रमा देवी बार-बार दरवाजे की ओट से बाहर झांकतीं और फिर निराश होकर आंगन में लौट आतीं। उनके माथे की लकीरें उनके भीतर चल रहे तूफान को साफ बयां कर रही थीं। उनके पति, जो कभी एक मिल में काम करते थे, पिछले तीन सालों से लकवे का शिकार होकर बिस्तर पर थे। घर में एक छोटा बेटा था जो अभी दसवीं में पढ़ रहा था। ऐसे में घर की पूरी जिम्मेदारी उनकी बाईस साल की बेटी, सुहानी के कंधों पर थी।
सुहानी शहर के एक बड़े बुटीक में सिलाई और कढ़ाई का काम करती थी। दिवाली का त्योहार नजदीक था, इसलिए बुटीक मालकिन ने ऑर्डर पूरे करने के लिए सभी लड़कियों को ओवरटाइम करने के लिए रोक लिया था।
सुहानी जानती थी कि इस ओवरटाइम के पैसे से उसके पिता की दवाइयां और भाई की स्कूल फीस आसानी से निकल जाएगी, इसलिए उसने बिना किसी शिकायत के रुकने का फैसला किया था। लेकिन उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि आज रात घर लौटते समय उसे किस खौफनाक अनुभव से गुजरना पड़ेगा।
जब सुहानी बुटीक से निकली, तो रात के साढ़े दस बज चुके थे। बस स्टैंड तक पहुंचने के लिए उसे लगभग बीस मिनट पैदल चलना था। शहर की वो सड़क, जो दिन में भीड़ से गुलजार रहती थी, इस वक्त किसी सुनसान खंडहर की तरह डरावनी लग रही थी। सड़क के दोनों ओर बड़े-बड़े पेड़ों की कतारें थीं,
जिनकी परछाइयां पीली रोशनी में किसी दैत्य जैसी प्रतीत हो रही थीं। सुहानी ने अपनी शॉल को कसकर लपेटा और अपने कदमों की रफ्तार बढ़ा दी। उसके कंधे पर टंगे बैग में कुछ बचे हुए कपड़ों के टुकड़े, धागे और सिलाई की एक बड़ी कैंची थी।
एक लड़की जब रात के अंधेरे में अकेली सड़क पर होती है, तो उसका दिमाग कई तरह की खौफनाक कल्पनाएं करने लगता है। उसे हर आहट से डर लगता है, हर गुजरती गाड़ी उसे आशंकित कर देती है। सुहानी भी उसी मानसिक द्वंद्व से गुजर रही थी। वह मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थी और सोच रही थी कि बस किसी तरह वह अपनी गली के मोड़ तक पहुंच जाए।
तभी उसे अपने पीछे कुछ दूरी पर कदमों की आहट सुनाई दी। पहले उसे लगा कि शायद यह उसका वहम है। उसने अपनी चाल थोड़ी और तेज कर दी। लेकिन पीछे वाले कदमों की रफ्तार भी तेज हो गई। सुहानी के दिल की धड़कनें तेज होने लगीं। उसने तिरछी नजर से पीछे देखने की कोशिश की,
लेकिन कोहरे और धुंधलेपन के कारण उसे केवल एक साया दिखाई दिया, जो लगातार उसके पीछे आ रहा था। सुहानी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने अखबारों में अक्सर ऐसी खबरें पढ़ी थीं, जिनमें रात के अंधेरे में अकेली लड़कियों को शिकार बनाया जाता था। वह साया धीरे-धीरे उसके करीब आ रहा था। सुहानी ने अपने बैग की चेन खोली और अपना हाथ अंदर डालकर उस बड़ी कैंची की मूठ को कसकर पकड़ लिया। यह कैंची अब उसका एकमात्र हथियार थी।
अचानक पीछे से एक पुरानी मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज आई। सुहानी की सांसें हलक में अटक गईं। उसे लगा कि अब वह नहीं बच पाएगी। वह साया पैदल नहीं, बल्कि अब गाड़ी पर था। मोटरसाइकिल की हेडलाइट की रोशनी जैसे ही सुहानी के पैरों पर पड़ी, वह घबराहट के मारे दौड़ पड़ी। वह बस भागना चाहती थी, कहीं छिप जाना चाहती थी।
लेकिन घबराहट और जल्दबाजी में उसका पैर सड़क पर पड़े एक बड़े पत्थर से टकराया और वह धड़ाम से मुंह के बल सड़क पर गिर पड़ी। उसके घुटनों और कोहनियों से खून छलकने लगा, और उसका बैग दूर जा गिरा। लेकिन सुहानी ने उस कैंची को अपने हाथ से नहीं छूटने दिया। वह दर्द से कराह रही थी, लेकिन उठने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।
