पुण्य की पूँजी

यशोदा के भीतर एक ऐसा आत्मसम्मान था जो कभी झुकना नहीं जानता था। गाँव में अगर कोई उन पर दया दिखाता या तरस खाकर यूँ ही बिना कुछ लिए पैसे देने की कोशिश करता, तो यशोदा का चेहरा सख्त हो जाता था। वे तुरंत कहतीं, “बेटा, जब तक विधाता ने इन हाथों में जान दी है, मैं किसी के तरस की रोटी नहीं खाऊंगी। मुझे दया नहीं, अपनी मेहनत का मोल चाहिए।” उनकी यह बात सुनकर लोग झेंप जाते थे। वहीं दूसरी ओर, गाँव के नटखट बच्चे जब खेलते-कूदते उनके दरवाजे पर आकर शोर मचाते, बाँस की खपच्चियां बिखेर देते, तो यशोदा कभी उन पर गुस्सा नहीं होती थीं। वे मुस्कुराते हुए अपनी पुरानी मटकी से भुने हुए महुए या सूखे बेर निकालकर उन बच्चों के नन्हे हाथों में रख देतीं। उन मासूम बच्चों की हंसी में यशोदा को अपने बिछड़े हुए दोनों बेटों का खोया हुआ बचपन नज़र आता था।

पीपल के पुराने पेड़ की छांव में बना वह खपरैल का छोटा सा घर गाँव के मुहाने पर अकेला खड़ा रहता था। दीवारें कच्ची थीं, जिन पर से बरसात के दिनों में मिट्टी की परतें उखड़ जाया करती थीं। इसी घर के बाहर एक टूटी सी चारपाई पर बैठकर बहत्तर साल की यशोदा अम्मा दिन-रात बाँस की तीलियां छीलती थीं। उनके सामने बाँस की खपच्चियों का ढेर लगा रहता था, जिनसे वे सूप, डलिया और पंखे बुना करती थीं। एक जमाना था जब इस आंगन में खुशियों की किलकारियां गूंजती थीं। यशोदा का भरा-पूरा परिवार था। पति खेत में हल चलाते थे और दो बलिष्ठ बेटे कंधे से कंधा मिलाकर घर की गाड़ी खींचते थे। मगर नियति का चक्र ऐसा घूमा कि सब कुछ बिखर गया।

बारह वर्ष पहले पति को फेफड़ों की गंभीर बीमारी ने घेर लिया और वे इलाज के अभाव में दम तोड़ गए। उस पहाड़ जैसे सदमे से यशोदा संभल भी न पाई थीं कि सात साल पहले गाँव में आई भीषण बाढ़ और महामारी ने उनके दोनों जवान बेटों को छीन लिया। एक बेटा पानी के तेज बहाव में बह गया और दूसरा अस्पताल में दवाइयों की कमी से चल बसा। उस काली रात ने यशोदा की दुनिया उजाड़ दी थी। गाँव के लोगों को लगा था कि बुढ़िया भी बेटों के गम में प्राण त्याग देगी, लेकिन यशोदा ने अपनी आँखों के आँसू पोंछ लिए। उनके पास रोने का वक्त भी नहीं था, क्योंकि पेट की आग किसी की मौत का इंतजार नहीं करती। विरासत और संपत्ति के नाम पर उनके पास सिर्फ एक पुरानी दरांती और बाँस छीलने का एक घिसा हुआ चाकू बचा था।

उम्र के इस पड़ाव पर यशोदा की आँखें धुंधलाने लगी थीं। बाँस की तीलियाँ बुनते वक्त उनकी कमजोर उंगलियां कभी-कभी छिल जातीं और खून बहने लगता, लेकिन वे बस पल्लू से पोंछकर फिर से काम में जुट जाती थीं। जब वे घंटों एक ही मुद्रा में बैठी रहतीं, तो उनकी रीढ़ की हड्डी में टीस उठती थी और गर्दन किसी सूखे पत्ते की तरह कांपने लगती थी। फिर भी, सुबह के सूरज की पहली किरण के साथ ही उनकी उंगलियां बाँस के रेशों में उलझने लगती थीं।

