साँझ का उजाला छिपने को है।अंधेरा अपने पैर पसारने के लिए तैयार है।खिड़की के पास खड़ी गायत्री अपने बीते दिनों को याद कर रही है ।वक्त की मार से वह भी कहाँ बच पायी है।बेटा अपने ससुराल गया है प्रिया को लिवाने।कई साल पीछे लौटी है गायत्री ।कितनी सुखी गृहस्थी थी उसकी ।
अच्छे पति ।दो बच्चे ।सबसे तालमेल बना कर गृहस्थी में मगन थी वह।बेटा पढ़ाई में अच्छा था।बेटी भी ठीक ठाक थी।मन मे हजार सपने संजोती गायत्री बेटे की शादी अपनी पसंद से करेगी ।खूब सुन्दरबहू लायेगें ।उसकी पसंद को बेटा थोड़े ही मना करेगा ।अपनी माँ को बहुत मानता है वह
मम्मा मम्मा कहते नहीं अघाता ।बेटे की नौकरी अच्छी कंपनी में लग गई थी ।गायत्री सपने बुन ही रही थी कि एक दिन बेटे ने विस्फोट कर दिया “मम्मा मैंने अपने लिये लड़की पसंद कर लिया है “”कौन है वह?कैसी है?कहाँ की है?”प्रश्नों की बौछार शुरु ही हुआ था फिर बेटे ने चुप करा दिया अपनी माँ को ।
“वह मेरे ही साथ, मेरे आफिस में काम करती है,बहुत सुन्दर है वह मम्मी “”और जाती? गायत्री का अगला सवाल था ।”ओह!मम्मा तुम भी न, पुराने जमाने की बात करती हो।अब कौन देखता है यह सब।पर गायत्री को चैन कहाँ था।वह कायस्थ और बहू बनिया।ना बाबा!यह नहीं हो सकता है ।फिर पति ने बहुत समझाया था “गायत्री,अब पहले वाला जमाना नहीं है ।
जिन्दगी बेटे को निभाने हैं तो उसकी पसंद अपनी पसंद बना लो।”फिर धूमधाम से शादी हो गई ।शादी का भरा पूरा घर ।रिसेप्शन भी हो गया ।लोगों की खूब वाहवाही लूटी गायत्री ने”कहाँ से लाये यह गुलाब की कली “?गुलाब की कली ही तो थी प्रिया ।
लेकिन पहली बार काटों की चुभन तब महसूस कर रही थी वह जब पार्टी के दूसरे दिन ही उसने बहू को पुकार कर कहा “बेटा , जल्दी से नहा धो कर तैयार हो जाओ घर में पूजा करना है।पंडित जी आने वाले ही होगें “प्रिया अनमनी सी बैठे रही ।
“बात क्या है? “तब बेटे प्रशांत ने कहा “मम्मा असल में प्रिया की मम्मी ने कहा था कि मै उसे लेकर वहां पहुंचा दूं”वहाँ भी पूजा रखवाया है”और यहाँ का कया?कमरे में प्रिया अपना बैग तैयार कर रही थी ।बेटा बहू दोनों चले गये ।कितनी यादों को समेटने मे लगी रहती है गायत्री ।बेटे ने समझाया था कि आखिर प्रिया को तो सब दिन यहाँ ही रहना है
तो कभी-कभी माँ के पास जाने दो।बच्चे छोटे थे तभी पापा का अचानक डेथ हो गया था ।सवाल दो छोटे भाई-बहनों का था।कैसे पालन पोषण होगा ।कैसे शिक्षा पूरी होगी? फिर पति के साथ उनकी मर्जी से जाकर अपनी माँ और भाई बहन को ले आई थी गायत्री ।
पति बहुत अचछे थे।लेकिन मैके और ससुराल पक्ष को एक साथ निभाना बहुत मुश्किल था।लेकिन गायत्री ने समझदारी से सबकुछ निबटाया ।पन्नों का कोई हिसाब नहीं होता ।बचपन से लिखने का शौक था गायत्री को ।पिता हमेशा पीठ ठोकते ।” बहुत बड़ी लेखक बनेगी मेरी बेटी “तब अम्मा बीच में टोक देती “पहले घर गृहस्थी का सीख ले फिर लिखते रहना “।
जो भी हो अम्मा के दुलार और डांट में संस्कार की हिदायत खास होती ।फिर गायत्री ने अम्मा को शिकायत का मौका नहीं दिया ।बेटे की शादी का एक सप्ताह बीत गया ।प्रिया लौट आई थी।घर में खुशी लौटी थी।बहुत सारे अरमान थे गायत्री के मन में ।
