वो अनचाही नेमत: एक बेटी का वजूद

“माँ! ओ माँ! कहाँ हो आप? जल्दी से बाहर आइए, मेरा शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है। आज मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है, मुझे अपने हाथों से दही-चीनी खिलाकर विदा कीजिए।” घर के आंगन में गूंजती यह चहकती हुई आवाज़ डॉ. नव्या की थी। रसोई से अपने पल्लू में हाथ पोंछती हुई सुमित्रा … Read more

खामोशी की दरारें

दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक आज विकास को हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। वह डाइनिंग टेबल के एक छोर पर बैठा अखबार के पन्नों में उलझने का नाटक कर रहा था, और ठीक उसके सामने बैठी नीता बिना कोई आवाज़ किए अपने कप की चाय खत्म कर रही थी। दोनों के बीच … Read more

मुस्कुराहट के पीछे छिपे आँसू: एक बेटी की विदाई

बचपन से ही हर लड़की की तरह मैंने भी अपनी शादी को लेकर न जाने कितने ही सपने संजोए थे। लाल जोड़ा, हाथों में रची गहरी मेहंदी, ढोल-नगाड़ों की थाप और एक ऐसा राजकुमार जो मुझे ब्याह कर ले जाएगा। लेकिन इन तमाम खुशनुमा सपनों के बीच एक डरावना सच भी हमेशा मेरे जहन में … Read more

वो धड़कन जो मेरी नहीं थी

पुणे शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में मीरा का जीवन एक सीधी रेखा की तरह चल रहा था। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करने वाली मीरा अपने काम से काम रखने वाली लड़की थी। तीन साल पहले हुई एक गंभीर हार्ट सर्जरी के बाद उसने अपनी जिंदगी को एक … Read more

खामोश इंतज़ार की चुभन

 बस, वही एक पल था जिसने दोनों के बीच जमी बरसों की बर्फ को पिघला दिया। उस दिन के बाद से उनका मेल-मिलाप शुरू हो गया। कल्याणी का नर्म दिल अविनाश के उस शालीन और अनवरत समर्पण के आगे हार गया था। धीरे-धीरे वह भी अविनाश को चाहने लगी। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान छिड़कने … Read more

चमकता घर और वो उंगलियों के निशान

 आज रश्मि घर के हर कोने में जाकर उन निशानों को ढूंढती है जो कभी उसे चुभते थे। वह डाइनिंग टेबल के कांच को छूकर महसूस करने की कोशिश करती है कि शायद कहीं काव्या की उंगलियों की छाप छूट गई हो। वह अंश के कमरे में जाकर उस खाली बिस्तर को घंटों निहारती है … Read more

रिश्तों की चुभन और एक माँ का खोखला आदर्श

“अनन्या, सुन रही है? कल करवा चौथ है और तू जानती है कि रिया का यह पहला व्रत है। घर में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। तू आज ही बाज़ार जाकर सरगी का सारा सामान, फल, मेवे और मठरियाँ ले आ। और हाँ, कल सुबह रिया को भूल से भी जल्दी मत उठाना। बेचारी का … Read more

खौफ के पार एक उम्मीद

  रमा देवी बार-बार दरवाजे की ओट से बाहर झांकतीं और फिर निराश होकर आंगन में लौट आतीं। उनके माथे की लकीरें उनके भीतर चल रहे तूफान को साफ बयां कर रही थीं। उनके पति, जो कभी एक मिल में काम करते थे, पिछले तीन सालों से लकवे का शिकार होकर बिस्तर पर थे। घर में … Read more

ममता का बँटवारा

मीरा के हाथों में मायके से आया वह लिफाफा किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। खिड़की से छनकर आती दोपहर की उदास हवा उस पन्ने को फड़फड़ा रही थी, मानो वह कागज भी मीरा के सीने में उठते तूफान की गवाही दे रहा हो। उसकी आँखों से गिरती गर्म बूंदों ने खत की … Read more

समर्पण के अनकहे रंग: एक कामकाजी माँ की खामोश तपस्या

“कभी खुद को आईने में देखा है तुमने, मीरा? क्या हाल बना लिया है अपना। न बालों में कंघी करने का होश है, न ढंग के कपड़े पहनने का। आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए हैं और वजन तो जैसे बढ़ता ही जा रहा है। घर का हाल देखो, ऐसा लगता है जैसे कोई … Read more

error: Content is protected !!