दोपहर के करीब दो बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर जूठे बर्तनों का ढेर लगा था और विशाखा जल्दी-जल्दी उन्हें समेट कर सिंक में डाल रही थी। अभी-अभी उसके पति सुमित और दोनों बच्चे खाना खाकर अपने-अपने कमरों में गए थे। विशाखा की नज़र बार-बार दीवार घड़ी पर जा रही थी। आज महीने का वो खास दिन था
जब उसकी हाई-सोसाइटी लेडीज क्लब की मीट थी। सजना-संवरना, ढेर सारी गपशप, तंबोला खेलना और लजीज पकवानों का लुत्फ़ उठाना—पूरे महीने की थकान मिटाने का यही एक बहाना तो था उसके पास। उसने सोचा, जल्दी से बर्तन समेटूं और अपनी वो नई रेशमी साड़ी पहनकर तैयार हो जाऊं।
तभी दरवाजे की घंटी ज़ोर से बजी। विशाखा का माथा ठनक गया। इस वक़्त कौन आ टपका? उसने मन ही मन प्रार्थना की कि कोई ऐसा न हो जो लंबा बैठने वाला हो, वरना उसकी हफ़्तों की प्लानिंग और लेडीज क्लब की मीट दोनों धरी की धरी रह जाएंगी। चेहरे पर एक हल्की सी खीझ लिए उसने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने खड़ी सूरत देखकर वह बुत बनकर रह गई।
“अरे विशाखा! कैसी है तू?” सामने खड़ी औरत ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा।
“रश्मि! ओ माय गॉड!” विशाखा की सारी खीझ न जाने कहाँ कपूर की तरह उड़ गई। उसने लपक कर दरवाजे पर खड़ी अपनी बचपन की उस सहेली को गले से लगा लिया जिसे उसने पिछले पांच सालों से नहीं देखा था। रश्मि विशाखा की कॉलेज की सबसे पक्की सहेली थी, लेकिन शादी के बाद दोनों अपनी-अपनी गृहस्थी में ऐसी उलझीं कि फोन पर भी बात होना एक सपना सा हो गया था।
“तू अंदर आ पहले! यार तू तो जैसे इस दुनिया से ही गायब हो गई। हम एक ही शहर में रहते हैं, फिर भी मिलने के लिए पांच साल लगा दिए तूने?” विशाखा ने उसे सोफे पर बैठाते हुए प्यार भरा उलाहना दिया।
रश्मि ने एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर उम्र से पहले ही थकान की लकीरें उभर आई थीं। उसकी साड़ी का रंग काफी हल्का पड़ चुका था और आँखों के नीचे काले घेरे थे। “क्या बताऊं विशाखा, शहर एक होने से क्या होता है? तीस किलोमीटर का फासला मेरे लिए तीन सौ किलोमीटर जैसा है। ससुराल बहुत बड़ा है। सास-ससुर की उम्र हो गई है, उनकी दवाइयां, ननद के बच्चों का आना-जाना, अपने बच्चों की पढ़ाई… सुबह छह बजे से जो चक्की शुरू होती है, रात के ग्यारह बजे तक खत्म नहीं होती। आज तो मैं बहुत मुश्किल से, सासू माँ के आगे हाथ जोड़कर आई हूँ कि मुझे आज अपनी विशाखा से मिलना है।”
विशाखा उसे ध्यान से देख रही थी। यह वही रश्मि थी जो कॉलेज के दिनों में पूरे ग्रुप की जान हुआ करती थी। सबसे नए कपड़े, सबसे खिलखिलाती हुई हँसी और बेबाक अंदाज़। आज वो एक ऐसी मुरझाई हुई औरत में तब्दील हो गई थी जिसका अपना कोई वजूद ही नहीं बचा था।
तभी विशाखा का फोन बजने लगा। स्क्रीन पर क्लब की सेक्रेटरी नीलम का नाम फ्लैश हो रहा था। विशाखा को याद आया कि उसे तो आज क्लब जाना था। उसने फोन की स्क्रीन देखी और फिर सामने बैठी रश्मि को देखा, जिसकी आँखों में एक अजीब सी आस थी—कुछ पल सुकून से बिताने की आस, अपनी पुरानी सहेली के साथ अपने दिल का गुबार निकालने की आस।
विशाखा ने बिना कुछ सोचे फोन को ‘साइलेंट’ पर डाल दिया और नीलम को एक मैसेज टाइप कर दिया—”घर पर एक बहुत ज़रूरी मेडिकल इमरजेंसी आ गई है, मैं आज नहीं आ पाऊंगी।”
आज तंबोला और वो बनावटी गपशप नहीं, बल्कि इस रिश्ते को सींचना ज्यादा ज़रूरी था। विशाखा ने अपना फोन किनारे रख दिया और रसोई में जाकर रश्मि की पसंद की कड़क अदरक वाली चाय और कुछ स्नैक्स ले आई।
“मुझे याद है तुझे अदरक वाली चाय कितनी पसंद थी,” विशाखा ने कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
चाय की चुस्की लेते ही रश्मि की आँखों से अचानक आंसू छलक पड़े। वह फफक-फफक कर रोने लगी। विशाखा घबरा गई और उसके पास खिसक कर बैठ गई। “क्या हुआ रश्मि? सब ठीक तो है ना? तू रो क्यों रही है?”
