आंसू थे। दीनानाथ जी ने उन्हें अंदर आने का इशारा किया।
ड्राइंग रूम में सब सोफे पर बैठ गए। कुछ देर तक एक भारी खामोशी छाई रही। फिर उस अधेड़ व्यक्ति ने दीनानाथ जी की तरफ हाथ जोड़ लिए।
“मेरा नाम सुधीर है,” उस व्यक्ति ने रुंधे हुए गले से कहना शुरू किया। “और हम सब बेंगलुरु से आए हैं।”
‘बेंगलुरु’ शब्द सुनते ही सावित्री देवी के रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आंखों में फिर से निहारिका का चेहरा तैरने लगा।
सुधीर जी ने पास बैठी उस बीस साल की लड़की के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “ये मेरी बेटी श्रेया है। पिछले चार सालों से इसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी। दुनिया इसके लिए सिर्फ एक अंधेरा कमरा बन गई थी। लेकिन… आठ महीने पहले, इसे किसी फरिश्ते की आंखें मिलीं। आज ये जिस दुनिया को देख रही है, वो आपकी बेटी निहारिका की आंखों से देख रही है।”
यह सुनते ही दीनानाथ जी, सावित्री देवी और रोहन स्तब्ध रह गए। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
श्रेया अपनी जगह से उठी और सावित्री देवी के पैरों के पास फर्श पर बैठ गई। उसने सावित्री देवी के कांपते हाथों को अपने गालों से लगाया और रोते हुए बोली, “मुझे नहीं पता था कि मुझे रोशनी देने वाली की मां कैसी दिखती होगी। लेकिन आज आपको देखकर लगता है कि मैं अपनी ही मां को देख रही हूं। आपकी निहारिका कहीं नहीं गई है, वह मेरे साथ है, इस दुनिया को देख रही है।”
सावित्री देवी ने श्रेया का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और उसकी आंखों में गहराई से झांकने लगीं। उन्हें उन आंखों में अपनी निहारिका की वो ही पुरानी चमक दिखाई दी। उनके सब्र का बांध टूट गया और वे श्रेया को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगीं।
तभी वो बारह साल का छोटा लड़का आगे आया। उसके साथ खड़े बुजुर्ग दंपत्ति ने कहा, “भाई साहब, यह हमारा पोता अमन है। इसे जन्म से ही दिल की गंभीर बीमारी थी। डॉक्टर जवाब दे चुके थे। लेकिन आपकी बेटी के दिल ने हमारे पोते को एक नई ज़िंदगी दी है।”
अमन ने मासूमियत से सावित्री देवी और दीनानाथ जी को प्रणाम किया। सावित्री देवी ने अपना हाथ अमन के सीने पर रखा। वहां धड़कता हुआ दिल उनकी उंगलियों को महसूस हो रहा था। उन्हें लगा जैसे उनकी निहारिका उनके स्पर्श का जवाब दे रही हो।
सुधीर जी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “हमें अस्पताल से सिर्फ इतना पता चला था कि दानदाता का परिवार इस शहर में रहता है। बहुत मुश्किल से हमने आपका पता ढूंढा है। आज दिवाली का दिन है। हम जानते थे कि आज आपके घर में अंधेरा होगा। लेकिन जिस बेटी ने हम पांच परिवारों की ज़िंदगी में रोशनी भर दी, उसके खुद के घर में अंधेरा कैसे रह सकता है? आज निहारिका हम सबके रूप में अपने घर वापस आई है, दिवाली मनाने।”
सुधीर जी ने अपने साथ लाया दीयों का थाल रोहन के हाथों में दे दिया।
दीनानाथ जी, जो अब तक निशब्द थे, उठे और उन्होंने सुधीर जी और अमन को बारी-बारी से गले लगा लिया। जो पिता अंगदान को पाप समझता था, आज उसे अपनी बेटी के उस फैसले पर असीम गर्व महसूस हो रहा था। उन्होंने महसूस किया कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि निहारिका ने मृत्यु को भी मात देकर अमरता प्राप्त कर ली है।
उस रात, उस घर का कोना-कोना दीयों की रोशनी से जगमगा उठा। सावित्री देवी ने खुद अपने हाथों से श्रेया, अमन और बाकी सभी मेहमानों को मिठाई खिलाई। रोहन दीयों को सजाते हुए मुस्कुरा रहा था, क्योंकि वह जानता था कि उसकी दीदी ने अपना वादा निभाया था—वह दिवाली पर घर वापस लौट आई थी, एक नहीं, बल्कि कई चेहरों के साथ।
घर के आंगन में जलते दीयों की लौ आज हवा से बुझने से नहीं डर रही थी, क्योंकि यह वो रोशनी थी जो कभी बुझ नहीं सकती थी। यह परोपकार, प्रेम और जीवन के अटूट स्पंदन की रोशनी थी। दीनानाथ जी के घर में आज मृत्यु का मातम नहीं, बल्कि जीवन का सबसे अनूठा और पवित्र उत्सव मनाया जा रहा था।
क्या इस कहानी ने आपकी आंखों को भी नम किया?
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