“अब तूने मुझे अपने हाथ से खिलाया है, तो थोड़ा मैं भी तुझे खिला दूँ। सुबह से तूने भी तो कुछ ढंग का नहीं खाया होगा मेरी इस ज़िद के चक्कर में,” शांति देवी ने कहते हुए एक निवाला सुमेधा के मुँह में डाल दिया।
अयान, जो दरवाज़े के पीछे खड़ा सब कुछ सुन और देख रहा था, उसकी आँखों में भी नमी आ गई। उसने देखा कि बिस्तर पर एक सास और बहू नहीं बैठी थीं, बल्कि एक माँ और बेटी बैठी थीं। एक ऐसी बेटी जो अपनी माँ की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती थी, और एक ऐसी माँ जिसने अपनी बेटी की मीठी डांट में छिपे अथाह प्रेम को समझ लिया था।
शांति देवी, जिनकी उम्र पचहत्तर के पार हो चुकी थी, दबे पाँव रसोई की तरफ बढ़ रही थीं। उनके कदमों में एक अजीब सी सतर्कता थी, जैसे कोई बच्चा चोरी-छिपे डिब्बे से कुकीज़ निकालने जा रहा हो। शांति देवी को पिछले महीने ही डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी थी कि उनके बढ़ते ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को देखते हुए तला-भुना और मसालेदार खाना उनके लिए किसी ज़हर से कम नहीं है। लेकिन आज पड़ोस की विमला ताई उनके लिए खास तौर पर घर के बने कुरकुरे समोसे और तीखी हरी चटनी भिजवा गई थीं।
शांति देवी ने रसोई के दरवाज़े से झाँका। उनकी बहू, सुमेधा, जो अभी-अभी कपड़े सुखाकर ऊपर से लौटी थी, अपने कमरे में कुछ काम कर रही थी। “यही सही मौका है,” शांति देवी ने मन ही मन सोचा। उन्होंने प्लेट में से एक बड़ा सा समोसा उठाया और जैसे ही उसे चटनी में डुबोकर मुँह के पास ले जाने वाली थीं, पीछे से एक कड़क और जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी।
“ये क्या हो रहा है माँ जी?”
शांति देवी के हाथ वहीं रुक गए। समोसा प्लेट में गिर पड़ा। उन्होंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सुमेधा दरवाज़े पर खड़ी थी, उसकी आँखें बड़ी थीं और चेहरे पर सख्त नाराज़गी साफ झलक रही थी। सुमेधा ने आगे बढ़कर प्लेट को उनके हाथ से ले लिया और उसे दूर स्लैब पर रख दिया।
“सुमेधा, वो… वो बस एक छोटा सा टुकड़ा चख रही थी। विमला ने इतने प्यार से भेजा है, मना कैसे करती?” शांति देवी ने नज़रें चुराते हुए एक कमज़ोर सा बहाना बनाया।
“मना मैं कर दूंगी विमला ताई को! उन्हें भी तो समझना चाहिए कि आपकी तबीयत कैसी रहती है। और आप? डॉक्टर ने क्या कहा था? एक बार भी सीने में दर्द हुआ तो सीधे अस्पताल जाना पड़ेगा। फिर भी आपको ये सब खाना है? अभी सुबह ही आपकी दवाइयों का डब्बा मैंने चेक किया, कल रात की गोली भी आपने बिस्तर के नीचे छिपा दी थी। क्या समझ रखा है आपने अपनी सेहत को?” सुमेधा की आवाज़ में गुस्सा कम और चिंता ज़्यादा थी, लेकिन उसका लहज़ा किसी सख्त माँ जैसा था जो अपने बच्चे को डांट रही हो।
शांति देवी को अपनी चोरी पकड़े जाने पर शर्मिंदगी तो थी, लेकिन सुमेधा की इस कड़क डांट ने उनके अंदर के अहं को जगा दिया। “तू मुझे सिखाएगी कि मुझे क्या खाना है और क्या नहीं? इस घर को, इस रसोई को मैंने चालीस साल तक संभाला है। सबको क्या खाना है, ये मैं तय करती थी। और आज तू मुझे एक समोसे के लिए डांट रही है? बहू है, बहू की तरह रह। मेरी माँ बनने की कोशिश मत कर!”
