ड्राइंग रूम में एक ऐसा भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे वहां मौजूद हर शख्स की तेज सांसें और उलझनें और भी गहरा कर रही थीं। वीरेंद्र जी सोफे पर सिर थामे बैठे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थीं और आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी।
उनके सामने उनकी पत्नी सुषमा, बेटा अनिकेत और बहू काव्या बैठे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि बात की शुरुआत कहाँ से की जाए। वीरेंद्र जी ने एक लंबी और थकी हुई सांस लेते हुए खामोशी को तोड़ा।
उन्होंने अपनी कांपती हुई उंगलियों को आपस में फंसाते हुए कहा, “देखो, मेरा दिमाग तो अब बिल्कुल सुन्न पड़ गया है। तुम लोग ही बताओ कि अब हमें क्या करना चाहिए? अभी आधा घंटा पहले मेरे फोन पर एक अनजान लड़की का कॉल आया था। उसने जो कुछ भी बताया, वह सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई है।” वीरेंद्र जी की आवाज में एक पिता की बेबसी साफ झलक रही थी।
दरअसल, वीरेंद्र जी की इकलौती और लाड़ली बेटी निहारिका की सगाई पंद्रह दिन पहले ही शहर के एक नामी परिवार के लड़के, समीर के साथ हुई थी। शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी और कार्ड छपने के लिए प्रेस में दिए जा चुके थे। घर में खुशियों का माहौल था, लेकिन उस एक फोन कॉल ने सारी खुशियों पर ग्रहण लगा दिया था।
फोन करने वाली लड़की ने बताया था कि समीर एक नंबर का शराबी और जुआरी है। उसकी इन्हीं हरकतों और हिंसक बर्ताव की वजह से पहले भी दो बार उसकी सगाई होकर टूट चुकी है। लड़की ने कुछ ऐसे पारिवारिक राज और समीर की निजी जिंदगी की बातें बताईं, जो सिर्फ वही जान सकता था जो उनके बहुत करीब रहा हो। वीरेंद्र जी ने जब उन बातों का मिलान समीर के परिवार द्वारा बताई गई कुछ अटपटी बातों से किया, तो एक-एक बात सच साबित हो रही थी। अब मामला अपनी बेटी की पूरी जिंदगी का था, तो वीरेंद्र जी कोई भी खतरा मोल कैसे ले सकते थे? इसीलिए उन्होंने बिना कोई देर किए अपने बेटे, बहू और पत्नी को विचार-विमर्श के लिए बुला लिया था।
सुषमा जी, जो अब तक अपने साड़ी के पल्लू को घबराहट में उंगलियों में लपेट रही थीं, अचानक बोल पड़ीं, “देखिए, मेरा तो यही मानना है कि अगर निहारिका की सगाई टूट गई तो हमारी बहुत बदनामी होगी। कार्ड बंटने शुरू होने वाले हैं, हलवाई को एडवांस जा चुका है। सगे-संबंधी क्या कहेंगे? लोग तो यही सोचेंगे कि जरूर हमारी बेटी में ही कोई खोट होगा, तभी ऐन मौके पर शादी टूट गई। समाज में हमारी नाक कट जाएगी।” सुषमा जी के शब्दों में बेटी की जिंदगी से ज्यादा समाज के तानों का खौफ हावी था।
यह सुनकर अनिकेत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा, “मां, आप यह कैसी बातें कर रही हैं? आपको अपनी नाक और समाज की परवाह है, लेकिन निहारिका की जिंदगी की कोई फिक्र नहीं? क्या हम उसे जानबूझकर एक कुएं में धकेल दें? कल को अगर उस शराबी ने हमारी निहारिका पर हाथ उठाया या उसकी जिंदगी नरक बना दी, तो क्या यह समाज आकर उसके आंसू पोंछेगा? बदनामी कुछ दिनों की होती है मां, लेकिन जिंदगी भर का रोना हम नहीं सह पाएंगे।”