गाँव की पगडंडी से जो भी निकलता, यशोदा मुस्कुराकर दोनों हाथ जोड़ लेतीं और बड़े ही अपनेपन से कहतीं, “राम-राम बेटा!” या “सदा सुहागन रहो बिटिया!” गाँव के लोग जब भी अपनी ज़रूरतों के लिए उनसे डलिया या अनाज फटकने वाला सूप खरीदते, तो यशोदा कभी मोलभाव नहीं करती थीं। किसी के पास पैसे होते तो वह दो-चार सिक्के रख जाता, लेकिन ज्यादातर लोग पैसों के बदले अनाज दे जाते थे। कोई मुट्ठी भर चना दे जाता, कोई कटोरी भर चावल, तो कोई ज्वार-बाजरे का कटोरा थमा देता। यशोदा उसी अनाज को बड़े जतन से संभालतीं, रात को चूल्हा जलाकर दलिया या सूखी रोटी बनातीं और ईश्वर को धन्यवाद देकर सो जातीं।

यशोदा के भीतर एक ऐसा आत्मसम्मान था जो कभी झुकना नहीं जानता था। गाँव में अगर कोई उन पर दया दिखाता या तरस खाकर यूँ ही बिना कुछ लिए पैसे देने की कोशिश करता, तो यशोदा का चेहरा सख्त हो जाता था। वे तुरंत कहतीं, “बेटा, जब तक विधाता ने इन हाथों में जान दी है, मैं किसी के तरस की रोटी नहीं खाऊंगी। मुझे दया नहीं, अपनी मेहनत का मोल चाहिए।” उनकी यह बात सुनकर लोग झेंप जाते थे। वहीं दूसरी ओर, गाँव के नटखट बच्चे जब खेलते-कूदते उनके दरवाजे पर आकर शोर मचाते, बाँस की खपच्चियां बिखेर देते, तो यशोदा कभी उन पर गुस्सा नहीं होती थीं। वे मुस्कुराते हुए अपनी पुरानी मटकी से भुने हुए महुए या सूखे बेर निकालकर उन बच्चों के नन्हे हाथों में रख देतीं। उन मासूम बच्चों की हंसी में यशोदा को अपने बिछड़े हुए दोनों बेटों का खोया हुआ बचपन नज़र आता था।

एक दिन दोपहर के समय तेज धूप खिली हुई थी। गाँव की गलियों में सन्नाटा था। उसी समय गाँव के युवा सरपंच, शैलेंद्र, हाथ में एक बड़ा सा रजिस्टर और चंदे की रसीद-कट्टा लिए गलियों से गुजर रहे थे। शैलेंद्र शहर से वकालत की पढ़ाई पूरी करके गाँव लौटा था और उसने गाँव की सूरत बदलने की ठान रखी थी। घूमते-घूमते उसके कदम यशोदा अम्मा के दरवाजे पर आकर रुक गए। उसने देखा कि इतनी चिलचिलाती धूप में भी वह बूढ़ी अम्मा पसीने से लथपथ होकर बाँस की डलिया बुनने में मशगूल थीं। उनकी फटी हुई सूती धोती पर कई जगह टांके लगे थे। मिट्टी के चूल्हे पर एक फूटी सी बटलोई रखी थी और घर की छत से धूप छनकर सीधे उनके सिर पर पड़ रही थी।

शैलेंद्र का दिल यह देखकर भर आया। उससे रहा नहीं गया। वह आगे बढ़ा और भारी आवाज में बोला, “अम्मा, प्रणाम!”

यशोदा ने अपनी कांपती गर्दन उठाई, आँखों पर हाथ की ओट बनाकर देखा और मुस्कुरा दीं, “अरे सरपंच बेटा! आओ, बैठो। इस धूप में कहाँ घूम रहे हो?”

शैलेंद्र टूटी चारपाई के एक कोने पर बैठ गया। उसने भावुक होकर कहा, “अम्मा, मैं कई दिनों से आपको देख रहा हूँ। इस उम्र में, जब शरीर को आराम की ज़रूरत होती है, आप दिन भर यह हाड़-तोड़ मेहनत करती हैं। आपकी यह दशा मुझसे देखी नहीं जाती। अगर आप कहें और अपनी सहमति दें, तो मैं ब्लॉक जाकर आपके लिए वृद्धावस्था और बेसहारा पेंशन स्वीकृत करवा दूँ। आपको हर महीने सरकार से कुछ पैसे मिल जाएंगे, तो आपको कम से कम इस उम्र में धूप में बैठकर यह बाँस नहीं छीलना पड़ेगा। आपकी दो जून की रोटी का इंतजाम बिना मेहनत के हो जाएगा।”