शांति देवी गुस्से से पैर पटकते हुए रसोई से बाहर निकलीं और अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया।
सुमेधा वहीं रसोई में खड़ी रह गई। उसने एक गहरी साँस ली और स्लैब पर टिक गई। उसे बुरा लग रहा था कि उसने अपनी सास से इतने ऊँचे स्वर में बात की, लेकिन उसे यह भी पता था कि अगर वो आज नरमी बरतती, तो शांति देवी अपनी सेहत के साथ ऐसे ही खिलवाड़ करती रहतीं। सुमेधा के लिए शांति देवी सिर्फ एक सास नहीं थीं। पाँच साल पहले जब सुमेधा इस घर में ब्याह कर आई थी, तो उसके कुछ ही महीनों बाद एक हादसे में सुमेधा की अपनी माँ गुज़र गई थीं। उस भयानक सदमे से सुमेधा को अगर किसी ने निकाला था, तो वो शांति देवी ही थीं। उन्होंने सुमेधा को अपने सीने से लगाकर कहा था, “रो मत मेरी बच्ची, आज से मैं तेरी सास नहीं, तेरी माँ हूँ। तेरी हर ज़िद, तेरे हर नखरे मैं उठाऊँगी।” और शांति देवी ने अपना वादा निभाया भी था। अब, जब उम्र के इस पड़ाव पर शांति देवी खुद एक कमज़ोर और ज़िद्दी बच्ची बन गई थीं, तो सुमेधा कैसे उन्हें उनके हाल पर छोड़ सकती थी?
शाम ढल चुकी थी। घर में अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। शांति देवी ने दोपहर का खाना नहीं खाया था और कमरे से बाहर भी नहीं निकली थीं। सुमेधा का पति, अयान, जब ऑफिस से लौटा तो घर का सन्नाटा देखकर समझ गया कि ज़रूर सास-बहू के बीच कोई ‘महायुद्ध’ हुआ है।
“क्या बात है सुमेधा? माँ के कमरे का दरवाज़ा बंद क्यों है और तुम इतनी उदास क्यों बैठी हो?” अयान ने अपना बैग सोफे पर रखते हुए पूछा।
सुमेधा ने अयान को पूरी बात बताई। अयान मुस्कुरा दिया। “तुम भी ना सुमेधा, माँ को एक समोसा खा लेने देती। बूढ़ी हैं, कभी-कभी मन कर जाता है।”
सुमेधा ने अयान को घूर कर देखा। “तुम्हें उनकी सेहत की कोई परवाह नहीं है क्या? डॉक्टर ने कहा है कि उनका हार्ट बहुत कमज़ोर है। अगर उन्हें कुछ हो गया तो? तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो, लेकिन मैं उन्हें रोज़ देखती हूँ। वो रात-रात भर दर्द से करवटें बदलती हैं, लेकिन हमें बताती नहीं हैं ताकि हम परेशान न हों। मैं उन्हें अपनी आँखों के सामने इस तरह खुद को नुकसान पहुँचाते हुए नहीं देख सकती। तुम बीच में मत पड़ो, ये माँ और बेटी के बीच का मामला है, मैं खुद सुलझा लूंगी।”
अयान चुपचाप अपने कमरे में चला गया, वह जानता था कि जब सुमेधा ने ‘माँ-बेटी’ कह दिया है, तो अब उसका इस मामले में दखल देना ठीक नहीं है।
रात के आठ बज चुके थे। सुमेधा रसोई में गई। उसने शांति देवी की पसंद का वेजिटेबल सूप बनाया, जिसमें ढेर सारी गाजर, बीन्स और हल्का सा मक्खन था। साथ में सूजी का एक बहुत ही नरम और स्वादिष्ट चीला तैयार किया। उसने एक सुंदर सी ट्रे में खाना सजाया, साथ में पानी का गिलास और उनकी रात की दवाइयाँ रखीं, और धीरे-धीरे शांति देवी के कमरे की तरफ बढ़ी।
