रघुनाथ जी रो पड़े। उन्होंने शेखर को गले से लगा लिया। उनका बरसों का जमा हुआ दुख, वह धोखा, वह पीड़ा, सब शेखर के कंधों पर आँसुओं के रूप में बह निकली।
“तुम सच कह रहे हो बेटा… मैंने जिसे अपना समझा, वह पराया निकला… और जिसे मैंने एक दिन यूँ ही इंसानियत के नाते मदद कर दी थी, वह आज मेरा अपना बन गया। भगवान की लीला भी अजीब है।”
सर्दियों की वह ठिठुरती हुई रात और आसमान से गिरती बेमौसम बारिश की बूँदें, शहर के एक सुनसान बस स्टैंड पर बैठे पैंसठ वर्षीय रघुनाथ जी के वजूद को जैसे अंदर तक जमा रही थीं। उनके कपड़े भीग चुके थे, और पास रखा एक छोटा सा पुराना सूटकेस भी पानी की मार सह रहा था। लेकिन रघुनाथ जी को उस ठंड का कोई अहसास नहीं हो रहा था। उनके शरीर से ज्यादा उनकी आत्मा काँप रही थी। उनकी सूनी और पथराई हुई आँखें बस सामने की उस खाली सड़क को ताक रही थीं, जहाँ से कुछ घंटे पहले उनका इकलौता बेटा विकास अपनी कार में बैठकर यह कहकर गया था कि “पिताजी, आप यहीं बैठिए, मैं अभी एटीएम से पैसे निकालकर लाता हूँ, फिर हम सीधे तीर्थ यात्रा के लिए निकलेंगे।”
रघुनाथ जी ने अपने काँपते हाथों से अपनी जेब टटोली। वहाँ मोबाइल नहीं था, क्योंकि विकास ने बहाने से उनका फोन अपने पास ही रख लिया था। जेब में बस एक मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा था। जब घंटों इंतज़ार के बाद भी विकास नहीं लौटा, तो किसी अनहोनी की आशंका से काँपते हुए उन्होंने वह पर्ची खोली थी। उसमें बस एक लाइन लिखी थी—”पिताजी, अब आप किसी आश्रम में चले जाइएगा, मेरा और आपका सफर यहीं तक था। घर के कागज़ात पर आपने हस्ताक्षर कर ही दिए हैं, अब वह घर मेरा है। मेरे और मेरी पत्नी के पास आपकी देखभाल का समय नहीं है।” वह एक पर्ची नहीं थी, बल्कि रघुनाथ जी के जीवन भर की तपस्या, उनके प्यार और उनके पिता होने के गुरूर का मृत्यु प्रमाण पत्र था।
वे वहीं ठंडे सीमेंट के चबूतरे पर जड़ होकर बैठे रहे। उनकी आँखों से आँसू सूख चुके थे, बस यादों का एक बवंडर उनके दिमाग में चल रहा था। उन्हें याद आ रहा था वह दिन जब विकास की माँ उसे जन्म देते ही दुनिया से चली गई थी। लोगों ने कहा था कि दूसरी शादी कर लो, बच्चा कैसे पलेगा, लेकिन रघुनाथ जी ने मना कर दिया। उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। कारखाने में ओवरटाइम किया, अपनी हर इच्छा को मार दिया ताकि विकास को एक अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। जब विकास ने शहर के सबसे महँगे कॉलेज में इंजीनियरिंग करने की जिद की थी, तो रघुनाथ जी ने अपना पुश्तैनी खेत तक बेच दिया था। वही विकास, जिसे कभी हल्की सी खरोंच आने पर वे पूरी रात नहीं सोते थे, आज उन्हें इस अंधेरी रात में मरने के लिए छोड़ गया था। उनका अपना खून, उनका अपना अंश, इतना पराया कैसे हो सकता है, यही सवाल उनके सीने में किसी खंजर की तरह चुभ रहा था।
