अटूट बंधन

घर की मंझली बहू रितु बार-बार छज्जे पर आ रही थी और गली के नुक्कड़ की तरफ देखकर भारी कदमों से वापस लौट जा रही थी। उसकी देवरानी श्रेया और जेठानी नेहा भी मायके से घर आ चुकी थीं और नीचे आंगन में बहुत ही ज्यादा चहल-पहल थी। घर के सभी लोग होली के त्योहार को बहुत ही शानदार तरीके से मनाने की तैयारियों में जुटे हुए थे।

“मम्मी जी, हर बार की तरह इस बार भी हम वो बड़ा वाला ड्रम आंगन के बीचों-बीच रखेंगे और उसमें टेसू के फूलों वाला पक्का रंग घोलकर रखेंगे। बड़ा मजा आता है सबको उस रंग भरे ड्रम में डुबकी लगाने में!” जेठानी नेहा ने गुझिया के लिए खोया भूनते हुए खिलखिलाकर कहा।

“और क्या जीजी! सच्ची बड़ा मजा आता है जब घर के सारे मर्दों को पकड़-पकड़ कर एक-एक करके उस रंग भरे पानी में डुबकी लगवाओ। और सुनिए, गुलाल भी खूब अलग-अलग रंगों का लेकर आएंगे। कोई भी इस बार होली में कोरा नहीं बचना चाहिए,” रितु की देवरानी श्रेया भी चहक रही थी।

“हाँ-हाँ भई, सब लोग अपने-अपने मन की करना। साल में एक ही बार तो इतना खूबसूरत त्योहार आता है जिसमें सभी का तन और मन दोनों ही भीग जाते हैं,” सास सावित्री जी ने भी अपनी दोनों बहुओं का साथ देते हुए कहा। “सचमुच, मुझे भी इस दिन का बड़ा इंतज़ार रहता है।”

आंगन में हंसी-ठिठोली गूंज रही थी, लेकिन सावित्री जी की पारखी नजरों ने छज्जे पर उदास खड़ी रितु को देख लिया था। सावित्री जी ने हाथ का काम छोड़ा और धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़कर रितु के पास पहुंच गईं। रितु की आंखें डबडबाई हुई थीं।

“क्या हुआ मेरी बच्ची? आज इतने सुंदर त्योहार के दिन तेरी आंखें क्यों नम हैं?” सावित्री जी ने रितु के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा।

रितु ने अपने आंसू छिपाने की कोशिश की और भारी गले से बोली, “कुछ नहीं मां जी, बस ऐसे ही… बाहर बच्चों को खेलते देख रही थी।”

सावित्री जी ने उसे अपने गले से लगा लिया, “मुझसे छुपाएगी? मैं जानती हूं तू कुणाल का रास्ता देख रही है। तीन साल हो गए हैं उसे घर पर होली मनाए। सरहद पर ड्यूटी ही ऐसी है कि त्योहारों पर हमारे फौजी बेटे घर नहीं आ पाते। पर तू दिल छोटा मत कर, उसने फोन पर वादा किया था ना कि वो इस बार पूरी कोशिश करेगा?”

“मां जी, कल रात कुणाल का फोन आया था। वो कह रहे थे कि बॉर्डर पर अचानक हालात कुछ तनावपूर्ण हो गए हैं और शायद उनकी छुट्टियां रद्द हो जाएं। उन्होंने कहा है कि मैं उनका इंतजार न करूं,” रितु फफक कर रो पड़ी। “पिछले तीन सालों से मैंने उनकी पसंद का सफेद सूट पहनकर गुलाल की थाली सजाई है, पर हर बार वो थाली धरी की धरी रह जाती है। इस बार भी मेरी होली बेरंग ही जाएगी मां जी।”

सावित्री जी का दिल भी भर आया। एक मां होने के नाते उनका दिल भी अपने बेटे को देखने के लिए तरस रहा था, लेकिन एक सास के रूप में उन्हें अपनी बहू को भी संभालना था। उन्होंने रितु के आंसू पोंछे और कहा, “फौजी की पत्नी होना कोई आसान काम नहीं है मेरी बच्ची। तुम लोग तो खुद एक सिपाही की तरह तपती हो। चल नीचे आ, उदास मत हो। तेरा परिवार तेरे साथ है।”

होलिका दहन की रात बीत गई और धुलंडी की सुबह आ गई। पूरा मोहल्ला रंगों से सराबोर था। ढोल-नगाड़ों की आवाज और फाग के गीतों से सारा शहर गूंज रहा था। घर के आंगन में श्रेया और नेहा ने जमकर रंग खेला। ससुर जी और देवर जी को तो उसी पानी के ड्रम में नहला दिया गया जिसकी योजना श्रेया ने बनाई थी।

रितु ने सफेद रंग का सूट पहना हुआ था, लेकिन उसने किसी को खुद पर रंग डालने नहीं दिया। वो बस मेहमानों को ठंडाई और गुझिया परोस रही थी। उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान थी, लेकिन उसकी आंखें अब भी बार-बार मुख्य द्वार की तरफ उठ जाती थीं। नेहा और श्रेया ने भी रितु की उदासी को भांप लिया था और वे जानबूझकर उसे रंगने की जिद नहीं कर रही थीं। दोपहर के बारह बज चुके थे। रितु की उम्मीद अब पूरी तरह से टूट चुकी थी। वह चुपचाप एक कोने में खंभे के सहारे खड़ी हो गई और अपनी आंखें बंद कर लीं।

तभी आंगन में अचानक ढोल की आवाज बंद हो गई। एक अजीब सी खामोशी छा गई। रितु ने आंखें खोलीं तो देखा कि दरवाजे पर एक लंबी चौड़ी कद-काठी का आदमी खड़ा है। उसके चेहरे पर इतना गुलाल लगा था कि उसे पहचानना मुश्किल था। लेकिन रितु को उसे पहचानने के लिए आंखों की नहीं, अपने दिल की धड़कनों की जरूरत थी। वह फौजी वर्दी का रंग और वो चिर-परिचित आहट…

“कुणाल!” रितु के मुंह से एक बेसाख्ता चीख निकल गई।

कुणाल मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा। उसके हाथों में लाल रंग का गुलाल था। घर के सभी लोग खुशी से झूम उठे। सावित्री जी की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। कुणाल ने अपनी मां के पैर छुए और सीधा रितु के पास आकर खड़ा हो गया।

“मैंने कहा था ना, फौजी अपना वादा कभी नहीं तोड़ता। हालात सुधर गए और मेरे कमांडिंग ऑफिसर ने मुझे एक दिन की खास छुट्टी दे दी,” कुणाल ने रितु की आंखों में देखते हुए कहा।

रितु कुछ बोल नहीं पाई, बस आंसुओं की धारा उसके गालों पर बहने लगी। कुणाल ने अपने हाथों का लाल गुलाल रितु के गालों पर लगा दिया। उस सफेद सूट पर गिरा लाल रंग रितु के जीवन की सारी उदासी को मिटा रहा था। नेहा और श्रेया दौड़कर आईं और उन्होंने कुणाल और रितु पर फूलों की बारिश कर दी।

उस दिन रितु ने भी आंगन में रखे उस पानी के ड्रम में सबको डुबकी लगवाई। आज उसकी होली बेरंग नहीं थी। फागुन की इस खुशनुमा हवा ने उसे उसके इंतज़ार की सबसे सुंदर सौगात दे दी थी। घर का हर कोना अब सिर्फ रंगों से नहीं, बल्कि एक सच्चे प्यार और परिवार के अटूट बंधन से महक रहा था।

आपके लिए एक सवाल:

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