अपने बहू को लेकर ।पहली होली थी शादी के बाद ।सुबह से तैयारी चल रही है ।ढेर सारे पकवान बना कर खिलायेगी प्रिया को ।आखिर अपनी बेटी ही तो है।गुलाब जामुन बना लिया था ।पनीर बनाने के लिए तैयारी होने लगी तो देखा प्रिया फिर अपने कपड़े अटैची में रख रही है ।
यह क्या? “हाँ, मम्मा,पहली होली है तो प्रिया की मम्मी ने कहा था कि पहली होली मायके में होने का रिवाज है ।तो आज हम लोग वहाँ जा रहे हैं “”पर बेटा, मैंने तुम्हारे पसंद के दही बड़े और गुलाब जामुन बनायें हैं “”कोई बात नहीं मम्मी,फिर खा लेंगे “प्रिया कह रही है कि जाना ही है तो सुबह ही ठीक रहेगा ।
वक्त की मार से टूटने लगी थी गायत्री ।आज्ञाकारी बेटा जो आगे पीछे डोलता रहता था वह अब प्रिया के साथ था।उधर से ही बेटा बहू दिल्ली चला गया ।नौकरी वहीं की थी।एक बार माँ को भी पूछ लिया ।कैसे जाती अभी वह।तुरंत शादी का घर है।पूरा सामान बिखरा पड़ा है ।सब को समेटने के बाद जाने का सोचेगी ।तीन महीने के बाद प्रशान्त ने खुश खबरी सुनाई।”मम्मा तुम दादी बनने वाली हो”।कितना खुश थी गायत्री ।
पूरे घर में नाचने लगी थी ” मै दादी बनने वाली हूँ और आप दादा “पति ने सलाह दिया हाँ गायत्री,तुम को जाना चाहिए ।उसे तुम्हारी जरूरत है।और गायत्री ने तैयारी कर ली जाने की।देखिये जी,मैंने आपके लिये कुछ खास्ता और नमकीन बना कर रख दिया है ।सुबह शाम बसंती आकर रसोई बना देगी ।रमा झाड़ू पोछा कर देगी आकर ।समय पर दवाई लेते रहिएगा ।”हाँ हाँ ,तुम चिंता मत करो “निश्चित हो कर जाओ।गायत्री दूसरे दिन चलीं गई ।
दिल्ली पहुंच गयी ।इधर-उधर देखा ।शायद बेटा लेने आया होगा ।बहुत देर तक इन्तजार किया ।वह नहीं आया ।”कुछ काम पड़ा होगा “आफिस में आजकल काम भी तो बहुत रहता है ।खुद से ही आटो लेकर घर पहुँच गयी ।प्रिया ने पैर छू लिया ।प्रशांत नहीं है?” वह मम्मी जी, मैंने अपनी माँ को भी बुलाया है देखभाल के लिए तो आज वह आ रही है तो प्रशांत लेने गये हैं स्टेशन ।
छनाक से कुछ दरक गया था तब।प्रिया की माँ आ गई ।अब गायत्री बहू के पसंद की चीजों का खयाल रखती और खूब बना बना कर खिलाती ।दिन रात रसोई में जुटी रहती गायत्री ।और माँ बेटी खाती , घूमती और अपने कमरे में गपशप करती ।वक्त के पन्ने पलटती गायत्री वक्त की मार सह रही थी ।
सबको समय पर सहारा दिया ।माँ भी नौ साल साथ रही।किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया ।दो बच्चे खुद के।दो जेठ के।वे भी पढ़ाई के लिए आ गए थे।दो बच्चे माँ के ।सबको निभाया ।समय पर पोता आ गया ।गायत्री ने पति को फोन लगाया ।”सुनिए जी,आप दादा बन गए हैं और मै दादी “।
पति भी बहुत खुश थे पर उनकी आवाज़ को क्या हो गया? चिंता मे पड़ी गायत्री ।बच्चे की पूरी देख भाल नानी कर रही थी ।गायत्री गोद में लेती तो तुरंत मना कर दिया जाता “बच्चे की आदत खराब हो जायेगी “कितना मन होता की पोते को दुलार प्यार करें लेकिन वह मौका भी नहीं लगता ।जब सबकुछ यही लोग देख रहे हैं तो मेरी क्या जरूरत?
