“बेटा-बहू तो अपने होते हैं…” – खुशबू गर्ग

सावित्री देवी का छोटा-सा घर था, लेकिन उसमें यादों और रिश्तों की गर्माहट भरी हुई थी। पति के गुजर जाने के बाद उनका सहारा सिर्फ उनके दो बच्चे थे—बेटा रोहित और बेटी पूजा। पूजा की शादी हो चुकी थी और वह अपने ससुराल में खुश थी, जबकि रोहित अपनी पत्नी नेहा के साथ माँ के … Read more

काश !हम भी पराए होते ।। – अंजना ठाकुर

किशन  मां के कमरे में आया तो देखा मां मुक्ता के सर में तेल लगा रही है ठीक वैसे ही जैसे बचपन में लगाती थी देखकर  किशन बोला मां मेरे सर में भी लगाओ ना मां , मां बोली अरे तू तो बहू से लगवा लेना अब मेरा इतना शरीर नहीं चलता वो तो मुक्ता … Read more

सुयोग्य बहू की तलाश – साधना वैष्णव

गौरव आज बहुत खुश है। खुश क्यों न हो उसे आज पहली तनख्वाह जो मिली है। वह खुशी-खुशी लगभग दौड़ता हुआ माँ के पास पहुँचा। उनको अपनी आँखें बंद करने कहा। माँ बोलीं- क्यों? मैं अभी संध्या आरती की तैयारी कर रही हूँ, मेरे पास तुम्हारे साथ खेलने के लिए समय नहीं है।         गौरव ने … Read more

घर की लक्ष्मी – मंजू ओमर

अरे उठ जा कलमुँही कबतक लेटी रहेगी, सुबह के आठ बजे रहे है चाय नाश्ता नहीं बनाएगी क्या, सर दर्द से फटा जा रहा है मेरा बिना चाय के। अरे अब उठ, इतना धीरे धीरे क्यों उठ रही है शरीर मे जान नहीं है क्या, कामचोर कहीं की। बस काम से जी चुराती रहती है। … Read more

अपमान – करुणा मलिक

 बहुत बधाई हो मंजू, नए प्यारे से घर की, बहुत सुंदर मकान बनाया है।  धन्यवाद जी, क्या करे ं …. मेरी पसंद तो थी ही अव्वल, मेरे तो बच्चों को भी कोई चीज आसानी से पसंद नहीं आती। तुम्हें पता है कुमुद, ठेकेदार ने छह- सात महीने का टाइम दिया था मकान पूरे करने का…..पर … Read more

उम्मीदों का नया सवेरा – विनीता सिंह

रामपुर गाँव में सूखे की मार ने हर चेहरे पर मायूसी लिख दी थी। धूल भरी पगडंडियों पर अब बच्चों के पैरों की चाप कम और बड़ों की चिंताओं की गूँज ज़्यादा सुनाई देती थी। माधव, जिसका पूरा जीवन इन खेतों की मिट्टी से जुड़ा था, हर सुबह फटी हुई ज़मीन को इस उम्मीद में … Read more

*उम्मीदों का नया सवेरा* – तोषिका

इतने साल हो गए तुम्हे जहां जेल में अपनी सजा काट ते हुए पर तुम्हारा बर्ताव देख कर तो नहीं लगता कि तुमने कभी किसी का खून किया होगा। आरक्षी ने बड़े सामान्य स्वर में पूछा। उधर सेल में बैठा साहिल बोला “सर अब मैं आपको क्या बताऊं, जब किसी की जिंदगी में *उम्मीदों का … Read more

अभी मुझे और जीना है – शुभ्रा बैनर्जी

पिछले छह महीने से लगातार बीमार रहने की वजह से,मां बहुत कमजोर हो गई थी।पिछले बत्तीस सालों से साथ में रह रही थी निशा।मां का जीवन के प्रति मोह छूट रहा था धीरे-धीरे।अपने जीते जी पति, इकलौते बेटे और दामाद को खोया था उन्होंने।अब उनकी बड़ी बेटी , जो दो साल पहले विधवा हुई थी … Read more

उम्मीदों का त्याग ।। – अंजना ठाकुर

नमिता ससुराल में कदम रखते ही एक पल के लिए ठिठक गई बिल्कुल साधारण घर लग रहा कमरे में चार कुर्सी और एक टेबल पड़ी थी साइड में एक पलंग रखा था बहु का स्वागत करने के बाद उसे अंदर कमरे में ले गए नमीता ने देखा वहां भी एक लोहे की अलमारी और एक … Read more

“मैं हूं ना ” – कमलेश आहूजा

“पापा,ये माथे पे चोट आपको कैसे लगी?”प्रिशा ने परेशान होकर बोला। “कुछ नहीं बेटा,बस ऐसे ही वो रोहित की दुकान पर समान लेने गया था तो मुड़ते समय दीवार से टकरा गया था।” रमेश जी ने बात बनाते हुए बोला। “पापा आप झूठ बोल रहें हैं,दीवार के टकराने से इतना गहरा जख्म नहीं होता।सच बताइए … Read more

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