गाँव का वह छोटा-सा शासकीय विद्यालय सुबह होते ही बच्चों की आवाज़ों से भर जाता था। विद्यालय के सामने कच्ची सड़क थी और उसके दोनों ओर दूर तक फैले खेत। खेतों में रोपा लगाते ग्रामीण नई उम्मीदों की फसल बोने की तैयारी में थे। बरामदे के पास खड़ा पुराना नीम का पेड़ गर्मी की दोपहर में बच्चों को अपनी छाँव देता था। कहीं दूर बैलों की घंटियाँ सुनाई देतीं और कभी हवा के साथ खेतों की मिट्टी की सोंधी गंध विद्यालय के कमरों को महका जाती।
सुधा अपने कक्ष में बैठी थीं। सामने फाइलों का ढेर था और खिड़की के बाहर नीम की शाखाएँ हवा में धीरे-धीरे हिल रही थीं। आकाश में काले बादलों की घुमड़न शुरू हो गई थी। सावन अपने उफान पर था।
तभी कक्ष के बाहर धीमी-धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—
“जा ना… मैडम बैठी हैं।”
“तू जा।”
“नहीं, तू जा।”
“अरे जा न… मैडम डाँटेंगी नहीं।”
सुधा के होंठों पर अनायास मुस्कान आ गई।
कागज़ों पर उनकी नज़र थी, लेकिन ध्यान दरवाज़े के बाहर था।
बच्चों ने शायद उनके कमरे को बाकी कमरों से अलग मान लिया था। यहाँ आने के लिए कोई गलती करना जरूरी नहीं था। कोई अपनी परेशानी लेकर भी आ सकता था।
बच्चों का किसी बड़े से न डरना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ी बात है—उस पर भरोसा करना।
सुधा ने जाने-अनजाने अपने लिए यही जगह बना ली थी।
“कौन है बाहर? अंदर आ जाओ,” सुधा ने झिझक दूर करने की पहल की।
कुछ क्षण बाद फिर फुसफुसाहट हुई—
“काव्या, तू ही बोल दे।”
दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
“मैडम… अंदर आ जाऊँ?”
“हाँ बेटा, आओ।”
सुधा ने फाइलों पर चलती कलम रोक दी।
काव्या धीरे-धीरे भीतर आई और कुर्सी के पास आकर खड़ी हो गई।
“बैठो।”
वह बैठी नहीं। उसकी उँगलियाँ लगातार दुपट्टे का किनारा मरोड़ रही थीं।
सुधा ने पूछा, “क्या बात है काव्या?”
कुछ क्षण चुप रहने के बाद काव्या बोली—
“मैडम… पापा फीस नहीं देंगे।”
“क्यों?”
“कह रहे हैं… अभी फीस के रुपए नहीं हैं… अगले साल पढ़ लेना।”
सुधा उसे देखती रह गईं।
एक साल।
किसी के लिए शायद कैलेंडर का एक पन्ना भर। लेकिन एक बच्चे की पढ़ाई में वह एक साल कभी-कभी पूरी दूरी बन जाता है।
उन्होंने सहजता से कहा—
“कोई बात नहीं। फीस की बात है। हम कह देंगे, तुम्हारी कक्षा के बच्चे तुम्हारी फीस के लिए थोड़ा-थोड़ा चंदा कर देंगे। फीस जमा हो जाएगी।”
काव्या ने तुरंत सिर उठा लिया।
“नहीं मैडम।”
सुधा ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों?”
“चंदा मत कराइए।”
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन निर्णय बिल्कुल स्पष्ट था।
सुधा कुछ क्षण उसे देखती रहीं।
सहायता देने वाले को अक्सर लगता है कि उसने सामने वाले की मुश्किल समझ ली है।
लेकिन जरूरतमंद के मन में उसकी जरूरत से भी बड़ा कुछ हो सकता है—उसका स्वाभिमान।
“ठीक है,” सुधा ने कहा, “तुम जाओ। कल मुझसे फिर मिलना।”
काव्या चली गई।
दरवाज़ा बंद होते ही सुधा कुर्सी पर पीछे टिक गईं।
क्या चाहती है यह बच्ची? मैं इसकी फीस भर दूँ?अगला विचार आया—लेकिन बाकी बच्चे भी कहने लगेंगे तब? सबकी फीस तो नहीं भर सकती।फिर—तो फिर इसकी ही क्यों?
वह स्वयं अपने प्रश्न का उत्तर नहीं दे पा रही थीं।
मानव मन भी विचित्र है। किसी और की परेशानी सामने आते ही संवेदना और विवेक दोनों अपनी-अपनी तरफ खींचने लगते हैं।
अगले दिन उन्होंने काव्या को फिर बुलाया।
“बेटा, घर में कौन-कौन हैं?”
“मैं, मेरा भाई… और पापा।”
“मम्मी?”
काव्या की आँखें झुक गईं।
“नहीं हैं। जब मैं छोटी थी तभी गुजर गईं।”
ओह कह सुधा कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर धीरे से पूछा, “घर का खर्च कैसे चलता है?”
“पापा कभी-कभी काम करने बाहर चले जाते हैं…..
सुधा चुपचाप सुनती रहीं। वह असलियत जानती थीं कि बच्ची के पिता जो कमाते हैं, वह कहाँ खर्च होता है। लेकिन पिता की गरिमा बच्ची कैसे गिराती?
काव्या ने थोड़ी देर बाद कहा—
“मैडम, मैंने पापा को फीस के बारे में दो महीने पहले ही बता दिया था।”
आखिरी वाक्य में छिपे आक्रोश और दुख को सुधा समझ गईं।
बच्चे अपने माता-पिता के सबसे निकट होते हैं; उनकी कमियों के सबसे बड़े साक्षी भी।उन्हें उन्हीं कमियों का हिसाब देने के लिए खड़ा कर देना शायद सबसे आसान, और सबसे अन्यायपूर्ण काम है।
सुधा ने धीरे से पूछा—
“फिर…? तुम पढ़ाई छोड़ना चाहती हो?”
काव्या ने तुरंत कहा—
“नहीं मैडम।”
इस बार उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी।
सुधा के भीतर कुछ पिघला। वह समझ गईं—यह बच्ची कितनी उम्मीद लेकर उनके पास आई है।
उन्होंने अपने पर्स की ओर हाथ बढ़ाया, फिर एक क्षण को ठिठक गईं।
कल ही तो एक छात्रा की माँ आई थीं… दवा के लिए मदद माँगने। उनकी भी तो मदद की थी मैंने।
एक हल्की-सी खीज मन में उठी।
आखिर मैं ही मिली हूँ क्या सबको? अपनी-अपनी परेशानी लेकर मेरे पास ही क्यों चले आते हैं? स्कूल में और लोग भी तो हैं… वे क्यों नहीं मदद करते?कहीं मेरी संवेदनशीलता का गलत फायदा तो नहीं उठा रहे?
एक पल को मन में यह भी आया—
कहीं लोग मुझे एटीएम तो नहीं समझने लगे?
वह खुद ही इस विचार पर हल्का-सा मुस्कुरा दीं।
लेकिन सवाल वहीं था।
फिर उन्हें अपनी माँ की कही बात याद आई—
“बेटा, अपनी कमाई का कम से कम एक प्रतिशत जरूरतमंदों के लिए जरूर निकालना।”
सुधा की नजर सामने बैठी काव्या पर टिक गई।लेकिन जरूरतमंद को मैं ढूँढ़ने कहाँ जाऊँगी?
किसी अनजान बस्ती में? किसी सड़क किनारे? किसी ऐसी जगह, जहाँ लोग अपनी मजबूरियाँ गिनाकर खुद को जरूरतमंद साबित करें?
ये बच्चे तो रोज़ उनके सामने आते हैं। इनके घर, इनके संघर्ष, इनकी परिस्थितियाँ—सब उनकी आँखों के सामने हैं।
यही तो हैं जरूरतमंद।
फिर जो जरूरत उनके सामने आकर खड़ी हो गई है, उसकी मदद करना गलत कैसे हो सकता है?
फिर मन ने सवाल किया—
आखिर मैं चाहती क्या हूँ? मदद करने से हिचक क्यों रही हूँ?
क्या कोई मेरे सामने गिड़गिड़ाए? रोए? अपनी मजबूरी साबित करने के लिए अपनी गरीबी का प्रदर्शन करे, तभी मैं मानूँ कि उसे सचमुच जरूरत है?या फिर मेरा बड़ा एहसान माने, तब?
सुधा का मन भीतर तक काँप गया।
क्या किसी की मदद पाने की पहली शर्त यह होनी चाहिए कि वह अपनी बेबसी साबित करे?
नहीं।
काव्या तो रो भी नहीं रही थी।वह तो उलटे चंदा लेने से मना कर रही थी।
उसने अपनी जरूरत छिपाई नहीं थी, लेकिन उसे तमाशा भी नहीं बनाया था।
सुधा को लगा, शायद यही उसके स्वाभिमान की सबसे बड़ी पहचान है।
फिर उन्हें अपना ही कहा हुआ वाक्य याद आया—
“बच्चों, पढ़ाई में कोई भी जरूरत हो तो मुझे बताना। अभी नहीं… आगे भी। कभी जरूरत पड़े तो फोन कर देना।”
जिस दरवाज़े को उन्होंने बच्चों के लिए भरोसे से खोला था, आज उसी दरवाज़े पर खड़ी एक जरूरत उन्हें भीतर तक परख रही थी।
हाँ, हर जरूरत का समाधान अपनी जेब से करना उनकी जिम्मेदारी नहीं था।
लेकिन हर जरूरत को संदेह की नजर से देखना भी उन्हें उचित नहीं लगा।
उन्होंने धीरे से फीस की राशि निकाल ली।
“तुम्हारी फीस मैं जमा कर दूँगी।”
काव्या चुप रही। उसके चेहरे पर हल्की उदासी थी।
सुधा ने मुस्कुराकर कहा—
“लेकिन एक शर्त है।”
“क्या?” उसने थोड़े संकोच से पूछा।
“जब पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ… कमाने लगो… तब ये पैसे मुझे लौटा देना।”
सुनते ही काव्या के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।
“जी मैडम।”
“पक्का?”
“पक्का।”
वह उठी।
दरवाज़े तक पहुँची और फिर पलटकर बोली—
“थैंक्यू मैडम।”
इस बार उसके चेहरे पर संतोष और स्वाभिमान की उजास थी।
सुधा मुस्कुराईं।
“मन लगाकर पढ़ाई करना। वही धन्यवाद होगा।”
काव्या चली गई।
सुधा कुछ देर तक दरवाज़े को देखती रहीं।किसी को कुछ देना आसान है।लेकिन उसे यह महसूस कराए बिना देना कि वह आप पर बोझ है—यही असली परीक्षा है!
शाम को विद्यालय लगभग खाली हो चुका था। सुधा खिड़की के पास खड़ी थीं। दूर कच्ची सड़क पर काव्या अपने पुराने बैग के साथ घर की ओर जा रही थी।
खेतों में रोपे गए नन्हे पौधे बारिश की बूँदों से भीग रहे थे।
सुधा के मन में आया—
“रास्ते कच्चे हों तो क्या… मंज़िलें कच्ची थोड़े ही होती हैं।”
उन्होंने डायरी खोली और लिखा—
“आज एक बच्ची की फीस जमा की है। उम्मीद है, एक दिन वह किसी और से कह सकेगी—‘चिंता मत करो, मैं हूँ।’”
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी।
सुधा ने डायरी बंद की और मुस्कुरा दीं।
शायद आज फीस के साथ-साथ एक विश्वास भी जमा हुआ था।
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