काव्या, जो अब तक चुपचाप सब सुन रही थी, उसने भी अपनी सास के हाथ पर हाथ रखते हुए बहुत ही सौम्य लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “मम्मी जी, अनिकेत बिल्कुल सही कह रहे हैं। एक औरत होने के नाते मैं समझ सकती हूं कि एक गलत जीवनसाथी पूरी इंसानियत को खत्म कर देता है। आप निहारिका को उस घर में भेजकर सिर्फ एक शादी नहीं करेंगी, बल्कि एक मासूम की बलि चढ़ाएंगी। और पापा जी, वो लड़की जिसने फोन किया, उसका कोई स्वार्थ नहीं था। उसने तो एक औरत होने के नाते दूसरी औरत की जिंदगी बर्बाद होने से बचाने के लिए हमें आगाह किया है। हमें उसकी बात को गंभीरता से लेना चाहिए और तुरंत इस रिश्ते को खत्म कर देना चाहिए।”
वीरेंद्र जी अपनी बहू की समझदारी भरी बातों को सुनकर थोड़ा संभले। उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा और बोले, “सुषमा, काव्या और अनिकेत सही कह रहे हैं। मैं पिता हूं। मैंने निहारिका को उंगली पकड़कर चलना सिखाया है। जब उसे खरोंच भी आती थी तो मेरी जान निकल जाती थी। आज जब मुझे पता चल गया है कि सामने आग का दरिया है, तो मैं अपनी झूठी शान के लिए उसे उसमें कैसे धकेल सकता हूं? भाड़ में जाए ऐसा समाज जो सच्चाई जानने के बाद भी हमें गलत समझे।”
तभी दरवाजे के पास एक आहट हुई। सबने मुड़कर देखा तो निहारिका वहां खड़ी थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी हिम्मत थी। वह सब कुछ सुन चुकी थी। वह धीरे-धीरे चलकर अपने पिता के पास आई और उनके गले लग गई।
“पापा, मुझे ऐसी कोई शादी नहीं करनी जहां मेरा सम्मान न हो। मुझे कुंवारी रहना मंजूर है, लेकिन किसी शराबी और धोखेबाज इंसान की पत्नी बनना मंजूर नहीं। आप समाज की चिंता मत कीजिए। अगर आप मेरे साथ हैं, तो मैं किसी भी ताने का सामना कर सकती हूं,” निहारिका ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा।
बेटी के इन शब्दों ने वीरेंद्र जी के अंदर एक नई ऊर्जा और अदम्य साहस भर दिया। उन्होंने उसी वक्त अपना फोन उठाया और समीर के पिता को कॉल मिला दिया। बिना किसी डर और बिना किसी झिझक के, वीरेंद्र जी ने कड़े शब्दों में कह दिया कि वे यह रिश्ता तोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें उनके बेटे की असलियत पता चल चुकी है। उधर से धमकियां भी आईं और मान-मनौव्वल भी हुआ, लेकिन वीरेंद्र जी टस से मस नहीं हुए।
अगले कुछ दिनों तक रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बीच तरह-तरह की बातें हुईं। कुछ ने वीरेंद्र जी को बेवकूफ कहा तो कुछ ने निहारिका के चरित्र पर ही सवाल उठा दिए। सुषमा जी कई रातों तक सो नहीं पाईं। लेकिन परिवार एक चट्टान की तरह निहारिका के साथ खड़ा रहा।
छह महीने बाद, अखबार में एक खबर छपी जिसे देखकर सुषमा जी की रूह कांप गई। समीर को पुलिस ने घरेलू हिंसा और धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। उसने निहारिका से रिश्ता टूटने के बाद एक और लड़की को धोखे में रखकर शादी की थी और उसे दहेज के लिए बुरी तरह पीटा था।
सुषमा जी रोती हुई निहारिका के पास गईं और उसे सीने से लगा लिया। “मुझे माफ कर दे बेटी। मैं समाज के डर से तुझे मौत के मुंह में धकेलने जा रही थी। तेरे पापा और भाई-भाभी ने मिलकर आज मुझे एक बहुत बड़ा पाप करने से बचा लिया।”
वीरेंद्र जी दरवाजे पर खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में कोई भी ‘इज्जत’ या ‘सम्मान’ आपकी अपनी संतान की जिंदगी और उसकी मुस्कान से बढ़कर नहीं होता। समाज सिर्फ तमाशा देखता है, लेकिन दर्द सिर्फ परिवार को सहना पड़ता है। इसलिए, जब बात बच्चों के भविष्य की हो, तो समाज की परवाह छोड़कर वही फैसला लेना चाहिए जो सही हो।
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लेखिका : शारदा सक्सेना