शैलेंद्र की यह बात सुनते ही यशोदा के चेहरे की मुस्कान जैसे अचानक गायब हो गई। उनकी झुर्रियों से भरी आँखों में एक गहरा दर्द और स्वाभिमान का एक शोला सा कौंध गया। उन्होंने हाथ में पकड़ी बाँस की खपच्ची को नीचे रख दिया। अपने कांपते हुए हाथों को आगे फैलाते हुए वे बहुत ही आहत स्वर में बोलीं, “बेटा शैलेंद्र, तुम गाँव के मुखिया हो, हमारे दुख-दर्द की चिंता करते हो, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन क्या तुम्हें मेरी इस चौखट पर सिर्फ लाचारी दिखाई दी? भगवान ने मुझे अभी दो हाथ दिए हैं। मेरी आँखें थोड़ी धुंधली ज़रूर हुई हैं, पर मेरी उंगलियां अभी भी डलिया बुनना नहीं भूली हैं। मेरी मेहनत से मुझे आधी रोटी ही सही, पर इज्जत की रोटी मिल जाती है। मैं सरकार या किसी और के आगे हाथ फैलाकर मुफ्त के पैसों पर अपना पेट क्यों भरूं? क्या तुम सिर्फ मुझे एक बेबस और लाचार बुढ़िया समझकर यहाँ आए थे?”

शैलेंद्र यशोदा के इस स्वाभिमान के आगे पूरी तरह निरुत्तर हो गया। उसकी आँखें शर्म से झुक गईं। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “अरे नहीं अम्मा, मेरा मकसद आपका अपमान करना बिल्कुल नहीं था। मुझे माफ कर दीजिए। सच तो यह है कि मैं इस रास्ते से एक दूसरे काम के सिलसिले में गुजर रहा था।”

“कैसा काम बेटा? हाथ में यह बही-खाता लेकर कहाँ जा रहे थे?” यशोदा ने अपनी आवाज को थोड़ा नरम करते हुए पूछा।

शैलेंद्र ने गहरी सांस ली और बोला, “अम्मा, हमारे गाँव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। जब भी गाँव में कोई बीमार पड़ता है, किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है, या किसी को सांप-बिच्छू काट लेता है, तो उसे बीस किलोमीटर दूर जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है। रास्ते में ही न जाने कितने लोग दम तोड़ देते हैं। मुझे याद है, जब आपके दोनों बेटों को हैजा हुआ था, तब भी अस्पताल दूर होने के कारण ही उन्हें सही समय पर इलाज नहीं मिल पाया था। इसलिए मैंने और पंचायत के कुछ युवाओं ने मिलकर यह संकल्प लिया है कि हम अपने गाँव की खाली पड़ी शामलात जमीन पर एक छोटा सा प्राथमिक अस्पताल और औषधालय बनवाएंगे, जहाँ एक डॉक्टर और जरूरी दवाइयां हमेशा मौजूद रहें। उसी नेक काम के लिए मैं गाँव के हर घर से चंदा इकट्ठा करने निकला हूँ ताकि जल्द से जल्द अस्पताल की नींव रखी जा सके।”

“गाँव में अस्पताल बनेगा?” यशोदा के कानों में जैसे किसी ने जीवन का मंत्र फूंक दिया हो।

उनके झुर्रियों से भरे चेहरे पर एक ऐसी रोशनी फैल गई, जैसी भोर के समय पूरब के आसमान पर फैलती है। उनकी धुंधली आँखों में आँसू छलक आए, लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं, बल्कि एक उम्मीद के थे। वे कांपते स्वर में बोलीं, “सच कह रहे हो बेटा? सचमुच हमारे गाँव में अस्पताल बनेगा? फिर तो गाँव के किसी गरीब की औलाद दवा के बिना नहीं मरेगी? किसी माँ की गोद ऐसे सूनी नहीं होगी जैसे मेरी हो गई?”

“हाँ अम्मा! यह मेरा पक्का वादा है। बस आप अपना आशीर्वाद दीजिए, हम गाँव वाले मिलकर इसे पूरा करेंगे,” शैलेंद्र ने आत्मविश्वास से कहा।

यशोदा ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं। उनके चेहरे पर एक गहरा संकल्प दिखाई देने लगा। उन्होंने अपने दोनों हाथों को घुटनों पर टिकाया और बड़ी मुश्किल से, लड़खड़ाते हुए अपने पैरों पर खड़ी हुईं।

“जरा रुको बेटा, मैं अभी आई,” इतना कहकर वे अपनी खपरैल की अंधेरी कोठरी के भीतर चली गईं।

शैलेंद्र बाहर बैठा इंतजार करने लगा। कमरे के भीतर से बर्तनों के खड़कने और किसी पुरानी चीज को खोलने की आवाज आ रही थी। यशोदा कमरे के एक कोने में रखे पुराने, मिट्टी के घड़े के पास गईं। उस घड़े के भीतर मक्के के सूखे दानों के नीचे एक छोटी सी पीतल की डिबिया दबी हुई थी। यशोदा ने कांपते हाथों से उस डिबिया को बाहर निकाला। डिबिया पर जंग लगा हुआ था। बड़ी मशक्कत के बाद जब उसका ढक्कन खुला, तो भीतर एक पुराना, कई तहों में मुड़ा हुआ सूती कपड़ा निकला।