बेटे से कहा “बेटा मेरा टिकट करा दो।तुम्हारे पापा की तबीयत ठीक नहीं है ।यहाँ मेरी जरूरत भी नहीं है “टिकट करा दिया गया ।प्रिया को बहुत मन भी नहीं था कि सास रहे ।एक दिन गायत्री ने सुन भी लिया था कि अब अपनी माँ को भेज दो।मेरी मम्मी तो है ही।घर पहुंच गयी गायत्री ।पति ज्वर मे बेसुध पड़े थे ।देह तप रहा था ।अस्पताल लेकर दौड़ पड़ी थी वह।
लेकिन पति को बचा न सकी।बुखार दिमाग पर चढ़ गया था ।बेटा बहू भी दौड़ कर आया ।रो धो कर असहाय सी महसूस करती गायत्री अपने कमरे में पड़ी रहती ।एक दिन प्रिया ने कहा “इतने बड़े घर में अकेले कैसे रहेंगे मम्मी ।इस घर को बेच कर हम दिल्ली में नया फ्लैट ले लेंगे ।
तब नहीं लगा था गायत्री को वक्त ऐसा दिन भी दिखाएगा ।फिर खुद ही मन को समझा लिया ।उम्र हो गई है ।अकेले कहाँ और कैसे रहेगी ।घर का क्या मोह करना ।जिंदगी का क्या भरोसा ।बच्चों के लिए ही जीना है तो जैसा ठीक समझो तुम लोग ।
पोता ही दादी का सहारा बन गया था ।गायत्री बेटे के पास चली गई ।बेटा माँ का खूब खयाल रखता ।प्रिया भी बहुत कुछ ठीक हो गई थी।दूसरे घर की लड़की है तो जुड़ने मे समय तो लगेगा ही ।एक माता पिता के दो बच्चों का स्वभाव अलग होता है यह तो दूसरे घर से आई है।एक रात बेटा पानी रखना भूल गया था ।
रात को प्यास लगी ।गायत्री रसोई में गयी ।बेटे की आवाज आ रही थी ।”देखो प्रिया,मै अपनी माँ को बहुत प्यार करता हूँ ।जबतक हैं उनको किसी बात की तकलीफ नही होने चाहिये ।””हाँ तो मैंने कब कहा कि उनकों आदर सम्मान नहीं देंगे “असल मे बचपन से सुनते आये थे कि ससुराल के लोग खराब होते हैं ।
इसलिए मेरे मन में उनके प्रति गुस्सा था।अब मुझे मालूम हो गया कि मम्मी बहुत अच्छी है ।मै आपको कभी शिकायत का मौका नहीं दूँगी “।
गायत्री अचानक बेटे के कमरे में लौटी और प्रिया को कलेजे से लगा लिया ।अब वह अपने परिवार के साथ रहने लगी थी और खुश है।साँझ ढल चुकी है।रात का अंधेरा छा गया है ।सोने की तैयारी कर लूँ ।कल बहू और पोता को लेकर आ जायेगा बेटा ।नींद भी आ रही है ।शुभ रात्रि ।—
उमा वर्मा ।राँची ।झारखंड ।स्वरचित ।
#वक्त की मार ।