“नहीं भाभी, यह तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। आप चाहे कितना भी इमोशनल ड्रामा कर लें, लेकिन मुझे वह कमरा हर हाल में खाली चाहिए ही चाहिए।” सुमेधा ने अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के बिल्कुल साफ-साफ शब्दों में अपनी जेठानी विशाखा से कह दिया।
सुमेधा की आवाज़ में एक अजीब सी कठोरता थी, जो पूरे घर के दालान में गूंज रही थी। विशाखा, जो अब तक खामोशी से अपनी देवरानी की बातें सुन रही थी, अचानक तन कर खड़ी हो गई।
“सुमेधा, एक बात तुम भी कान खोलकर सुन लो। मैं तो अपना यह कमरा किसी भी हालत में खाली नहीं करूंगी। मुझे भी देखना है कि आखिर क्या कर लोगी तुम,” विशाखा ने भी बेहद ढिठाई और दृढ़ता के साथ सुमेधा को जवाब दिया।
सुमेधा का पारा अब सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। “ठीक है! अगर सीधी उंगली से घी नहीं निकलता, तो मुझे भी डिब्बा टेढ़ा करना आता है। मैं अभी के अभी अपना सारा सामान मजदूरों से कहकर इस कमरे से बाहर निकलवा दूंगी। फिर आप सामने खड़ी-खड़ी सब कुछ देखती रहना,” सुमेधा अपनी जेठानी का यह अडियल बर्ताव देखकर अब पूरी तरह से ज़बरदस्ती पर उतर आई थी।
विवाद उस बड़े से कमरे को लेकर था जो घर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में था। सुमेधा पांच महीने की गर्भवती थी और उसे अपने आने वाले बच्चे के लिए एक हवादार और धूप से भरे कमरे की तलाश थी, जिसे वह एक खूबसूरत नर्सरी में बदल सके। पूरे घर में सिर्फ विशाखा का ही कमरा ऐसा था जहां सुबह की पहली किरण से लेकर शाम की ठंडी हवा तक का पूरा इंतज़ाम था। सुमेधा का तर्क था कि विशाखा अकेली है, वह घर के किसी भी दूसरे छोटे कमरे में आसानी से रह सकती है। लेकिन विशाखा उस कमरे को छोड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थी।
सुमेधा ने सचमुच अपना फोन निकाला और कुछ मजदूरों को बुला लिया। जैसे ही मजदूर घर में दाखिल हुए और विशाखा के कमरे की तरफ बढ़ने लगे, विशाखा दौड़कर अपने कमरे के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई। उसने अपने दोनों हाथ चौखट पर फैला दिए और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली।
“खबरदार जो किसी ने मेरे कमरे की एक भी चीज़ को हाथ लगाया! मैं अपनी जान दे दूंगी लेकिन इस कमरे से नहीं जाऊंगी,” विशाखा चीख पड़ी।
घर का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया था। सुमेधा भी अपनी ज़िद पर अड़ी थी और मजदूर असमंजस में खड़े थे। तभी सुमेधा की सास, कावेरी जी, मंदिर से लौटकर घर में दाखिल हुईं। घर का यह नज़ारा देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“यह क्या तमाशा लगा रखा है तुम दोनों ने?” कावेरी जी ने अपनी छड़ी ज़मीन पर पटकते हुए कड़क आवाज़ में कहा।
सुमेधा तुरंत अपनी सास के पास गई और शिकायत करने लगी, “मां जी, आप ही देखिए। मुझे अपने बच्चे के लिए यह कमरा चाहिए। मैंने भाभी से कितनी बार कहा कि वह ऊपर वाला कमरा ले लें, लेकिन ये तो किसी की सुनती ही नहीं हैं। बस अपनी ज़िद पकड़ कर बैठ गई हैं। आखिर एक कमरे में ऐसा क्या रखा है?”
कावेरी जी ने सुमेधा को चुप रहने का इशारा किया। फिर वे धीरे-धीरे चलकर दरवाजे पर रोती हुई विशाखा के पास गईं और उसके सिर पर हाथ फेरा।
“सुमेधा,” कावेरी जी की आवाज़ अब बेहद शांत लेकिन दर्द से भरी हुई थी, “तुम पूछ रही हो न कि इस कमरे में ऐसा क्या रखा है? तुम्हें ये सिर्फ चार दीवारें और एक खिड़की नज़र आती है। लेकिन विशाखा के लिए यह कमरा उसका पूरा संसार है। क्या तुम जानती हो कि विशाखा इस कमरे को क्यों नहीं छोड़ना चाहती?”
