लौट कर आई दुआ

शहर के जाने-माने रिटायर्ड बैंक अधिकारी सुधीर बाबू अपनी ईमानदारी और दरियादिली के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर थे। उनके दरवाजे से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। किसी की बेटी की शादी हो, किसी के बच्चे की फीस भरनी हो या किसी के इलाज का खर्च उठाना हो, सुधीर बाबू हमेशा अपनी हैसियत … Read more

खामोशियों का नेटवर्क

कावेरी ने एक गहरी ठंडी सांस छोड़ी। “आजकल के बच्चों का प्यार भी इन मशीनों के अंदर ही कैद होकर रह गया है। ये साथ बैठकर बातें नहीं करते, एक-दूसरे को ‘टैग’ करते हैं। इनकी रूठने-मनाने की प्रक्रिया भी ‘ब्लॉक’ और ‘अनब्लॉक’ तक सीमित हो गई है। हमारी तरह छोटी-छोटी बातों पर रूठना, और फिर … Read more

प्यार की अनकही रेसिपी

क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि तुम एक ‘औरत’ का काम कर रहे हो? या शिखा तुम पर हुक्म चला रही है?” समीर ने झिझकते हुए वह सवाल पूछ ही लिया जो उसके मन में अटका था। अभिनव ज़ोर से हंस पड़ा। उसकी हंसी में कोई बनावट नहीं थी। “औरत का काम? खाना पकाना … Read more

शाम की गुनगुनी धूप

 “ये आप क्या कर रहे हैं? इस उम्र में आकर हाथ जोड़ने शोभा नहीं देते। पति-पत्नी का रिश्ता तो एक गाड़ी के दो पहियों जैसा होता है। कभी एक पहिया घिस जाता है, तो दूसरा उसका भार सँभाल लेता है। इसमें माफी कैसी?” सावित्री की आवाज़ में एक अजीब सा सुकून था। “और वैसे भी, … Read more

धूप, चाय और वो पुरानी बेंच

रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने चाय का कप लिया और बेंच पर बैठ गए। “हम्म… सूजन आ गई है। मैंने कल ही कहा था कि डॉक्टर के पास चलते हैं, लेकिन मेरी सुनती कहाँ है वो।” मीरा ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “बाबूजी, अगर आप बुरा ना मानें तो … Read more

अदृश्य रक्षक: बंद दरवाजों का दर्द

 “भाभी, मुझे पता है आज आपको अपने भैया की बहुत याद आ रही होगी। लेकिन आप उदास मत होइए, समर भैया हैं ना, वो भी तो आपके भाई जैसे ही…” विशाखा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि उसे लगा उसने कुछ गलत कह दिया। लेकिन काव्या ने बहुत ही शांत स्वर में … Read more

नई सुबह की दस्तक

सुबह के आठ बज रहे थे, लेकिन मास्टर रघुनाथ जी के भीतर जैसे कोई तूफ़ान उबल रहा था। उनकी पत्नी सुमित्रा ने मेज़ पर चाय का प्याला रखते हुए कहा, “चाय ठंडी हो रही है, इसे तो पी लीजिए। सुबह से उस कागज़ में सिर खपाए बैठे हैं, जैसे आज ही कोई बड़ा किला फतह … Read more

स्मृतियों की वसीयत

  वैदेही की आंखें आंसुओं से सूज चुकी थीं और उसका सिर अपनी छाती तक झुका हुआ था। सामने बाबूजी क्रोध से कांप रहे थे। “तूने सोच भी कैसे लिया कि इस घर की बेटी उस साधारण से मास्टर के बेटे के साथ अपना जीवन बिताएगी? हमारी और उनके परिवार की जो पीढ़ियों पुरानी खटास है, … Read more

अपनों के आँसू

सुमित के ये शब्द मेरे कानों में सीसे की तरह पिघल कर गिर रहे थे। मैं कुछ जवाब देने ही वाला था कि तभी फ्लैट की घंटी बजी। सुमित ने उठकर दरवाज़ा खोला। मैं भी उसके पीछे-पीछे हॉल में आ गया। शिखा भी किचन से बाहर आ गई थी। दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, … Read more

रेत के निशानों पर हौसले की उड़ान

गौरी, उम्र यही कोई पंद्रह बरस की रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी समझ थी जो उम्र से बहुत पहले आ जाती है। राजस्थानी गाँव के उस रूखे और रेतीले माहौल में भी वह किसी खिले हुए पलाश के फूल जैसी लगती थी। साँवला सलोना रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, और हवा में … Read more

error: Content is protected !!