यशोदा ने उस कपड़े की गांठ खोली। उसमें मुड़े-तुड़े, पुराने और पसीने की गंध में बसे कुछ नोट और कुछ सिक्के रखे थे। यशोदा ने अपनी थरथराती उंगलियों से उन नोटों को गिना—कुल सात सौ रुपये थे। उन्होंने उन नोटों को अपने सीने से लगाया, आँखें बंद करके एक गहरी सांस ली, और फिर कदमों को साधते हुए बाहर धूप में निकल आईं।

चारपाई के पास आकर यशोदा ने शैलेंद्र का हाथ अपने हाथों में ले लिया। शैलेंद्र कुछ समझ पाता, इससे पहले ही यशोदा ने वे सारे रुपये उसकी हथेली पर रख दिए और अपनी कांपती हथेलियों से उसकी मुट्ठी बंद कर दी।

शैलेंद्र ने चौंककर अपनी मुट्ठी खोली। उसने उन फटे-पुराने नोटों को देखा और फिर यशोदा के चेहरे को। वह जानता था कि एक-एक मुट्ठी अनाज के लिए दिन भर बाँस छीलने वाली इस वृद्धा के लिए सात सौ रुपये की क्या कीमत थी। यह कोई मामूली रकम नहीं थी, यह उनके लिए एक अथाह संपत्ति थी।

शैलेंद्र घबराकर तुरंत पीछे हटा और पैसे वापस बढ़ाते हुए बोला, “नहीं-नहीं अम्मा! यह आप क्या कर रही हैं? मैं आपसे एक पैसा भी नहीं ले सकता। आप खुद दाने-दाने को मोहताज हैं, आपकी झोपड़ी की छत चूती है। आप यह पैसे अपने पास रखिए। यह आपके बुरे वक्त में, आपकी दवाई या कफ़न-दफ़न के काम आएंगे। मैं पाप का भागीदार नहीं बन सकता।”

यशोदा ने शैलेंद्र का हाथ और जोर से थाम लिया। उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज और दृढ़ता थी जिसे देखकर शैलेंद्र स्तब्ध रह गया।

यशोदा ने बड़े ही स्नेह और गंभीरता से कहा, “बेटा, जब मेरे दोनों बेटे चले गए थे, तब इस दुनिया में मेरे जीने का कोई मकसद नहीं बचा था। बस एक ही तमन्ना दिल में बची थी कि अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक बार जगन्नाथ पुरी और हरिद्वार जाकर गंगा स्नान कर लूँ। मैंने सोचा था कि वहाँ जाकर अपने बेटों और पति की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करूंगी और अपने पाप धोकर मोक्ष पाऊंगी। यह सात सौ रुपये मैंने पिछले दस सालों में अपनी एक-एक डलिया और सूप की कमाई में से पेट काटकर, भूखे रहकर जोड़े थे। यह मेरी उसी मुक्ति और तीर्थ यात्रा की जमापूंजी है।”

शैलेंद्र का गला रुंध गया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। वह कांपती आवाज में बोला, “अम्मा, जब यह आपके जीवन भर के तीर्थ की पूंजी है, आपके मोक्ष का साधन है, तो फिर आप इसे मुझे क्यों दे रही हैं? क्या आप तीर्थ नहाने नहीं जाएंगी? क्या आपको मोक्ष नहीं चाहिए?”

यशोदा के चेहरे पर एक ममतामयी और अलौकिक मुस्कान तैर गई। उन्होंने शैलेंद्र के सिर पर अपना कांपता हुआ हाथ रखा और बोलीं, “बेटा, गंगा के ठंडे पानी में डुबकी लगाने से तो सिर्फ इस हाड़-मांस के नश्वर शरीर की मैल धुलती है। लेकिन अगर मेरे इन चंद रुपयों से गाँव में वह अस्पताल बन जाए, और उस अस्पताल में किसी गरीब की जान बच जाए, किसी बीमार बच्चे को समय पर दवाई मिल जाए और किसी लाचार माँ का बेटा मरने से बच जाए… तो मेरी आत्मा को इसी धरती पर जीते-जी मोक्ष मिल जाएगा। जिस दिन उस अस्पताल की पहली ईंट रखी जाएगी, उसी दिन मेरा गंगा स्नान पूरा हो जाएगा बेटा। इससे बड़ा कोई तीर्थ, इससे बड़ा कोई धाम इस बूढ़ी यशोदा के लिए इस दुनिया में और क्या हो सकता है?”