समय बीतता जा रहा था। रात के करीब बारह बज चुके थे। बारिश रुक गई थी, लेकिन कोहरे और ठंडी हवाओं ने कहर ढाना शुरू कर दिया था। रघुनाथ जी को अब लगने लगा था कि शायद यही उनकी आखिरी रात है। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और मृत्यु का इंतज़ार करने लगे।
तभी सड़क पर एक कार आकर रुकी। कार की हेडलाइट की रोशनी सीधी रघुनाथ जी के चेहरे पर पड़ी, जिससे उन्हें अपनी आँखें सिकोड़नी पड़ीं। कार का दरवाज़ा खुला और एक लंबा-चौड़ा, सूट-बूट पहने हुए युवक बाहर निकला। शायद वह रास्ता भटक गया था या किसी का इंतज़ार कर रहा था। उसकी नज़र बस स्टैंड पर सिकुड़ कर बैठे उस बुजुर्ग पर पड़ी। एक पल के लिए उसने अनदेखा करना चाहा, लेकिन फिर कुछ सोचकर वह उनके करीब आया।
“बाबा? आप इतनी रात को यहाँ इस ठंड में क्या कर रहे हैं? आपके घर वाले कहाँ हैं?” युवक ने बड़ी ही विनम्रता से पूछा।
रघुनाथ जी ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं और उस अजनबी को देखा। उनके होठों में इतनी ताकत नहीं थी कि कुछ बोल सकें। वे बस शून्य में देखते रहे। युवक ने जब ध्यान से उनके चेहरे को देखा, तो वह अचानक ठिठक गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और हैरानी तैर गई। उसने अपना छाता फेंका और घुटनों के बल उनके पास बैठ गया।
“रघुनाथ जी? आप… आप रघुनाथ जी हैं ना? सिंचाई विभाग वाले?” युवक की आवाज़ में एक अजीब सी कंपन थी।
रघुनाथ जी ने हल्की सी हामी भरी, बिना यह जाने कि यह अजनबी उन्हें कैसे पहचानता है।
“हे भगवान! आपकी यह हालत! आप एकदम बर्फ की तरह ठंडे हो रहे हैं।” युवक ने बिना एक पल गँवाए अपना कीमती कोट उतारा और रघुनाथ जी को पहना दिया। फिर उसने उनका हाथ पकड़ा और लगभग सहारा देते हुए अपनी कार की तरफ ले गया।
“मुझे… मुझे यहीं छोड़ दो बेटा… मेरा अब कोई घर नहीं है… मैं कहाँ जाऊँगा…” रघुनाथ जी ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा।
“आप मेरे साथ मेरे घर चलेंगे बाबूजी। और कुछ नहीं सोचना है आपको।” युवक ने उन्हें कार की पिछली सीट पर आराम से बिठाया, हीटर चालू किया और उनका सूटकेस डिग्गी में रखकर कार दौड़ा दी।
रास्ते भर रघुनाथ जी खामोश रहे। उनका दिमाग सुन्न था। एक तरफ उनका अपना बेटा था जो उन्हें सड़क पर फेंक गया था, और दूसरी तरफ यह अनजान युवक था जो उन्हें अपने साथ ले जा रहा था।
कुछ ही देर में कार एक खूबसूरत से बंगले के सामने रुकी। युवक उन्हें सहारा देकर अंदर ले गया। घर में उसकी पत्नी सो रही थी, जिसे उसने तुरंत जगाया। “मीरा, जल्दी से गर्म पानी और तौलिया लाओ, और कुछ गर्म सूप बनाओ। बाबूजी बहुत ठंड में थे।”
मीरा भी बिना कोई सवाल किए तुरंत दौड़ पड़ी। दोनों पति-पत्नी ने मिलकर रघुनाथ जी के गीले कपड़े बदलवाए, उन्हें एक गर्म, आरामदायक बिस्तर पर लिटाया और अपने हाथों से सूप पिलाया। जब रघुनाथ जी कुछ सामान्य हुए और उनके शरीर में गर्माहट लौटी, तो उन्हें नींद आ गई।