मोटरसाइकिल ठीक उसके पास आकर रुकी। इंजन बंद हुआ और एक भारी जूतों वाले कदमों की आहट उसके करीब आने लगी। सुहानी ने अपनी आंखें मींच लीं और कैंची की नोक को अपनी छाती के पास तान लिया। वह किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार थी। एक पल के लिए उसे अपनी बीमार मां और पिता का चेहरा याद आया। तभी एक मजबूत हाथ ने उसके कंधे को छुआ। सुहानी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर कैंची वाले हाथ को पीछे खींचा और वार करने ही वाली थी कि एक बेहद शांत और ठहरी हुई आवाज ने उसे रोक दिया।
“अरे-अरे! संभाल के… बहन जी, घबराइए मत। मैं कोई गुंडा-मवाली नहीं हूं।”
सुहानी ने कांपते हुए अपनी आंखें खोलीं। सामने एक पच्चीस-छब्बीस साल का नौजवान खड़ा था। उसने एक साधारण सी जैकेट और सिर पर मफलर बांधा हुआ था। उसकी आंखों में कोई दरिंदगी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी चिंता थी।
“तुम… तुम मेरे पीछे क्यों आ रहे थे? क्या चाहते हो मुझसे?” सुहानी ने हांफते हुए पूछा, हालांकि उसकी पकड़ कैंची पर अभी भी मजबूत थी।
उस युवक ने दो कदम पीछे हटते हुए अपने हाथ हवा में उठा लिए, जैसे यह विश्वास दिलाना चाहता हो कि वह निहत्था है और नुकसान नहीं पहुंचाएगा। उसने कहा, “मेरा नाम कबीर है। मैं पास के अनाथ आश्रम में काम करता हूं और रात को नाइट गार्ड की ड्यूटी भी करता हूं। मैं बस स्टैंड के पास चाय की टपरी पर खड़ा था, जब मैंने देखा कि तीन लड़के आपका पीछा कर रहे हैं। वे नशे में धुत थे और उनकी नीयत ठीक नहीं लग रही थी। मैं उन्हें टोकने ही वाला था कि वे आपको देखकर उस सुनसान गली की तरफ मुड़ गए। मुझे फिक्र हुई कि कहीं वे आपके साथ कोई बदसलूकी न करें, इसलिए मैंने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और उनके पीछे आ गया। मेरी गाड़ी की आवाज सुनकर वे तीनों तो गली के उस पार भाग गए, लेकिन आप डर कर दौड़ पड़ीं और गिर गईं।”
सुहानी स्तब्ध रह गई। वह जिसे अपना शिकारी समझ रही थी, वह असल में उसका रक्षक था। कबीर ने नीचे झुककर सुहानी का बिखरा हुआ सामान बैग में समेटा और बैग सुहानी की तरफ बढ़ा दिया।
“आप उठ सकती हैं? चोट ज्यादा तो नहीं लगी?” कबीर ने बहुत ही अदब से पूछा।
सुहानी ने लड़खड़ाते हुए उठने की कोशिश की। उसके घुटने छिल गए थे और दर्द हो रहा था, लेकिन वह खड़ी हो गई। उसने अपनी कैंची को चुपके से बैग में वापस रख दिया। उसे अपने आप पर थोड़ी शर्मिंदगी भी महसूस हो रही थी कि उसने एक नेक इंसान पर शक किया। लेकिन आज के समाज में एक लड़की और कर भी क्या सकती है? सुरक्षा से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं।
कबीर ने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और कहा, “इस रास्ते पर रात में अकेले पैदल जाना खतरे से खाली नहीं है। अगर आपको एतराज ना हो, तो मैं आपको आपके घर तक छोड़ देता हूं। आप चाहें तो मेरे पीछे बैठ सकती हैं। मेरी बहन भी इसी समय अस्पताल से अपनी नर्सिंग की ड्यूटी खत्म करके आती है, मैं उसका दर्द समझ सकता हूं।”
सुहानी के पास कोई और विकल्प नहीं था। उसके पैरों में दर्द था और रास्ता अभी भी लंबा था। वह बिना कुछ कहे मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ गई। हवा के ठंडे झोंके अब डरावने नहीं लग रहे थे। रास्ते भर दोनों के बीच कोई खास बात नहीं हुई। कबीर बहुत ही सावधानी से और एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखते हुए गाड़ी चला रहा था। सुहानी के मन में समाज के प्रति एक नई सोच जन्म ले रही थी। उसने सोचा कि दुनिया पूरी तरह से बुरी नहीं हुई है; कुछ आदमखोर भेड़ियों के बीच कुछ ऐसे इंसान भी जिंदा हैं, जो रिश्तों की कद्र करते हैं और औरतों का सम्मान करते हैं।