रश्मि ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं यार, बस आज बरसों बाद किसी ने मुझसे मेरी पसंद पूछी है। उस घर में मैं सबके लिए सुबह से रात तक उनकी पसंद का खाना, चाय, नाश्ता बनाती हूँ। पर मेरी पसंद क्या है, यह पूछने वाला कोई नहीं है। पति देव ऑफिस की उलझनों में रहते हैं, बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि मैं कोई इंसान नहीं, बस एक रोबोट हूँ जिसमें भावनाएं ही नहीं हैं। आज जब तूने यह चाय दी, तो लगा जैसे मैं वापस उसी पुराने ज़माने में लौट आई हूँ जहाँ मैं सिर्फ एक बहू या माँ नहीं, बल्कि ‘रश्मि’ थी।”
विशाखा का गला रुंध गया। उसे अपनी उस ‘खीझ’ पर शर्म आने लगी जो रश्मि को दरवाजे पर देखकर उसे हुई थी। वो किस क्लब की मीट के लिए परेशान हो रही थी? क्या वो उन लोगों के लिए जा रही थी जो बस उसके कपड़ों और जेवरों की तारीफ करते? यहाँ सामने एक ऐसी सहेली बैठी थी जिसकी आत्मा प्यार और अपनेपन के लिए प्यासी थी।
विशाखा ने रश्मि के हाथ अपने हाथों में ले लिए। “रो मत पगली। आज तू यहाँ आई है ना, तो हम वही करेंगे जो कॉलेज में करते थे। आज कोई गृहस्थी की बात नहीं होगी।”
उस पूरी दोपहर दोनों ने खूब बातें कीं। कॉलेज के दिनों की शरारतें याद कीं, प्रोफेसरों के मज़ाक उड़ाए, और एक-दूसरे के साथ जमकर हँसीं। विशाखा ने रश्मि के बालों में तेल से चंपी की, उसे अपने हाथ से खाना खिलाया और फिर दोनों पुरानी एल्बम निकालकर यादों के गलियारों में खो गईं। रश्मि के चेहरे पर जो उदासी थी, वह अब एक खूबसूरत चमक में बदल चुकी थी। उसकी हँसी में वो पुरानी खनक वापस लौट आई थी।
शाम के पांच बज गए थे। रश्मि ने घड़ी देखी और चौंक कर उठी। “अरे बाप रे! पांच बज गए। मुझे निकलना होगा, वरना घर पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी और सासू माँ परेशान हो जाएंगी।”
विशाखा ने उसे दरवाजे तक छोड़ा। रश्मि ने जाते-जाते विशाखा को कसकर गले लगा लिया। “विशाखा, तूने आज मुझे एक नई ज़िंदगी दे दी। ये कुछ घंटे मेरे लिए आने वाले कई सालों की ऊर्जा बन गए हैं। थैंक यू यार!”
रश्मि के जाने के बाद विशाखा ने दरवाजा बंद किया और एक गहरी सांस ली। आज उसने अपनी किटी पार्टी मिस कर दी थी, आज उसने वो स्वादिष्ट इटैलियन लंच नहीं किया था, लेकिन आज उसके दिल में जो सुकून था, वह किसी भी पार्टी से हज़ार गुना ज्यादा था। उसने एक मुरझाए हुए फूल में दोबारा जान डाल दी थी। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते और दोस्त वो अनमोल धरोहर हैं जो गृहस्थी की आपाधापी में कहीं गुम नहीं होने चाहिए। असली खुशी महंगे होटलों में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए इन चंद लम्हों में ही छिपी होती है।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसी दोस्त है जो गृहस्थी की उलझनों में कहीं खो गई है? उसे आज ही फोन करें, शायद उसे आपके इन दो शब्दों की ही ज़रूरत हो। कमेंट बॉक्स में अपनी उस सहेली का नाम ज़रूर लिखें।
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लेखिका : मोहिनी मिश्रा