कमरे का दरवाज़ा अंदर से लॉक नहीं था, बस सटा हुआ था। सुमेधा ने पैर से दरवाज़ा धकेला और अंदर दाखिल हुई। कमरे में हल्की सी रोशनी थी। शांति देवी बिस्तर पर करवट लिए लेटी थीं, उनकी पीठ दरवाज़े की तरफ थी।
“माँ जी, उठिए। रात का खाना तैयार है।” सुमेधा ने ट्रे को साइड टेबल पर रखते हुए बहुत ही नरम आवाज़ में कहा।
शांति देवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वे वैसे ही लेटी रहीं।
सुमेधा बिस्तर के किनारे बैठ गई और उसने शांति देवी के कंधे पर हाथ रखा। “अभी भी गाल फुलाए बैठी हैं? आप तो मुझसे भी ज़्यादा ज़िद्दी हैं। चलिए उठिए, देखिए मैंने आपके लिए क्या बनाया है।”
शांति देवी ने झटके से सुमेधा का हाथ हटा दिया और उठकर बैठ गईं। उनकी आँखों में शिकायत थी। “मुझे नहीं खाना कुछ भी। ले जा इसे यहाँ से। जब मैं अपनी मर्ज़ी का एक टुकड़ा नहीं खा सकती, तो तेरे हाथ का ये उबला हुआ खाना भी क्यों खाऊँ? और तू यहाँ क्यों आई है? अभी दोपहर में तो मुझ पर हुक्म चला रही थी। जा, जाकर अपना काम कर।”
सुमेधा मुस्कुराई। उसने देखा कि शांति देवी की आँखों के किनारे हल्के से भीगे हुए थे। वो जानती थी कि ये गुस्सा नहीं, बल्कि उम्र का वो खालीपन है जहाँ इंसान बस थोड़ा सा प्यार और तवज्जो चाहता है।
सुमेधा ने ट्रे से सूप का कटोरा उठाया, चम्मच से थोड़ा सा सूप लिया, उसे फूँक मारकर ठंडा किया और शांति देवी के होठों के पास ले गई। “मुझे पता है आपको मुझ पर बहुत गुस्सा आ रहा है। आप सोच रही हैं कि जो बहू कल तक मेरे आँचल में छुपकर रोती थी, आज वो मुझे आँखें दिखा रही है। लेकिन आप ही बताइए माँ जी, अगर एक बच्ची अपनी माँ की सेहत का ध्यान नहीं रखेगी, तो कौन रखेगा?”
शांति देवी ने मुँह फेर लिया। “मुझे नहीं चाहिए ऐसी परवाह। मैंने सारी उम्र इस परिवार को संभाला है, अब मुझे किसी की रोक-टोक की ज़रूरत नहीं है।”
सुमेधा ने कटोरा वापस ट्रे में रख दिया। उसकी भी आँखें अब भर आई थीं। उसने शांति देवी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “आप भूल गईं माँ जी? जब पाँच साल पहले मेरी माँ मुझे छोड़कर चली गई थीं, तब मैं कितनी टूट गई थी। मैं खाना-पीना भूल गई थी, बस रोती रहती थी। तब आप मेरे पास आई थीं। आपने मुझे अपने हाथ से खाना खिलाया था और कहा था कि ‘मैं हूँ ना तेरी माँ’। आपने मुझे उस दर्द से बाहर निकाला। आपने अपना वादा निभाया माँ जी।”
सुमेधा की आवाज़ भारी हो गई और उसके गालों पर आँसू लुढ़क आए। “अब जब आप कमज़ोर हो गई हैं, जब आप अपनी ही सेहत की दुश्मन बन गई हैं, तो क्या मेरा फर्ज़ नहीं बनता कि मैं आपको रोकूँ? मैं पहले ही अपनी एक माँ को खो चुकी हूँ, माँ जी। मैंने देखा है कि जब एक माँ हमेशा के लिए चली जाती है, तो घर कितना सूना हो जाता है। मैं उस खालीपन से गुज़र चुकी हूँ। अब मैं अपनी दूसरी माँ को नहीं खोना चाहती। अगर आपको मेरी डांट बुरी लगती है, तो मैं माफी मांगती हूँ। कान पकड़ती हूँ आपके सामने। लेकिन भगवान के लिए, अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ मत कीजिए। मैं आपके बिना इस घर की कल्पना भी नहीं कर सकती।”