सुमेधा ने नासमझी में सिर हिलाया।
कावेरी जी ने एक गहरी सांस ली और सुमेधा की तरफ देखते हुए कहा, “आज से पांच साल पहले, जब मेरे बड़े बेटे और विशाखा के पति, अंशुल को ब्लड कैंसर हुआ था, तो उसने अपने जीवन के आखिरी छह महीने इसी कमरे में बिताए थे। जब वह बिस्तर से उठ नहीं पाता था, तो इसी खिड़की से वह बाहर के पेड़-पौधों को निहारता था। इस कमरे की उस नीली दीवार को अंशुल ने अपने हाथों से पेंट किया था। उस कोने में जो पुरानी कुर्सी रखी है, वहां बैठकर अंशुल ने विशाखा को अपनी आखिरी सांस तक प्यार किया था। इस कमरे की हवा में विशाखा को आज भी अपने पति की खुशबू आती है। तुम जिसे ‘पुराना कबाड़’ समझकर बाहर फेंकने की बात कर रही हो, विशाखा उसी कबाड़ के सहारे अपनी पूरी ज़िंदगी काट रही है।”
यह सुनकर सुमेधा के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई। उसे अचानक अहसास हुआ कि वह कितनी स्वार्थी और संवेदनहीन हो गई थी। वह एक नई ज़िंदगी को दुनिया में लाने की खुशी में इतनी अंधी हो गई थी कि उसे अपनी ही जेठानी का वह दर्द नज़र नहीं आया जो उन दीवारों में दफन था। विशाखा की ज़िद कोई अहंकार नहीं था, बल्कि अपनी उजड़ी हुई दुनिया की आखिरी निशानी को बचाने की एक बेबस कोशिश थी।
सुमेधा की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसने मजदूरों को तुरंत वापस जाने का इशारा किया। वह कांपते कदमों से विशाखा के पास गई और उसके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“मुझे माफ कर दीजिए भाभी,” सुमेधा फफक कर रो पड़ी। “मैं सच में बहुत अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि आप जानबूझकर मुझे परेशान कर रही हैं। मुझे नहीं पता था कि मैं अनजाने में आपकी सबसे कीमती यादें छीनने जा रही थी। मुझे कोई कमरा नहीं चाहिए। मेरे बच्चे के लिए इस घर का कोई भी कोना काफी होगा, लेकिन मैं आपकी यादों का घर नहीं उजाड़ सकती।”
विशाखा, जिसका दिल सुमेधा के कठोर शब्दों से छलनी हो चुका था, सुमेधा के इस सच्चे पश्चाताप को देखकर पिघल गई। उसने आगे बढ़कर सुमेधा को अपने गले से लगा लिया। दोनों देवरानी-जेठानी एक-दूसरे के गले लगकर अपने सारे गिले-शिकवे आंसुओं में बहा रही थीं।
उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह से बदल गया। सुमेधा ने दूसरी दिशा वाले एक कमरे को ही रंग-रोगन करके नर्सरी बनाना शुरू कर दिया। कुछ हफ्तों बाद, एक दिन सुमेधा जब अपने कमरे में बैठी थी, तो विशाखा उसके पास आई। विशाखा के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
“सुमेधा,” विशाखा ने सुमेधा के हाथ में एक चाबी रखते हुए कहा, “कल से तुम अपने बच्चे की नर्सरी मेरे कमरे में तैयार करना शुरू कर दो।”
“भाभी! ये आप क्या कह रही हैं? मैंने कहा न मुझे वह कमरा नहीं चाहिए,” सुमेधा ने घबराते हुए कहा।
विशाखा ने प्यार से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मुझे पता है सुमेधा। लेकिन कल रात मैं बहुत देर तक सोचती रही। अंशुल बच्चों से बहुत प्यार करता था। वह कभी नहीं चाहता कि उसका कमरा एक विधवा के आंसुओं और उदासी का गवाह बनकर रह जाए। वह चाहता तो यही कि वहां किसी बच्चे की किलकारियां गूंजें। मैं उसकी यादों को अपने दिल में लेकर ऊपर वाले कमरे में जा रही हूं, ताकि इस घर के सबसे खूबसूरत कमरे में हमारे घर का नया सवेरा हो सके।”
उस दिन सुमेधा को अहसास हुआ कि प्यार और त्याग से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती। जब हम दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हैं, तो वे खुद ही हमारे लिए अपने हिस्से का आसमान भी खाली कर देते हैं।
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लेखिका : हर्षिता सिंह