अतीत की दहलीज पर

“मैं तुम्हें वापस पाने की जिद नहीं कर रहा हूँ, अनन्या। मैं जानता हूँ मैंने तुम्हारा बहुत दिल दुखाया है। मैं बस इतना चाहता था कि तुम यह जान लो कि तुम्हारी लड़ाई गलत नहीं थी। गलत मैं था। मुझे बस इस एहसास के साथ नहीं जीना था कि तुम मुझे एक डरपोक और धोखेबाज … Read more

निस्वार्थ त्याग

रिया  अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी होकर कॉलेज के एक फंक्शन के लिए तैयार हो रही थी। तभी उसके पिता, मदन जी, अपने एक पैर से हल्का सा लंगड़ाते हुए कमरे में आए। उनके हाथ में रिया  की प्रेस की हुई ड्रेस थी। मदन जी के चेहरे पर एक पुराना, गहरा जलने का … Read more

वह रानी रंग की साड़ी: एक खामोश प्रेम की गवाही

यह पढ़ते ही दोनों ननद-भौजाई एक दूसरे के गले लगकर जोर-जोर से रोने लगीं। सुमित्रा जी ने अपनी मौत की तैयारी भी जैसे पहले से ही कर रखी थी, ताकि जाने के बाद भी उनके बच्चों को कोई तकलीफ न हो। रोने की आवाज सुनकर विकास और पीछे-पीछे रघुनाथ जी भी भारी कदमों से कमरे … Read more

खामोश समझौता

ये बातें सुजाता जी के दिल को छलनी कर देती थीं। जिस औरत ने जीवन भर अपने दम पर दुनिया का सामना किया था, आज उसे अपने ही घर में, अपने ही पहनावे और अस्तित्व के लिए ताने सुनने पड़ रहे थे। काव्या की माँ जब भी घर आतीं, तो वह भी काव्या की ही … Read more

कोख का कलंक

अंजलि पिछले हफ्ते ही अपनी बीमार माँ को देखने के लिए अपने मायके भोपाल गई हुई थी। घर में सिर्फ सुमित्रा देवी और रोहन थे। सुमित्रा देवी को लगा कि अंजलि की गैरमौजूदगी में रोहन को समझाना आसान होगा। रात के खाने के बाद, जब रोहन हॉल में बैठकर अपना लैपटॉप बंद कर रहा था, … Read more

आंसुओं का मुखौटा

धूल भरी पगडंडी से होते हुए जब विकास की गाड़ी पुश्तैनी हवेली के लोहे वाले बड़े दरवाजे के सामने रुकी, तो वहां पहले से ही गांव वालों की भारी भीड़ जमा थी। शालिनी ने गाड़ी का शीशा नीचे किया तो बाहर से आती अगरबत्ती, लोबान और रोने-पीटने की मिली-जुली आवाजें उसके कानों से टकराईं। आज … Read more

वंश का अभिमान: एक माँ की हुंकार

शिवानी अपनी तीन साल की नन्ही बेटी, काव्या को अपने हाथों से नाश्ता करा रही थी। काव्या की मीठी तोतली बातें और उसकी मासूम हंसी से पूरा घर गूंज रहा था। शिवानी के पति, राघव, अखबार पढ़ते हुए बीच-बीच में अपनी बेटी की हरकतों पर मुस्कुरा देते थे। बाहर से देखने पर यह एक बेहद … Read more

उम्मीद के धागे

अस्पताल की सफेद, ठंडी दीवारों के बीच एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जिसे सिर्फ वेंटिलेटर की एकरस ‘बीप-बीप’ की आवाज़ ही तोड़ रही थी। आईसीयू के बाहर, कांच की दीवार से माथा टिकाए विक्रम खड़ा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता … Read more

ममता की तराजू: पच्चीस साल बनाम एक महीना

शालिनी का मन आज सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और उदासी के भंवर में गोते खा रहा था। घर का हर कोना उसे काटने को दौड़ रहा था। आज उसकी इकलौती बेटी काव्या की शादी को ठीक एक महीना पूरा हो गया था। यह एक महीना शालिनी के लिए किसी युग के बीतने … Read more

खामोश दीवारें और सुलगते जज़्बात

“मैडम जी, दरवाज़ा तो खोलिए, कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ!” कामवाली शांता की ऊँची आवाज़ सुनकर अंजलि जैसे किसी गहरे सपने से जागी। उसने झटके से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और जाकर दरवाज़ा खोल दिया। पुणे के एक बेहद पॉश इलाके में बने उस आलीशान विला को बाहर … Read more

error: Content is protected !!