यह कहते-कहते सुमेधा फफक कर रो पड़ी और उसने अपना सिर शांति देवी की गोद में रख दिया।
कमरे में कुछ पलों के लिए एकदम सन्नाटा छा गया। शांति देवी का गुस्सा, उनका अहम, उनकी सारी शिकायतें सुमेधा के उन सच्चे और गर्म आँसुओं में जैसे पिघल कर बह गईं। उन्हें अचानक इस बात का एहसास हुआ कि सुमेधा का वो गुस्सा, वो डांट, कोई हुक्म जताना नहीं था, बल्कि उन्हें खो देने का वो गहरा डर था, जो सिर्फ एक बेटी के दिल में अपनी माँ के लिए हो सकता है।
शांति देवी के कांपते हुए हाथ उठे और उन्होंने सुमेधा के सिर को सहलाना शुरू कर दिया। उनकी अपनी आँखों से भी आँसू बहने लगे थे। “चुप कर पगली… रोती क्यों है? इतनी बड़ी हो गई है, घर चलाती है, और अभी भी बच्चों की तरह रो रही है।”
सुमेधा ने सिर उठाया, उसकी नाक लाल हो रही थी। “तो आप प्रॉमिस कीजिए कि आगे से चोरी-छिपे वो सब नहीं खाएंगी जो डॉक्टर ने मना किया है? और अपनी दवाइयां समय पर लेंगी?”
शांति देवी ने हल्के से मुस्कुराते हुए सुमेधा के आँसू पोंछे। “अच्छा बाबा, प्रॉमिस। अब तू ऐसे रोकर डराएगी, तो मैं समोसा तो क्या, पानी भी पूछ कर पियूँगी। अब चुप हो जा। तूने तो मुझे रुला ही दिया।”
सुमेधा भी मुस्कुरा दी। उसने फिर से सूप का कटोरा उठाया और चम्मच शांति देवी के मुँह के पास ले गई। शांति देवी ने इस बार बिना किसी नखरे के सूप पी लिया। फिर उन्होंने सुमेधा के हाथ से चम्मच ले ली।
“अब तूने मुझे अपने हाथ से खिलाया है, तो थोड़ा मैं भी तुझे खिला दूँ। सुबह से तूने भी तो कुछ ढंग का नहीं खाया होगा मेरी इस ज़िद के चक्कर में,” शांति देवी ने कहते हुए एक निवाला सुमेधा के मुँह में डाल दिया।
अयान, जो दरवाज़े के पीछे खड़ा सब कुछ सुन और देख रहा था, उसकी आँखों में भी नमी आ गई। उसने देखा कि बिस्तर पर एक सास और बहू नहीं बैठी थीं, बल्कि एक माँ और बेटी बैठी थीं। एक ऐसी बेटी जो अपनी माँ की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती थी, और एक ऐसी माँ जिसने अपनी बेटी की मीठी डांट में छिपे अथाह प्रेम को समझ लिया था।
उस रात उस कमरे में सूप का स्वाद शायद दुनिया के सबसे महँगे पकवान से भी ज़्यादा मीठा था, क्योंकि उसमें सिर्फ नमक-मिर्च नहीं, बल्कि रिश्तों की वो मिठास घुली थी जो उम्र के साथ और भी गहरी होती जाती है। बुढ़ापा भले ही इंसान को बच्चा बना देता हो, लेकिन जब उस बच्चे को संभालने के लिए घर में प्यार से भरी एक ‘माँ’ रूपी बहू मौजूद हो, तो वो बुढ़ापा किसी वरदान से कम नहीं लगता।
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल