*स्वाभिमान मेरा भी* – तोषिका

“कहा जा रही हो बेटा? आज तुम्हे लड़के वाले आ रहे है देखने।” मोहन ने अपनी बेटी निशा को पीछे से टोकते हुए बोला। निशा घूमी और उसने बोला “बस बाहर थोड़ा कॉलेज के लिए समान लेने जा रही हू, जल्दी ही आ जाऊंगी।” 

तभी मोहन ने ताने मारते हुए बोला “सारा दिन बाहर घूम वा लो, आज कल तो लड़कियों के घर पर पैर ही नहीं टिकते है…”।

इससे आगे मोहन कुछ बोले बीच में निशा की मां आई और बात संभाली और निशा को जल्दी आने के लिए कहा।

उधर मोहन गुस्से में अपनी पत्नी को बोला “तुमने ही बिगाड़ रखा है अपनी बेटी को, इतने पर लग गए है कि आती जाती रहती है। पता नहीं ससुराल वाले इसके क्या बोलेंगे कि मां बाप ने कुछ नहीं सिखाया।” दूसरी तरफ उसकी पत्नी बात संभाल रही थी ये बोल कर जाने दीजिए, बच्ची है सीख जाएगी लेकिन बाहर दरवाजे के पीछे छुपी हुई

निशा सब सुन रही थी और सारी बातें उसको काँटे की तरह चुभ रही थी क्योंकि, जिस आजादी की उसके पिता बात कर रहे थे वैसे वाली आजादी उसको कभी नहीं मिली थी और रोक टोक ज्यादा थी। उसने अपने आंसू पोछे और कॉलेज जाकर अपना सामान लिया और वापिस आ गई।

थोड़ी देर बाद लड़के वाले भी देखने आये और उन्होंने निशा को पसंद भी कालिया और शादी तय हो गई।

निशा के मन में कई सवाल थे पर उसकी हिम्मत नहीं हुई पूछने की।

शादी का दिन आया और बड़े धूम धाम से निशा और उसके पति रेहान की शादी हुई और आप वो अपने परिवार के लिए पराया धन बन चुकी थी।

शुरू में सब सही था रेहान उस से रोज़ फोन करके पूछता था कि “खाना खाया? आराम किया?” और भी कई सवाल। ऐसे करते हुए शादी को 2 महीने हो गए थे और निशा पर बच्चे करने का दवाब उसकी सास उस पर ये कह कर डालती थी कि “बेटा, अब तो सब कुछ देख लिया है मैने इस दुनिया में, बस अब अपने पोते को देख लूं जो मैं चैन से जा पाऊंगी।” या फिर कभी कहती कि “अगर मेरा पोता जल्दी हो जाता तो क्या पता मैं अपने पर पोते को भी देख पाऊ।” निशा बस गर्दन झुका कर हां कर देती थी और जब वो रेहान को बोलती थी तो रेहान उसी पर भड़कते हुए कहता था “हां, ठीक है यार ये घर के मामलों में मुझे मत घसीटा करो।” हर बार ये सुनते सुनते वो थक गई थी इसीलिए उसने रेहान को बोलना ही छोड़ दिया।

*६ महीने बाद*

अरे बधाई हो, बधाई निशा मां बनने वाली है, उत्साह में निशा की सास ढिंढोरा पीट रही थी और उधर रेहान को निशा कॉल कर रही थी ये बताने के लिए जो ऑफिस के तौर की वजह से १ महीने पहले गया था।

निशा को लग रहा था कि शायद अब सब सही हो जाएगा और उसकी सास भी खुश हो जाएगी और रेहान भी घर जल्दी आ जाया करेंगे। घंटे दिन में और दिन महीने में कब निकले पता ही नहीं चला और अब निशा ८ महीने गर्भ से थी और किसी भी समय डिलीवरी हो सकती थी।

*कुछ दिन बाद*

निशा को अचानक से दर्द हुआ और उसको तुरंत हॉस्पिटल लेकर गए। वहां पर उसने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन वो थोड़ा रंग से सांवला था और निशा और रेहान का रंग साफ था तो उसकी सास वही हॉस्पिटल में सबके सामने बोली “बहु ये रेहान का ही बेटा है ना? कही किसी और की जिम्मेदारी हमारे सर तो नहीं डाल रहे हो?”निशा जो अभी नाज़ुक थी, ये सुनते ही उसकी धड़कने रुक सी गई लेकिन उसको भरोसा था कि उसका पति उसका साथ देगा इसीलिए उसने कुछ नहीं बोला

*कुछ समय बाद*

रेहान हॉस्पिटल आया, वो बच्चे को देख कर बहुत खुश हुआ और ये देख कर निशा भी मुस्कुराई और तभी रेहान की मां बोली “बेटा देख ना, तेरा और बहु का रंग कितना साफ है और तेरा बेटा काला? मैं कह रही हू, दाल में कुछ तो काला है।”

निशा ने अपनी उमीद वाली आंखों से रेहान की तरफ देखा और रेहान ने बिना सोचे अपने बच्चे को देखा और बोला “ठीक है फिर, इस बच्चे का डी.अन. ऐ टेस्ट करवा लेते है, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।” ये सुन कर निशा के कानों को भरोसा ही नहीं हुआ और उसने अपनी पूरी जान लगते हुए तेज आवाज में बोला “आपको, अपने खून पर भरोसा नहीं है ना ही मेरे पर। और मैं कोई भी टेस्ट नहीं करवाऊंगी अपने बेटे का, *स्वाभिमान मेरा भी* है और अब मैं अपने स्वाभिमान को और ठेस नहीं पहुंचाने दूंगी किसी को।”

सब वहां आस पास के लोग देख रहे थे, लेकिन किसी की कोई हिम्मत नहीं हुई बोलने की।

*२ साल बाद*

निशा अपने बेटे अविनाश के साथ अकेले अपने खुद के घर में रहती है, और उसने रेहान को तलाक दे दिया है। कभी कभी उसकी मां उस से मिलने आ जाती है और अब वो खुद अपने पैरों पर खड़े हो कर अपने बेटे को , घर को और काम को सबको बखूबी संभाल रही है।

लेखिका

तोषिका

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