यशोदा के इन सीधे और सच्चे शब्दों ने शैलेंद्र की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। वह कुछ बोल न सका। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने उन पुराने नोटों को अपनी आँखों और माथे से लगा लिया। उसे लगा कि वह किसी सामान्य वृद्धा के सामने नहीं, बल्कि साक्षात त्याग और मानवता की देवी के सामने खड़ा है।

यशोदा ने अपनी फटी धोती के पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं और बिना किसी मलाल या पछतावे के, बिल्कुल शांत भाव से वापस अपनी चारपाई के पास बैठ गईं। उन्होंने अपनी दरांती उठाई और एक नई बाँस की तीली को छीलने में जुट गईं। उनके चेहरे पर एक ऐसा अपार संतोष झलक रहा था, जो करोड़ों की संपत्ति दान करने वाले रईसों के चेहरे पर भी नहीं दिखाई देता।

शैलेंद्र उस दिन गाँव में जहाँ भी गया, उसने चंदा मांगने से पहले यशोदा अम्मा के उस त्याग की कहानी लोगों को सुनाई। उसने अपनी हथेली पर रखे वे सात सौ रुपये गाँव के बड़े-बड़े जमींदारों, व्यापारियों और किसानों को दिखाए।

यशोदा अम्मा के इस निस्वार्थ समर्पण की बात जंगल की आग की तरह पूरे गाँव और आस-पास के इलाकों में फैल गई। लोगों के दिलों पर जैसे बिजली सी गिर पड़ी। जो लोग पहले पचास-सौ रुपये का चंदा देने में भी बहाने बना रहे थे, वे अपनी तिजोरियां खोलकर बाहर आ गए। संपन्न किसानों ने अपनी फसल का हिस्सा दान कर दिया, व्यापारियों ने सीमेंट और ईंटों के ट्रक मंगवा दिए, और गाँव के नौजवानों ने खुद मजदूरी करने का संकल्प ले लिया। यशोदा के सात सौ रुपयों की उस पवित्र पूँजी ने एक ऐसा चमत्कार कर दिखाया जो लाखों के सरकारी बजट से भी संभव नहीं था।

देखते ही देखते छह महीने के भीतर गाँव के बीचों-बीच एक भव्य और आधुनिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनकर तैयार हो गया।

उद्घाटन का दिन आया। गाँव को तोरण द्वारों और फूलों से सजाया गया था। जिले के बड़े-बड़े अधिकारी, नेता और पत्रकार वहाँ उपस्थित थे। सब सोच रहे थे कि फीता काटने के लिए किसी बड़े मंत्री या विधायक को बुलाया जाएगा। लेकिन जब उद्घाटन का समय हुआ, तो सरपंच शैलेंद्र खुद आगे बढ़ा। वह भीड़ को चीरते हुए पगडंडी की तरफ गया और यशोदा अम्मा का हाथ पकड़कर पूरे सम्मान के साथ मंच पर ले आया।

शैलेंद्र ने माइक पर गूंजती आवाज में कहा, “इस अस्पताल की नींव किसी सरकार या दौलतमंद की बदौलत नहीं, बल्कि यशोदा अम्मा के जीवन भर के तीर्थ की पवित्र पूँजी से रखी गई है। इस भवन की हर ईंट में इनकी ममता और त्याग की महक है।”

पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट और जयकारों से गूंज उठा। यशोदा के कांपते हाथों में जब कैंची थमाई गई, तो उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। जैसे ही उन्होंने लाल रिबन काटा, फूलों की वर्षा होने लगी। अस्पताल के मुख्य द्वार पर लगे संगमरमर के पत्थर पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—’यशोदा आरोग्य धाम’।

उस दिन यशोदा ने जब अस्पताल के भीतर कदम रखा, तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो वे सचमुच हरिद्वार की हर की पौड़ी पर खड़ी हों। उनके मन का कोना-कोना एक असीम शांति और दिव्यता से भर चुका था। उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा पूरी कर ली थी—मानवता की सेवा का तीर्थ।

क्या आपको भी लगता है कि पत्थरों के मंदिरों में जाने और नदियों में डुबकी लगाने से कहीं अधिक बड़ा पुण्य किसी बेबस और बीमार इंसान की जान बचाना है? यशोदा अम्मा के इस महान त्याग और स्वाभिमान पर आपकी क्या भावनाएं हैं, हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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