सम्मान मेरा भी – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

नगर के सबसे भव्य सभागार में वार्षिक नागरिक सम्मान समारोह आयोजित था। रंग-बिरंगी रोशनियाँ, फूलों की सजी कतारें और मंच पर सजे सम्मान-चिह्न इस बात के साक्षी थे कि आज समाज के विशिष्ट लोगों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जाना था।

उद्योगपति, चिकित्सक, शिक्षाविद्, समाजसेवी और अधिकारी—सब अपनी-अपनी उपलब्धियों के साथ मंच पर आमंत्रित किए जा रहे थे। हर नाम के साथ तालियों की गूँज उठती और कैमरों की चमक उस क्षण को कैद कर लेती।

उसी सभागार के बाहर, प्रवेश द्वार के पास, शांता देवी हाथ में झाड़ू लिए चुपचाप सूखे पत्ते समेट रही थीं। उम्र साठ के पार पहुँच चुकी थी। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, मगर आँखों में अजीब-सी शांति थी।

पिछले सत्ताईस वर्षों से यही उनका संसार था। इस भवन में जितने भी बड़े कार्यक्रम हुए, हर आयोजन से पहले उन्होंने ही इसे चमकाया था। लोग आए, सम्मान पाए, चले गए—पर किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि इस चमक के पीछे किसका श्रम है।

तभी कुछ बच्चे हँसते-भागते आए। उन्होंने पानी की खाली बोतलें और चिप्स के पैकेट वहीं फेंक दिए। शांता देवी बिना कुछ कहे उन्हें उठाने लगीं। तभी एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा, “मम्मी, ये आंटी हमेशा सफाई ही करती रहती हैं?”

माँ ने सहज भाव से कहा, “बेटा, यही इनका काम है।”

शांता देवी मुस्करा तो दीं, पर भीतर कहीं एक टीस उठी। क्या सचमुच उनका परिचय केवल इतना ही था—”यही इनका काम है”?

उसी समय पत्रकारिता की छात्रा रागिनी वहाँ पहुँची। वह समारोह की रिपोर्टिंग करने आई थी। उसकी नज़र शांता देवी पर ठिठक गई।

“अम्मा, कब से काम कर रही हैं यहाँ?”

“सत्ताईस साल हो गए बिटिया।”

“कभी किसी ने आपका सम्मान किया?”

शांता देवी ने हल्की-सी हँसी हँस दी।

“हमारे हिस्से सम्मान कहाँ? लोग कूड़ा डिब्बे में डाल दें, हमें इंसान समझकर दो मीठे बोल बोल दें, वही बहुत बड़ा सम्मान है।”

“आपको बुरा नहीं लगता?”

“लगता है बिटिया। गंदगी फैलाने वाला कभी शर्मिंदा नहीं होता, लेकिन उसे साफ करने वाला अक्सर लोगों की नज़रों में छोटा हो जाता है। यही दुख है।”

रागिनी के भीतर कुछ काँप गया। उसने कैमरा बंद कर दिया, क्योंकि अब वह समाचार नहीं, एक सच सुन रही थी।

अंदर मंच पर भाषण चल रहा था—

“हम उन्हीं लोगों का सम्मान करते हैं, जिनके कारण समाज आगे बढ़ता है।”

रागिनी से रहा नहीं गया। कार्यक्रम के अंत में उसने संचालक से दो मिनट बोलने की अनुमति माँगी।

“मैं आज जिन महान लोगों का सम्मान हुआ है, उनका पूरा आदर करती हूँ,” उसने कहा, “लेकिन मैं एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ। इस सभागार की सफाई यदि आज न हुई होती, तो क्या यह समारोह इतनी गरिमा से हो पाता? बाहर एक महिला बैठी हैं। सत्ताईस वर्षों से उन्होंने इस भवन की सेवा की है। हजारों लोगों के सम्मान समारोह उन्होंने देखे, पर स्वयं कभी सम्मानित नहीं हुईं। क्या समाज को स्वच्छ रखने वाला हाथ सम्मान के योग्य नहीं?”

पूरा सभागार मौन हो गया।

मुख्य अतिथि तुरंत अपनी कुर्सी से उठे और बोले, “कृपया उन्हें मंच पर बुलाइए।”

शांता देवी सकुचाती हुई मंच पर पहुँचीं। उन्होंने जीवन में पहली बार इतनी रोशनी अपने ऊपर पड़ती देखी। हाथ काँप रहे थे। शॉल ओढ़ाते समय उनकी आँखें भर आईं।

तालियाँ लगातार बजती रहीं।

मुख्य अतिथि ने कहा, “आज हमने महसूस किया कि सम्मान केवल उपलब्धियों का नहीं, श्रम का भी होना चाहिए।”

माइक शांता देवी की ओर बढ़ाया गया।

उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—

“मैंने कभी पुरस्कार का सपना नहीं देखा। बस इतना चाहती थी कि लोग हमें देखकर मुँह न फेरें। हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं। हमारे हाथ गंदगी उठाते हैं, इसलिए गंदे नहीं हो जाते। यदि सफाई सम्मान का कारण नहीं बन सकती, तो गंदगी फैलाना भी किसी का गौरव नहीं होना चाहिए।”

कुछ क्षण के लिए पूरा सभागार बिल्कुल शांत हो गया।

फिर सभी लोग अपनी-अपनी सीटों से खड़े हो गए। यह सम्मान केवल एक महिला का नहीं था, श्रम की गरिमा का था।

अगले दिन अख़बारों में सबसे बड़ी तस्वीर किसी मंत्री या उद्योगपति की नहीं, बल्कि झुर्रियों से भरे उस चेहरे की थी, जिस पर वर्षों बाद आत्मसम्मान की मुस्कान खिली थी।

नगर निगम ने उसी सप्ताह निर्णय लिया कि हर वर्ष उन कर्मचारियों का भी सार्वजनिक सम्मान होगा जो पर्दे के पीछे रहकर समाज को व्यवस्थित रखते हैं—सफाईकर्मी, माली, परिचारक, रसोइये और वे सभी लोग जिनके बिना सभ्यता की चमक संभव नहीं।

उस दिन के बाद शांता देवी पहले की तरह ही झाड़ू लगाती रहीं। उनके काम में कोई परिवर्तन नहीं आया, लेकिन उनके चलने का ढंग बदल गया था। अब उनकी झुकी हुई पीठ कुछ सीधी हो गई थी। उन्हें लगा, जैसे वर्षों से मन पर रखा एक अदृश्य बोझ उतर गया हो।

क्योंकि उस दिन उन्हें केवल एक शॉल और स्मृति-चिह्न नहीं मिला था; उन्हें यह विश्वास मिला था कि किसी भी काम का मूल्य उसकी चमक से नहीं, उसकी आवश्यकता से आँका जाना चाहिए।

समाज तब सचमुच सभ्य बनता है, जब वह मंच पर खड़े लोगों के साथ-साथ मंच तैयार करने वाले हाथों को भी पहचानता है।

और तभी हर श्रमिक, हर कर्मयोगी, हर अनदेखा इंसान पूरे आत्मविश्वास से कह सकता है—

“सम्मान मेरा भी। 

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना 

लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’ 

खुर्जा उत्तर प्रदेश

error: Content is protected !!