अगली सुबह जब रघुनाथ जी की आँख खुली, तो उन्होंने खुद को एक शानदार और साफ-सुथरे कमरे में पाया। खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही थी। उनके उठते ही वह युवक, जिसके हाथ में चाय का प्याला था, अंदर आया। उसके चेहरे पर एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान थी।
“कैसी तबीयत है अब आपकी बाबूजी? रात को तो आपने हमें डरा ही दिया था,” युवक ने चाय का प्याला टेबल पर रखते हुए कहा और उनके पैर छू लिए।
रघुनाथ जी ने उसे आशीर्वाद दिया, लेकिन उनकी आँखों में अभी भी हैरानी और एक गहरा सवाल था। उन्होंने संकोच करते हुए पूछा, “बेटा… तुम कौन हो? मैं तो तुम्हें पहचानता भी नहीं। फिर तुमने मुझ जैसे एक लावारिस और अभागे इंसान को अपने घर में पनाह क्यों दी? मेरी तो अपनी औलाद ने मुझे बोझ समझ कर निकाल दिया, फिर तुम एक अजनबी होकर मेरी इतनी सेवा क्यों कर रहे हो?”
यह सुनकर युवक मुस्कुराया। वह उनके पास बिस्तर के किनारे बैठ गया और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, “बाबूजी, मेरा नाम शेखर है। मैं आपके लिए अजनबी हो सकता हूँ, लेकिन मेरे लिए आप साक्षात् ईश्वर हैं। मैंने आपको पनाह नहीं दी है, मैं तो बस उस कर्ज की एक छोटी सी किस्त चुकाने की कोशिश कर रहा हूँ, जो मुझ पर पिछले पच्चीस सालों से बाकी है।”
“कर्ज? कैसा कर्ज बेटा? मुझे कुछ याद नहीं आ रहा,” रघुनाथ जी ने चकित होते हुए कहा।
शेखर ने एक गहरी साँस ली और अपनी पुरानी यादों के पन्ने पलटने लगा। “आपको याद है बाबूजी, आज से पच्चीस साल पहले जब आप अपना नया घर बनवा रहे थे? वहाँ कई मजदूर काम करते थे। उन्हीं में से एक मजदूर था रामदीन, जो अपनी पत्नी के गुज़र जाने के बाद अपने दस साल के बेटे को भी काम की जगह पर साथ लाता था।”
रघुनाथ जी ने अपनी यादों पर ज़ोर डाला और धीरे से बोले, “हाँ… रामदीन… मुझे धुंधला-धुंधला याद है।”
“एक दिन काम करते समय रामदीन दूसरी मंजिल की मचान से नीचे गिर गया था,” शेखर की आवाज़ भारी होने लगी थी। “उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। ठेकेदार ने अपना पल्ला झाड़ लिया और कहा कि वह कोई इलाज का खर्चा नहीं देगा। वह दस साल का बच्चा अपने लहूलुहान बाप के पास बैठकर रो रहा था, मदद की भीख माँग रहा था, लेकिन कोई आगे नहीं आया। तब आप वहाँ आए थे बाबूजी।”
शेखर की आँखों से आँसू छलक पड़े। “आप ही थे जिसने बिना एक पल सोचे अपनी गाड़ी में मेरे बाबूजी को अस्पताल पहुँचाया। ठेकेदार से लड़कर उसे काम से निकाल दिया। मेरे बाबूजी के इलाज का सारा खर्चा, जो उस वक्त आपके लिए भी बहुत बड़ी रकम थी, आपने अपनी जेब से भरा। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई थी। जब आपको पता चला कि मेरे बाबूजी अब कभी चल-फिर नहीं पाएंगे और कोई भारी काम नहीं कर सकेंगे, तो आपने उन्हें अपने उसी नए घर के अहाते में एक छोटी सी कोठरी दे दी। उन्हें अपने घर का चौकीदार बना लिया ताकि वे सम्मान से जी सकें।”
