अपनापन या अधिकार

सुबह के करीब छह बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड ने दस्तक दे दी थी, लेकिन मीरा के माथे पर पसीने की कुछ बूंदें साफ झलक रही थीं। गैस के एक चूल्हे पर कुकर की सीटी बजने को तैयार थी, तो दूसरे पर वह ओट्स और ताजी सब्जियों का चीला बना रही थी। घर … Read more

ये कैसा बंधन है! – श्वेताअग्रवाल

जैसे ही डोरबेल बजी, निमित्त तेज़ी से उठा और दरवाज़े की तरफ दौड़ पड़ा। जब तक उसकी पत्नी वाणी किचन से निकल आई, उसने दरवाजा खोल दिया था। बाहर दरवाज़े पर डाकिया खड़ा था। उसने तुरंत उसके हाथ से लिफ़ाफ़ा लिया और उसे वहीं दरवाज़े पर खड़े-खड़े लिए खोल दिया, मानो उससे सब्र ही नहीं … Read more

रिश्ता – डाॅ उर्मिला सिन्हा

अचानक दोनों में टक्कर हो गई। ” जरा संभल कर”। “ओह,सारी” और टकराने वाली नौ-दो ग्यारह। मिहिर के हाथ से गिलास गिर गया। गनीमत गिलास खाली था…झन्न से आवाज हुई , मिहिर ने नजरें दौड़ाई हल्का सा गुलाबी दुपट्टा दिखा। उसने देखने की कोशिश की… और आगे बढ़ गया। शादी विवाह का घर, नृत्य-संगीत, रस्मोरिवाज … Read more

कर्मों का आईना

आरव ने पलटकर अपनी माँ की आँखों में देखा। उसकी मासूमियत में एक ऐसी सच्चाई थी जो किसी भी इंसान की रूह कंपा सकती थी। उसने सहजता से कहा, “नहीं मम्मा, ये कमरा आपके और पापा के लिए है। जब आप और पापा दादा-दादी की तरह बूढ़े हो जाओगे, तो मेरी पत्नी भी तो आप … Read more

**रिश्तों का अनकहा कर्ज़**

 अंजलि की आंखें नम हो गईं। उसने कहा, “भैया, मुझसे छुपाने की कोशिश मत करो। मुझे पता चल गया है कि आपके बिजनेस में पिछले महीने बहुत भारी नुकसान हुआ है और आप लोग बैंक का कर्ज चुकाने के लिए यह घर बेचने की सोच रहे हैं। उस दिन जब आप मां के कमरे में … Read more

सपनों की उड़ान और माँ का आँचल

काव्या के लिए यह जवाब किसी वज्रपात से कम नहीं था। उसने रोते हुए अपने पिता को बहुत समझाने की कोशिश की कि वह अपना ख्याल रख सकती है, वहाँ हॉस्टल में रहेगी, लेकिन दीनानाथ जी अपने फैसले पर अडिग थे। उनका प्यार और अपनी बच्ची के प्रति उनकी फिक्र इतनी हावी थी कि वह … Read more

सर्द रातों की वो खामोश गर्माहट

“हम इतनी रात को इसलिए निकलते हैं,” प्रेरणा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “ताकि किसी को ऐसा न लगे कि हम कोई अहसान कर रहे हैं या किसी को दिखावा कर रहे हैं। हम बस चुपचाप उनके ऊपर कंबल डाल देते हैं जो ठंड से सिकुड़े हुए सो रहे होते हैं। जब वो सुबह उठकर … Read more

स्मृतियों की गूंज और एक प्याली चाय

कैलाश बाबू ने लैंडलाइन का रिसीवर जैसे ही क्रैडल पर रखा, उनके चेहरे पर एक पुरानी, जानी-पहचानी मुस्कान तैर गई। उनके मुंह से आदतन और बड़े ही उत्साह के साथ निकला, “अरे सावित्री, सुन रही हो? लखनऊ से अपने रमेश बाबू का फोन था, उनकी छोटी बेटी की शादी तय हो…”  शब्द उनके होंठों पर … Read more

**सपनों की ज़मीन और उम्मीदों का आसमान**

“मुझे पता है पल्लवी,” विवेक ने बहुत ही धीमी लेकिन विश्वास से भरी आवाज़ में कहा, “मैं तुम्हारे पिता के सपनों का वो ‘सरकारी बाबू’ नहीं हूँ, और शायद यह घर और मेरी हैसियत तुम्हारी काबलियत के हिसाब से बहुत छोटी है। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी इन कीमती डिग्रियों की जगह … Read more

प्रतीक्षा के वो अनकहे पन्ने

“काव्या, मेरी बात एक बार गौर से सुन लो। मैं तुम्हारे लिए अपनी ज़िंदगी की आखिरी सांस तक इंतज़ार कर सकता हूँ। लेकिन इस दिल में तुम्हारे सिवा कोई और कभी जगह नहीं ले पाएगा, यह मेरा वादा है।” मेज पर रखी कॉफी की प्याली को बिना छुए ही रजत वहाँ से उठकर चला गया।  … Read more

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