उम्र की दहलीज और बचपन का हाथ

कबीर ने अपने जूते के फीते बांधते हुए बहुत ही मासूमियत लेकिन एक गहरी समझ के साथ कहा, “पापा, आपको याद है जब हम पिछले साल ट्रिप पर गए थे? मम्मा ने मेरा कितना सारा सामान पैक किया था। मेरी दवाइयां, मेरे खिलौने, मेरे गर्म कपड़े, मेरा मनपसंद खाना। मम्मा कहती हैं कि बच्चों को … Read more

कच्ची मिट्टी का पक्का घर

मीरा थोड़ी आगे बढ़ी और अपने ससुर दीनानाथ जी की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रखा और कहा, “क्या आपको पता है अंकल, जब हम शहर के बाज़ार से गुज़रते थे, तो लोग मेरे ससुर जी को देखकर सम्मान से रास्ता छोड़ देते थे। उनका नाम सुनकर … Read more

 विश्वास की डोर

उस दिन मीरा ने चाय की ट्रे जैसे-तैसे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे वहां से अपने कमरे में चली गई। उसके दिल में एक अजीब सी खटास पैदा हो गई थी। जिस सास के साथ वह अपने दिल की हर बात साझा करती थी, अचानक वह उसे एक अजनबी और स्वार्थी औरत लगने … Read more

सुबह की मीठी धूप

“अरे मीरा बेटा, तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गईं? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। आज तो रविवार है, तुम्हें आराम करना चाहिए था,” निर्मला देवी ने बहुत ही स्नेह से कहा। मीरा हड़बड़ा गई। उसे लगा कि शायद उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है या फिर उसकी सास उसे ताना मार … Read more

कर्ज़ ममता का: एक देवर की अपनी भाभी के लिए अनूठी भेंट

रोहन ने कविता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी भी आँखों से आँसू बह रहे थे। “भाभी, दुनिया कहती है कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसने माँ बनाई है। लेकिन मैं कहता हूँ कि जिसके पास आपके जैसी भाभी हो, उसे तो किसी भगवान की भी ज़रूरत नहीं है। … Read more

रिश्तों की असली पहचान

वो भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि काश बाबूजी का आना किसी तरह टल जाए। वो नहीं चाहती थी कि जिन बाबूजी को कस्बे में इतना सम्मान मिलता है, उन्हें अपनी ही बेटी के घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़े। लेकिन सुबह हो चुकी थी। ट्रेन का समय हो गया था। मीरा ने … Read more

विश्वास की कसौटी

रेवती जी ने श्रुति के आँसू पोंछे और रोहन की तरफ पलटकर बोलीं, “सुन ले रोहन, शादी का रिश्ता कोई शक की ज़मीन पर खड़ी इमारत नहीं होती। ये विश्वास की वो डोर है जो एक बार टूट जाए तो लाख कोशिशों के बाद भी उसमें गाँठ रह ही जाती है। मंडप में जलाई गई … Read more

रिश्तों की अनकही डायरी

आज मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। मैंने  दीक्षा  पर हाथ उठाया। मुझे खुद से घिन आ रही है। मैं जानता हूँ कि वो इस शादी से खुश नहीं है, किसी और को चाहती है। मैं ये भी जानता हूँ कि वो रोज़ दोपहर को उससे मिलने जाती है। लेकिन वो भी क्या करे, उसके … Read more

खोखली मर्यादाएं

रोहन ने अपनी बात जारी रखी, “बाबूजी, क्या अब भी आप भाभी को उसी चौखट पर बांधे रखना चाहते हैं जहाँ से कभी कोई नहीं गुज़रेगा? अगर यही सब हमारी बहन के साथ हुआ होता… अगर आपके दामाद ने हमारी बहन को ऐसे छोड़ दिया होता, तो क्या तब भी आप यही कहते कि ‘मर्द … Read more

वजूद की लड़ाई

 रीमा  वहीं बुत बनकर खड़ी रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी गलती क्या है? क्या उसका विधवा होना उसका अपराध है? या उसका किसी के आगे हाथ न फैलाकर खुद कमाना उसका गुनाह है? क्यों पुरुष वर्ग उसे बस एक इस्तेमाल की वस्तु समझता है, और जब अपनी पत्नी के सामने … Read more

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