रघुनाथ जी की आँखों में अब वो पुरानी तस्वीरें साफ होने लगी थीं।
शेखर ने आगे कहा, “वह दस साल का बच्चा मैं ही था बाबूजी। आपने न सिर्फ मेरे पिता को मरने से बचाया, बल्कि मेरा दाखिला एक अच्छे स्कूल में करवाया। मेरी किताबें, मेरी फीस, मेरे कपड़े, सब आपने दिए। आपने मुझसे कहा था कि खूब मन लगाकर पढ़ना। जब तक मैंने ग्रेजुएशन पूरा नहीं कर लिया और मुझे मेरी पहली नौकरी नहीं मिल गई, आप हमारे लिए एक साये की तरह खड़े रहे। बाद में मेरी नौकरी दूसरे शहर में लग गई, मैं अपने पिताजी को लेकर चला गया। पिताजी हमेशा कहते थे कि बेटा, हम रघुनाथ बाबू के एहसानों तले दबे हैं। अगर वो न होते, तो हम सड़क पर भिखारियों की मौत मरते। अगर कभी जिंदगी में उन्हें तुम्हारी ज़रूरत पड़े, तो अपनी जान देकर भी उनके उपकार का कर्ज़ चुकाना।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सिर्फ दोनों की सिसकियों की आवाज़ आ रही थी।
“पिताजी तो कुछ साल पहले गुज़र गए,” शेखर ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैंने बहुत कोशिश की आपको ढूँढने की, लेकिन आपका ट्रांसफर हो चुका था और हमारा संपर्क टूट गया था। कल रात मैं अपनी एक मीटिंग से लौट रहा था, तब मैंने आपको उस बस स्टैंड पर देखा। पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ, लेकिन जब पास जाकर देखा तो मैं अपने भगवान को ऐसे हाल में देखकर अंदर तक हिल गया। जिसे आपने अपने खून-पसीने से सींचा, उस विकास ने आपको घर से निकाल दिया, लेकिन जिस पौधे को आपने बस इंसानियत के नाते पानी दिया था, वह आज एक घना पेड़ बन चुका है बाबूजी।”
रघुनाथ जी रो पड़े। उन्होंने शेखर को गले से लगा लिया। उनका बरसों का जमा हुआ दुख, वह धोखा, वह पीड़ा, सब शेखर के कंधों पर आँसुओं के रूप में बह निकली।
“तुम सच कह रहे हो बेटा… मैंने जिसे अपना समझा, वह पराया निकला… और जिसे मैंने एक दिन यूँ ही इंसानियत के नाते मदद कर दी थी, वह आज मेरा अपना बन गया। भगवान की लीला भी अजीब है।”
शेखर ने उन्हें खुद से अलग किया, उनके आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए बोला, “बाबूजी, वह घर विकास का हो सकता है, लेकिन यह घर आपका है। अब से आप यहीं रहेंगे, हमारे साथ, हमारी छत के नीचे। मेरे बच्चे आपको दादाजी कहने के लिए बेताब हैं। और हाँ, अगर मैंने आपको कोई भी शिकायत का मौका दिया, तो जैसे बचपन में मेरी गलती पर मेरे कान खींचते थे, वैसे ही अब भी खींचिएगा।”
रघुनाथ जी के होठों पर इतने झटके सहने के बाद पहली बार एक सच्ची और सुकून भरी मुस्कान खिल उठी। उन्हें समझ आ गया था कि परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता, बल्कि प्यार, आदर और कर्मों के उन धागों से बनता है, जो हम जीवन भर अनजाने में बुनते हैं।
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