कुछ ही मिनटों में मोटरसाइकिल सुहानी की गली के नुक्कड़ पर पहुंच गई। सुहानी ने उतर कर राहत की सांस ली। उसकी मां, रमा देवी, जो अब तक गली के बाहर ही चक्कर काट रही थीं, सुहानी को देखकर दौड़ पड़ीं।
“सुहानी! तू इतनी देर कर दी? और यह चोट कैसे लगी?” रमा देवी ने घबराते हुए पूछा।
सुहानी ने अपनी मां को गले लगा लिया और कहा, “कुछ नहीं मां, बस अंधेरे में गिर गई थी। ये कबीर भैया हैं, इन्होंने ही मेरी मदद की और मुझे घर तक छोड़ा।”
रमा देवी ने हाथ जोड़कर कबीर का धन्यवाद किया। कबीर ने मुस्कुराकर हाथ जोड़े और कहा, “अरे नहीं अम्मा जी, इसमें धन्यवाद कैसा। यह तो मेरा फर्ज था।”
जब कबीर जाने के लिए मुड़ा, तो सड़क के किनारे लगे खंभे की पीली रोशनी उसकी जैकेट पर पड़ी। सुहानी की नजर अचानक कबीर की बांह पर गई। उसकी जैकेट की दाहिनी आस्तीन कटी हुई थी और वहां से खून रिस कर जैकेट पर जम गया था।
“कबीर भैया! आपके हाथ से खून बह रहा है… यह कैसे हुआ?” सुहानी ने चौंकते हुए पूछा।
कबीर ने अपनी बांह देखी और एक हल्की सी मुस्कान के साथ बोला, “कुछ नहीं। जब आप गिरी थीं और मैंने आपको उठाने के लिए हाथ बढ़ाया था, तब शायद बचाव में आपके हाथ में जो हथियार था, उसकी नोक से यह खरोंच लग गई। कोई बात नहीं, यह तो कुछ दिनों में भर जाएगा।”
सुहानी को अपनी उस सिलाई वाली कैंची का ध्यान आया। वह अपराधबोध से भर उठी। “मुझे… मुझे माफ कर दीजिए। मैं डर गई थी और मुझे लगा कि…”
कबीर ने उसकी बात बीच में ही काट दी। “आपको माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है सुहानी जी। बल्कि मुझे इस बात की खुशी है कि आप किसी भी अनहोनी से बचने के लिए पूरी तरह तैयार थीं। समाज के जो हालात हैं, उसमें हर लड़की को अपने बचाव के लिए हमेशा ऐसा ही सतर्क और हथियारबंद रहना चाहिए। आपका वो डर और आपका वो वार, दोनों ही बिल्कुल सही थे। अपनी सुरक्षा की यह नोक हमेशा तेज रखिएगा।”
कबीर ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की। फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा, “कल रविवार है। हमारे आश्रम में सुबह महिलाओं के लिए मुफ्त आत्मरक्षा (सेल्फ डिफेंस) की क्लास होती है। मैं चाहूंगा कि आप भी वहां आएं। कैंची या किसी चीज से ज्यादा, आपके अपने हाथ मजबूत होने चाहिए।”
यह कहकर कबीर वहां से चला गया। सुहानी और उसकी मां उसे अंधेरे में ओझल होते हुए देखते रहे। सुहानी को आज रात एक बहुत बड़ा सबक मिला था। खौफ और भरोसे के बीच का अंतर समझ आ गया था। उस रात सुहानी जब बिस्तर पर लेटी, तो उसके पैरों में दर्द जरूर था, लेकिन उसका मन एक अजीब सी शांति और आत्मविश्वास से भरा हुआ था।
अगली सुबह सुहानी ने अपने जीवन में एक नया संकल्प लिया। उसने ठान लिया था कि वह अब किसी साये से नहीं डरेगी, बल्कि खुद इतनी मजबूत बनेगी कि दूसरों के लिए ढाल बन सके।
दोस्तों, जब आप इस कहानी को पढ़ रहे थे, तो क्या आपके मन में भी एक पल के लिए यही ख्याल आया था कि रात के अंधेरे में आने वाला शख्स कोई गलत इंसान ही होगा? हम समाज को उसी नजरिए से देखते हैं, जो हमें अक्सर दिखाया या बताया जाता है। लेकिन क्या हमें अपने नजरिए में बदलाव लाने की जरूरत है? अपनी राय हमें जरूर बताएं।
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लेखिका : वर्षा शीतल